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बुधवार, 21 अक्टूबर 2015

छत्‍तीसगढ़ी कहानी

योग्यता के जांच


भोलापुर के राजा ह एलान करिस - ’’इहां के सब मास्टर मन भोकवा अउ लेदरा हवंय। न पढ़े बर जानंय, न पढ़ाय बर। विही पाय के इहाँ के पढ़इया लइका मन घला भोकवा अउ लेदरा हो गे हें; होवत जावत हें। कलेक्टर, डाक्टर, इंन्जिनियर, साहब, बने के तो बाते ला छोड़ दे, इहाँ कोनों लइका ह चपरासी बने के लाइक घला नइ हे। विही पाय के अब हम परदेस ले कोरी-खरिका, बने-बने पढ़े-लिखे, सीखे-सोधे मास्टर लान के, मास्टर मन के जम्मों खाली जघा म वोमन ला बइठारबोन। सब स्कूल मन ला ऊँकरे हवाला करबोन, अउ इहाँ के जम्मों लेदरा-पदरा गुरूजी मन ला कान पकड़ के गेटाउट करबोन।’’

राजा ह मनेमन डर्रावत रिहिस, कहूँ ये फैसला ला सुन के राजभर मा गड़बड़ी झन मात जाय। हड़ताल-प्रदर्शन के रहिद झन मात जाय; फेर वइसन कुछुच् नइ होइस। राजा हा चैन के साँस लिस। सिंहासन के पाया मन ल निहर के टमड़िस, देखिस, पहिली ले जादा मजबूत लागिस। अपन भौं मन ला हलाइस, आँखीं मन ला बड़े-बड़े छटकारिस, अउ टेड़गा हाँसी हाँस के मनेमन किहिस - ’इहाँ के जम्मों साले मन लेड़गा अउ कोंदवच् नइ हें, अंधरा अउ भैरा घला हें।’

दूसर दिन वोकर एक झन भेदिया ह आ के वोला चुपचाप बताइस - ’सरकार! मरहा राम ह थोरिक अँटियावत हे। इहाँ के पढ़े-लिखे लइका मन ल भड़कावत हे। लइका मन ल सकेल के हड़ताल करइया हे।’

राजा ह सोचिस, नानचुक चिंगारी ह घला जंगल के आगी बन जाथे। रमंज के तुरत-फुरत बुझा देना जरूरी हे। किहिस - ’जब देखो तब, ये साले मरहाच् राम ह काबर जादा अइंठथे रे। एकोदिन वोकर अकड़ ल बने असन टोरव तो। जावव अउ अभिचे वोला धर को लानव, पूछबो साले ल, काबर वो ह अतिक अकड़थे।’

राजा के सिपाही मन मरहा राम के गजब खातिरदारी करत वोला राजा के आगू हाजिर करिन। मरहा राम ह अपन दू-चार संगवारी मन ल घला सकेल के लाय रहय। सबो झन ल बढ़िया गदिया वाले कुरसी म बइठार दिन। महर-महर करत नास्ता-पानी परोस दिन। वो मन म कोनों घला ह अइसन कुरसी म बाप-पुरखा बइठे नइ रहंय; अइसे लगिस मानो जमीन म धंसत हें का। मरहा राम ह कहिथे - ’नरक म धंस जाबो का रे। ये ह कुरसी आय के नरक के दुवार आय?’ संगवारी मन ह सबो झन नास्ता झड़के म मगन रहंय; मरहा के बात ल सुन के ’हें, हें’ कर दिन।

राजा ह आइस, जय-जोहार होइस, चहा-पानी के बात पूछिस, निकता-गिनहा के बात होइस तब राजा ह कहिथे - ’मरहा राम! तुँहर गाँव के रामायन प्रतियोगिता के गजब सोर सुने हंव जी। जाय के अड़बड़ इच्छा होथे, फेर तुमन तो कभी नेवताच् नइ पठोवव भाई। एसो अउ बने धूमधाम से होना चाही। खर्चा-पानी के फिकर झन करना। येदे साहब खड़े हे न, जावत-जावत येकर डायरी म लिखा देहव। चाँऊर-नून बने मिलत हे के नइ? एसो अकाल पड़ गे हे, राहत कार्य के जरूरत पड़ही। कतका होना, वहू ल लिखा देना। तोर संग अभी जतका आय हें न, ये बाबू मन ह, सब पढ़े-लिखे हें तइसे लागत हे। उहाँ ये सब झन ल मेट अउ टाइमकीपर बना देबोन। अउ कुछू बात होही तब सीधा मोला फोन करबे। लेव अउ आहू।’

मरहा राम ह सोचिस, ये तो हमला कुकुर समझत हे। बात ल कहाँ ले कहाँ घुमावत हे। रोसिया के किहिस - ’करइया मन ह करावत होहीं जी, हमूं मन कराथन रामायन प्रतियोगिता। हमला इही बात करे बर बलाय हस का? बाहिर के आदमी ल सरकारी नौकरी देवत हस, हमर ये लइका मन घला पढ़े-लिखे हवंय, ये मन कहाँ जाहीं तउन ल बता?’

राजा तीर सबके जवाब रहिथे, सब जवाब रहिथे, मरहा राम ल समझाइस - ’तोर बात ह सही हे जी मरहा राम, यहू लइका मन पढ़े-लिखे हवंय, जउन मन पढ़ावत हें तउनो मन ह पढ़े-लिखे हें, हमू ल पता है, फेर हमला जउन योग्यता के जरूरत हे, इंकर मन तीर नइ हे, विही पाय के हम दूसर कोती के आदमी मन ल भरती करत हन।’

मरहा राम ह किहिस - ’जउन कोती के आदमी मन ल बलावत हस, वोमन कइसे नकलमारी करके परीक्षा पास होथंय, समाचार म हमू सब देखथन। बाहिर के मन इहाँ आ के इहाँ के मन ल कइसे लूटथें, वहू ल देखत आवत हन। ये लइका ह गणित पढ़े हे, ये ह विज्ञान पढ़े हे, का ये मन हा नौक्री के लाइक नइ हें?’

राजा ह किहिस - ’तोर बात ह सही हे जी मरहा, अतका देख-सुन के घला तुंहला परीक्षा पास करे के अकल नइ आइस। कोन ह धरे-चपके हे तुहंर हाथ ल? रहि गे तोर संग म आय ये लइका मन के बात, इंकर योग्यता ल जांचे बर मंय ह इंकर ले सवाल पूछत हंव। सही जवाब दे दिहीं ते अभी इंकर नौकरी पक्का कर देहंव।’

मरहा राम ह किहिस - ’अंतेतंते पूछ के फेल करे के उदिम झन कर जी, हमला सब पता हे।’

राजा ह किहिस - ’अंतेतंते काबर पूछबोन जी, सोज अउ सरल जोड़-भाग के सवाल हे। दू झन हें, दूनों बर एक-एक सावल पूछत हंव। सवाल नंबर एक येकर बर - ’तोर तीर दस ठन आमा हे, पाँच ठन ल कोनों ह नंगा के भाग गे, तोर तीर कतका आमा बाचही? सावल नंबर दो येकर बर - तोर तीर दस ठन आमा हे, एक झन कोनों दूसर संगवारी संग बराबर बाँटना हे, तोर भाग म कतका आमा आही? बने सोच के बतावव।’

सवाल सरल रिहिस - पहिली संगवारी, जेकर नाम लखन रिहिस, किहिस - ’पाँच आमा।’ दूसर सवाल के जवाब ओम प्रकास ह दीस - ’पाँच-पाँच आमा।’

राजा ह माथा धर के बइठ गे। किहिस - ’दिख गे तुँहर योग्यता ह। इही कारण हमला दूसर कोती के आदमी बलाय बर पड़त हे मरहा राम। सुन डरेस?’

मरहा राम ह किहिस - ’बने तो बताइन हे, अउ का जवाब दिहीं जी?’

राजा ह कहिथे - ’कस जी! तुँहर चीज ल कोनों ह चोरी करके भागही, कोनों ह सेतमेत म तुँहर चीज के बँटवारा मांगही, अउ तुम वोला सहज म दे देहू? वोला धर के रहपटियाहू नहीं? वोकर हाथ-गोड़ ल नइ टोरहू? आज तो तुम सब फेल हो गेव। तुँहला कोनों नौकरी नइ मिल सकय। कोनों दिन अउ सवाल पूछहूँ, बने तियारी करके आहू। जावव! तब तक गोहगोहों ले चाँऊर-नून खावव अउ रामायन प्रतियोगिता के तियारी करव।’
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रविवार, 23 जून 2013

संपत अउ मुसवा

उतेरा एसो गजब घटके रहय। माड़ी-माड़ी भर लाखड़ी, घमघम ले फूले रहय। मेड़ मन म राहेर ह घला सन्नाय रहय। फर मन अभी पोखाय नइ रहय, फेर बेंदरा मन के मारे बंाचय तब।
फुलबासन ह सुक्सा खातिर लाखड़ी भाजी लुए बर खार कोती जावत रहय। मेड़ के घटके राहेर के बीच चिन्हारी नइ आवत रहय। हरियर लुगरा, हरियरेच पोलखा, राहेर के रंग म रंग गे रहय।
 राहेरेच जइसे वोकर जवानी ह घला सन्नाय रहय।
फुलबासन, जथा नाम, तथा गुन। फूल कस सुंदर चेहरा। पातर, दुब्बर सरीर। कनिहा के आवत ले बेनी झूलत हे, जउन म लाल फीता गुंथाय हे। महमहाती तेल, क्रीम अउ पावडर लगा के जब गली खोर म निकलथे, चारों मुड़ा ह आमा बगीचा कस महमहाय लगथे। करिया करिया आंखी, कुंदरू चानी कस पातर पातर ओंठ, भरे पूरे छाती, देखइया के लार चुचवा जाथे। सात आठ बछर हो गे हे ये गांव म बिहा के आय, फेर लोग लइका एको झन नइ होय हे। वोकर घर वाला सुंदरू वोला अघातेच मया करथे। अपन आप ल भागमानी समझथे कि गांव भर ले जादा सुंदर बाई हे वोकर।
सुंदरू बारो महीना सहर म हमाली करे बर जाथे। भिनसरहच सायकिल धर के निकल जाथे। दिन भर खटथे। आठ नौ बजे रात के लहुटथे। घाम पानी म दिनभर कमाथे। पाइ-पाइ जोड़थे। एक कप चहा भले नइ पीही फेर फुलबासन के फरमाइस ल जरूर पूरा करथे।
फूलबासन जतका सुंदर हे, वोतकेच मटमटही अउ फूलकझेलक घला हे। फैसन म रत्ती भर के कमी नइ होना चाही। मुंहबाड़िन अतेक कि गांव के कोनों वोकर संग नइ पूर सकय। फेर वाह जी सुंदरू। बाई्र के कोनों किसम के तकलीफ ल देख नइ सकय।
फुलबासन के मोहनी म सुंदरू ह तो मोहाएच हे, गांव भर के बुढ़वा जवान मन घला मोहाय हें। फुलबासन के सुभाव घला फूलेच सरीख हे। फूल ह भला कते भंवरा ल मना करथे? सब बर रस छलकत रहिथे।
मुड़ी म खाली टुकनी बोहे, राहेर मेड़ म मठरत-मठरत, ददरिया झोरत, एती ले फुलबासन जावत रहय। ओती ले मुसमुसात मुसवा राम आवत रहय। बीच मेड़ म ओरभेटठा हो गे।
मुसवा राम बढ़ावल नाम आय। वोकर असली नाम हाबे भुलवा राम। आदत सुभाव हे मुसवा सरीख। जेकर नही तेकर कोठी म बिला कर करके धान फोले म माहिर। ताकइया ह ताकते रहि जाथे, मुसवा राम ककरो सपड़ म नइ आवय। गांव के नामी डाक्टर। गुल्लूकोस, पदीना अउ दराक्छस (ग्लूकोज, पोदीना और द्राक्षासव )म सब किसम के बीमारी ल ठीक कर डारथे। लाख मर्ज के एके दवा। जउन बीमारी ह ये दवा मन म बने नइ होवय, तउन ह पक्का बाहरी हवा होथे। कोनो सोधे बरे के कारू नारू। तब? झाड़-फूंक, तेला-बाती बर घला उस्ताद हे। दारू-कुकरी के जुगाड़ होनच हे।
मुसवा राम म अतकेच खूबी होतिस तब तो। वो आय पक्का गम्मतिहा। नाचा-पेखा म जोक्कड़ बन के परी मन संग जब बेलबेलाथे, देखइया मन म चिहुर उड़ जाथे। पेट रमंज रमंज के हांसथें। समझ लेव हीरो नं. वन। असल जिंदगी म घला वो ह वइसनेच हे। वोकर बात सुन सुन के कतरो जती-सती रहंय, मोहा जाथें।
फुलबासन ददरिया झोरे म मस्त रहय। मुसवा राम के गम ल नइ पाइस। फेर मुसवा राम मुसवच आय। दुरिहाच ले वो ह फुलबासन ल ओरख डारे रहय। जान सुन के गउखन बने रहय। ओरभेट्ठा करे के ताक म तो सबर दिन के रहय। गांव नता म फुलबासन ह मुसवा राम ल कुरा ससुर मानथे। कट खाय रहिगे। आसते ले खखार के मुसवा राम ह आगू म खड़े हो गे। रद्दा बंद। फुलबासन ह हड़बड़ा गे। एती मुंड़ के गिरत चरिहा ल संभाले के उदिम करिस, त ओती छाती के अंचरा ह कनिहा म झूल गे। सरम के मारे वोकर मुंहू-कान ह ललिया हे।
बारा घठैंादा के पानी पियइआ मुसवा राम, फेर लहर-लहर लहरा मारत, अथाह गहिरी, अइसन घाट वो ह कभू नइ देखे रिहिस। देखिस त देखते रहि गे। जनम के बेलबेलहा, फेर चेत सुरता अइसे हराइस के सब भुला गे।
फुलबासन ह वोकर ले का कम हे? भांप गे कि मुसवा राम ह बिला ले बाहिर निकले बर अकबकावत हे फेर रद्दा नइ पावत हे। थोरिक देर अउ अकबकावन दिस तब अपन अंचरा ल सोझियावत किहिस -’’टार हो बड़का, खांसो खखारो घला नहीं।’’
मुसवा राम अब अपन होस म आ गे रहय। कहिथे -’’ये ले, छोटकी के बात। काला टेंकाय हाबन भइ, तेला टारबोन। तुम्हीं बताव।’’
मुसवा ह कहिथे -’’हमर देवता ह नइ रुसाय। तुंहरे ह रुसाय होही। कहू त मनाय बर नरिहर धर के संझा बेरा आ जाहूं।’

फुलबासन कुछू नइ बोलिस। मुच ले हांस दिस। कनखही देखत, कनिहा ल मटकावत, मुसवा राम ल रगड़त आगू बढ़ गे। मुसवा राम ह पथरा कस मुरती जिहां के तिहां ठाढ़े रहिगे।
तीन चार खेत के दुरिहा म संपत महराज के खेत हे। वहू ह चरवाहा-बनिहार मन संग ढेंखरा कंटवाय बर आय रहय। फुलबासन अउ मुसवा राम ल राहेर झुंझकुर ले निकलत देख डारथे। का गुलाझांझरी होइस होही, समझे म वोला देर नइ लगिस। मने मन कहिथे -’’आज तोला देखहूं रे मुसवा, कइसे बोचकबे ते।’’
संपत महराज के चरित्तर के का बखान करंव। पुरखा मन गांव के जमींदार रिहिन। ये गांव म उंखरे राज चलय। परिवार बाढ़त गिस, जमीन खिरत गिस। कका-बबा, भाई-भतीजा मन पढ़-                लिख के डाक्टर, इंजीनियर बन गे हें। नेतागिरी म तो इंखर मन के खंबा गड़ेच हे। सब झन सहर म जा के बस गे हावंय। संपत महराज गांवेच म अटके पड़े हे। पढ़इ- लिखइ म चेत नइ करिस। छोट-मोट नौकरी करे म इज्जत जातिस। सहर म दाल नइ गलिस तब इहां अपन रौब झाड़त रहिथे। जनम के अंखफुट्टा। ऊपर छांवा तो गांव भर ल नाता गोता मानथे, फेर मतलब के सधत ले।
मुसवा राम ह नांगनाथ आय, त संपत महराज ह सांपनाथ हरे।
फुलबासन के न तो सास-ससुर संग बनिस, न देरानी-जेठानी संग। पठोनी आय छै महिना घला नइ पूरिस, सुंदरू ल अइसे पाठ पढ़ाइस कि चुल्हा चक्की सब अलग हो गे। घर दुवार धला अलग हो गे।
सुंदरू ह गजब रात के लहुटथे। नरिहर चढ़इया मन इही बेरा के अगोरा करत रहिथें।
बियारी के बेरा रिहिस। निझमहा देख के मुसवा राम ह फुलबासन देबी के मंदिर म नरिहर चढ़ाय बर पहुंच गे। मुहाटी बंद रहय। जइसने खोले के उदिम करिस, अपने अपन खुल गे। संपत महराज ह तोलगी भीरत सुटुर सुटुर निकलत रहय। दुनों के दुनों हड़बड़ा गें। संपत महराज ह कहिथे -’’अरे मुसवा, तहूं आय हस? हाथ-गोड़ के पीरा म बिचारी ह गजब कांखत हे। फूंुके बर बलाय रिहिस। फूंकत ले गजब जम्हाय हंव। बैरासू धरे होही। तोरे ह काट करे त करे। जा तहूं फूंक देबे। अबड़ तकलीफ म हे बिचारी ह।
मुसवा राम सुट ले बिला म खुसर गे।