गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

व्यंग्य

व्यंग्य

बहुरूपिया

दो समाज सेवक हैं। इन दोनों को देखकर बड़ा ताज्जुब होता है। शारीरिक संरचना, चेहरा-मोहरा, व्यवहार-विचार, और प्रवृत्तियाँ सब कुछ एक जैसे; मानो जुड़वाँ हों।

पहला व्यक्ति है मालिकचंद, यथा नाम तथा गुण। ये बहुत बड़े कारोबारी हैं। इनके हजारों कर्मचारी हैं। कर्मचारियों को विधि द्वारा स्थापित नियमों के अनुसार वेतन-भत्ते दिये जाते हैं। नियम के मुताबिक कर्मचारियों को प्रतिमाह वेतन भुगतान हो जाने चाहिए, पर ऐसा कभी होता नहीं है। वेतन के लिए कर्मचारियों को कभी-कभी दो-दो, तीन-तीन माह, और कभी इससे भी अधिक समय तक मुँह ताकना पड़ जाता है। इसके पीछे मालिक के पास अनेक औचित्यपूर्ण कारण होते हैं। वेतन के लिए प्रतीक्षा करना और बिना वेतन के काम करना कर्मचारियों की मजबूरी है।

कर्मचारियों की और भी मजबूरियाँ हैं।

मजबूरियाँ सबसे बड़े नियम होते हैं, और ये मालिक के पक्ष में जाते हैं। मजबूरियाँ मनुष्य को आक्टोपस की तरह जकड़े रहते हैं। 

मालिकचंद के आॅफिस के पास ही दूसरे च्व्यक्ति, सेवकचंद का आॅफिस है। जरूरतमंदों की सहायता करना इनका काम है। ये सूद पर पैसा बाँटने का काम करते हैं। इनका कहना है कि सूद का यह काम वे किसी व्यावसायिक उद्देश्य या लाभ के लिए नहीं करते हैं; समाज-सेवा के लिए करते हैं। यही कारण है कि उधार के रकम पर इनका ब्याजदर बाजार में प्रचलित दर से कम होता है। सूद पर रकम बांटने के अलावा ये दुकानदारी का काम भी करते हैं। इनकी दुकान पर मालिकचंद के सभी जरूरतमंद कर्मचारियों को तमाम तरह की उपभोक्ता वस्तुएँ सहज ही उधार पर उपलब्ध कराई जाती हैं। सेवकचंद अपने नियमों के मामले में बड़े सख्त हैं। मालिकचंद के सारे कर्मचारी और आस-पास के दूसरे कंपनियों के अधिकांश वेतनभोगी इनके बंधे-बंधाये ग्राहक हैं। समाज सेवा के इस काम के सारे नियम इन्हीं के बनाये हुए हैं। पहले ही नियम के अनुसार बांटे गये सारे रकम ब्याज सहित कर्मचारी उर्फ ग्राहक के वेतन से कटकर सीधे इनके खाते में चले आते हैं। कर्मचारियों के खाते में शेष रकम कुछ ही दिन साथ दे पाते हैं। यह क्रम सालों से चल रहा है।

लोग हकीकत जानते हैं; मालिक चंद बहुत बड़ा बहुरूपिया है। मालिकचंद ही स्वांग रचकर सेवकचंद के रूप में बैठा है।
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kuber

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