शनिवार, 18 अक्तूबर 2014

कविता


क और ख


क और ख
दोनों में मित्रता हो जाती है
दोनों जब अपने-अपने घरों से निकल रहे होते हैं।

क और ख
दोनों कभी नहीं लड़ते
दोनों जब साथ-साथ काम की ओर जा रहे होते हैं।

क और ख
दोनों रोटी का धर्म समझ और समझा रहे होते हैं
दोनों जब साथ-साथ पसीना बहा रहे होते हैं।

क और ख
दोनों एक ही बात दुहरा रहे होते हैं
काम से थक कर दोनों जब सुस्ता रहे होते हैं।

क और ख
दोनों के चेहरे एक से दिखते हैं
भूख से दोनों के पेट जब बिलबिला रहे होते हैं।

क और ख
दोनों के चेहरे एक से खिलते हैं
किसी बात पर दोनों जब खिलखिला रहे होते हैं।

क और ख
दोनों के धर्म एक हो जाते हैं
हाथों में जब दोनो फावड़ा और कुदाल उठा रहे होते हैं।

क और ख
दोनों के धर्म बदल जाते हैं
हाथों में जब दोनों अपने धर्मग्रंथ उठा रहे होते हैं।

क और ख
दोनों कभी नहीं मिलते
दोनों जब अपने-अपने घरों में रह रहे होते है।

क और ख
दोनों एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं
अपने-अपने इबादतगाह की ओर दोनों जब जा रहे होते हैं।
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kuber

सोमवार, 6 अक्तूबर 2014

समीक्षा

 समकालीन साहित्य का ’मैं’ और ’तुम’


प्रश्न - आपने कहा - समकालीन साहित्य में ’मैं कौन हूँ’ की जगह ’हम कौन हैं’ पर चिंतन होता है। इसे समझायेंगे?


उत्तर - बिलकुल! ’मैं कौन हूँ’ का चिंतन भारतीय दर्शन का केन्द्रबिन्दु रहा है। इसकी अवधारण नितांत वैयक्तिक है जो हमें अध्यात्म की ओर ले जाता है। जीवन के यथार्थ से या यथार्थ की दुनिया से इसका क्या संबंध है? अथवा इसका सामाजिक सरोकार क्या है? ’’मैं नीर भरी दुख की बदली,’’ में ’मैं’ की अभिव्क्ति नितांत निजता की अभिव्यक्ति है। क्या इसका कोई सामाजिक सरोकार बनता है? लेकिन निराला जब कहता है - ’’ठहरो, अहो! मेरे हृदय में है अमृत, मैं सींच दूँगा। अभिमन्यु जैसे हो सकोगे तुम, तुम्हारे दुख, मैं अपने हृदय में खींच लूँगा।’’  तब निराला का ’मैं’ दुनिया के उन तमाम विचारवान लोगों का ’मैं’ बन जाता है जो ’तुम’ अर्थात् दुनिया के सारे शोषितों और वंचितों के प्रति सक्रिय सहानुभूति रखते हैं। उनकी दुनिया बदलने के लिए कुछ करना चाहते हैं। उनकी पीड़ा को आत्मा की गहराई से अनुभव करना चाहते हैं। और इसी तरह जब मुक्तिबोध कहता है - ’’मैं तुम लोगों से दूर हूँ, तुम्हारी प्रेरणओं से मेरी प्रेरणाएँ इतनी भिन्न है, कि जो तुम्हारे लिए विष है, वह मेरे लिए अन्न है।’’ तब मुक्तिबोध का, तेलिया लिबास में काम करता हुआ मैकेनिक ’मैं’ दुनिया भर के गरीब-मजदूरों और शोषितों का प्रतिनिधि बन जाता है और उसका ’तुम’ दुनिया भर के शोषकों-वंचकों का प्रतीक बन जाता है। इसीलिए मैं कहता हूँ, समकालीन साहित्य ’मैं’ का साहित्य नहीं है, ’हम’ का साहित्य है और इसीलिए मुक्तिबोध यहाँ पर मुक्ति ’मैं’ में नहीं ’हम’ में तलाशते हैं। समकालीन साहित्य आपको स्वर्ग और नरक के भूल-भुलइया में नहीं उलझाता। यदि आपका जीवन दुखों से भरा हुआ है तो उसका कारण भी इसी दुनिया में मौजूद है, और सुखमय जीवन के लिए आपको किसी स्वर्ग की जरूरत नहीं है। स्वर्ग भी इसी दुनिया में मौजूद है।

आपको वह बोध-कथा याद ही होगा? नाव से नदी पार करते हुए पंडितजी नाविक से कहता है कि अरे मूर्ख! वेद शास्त्र नहीं पढ़ने से तो तेरा आधा जीवन बेकार चला गया। तभी आँधी और बरसात के कारण नाव डूबने लगती है। पंडितजी को तैरना नहीं आता था। नाविक ने कहा - ’’पंडितजी, क्या आपके पोथी-पुराणों ने आपको तैरना नहीं सिखाया? तब तो आपका पूरा जीवन ही व्यर्थ चला गया।’’

जिस किताबी ज्ञान से नदी पार न किया जा सके, उससे भवसागर पार किया जा सकता है? जो किताबी ज्ञान प्राणों की रक्षा न कर सके, वा हमें मोक्ष देगा? कितना भद्दा मजाक है।

समकालीन साहित्य एक बेहतर समाज की बात तो करता है।
kuber