गुरुवार, 3 सितंबर 2020

निबंध - शब्द के ज्ञान अउ लोक के ज्ञान

 निबंध

शब्द के ज्ञान अउ लोक के ज्ञान

कुबेर

 

श्रीमद्भागवत गीता के दूसरा अध्याय के अट्ठारवाँ श्लोक म भगवान हर अर्जुन ल केहे हे -

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।

अनाशिनोेप्रमेयस्य तस्माद्युष्यस्व भारत।  

(इस नाशरहित, अप्रमेय, नित्यस्वरूप आत्मा के ये सब शरीर नाशवान कहे गये हैं। इसलिए हे भरतवंशी अर्जुन! तू युद्ध कर।) 

आत्मा ह नाशरहित, अप्रमेय, अउ नित्यस्वरूप हे। हे अर्जुन, तंय युद्ध कर। 

अप्रमेय के मतलब होथे, जउन ल न तो प्रमाणित करे जा सके अउर न तो सिद्ध करे जा सके। रेखागणित म हम प्रमेय के बारे म पढ़थन। येमा बहुतअकन प्रमेय मन ल हम नियम अउ तर्क के आधार म सिद्ध करथन। पन रेखागणित म घला कुछ प्रमेयमन अइसन होथें जउन ल प्रमाणित करे के जरूरत नइ पड़य, काबर कि वोमन अपनआप में खुद सिद्ध रहिथें। 

प्रकृति अउ प्रकृति के सबो अंग - धरती, पहाड़, नदिया, समुद्र, येमन ल कइसे सिद्ध करबे अउ येमन ल सिद्ध करे के का जरूरत हे। चंदा, सुरूज, अगास, अउ ब्रह्माण्ड ल कइसे सिद्ध करबे। येमन अपन आप म सिद्ध हवंय, स्वयंसिद्ध हवंय। येमन ल सिद्ध करेबर सब नियम, सब तर्क अउ सब शब्दमन व्यर्थ हें। वइसने आत्मा हर घला स्वयंसिद्ध अउ स्वयं प्रमाणित हे। आत्मा ल परमात्मा के अंश माने जाथे। जब अंश हर स्वयंसिद्ध हे तब तो परमात्मा हर तो पूर्ण हे, वोल सिद्ध करे के का जरूरत हे? 

कबीर साहब ह कहिथें -

’’शब्द-शब्द सब ही कहे, वो तो शब्द विदेह।

जिभ्या पर आवे नहीं, निरखि-निरखि कर लेह।।’’

(समस्त संसार ईश्वर को शब्द के माध्यम से जानना चाहता है, परंतु ईश्वर तो शब्द से परे हैं। वह जीभ पर आयेगा नहीं, उसे तो आत्मचिंतन से प्रसूत ज्ञान से ही प्राप्त किया जा सकता है।) 

संसार के जम्मो पंडितमन आत्मा अउ परमात्मा, स्वर्ग अउ नरक, मोक्ष अउ बंधन, धर्म अउ अधर्म के जतका व्याख्या करथें, सब शब्द हरे। व्याख्या चाहे बोल के करे जाय या लिख के, सब शब्द हरें। शब्द मतलब वोतकच् नइ मानना चाही, जतका ल बोल के प्रगट करे जाथे। आत्मा अउ परमात्मा, स्वर्ग अउ नरक, मोक्ष अउ बंधन, धर्म अउ अधर्म के व्याख्या करइया, संसार के जम्मो धर्मग्रंथ मन घला शब्देच् आवंय। 

शब्द ह जीभ के विषय हरे। प्रकृति हर जीभ बर दो कार्य निर्धारित करे हे - पहला, शब्द के उच्चारण करना याने बोले के काम जेकर ले भाषा के निर्माण होय हे। अउ दूसरा, भोजन के स्वाद के पता करना अउ वोला लीले म सहायता करना। पन मनुष्य ह बड़ा चतुर होथे। हमन अपन चतुराई से भोजन करे के अलावा जीभ के खातिर एकठन अउ काम खोज डरे हन - भोजन के व्यवस्था याने जुगाड़ करे के काम। प्रकृति हर जीभ ल भोजन के स्वाद पता करे बर बनाय हे। हमन वोला भोजन के व्यवस्था करे के काम म घला लगा दिये हन। भोजन के व्यवस्था करे के ये उपरहा काम हर जीभ के काम नो हे। जीभ हर भोजन ल लीले के काम कर सकथे, भोजन के व्यवस्था करे के काम ल ये हर कइसे करही, ये काम हर वोकर स्वभाव म नइ हे। जीभ कना तो मात्र शब्द हे। शब्द हर जीभ के शक्ति हरे। अउ जब हम जीभ ला भोजन के व्यवस्था करे के उपरहा काम म लगाथन; जउन हर वोकर खातिर सर्वथा अप्राकृतिक काम हरे; तब वोहर ये काम ल सिद्ध करे बर इही शक्ति के प्रयोग ल करथे। शब्द द्वारा भोजन के व्यवस्था करे के काम ह शब्द के दुरुपयोग हरे, जीभ के दुरुपयोग हरे। 

केहे गे हे, ’मन हरे, ते धन हरे’। ककरो धन ल हरना हे ते पहिली वोकर मन ल हरव। अउ ये काम खातिर शब्द ले बढ़के अउ कोनो दूसर हथियार अउ कहाँ मिलही? ’राम नाम जपना, पराया माल अपना’। मनुष्य हर आजतक जतका दुरुपयोग शब्द के करे हे वोतका अउ दूसर जिनिस के नइ करे हे। अउ जब शब्द के दुरुपयोग होही तब दुनिया म संकट तो पैदा होहिच। भोजन के व्यवस्था करना जीभ के काम नो हे अउ वोला हम भोजन के व्यवस्था करे के काम म लगा दे हन। परिणाम सामने हे। समाज म दुनिया भर के गड़बड़ी अउ संकट के जनम हो गे। ठगफुसारी, धोखादारी अउ दगाबाजी के जम्मो काम शब्द बिना संभव नइ हे, अउ येकर बिना जीभ हर भोजन के व्यवस्था कइसे करही? 

भोजन के व्यवस्था करे बर काम करे के जरूरत पड़थे, मेहनत करे के जरूरत पड़थे। अउ काम करे बर प्रकृति हर हमर हाथ-गोड़ ल बनाय हे अउ वोला ताकत देय है। इही पाय के केहे गे हे, ’’बहाँ भरोसा, तीन परोसा’’। भोजन के उत्पादन करे के काम ल समाज म किसान अउ बनिहारमन करथें। समाज के जम्मो श्रमवीर; किसान अउ बनिहारमन सांझे-बिहाने, घाम-सीत सहिके, जांगर पेर के, अनाज पैदा करथें। अउ समाज के जम्मो जांगरचोर, श्रमचोर अउ कामचोर मन शब्द के जाल म वोमन ल फंसा के उंकर पैदा करे भोजन, उंकर धन के हरन करथें। 

कबीर साहब ह आगू कहिथें -

’’पांच तत्व का पूतरा, युक्ति करी मैं कींव।

मैं तोहि पूछौं पांडिता, शब्द बड़ा कि जीव।।’’

(पांच तत्व के इस पुतले की रचना मैंने क्यों किया? पंडितों! मैं तुम लोगों से पूछता हूँ, शब्द बड़ा है कि जीव बड़ी है?) कबीर साहब ह दुनिया के तमाम पंडितमन ले पूछत हें - ’’पांच तत्व के ये पुतरा ल, अबड़ जोगासन से मंय ह काबर बनाय हंव? अजी पंडित हो! बतावव, ’मोर बनावल’ ये पुतरा अउ येकर अंतस के जीव हर बड़े हे कि ’तुंहर बनावल’ ये शब्द मन हर बड़े हें? जीवात्मा हर बड़े हे, मनुष्य हर बड़े हे कि तुंहर शब्दमन, तुंहर पोथी पुरानमन बड़े हें?’’

एकठन क्षेपक कथा हे, आप सब येला जरूर सुने होहू। चारों वेद, छहों शास्त्र अउ अठारहों पुरान के परम ज्ञाता एकझन प्रकांड पंडित रिहिस। समाज म वोकर बिकट मान-सनमान रिहिस। शस्त्रार्थ म वोला कोनो नइ हरा सकंय। वोहर जिहाँ जावय, अपन पोथी-पुरान ल धर के जावय। एक घांव वोला नदिया पार करके दूसर गाँव जाना रिहिस। नदिया म आट-पाट पूरा आय रिहिस। वोहर अपन पोथी-पुरान ल धर के डोंगा म बइठ गे। चलत-चलत वोहर डोंगहार ल पूछथे; ’’कसजी डोंगहार, तंयहर वेद-शास्त्र के बारे म कुछू जानथस कि नहीं?’’ 

डोंगहार हर किहिस; ’’वेद-शास्त्र के बात ल हम का जानबोन महराज।’’

पंडितजी हर वोकर हिनमान करत किहिस; ’’अरे मूर्ख! तब तो तोर एक चैथाई जिंदगी हर बेकार हो गिस। अब ये बता, पुरान अउ दूसर ग्रंथमन के बारे म जानथस’’?

डोंगहार हर किहिस; ’’डोंगा चलाय के सिवा मंयहर अउ कुछुच नइ जानंव महराज’’।

पंडितजी हर वोकर फेर हिनमान करिस; ’’तब तो तोर आधा जिनगी हर बेकार होगे।’’ तभे अगास म करिया बादर घुमड़े लगिस। जोर-जोर से बड़ोरा चले लगिस। बिजली कड़के लगिस अउ सूपाधार पानी बरसे लगिस। पंडितजी के पोथी-पुरान के भार म डोंगा हर वइसने डगमग-डगमग करत रहय अब तो डोंगा हर बूड़े लगिस। डोंगा ल बूड़त देखके डोंगहार हर पंडितजी ल पूछिस, ’’तंउरे बर आथे कि नहीं महराज! डोंगा हर तो अब-तब बूड़नेचवाला हे?’’

पंडितजी हर डर के मारे कांपत रहय, किहिस, ’’मूरख! पानी म तंउरे के बात हर कहीं वेद-शास्त्र म लिखाय रहिथे?’’

डोंगहार हर किहिस; ’’महराज! तब तो तुंहर पूरा जिनगी हर बेकार हो गे।’’

डोंगा हर बूड़ गिस। संग म पंडित अउ वोकर जम्मों पोथी-पुरानमन घला बूड़ गिन। डोंगहार हर तंउर के वो पार निकल गिस।

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हो सकथे, ये कहानी हर काल्पनिक न होके सचमुच के घटल कोनो घटना होही, कभू घटे रिहिस होही। पन मंयहर येला एक लोक मिथक मानथंव। लोक मिथक ये पाय कि येहर पंडित अउ पोथी परंपरा के विपरीत अउ लोक परंपरा के पक्ष म हे। चाहे जइसे भी होय, येमा दू बात बड़ा महत्वपूर्ण हे, सोचे अउ विचार करे के हे। सोचे के पहिली बात हरे, शास्त्रमन म भवसागर के बात लिखाय हे, वैतरणी के बात लिखाय हे अउ वोला तंउर के पार करे के उपाय मन घला लिखाय हें। वोमन ल पढ़ के, सुन के, रट के तंउरे बर आ जाही का? शास्त्र मन म नदिया के पानी म तंउरे के बात घला लिखाय रहितिस, अउ पानी म तंउरे के नियम-तरीका घला लिखाय रहितिस तब घला का वोला पढ़के कोनो हर तंउरे बर सीख जाही? तंउरे के नियम अउ तरीकामन ल रटके कोनो हर तंउरे बर नइ सीख सकय। तंउरे बर सीखना हे तब हमला नदिया के पानी म उतरनच् पड़ही। जउन हर पानी म उतरथे विही हर तंउरे बर सीखथे। तंउरे बर कोनो ल किताब म लिखाय तंउरे के नियम ल रटे के कोनो जरूरत नइ हे। किताब के रटे नियममन नंदिया के पूरा-पानी म कोनो काम नइ आवंय। 

भव माने संसार होथे। भवसागर ल तंउर के नहकना हे तब हमला भवसागर के जल म उतरके उहाँ तंउरे के अभ्यास करे बर पड़ही। संसार ले दुरिहा रहिके कोनो हर संसारसागर ल, भवसागर ल तंउर के नहक नइ सकय। वैतरणी ल तंउर के नहकना हे तब हमला संसार रूपी वैतरणी के जल म उतरके उहाँ तंउरे बर सीखे ल पड़ही। मठ अउ मंदिरमन म खुसर के, पोथी-पुरन ल रटे जा सकथे, भवसागर ल तंउरे के नियम अउ तरीका ल रटे अउ सीखे जा सकथे, पन तंउरे के मरम ल नइ सीखे जा सकय। कबीर साहब हर केहे हें - 

’’टोपी पहिरे, माला पहिरे, छाप तिलक अनुमाना।

साखी, शब्दे गावत भूले, आतम खबर न आना।।’’

(टोपी पहिनकर, माला पहिनकर, छाप-तिलक लगाकर आप परमात्मा की खोज में भटक रहे हैं। साखी और सबद को तो रट लिये हो पर परमात्मा को भूल गये हो। इससे न तो आत्मा का ज्ञान हो सकता है, और न परमात्मा का।) 

टोपी पहिनके, माला पहिनके, छाप-तिलक लगाके आप परमात्मा के खोज म भटकत हव। साखी अउ सबद ल रट ले हव अउ परमात्मा ल भुला गे हव। येकर से न तो आत्मा के ज्ञान हो सकय, अउ न परमात्मा के।

शब्द से आत्मा अउ परमात्मा के ज्ञान नइ हो सकय।

सोचे के दूसर बात हे, जउन ज्ञान हर जीवन नइ दे सकय, वोहर मोक्ष कइसे दे सकही? जउन ज्ञान हर नदिया ल पार नइ करा सके वोहर भवसागर ल कइसे पार कराही? शब्द से कोनो ल जीवन नइ मिले। जीवन मिलथे हमला अन्न से। अन्न उपजाय के ज्ञान अउ सामथ्र्य दुनिया के कोनो शब्द म; कोनो धर्म ग्रंथ म नइ हे। अन्न उपजाय के ज्ञान लोक के पास हे। किसान अउ मजदूर के पास हे। बिना ज्ञान के अन्न हर घला नइ उपजे। किसान हर ये ज्ञान ल अपन परंपरा अउ अपन अनुभव से सीखथे। पोथी पढ़के नइ सीखे, खेत म जांगर टोर के सीखथे। पन दुख के बात हे, लोक के, किसान के जउन ज्ञान से अन्न उपजथे, अउ जेकर से हमला जीवन मिलथे, वोला हम ज्ञान नइ मानन। जिंकर कना अतना अनमोल ज्ञान हे, जीवन देनेवाला ज्ञान हे, वोमन ल पंडित मन हर मूरख अउ अज्ञानी सिद्ध करके बइठे हें। काबर कि येकर ले पंडितमन ल इंकर परिश्रम के हरण करे के, इंकर शोषण करे के सहूलियत मिल जाथे। जउन लोकज्ञान ले जीवन देनेवाला, अमृत समान अन्न पैदा होथे वो ज्ञान के कोनो मोल नइ हे अउ जउन शब्द ज्ञान ले अन्न के एक दाना पैदा नइ करे जा सके वोहर सर्वश्रेष्ठ हे, मोक्ष देनेवाला हे। वाह भई वाह! 

जउन ज्ञान हर जीवन नइ दे सकय वो हर मोक्ष दीही कि जीवन देनेवाला ज्ञान हर मोक्ष दीही? आदमी हर जब खेती करना सीखिस तब जम्मों कला के विकास होइस। सभ्यता के विकास होइस। दुनिया हर सभ्य बनिस। दुनिया के सब्बो कला, संगीत, साहित्य अउ धर्म के जनम, पालन अउ विकास के मूल म खेती हवय। पन पंडितमन के परंपरा म ये ज्ञान के कोनो मोल नइ हे। मोल हे खाली शब्द ज्ञान के, जेकर से जीवनदायिनी अन्न के एकठन दाना घला पैदा नइ करे जा सके। केवल लोक समुदाय के मन म डर पैदा करके वोला ठगे जा सकथे, वोकर शोषण करे जा सकथे। लोक हर अतका मूरख घला नइ हे। पंडित अउ वोकर पोथी-पुराण के मरम ल वो हर बनेच ढंग ले जानथे तभे तो एक ठन हाना प्रचलित हे, ’’जब भरे खोचका डबरा, तब जाने बाम्हन पदरा।’’

श्रीमद्भागवत गीता के दूसरा अध्याय के तिरपनवाँ श्लोक म भगवान हर अर्जुन ल केहे हे -

’’श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।

समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि।।’’

(भांति-भांति के वचनों को सुनने से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मा में अचल और स्थिर ठहर जायेगी तब तू योग को प्राप्त हो जायेगा अर्थात् तेरा परमात्मा से नित्य संयोग हो जायेगा।) शब्द हर बुद्धि ल चलायमान अउ अस्थिर करथे। चलायमान अउ अस्थिर बुद्धि से परमात्मा के प्राप्ति नइ हो सकय। दुनिया के सबो पोथी-पुराणमन बुद्धि ल चलायमान अउ अस्थिर करनेवाला हें। इही पाय के कबीर साहब हर केहे हें -

’’पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय।

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।।’’

पोथी पढ़के कोनो ज्ञानी नइ बन सकय। ज्ञानी बने बर प्रेम के ढाई आखर ल पढ़े के जरूरत हे। बिना प्रेम के न तो अखण्ड आनंद मिल सकय, न मोक्ष मिल सकय अउ न परमात्मा। प्रेम के प्राप्ति प्रेमेच ले होथे, शब्द ले नइ होवय। कबीर साहब हर केहे हें - 

’’प्रेम न बारी ऊपजे, प्रेम न हाट बिकाय।

राजा, परजा जो चहे, सीस देय लइ जाय।।’’

***kuber***

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