सोमवार, 18 मई 2026

आलेख - khuman sao

 स्मृतियों के सुवासित पुष्प

(संपादकीय)

1969 में हमारे गाँव में बिजली आई तो कुछ ही दिनों में घर में बिजली से चलने वाला रेडियो भी आ गया। इसके पहले रात्रि जेवन के बाद पड़ोसी चाचा के, सेल से चलने वाले जापानी याशिका ट्रांजिस्टर से गाँव के अन्य बड़े-बुजुर्गों के साथ अपने ही चैरा में बैठकर मैं भी गीत-संगीत का आनंद लिया करता था। आकाशवाणी रायपुर से प्रसारित बरसाती भइया का चैपाल सबका पसंदीदा कार्यक्रम हुआ करता था। अपनी गुरतुर छŸाीसगढ़ी भाषा में खेती-किसानी के गोठ-बात के बीच-बीच में पारंपरिक छŸाीसगढ़ी गीतों - बांस गीत, सुवा गीत, गौरा गीत, ददरिया आदि को सुनकर मन आनंद से भर जाता था। सास गारी देवय ..., तोला जोगी जानेव गा भाई .... खुसरा चिरई के बिहाव .. मोर छत्तीसगढ़ ल कहिथे भइया धान के कटोरा भइया ..... जैसे गीतों की ठसक अलग ही हुआ करती थी। इसी बीच, मंय बंदत हंव दिन रात ओ मोर धरती मइया, मोर संग चलव रे मोर संग चलव गा, मन डोले रे मांघ फगुनवा रस घोले रे मांध फगुनवा जैसे और भी सुमधुर गीतों की मनभावनी बयार चलने लगी। और सुनने वालों के मन में यह जानने की सहज उत्सुकता होने लगी कि छŸाीसगढ़ के लोगों को सम्मोहित करने वाले इन गीतों को बनाने वाले कौन लोग हैं? और जब किसी तरह यह जानकर उत्सुकता शांत हुई कि इन गीतों को लिखने वाले और गाने वाले का नाम लक्ष्मण मस्तुरिहा है, संगीतकार का नाम खुमान साव है तब एक और नई उत्सुकुता मन में जागने लगी कि आखिर ये विलक्षण कला साधक किस गाँव के रहने वाले हैं? देखने में कैसे हैं? दिव्य पुरुषों की तरह दिखते हैं या किसी जादूगर की तरह? 

अब खुमान साव और लक्ष्मण मस्तुरिहा किंवदंती बन चुके थे। मेरे लिए भी ये किंवदंती बन चुके थे। इन्हें प्रत्यक्ष देखने की साध लिए दिन और साल गुजरते गए। धीरे-धीरे मैं भी कुछ लिखने लगा और साहित्यकारों के बीच बैठने का अवसर मिलने लगा। 23 मार्च 1999 के दिन हम सुरगी अंचल के रचनाकारों ने मिलकर सुरगी में ’साकेत साहित्य परिषद’ का गठन किया। 

01 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य बना। अजीत जोगी पहले मुख्यमंत्री बने। श्री जोगी साहित्य और कला के प्रति संवेदनशील थे। प्रत्येक जिले में जिला स्तर पर साहित्य और कला के वार्षिक आयोजनों के लिए वे शासकीय अनुदान देने लगे। इसी योजना के तहत 17 मार्च 2002 के दिन राजनांदगाँव के दिग्विजय स्टेडियम के सभागार में राजनांदगाँव जिले का जिला स्तरीय आयोजन हुआ। जिला प्रशासन ने सुचारु आयोजन का दायित्व दिग्विजय महाविद्यालय को सौंपा। दिग्विजय महाविद्यालय में तब स्नातकोŸार हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष डाॅ. नरेश कुमार वर्मा हुआ करते थे। इस आयोजन को व्यवस्थित करने में उनकी अहम भूमिका थी। 

डाॅ. नरेश कुमार वर्मा ’साकेत साहित्य परिषद सुरगी’ के हम नवोदित रचनाकारों के संरक्षक और मार्गदर्शक भी थे। आयोजन के मुख्य अतिथि के रूप में खुमान सर भी आमंत्रित थे। खुमान सर समय के पाबंद थे। यह उनके अनुशासन का एक अनिवार्य अंग हुआ करता था। कार्यक्रम के लिए निर्धारित समय पर वे अयोजन स्थल पर पधार चुके थे। कुछ अन्य विशिष्ट अतिथियों के आगमन में विलंब होने के कारण कार्यक्रम शुरू नहीं हो पा रहा था। आयोजन में सम्मिलित होने आये साहित्यकारों, कलाकारों और अन्य गणमान्यों के बीच धोती-कुर्ता धारण किए खुमान सर की आभा सबसे अलग, सब तरफ बिखर रही थी। मैं उन्हें लगातार निहारे जा रहा था। डाॅ. वर्मा ने मुझसे पूछा, ’’खुमान साव को जानते हो कि नहीं?’’ मैंने कहा, ’’उन्हें कौन नहीं जानता होगा सर। पर उनसे मिलने का सौभाग्य मुझे आज तक नहीं मिला।’’ डाॅ. वर्मा ने कहा, ’’तो चलिए, आज मिल लिजिए।’’ और इस तरह मेरी वर्षों की अभिलाषा पूरी हुई।

पं. श्याम लाल चतुर्वेदी छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के प्रथम अध्यक्ष बनाए गए। उन्हीं के संयोजन में, मार्च 2012 में रायपुर के टाउनहाल में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग का एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित हुआ। डाॅ. नरेश कुमार वर्मा इस आयोजन में आमंत्रित थे। उनके साथ मैं भी इस आयोजन में गया हुआ था। अपने छात्र जीवन में पृथक छत्तीसगढ़ की माग के समर्थन में अपने खून से पत्र लिखने वाले और छत्तीसगढ़ी कविता संग्रह ’माटी महतारी’ लिखने वाले डाॅ. नरेश कुमार वर्मा छत्तीसगढ़ महतारी के सच्चे सपूत थे। इस आयोजन में खुमान सर भी आमंत्रित थे। भेट होने पर उन्होंने पूछा, ’’तुमन कामा आय हव?’’ वर्मा सर ने कहा, ’’हमन तो रेलगाड़ी से आय हन।’’ ’’तब जाती खानी मोर संग चलहू। कार ले के आय हंव। बनही कि नहीं?’’ खुमान सर ने कहा। हम लोगों के लिए यह प्रस्ताव गर्व का विषय था।

रायपुर से ठेकवा तक वे रोचक संस्मरण सुनाते रहे। हम लोग मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहे। इसी क्रम में उन्होंने ग्राम बादराटोला के जंगल सत्यग्रह का व्Ÿाांत सुनाया और बताया कि कैसे इस आंदोलन में रामाधीन नामक आदिवासी युवक शहीद हो गया था। इस यात्रा का और खुमान सर के अपनत्व भरी बातों का ऐसा असर हुआ कि इसके बाद तो मैं स्वयं को उनके परिवार का सदस्य ही मानने लगा। खुमान सर न केवल संगीत से अपितु साहित्य से भी गहरा लगाव रखते थे। लोगों को जोड़ने और लागों से जुड़ने की उनमें अद्भुत क्षमता थी। 

03 जून 2012 को साकेत साहित्य परिषद सुरगी का तेरहवाँ स्थापना समारोह ग्राम करेला के सुप्रसिद्ध माँ भवानी मंदिर प्रांगण में मनाया जा रहा था। खुमान सर आए और कार्यक्रम में किसी तरह का व्यवधान न हो, इस बात का ध्यान रखते हुए मंच के सामने श्रोताओं के लिए बिछाए गए दरी में बैठ गए। हम लोग सकते में आ गए। उनके पास जाकर उनका आशिर्वाद लिए और मंच पर चलने का आग्रह करने लगे। उन्होंने कहा, ’’तुंहर कार्यक्रम के समाचार ल अखबार म पढ़ेन। आय के मन होइस ते आ गेन। अब हमला इही करा बइठ के सुनन दव। मंच म नइ जावन।’’ और बार-बार अनुनय-विनय करने पर भी हमारे आग्रह को उन्होंने शालीनतापूर्वक अस्वीकार कर दिया। इसके बाद तो वे साकेत साहित्य परिषद सुरगी से परिषद के नियमित सदस्य की तरह जुड़ गए। खुमान सर का परिवार विशाल है। छŸाीसगढ़ के कलाकार, कवि और कलमकार उनके परिवार का हिस्सा थे। साहित्य के प्रति उनके अनुराग का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा। 

बस इतना ही। और भी बहुत सारी बातें इस किताब में पढ़ पायेंगे।

मैं यह स्वीकार करता हूँ कि खुमान सर के विराट व्यक्तित्व को समझने के लिए इस स्मारिका में संकलित सामग्रियाँ बहुत अल्प हैं। फिर भी मुझे आशा है कि इस संकलन के द्वारा, अपने जीवन काल में ही किंवदंती बन चुके, छŸाीसगढ़ी लोक संगीत के महान संगीतसाधक श्री खुमान लाल साव के व्यक्तित्व को कुछ अंशों में ही सही, हम समझ पायेंगे।

इस स्मारिका के लिए लेख लिखने वाले सभी साहित्यकारों का मैं आभारी हूँ। श्री संजीव तिवारी, श्री अरुण कुमार निगम एवं श्री राहुल सिंह का भी मैं आभारी हूँ जिन्होंने अपन-अपने ब्लाग से खुमान सर से संबंधित सामग्रियों का उपयोग करने की मुझे अनुमति दी। इस संकलन की भूमिका लिखने के लिए श्री मुकुल के. पी. साव सर का मैं विशेष आभारी हूँ। इस संग्रह में संकलित सभी सामग्रियों में दी गई जानकारियों व तथ्यों के प्रति उनके लेखक उत्तरदायी हैं। संपादक की सहमति अनिवार्य नहीं है।  

कुबेर

20 सितंबर 2025

रविवार, 22 फ़रवरी 2026

आलेख

 पहिली पठन

(महेन्द्र बघेल के व्यंग्य संग्रह ’झन्नाटा तुहर द्वार’ की भूमिका)

अंग्रेज लेखक एडवर्ड वेराल लुकास के ’द स्कूल फॉर सिंमपथी’ शीर्षक से एक ठन निबंधात्मक कहानी हे जेमा ’द स्कूल फॉर सिंमपथी’ नाम के एक अनोखा स्कूल के बारे म बताय गे हे। कहानी के मुख्य पात्र वोकर संस्थापिका मिस बीम हे। स्कूल के पाठयक्रम म आने-आने विषय के अलावा अंधत्व दिवस, मूक दिवस, बधिर दिवस, लंगड़ा दिवस अउ लुलवा दिवस घला शामिल हें। पाठयक्रम के मुताबिक उहाँ के विद्यार्थी मन ल एक दिन अंधा, एक दिन मुक्का, एक दिन बहरा, एक दिन लंगड़ा अउ एक दिन लुलवा बनना अनिवार्य हे। एकर उद्देश्य हे - ’विद्यार्थी मन म वास्तविक जीवन म अलग-अलग कठिनाई के सामना करइया मनखे मन के पहिचान करे के क्षमता के विकास करना, अउ उंकर मन म अइसन मनखे मन के प्रति सहानुभूति के भाव जागृत करना ताकि वो मन (विद्यार्थी मन) एक विचारशील, मददगार अउ नेक नागरिक बन सकंय।’ 

कहानी के लेखक ह एक दिन वो स्कूल के दौरा म गिस तब वोला उहाँ के विद्यार्थी मन बताइन कि उंकर बर ’अंधत्व दिवस’ ह सबले कठिन दिन बीतिस फेर ’मूक दिवस’ वाले दिन ह घला कम कठिनाई म नइ बीतिस। ’द स्कूल फॉर सिंमपथी’ कहानी ल हमर देश के स्कूल अउ कॉलेज के अलग-अलग कक्षा मन म अंग्रेजी विषय के पाठयक्रम म शामिल करे गे हे। फेर हमर देश म अइसन कोनो स्कूल-कॉलेज कहूँ नइ हे।

ये सब बात ल बताय के पीछू मोला ये कहना हे कि मनखे ह बिना बोले नइ रहि सकय अउ बोले खातिर बोली-भाषा के जरूरत पड़थे। नवजात बच्चा ह घला पैदा होवत सात रोय के शुरू कर देथे। रोना ह घला एक ठन भाषा हरे। इही पाय के मोर ये दृढ़ मान्यता हे कि आदि ले अब तक मानव समाज ह जतका महत्वपूर्ण आविष्कार करे हे ओमा सर्वप्रथम आविष्कार, सबले बड़का आविष्कार अउ सबले जादा विलक्षण आविष्कार भाषा हरे।  भाषा बिना आदमी ह न सोच सके, न विचार सके अउ न बोल सके। 

मनखे ह बिना बोले काबर नइ रहि सकय? काबर कि वोहर समाज के बीच म अपन आप ल अभिव्यक्त करना चाहथे। अब सवाल ये पैदा होथे कि मनखे के पास अइसन का हे जउन ल वोहर अभिव्यक्त करना चाहथे? येला समझे बर हमला मनुष्य अउ भाषा के बीच के अंतरसंबंध ल समझे बर पड़ही। मनुष्य हे त भाषा हे अउ भाषा हे तब मनुष्य हे। दूनो एक-दूसर के पूरक हरें। इही पाय के भारतीय दार्शनिक मन आत्मा, मस्तिष्क, हिरदे अउ कंठ ल आधार मान के भाषा के चार स्वरूप माने हें जउन अइसन हें :- 

(1) ’परा’ - ’परा’ के संबंध आत्मा ले हे। येला आत्मा के भाषा या आत्मा के आवाज कहे गे हे। आत्मा ह ज्ञान, चिंतन अउ चेतना के केंद्र हरे। 

(2) ’पश्यंती’ - ’पश्यंती’ के संबंध मस्तिष्क ले हे। मस्तिष्क ह बुद्धि, विचार अउ कल्पना के केंद्र हरे। मन के आवाज अउ मन के बात इही हरे। 

(3) ’मध्यमा’ - ’मध्यमा’ ह हृदय के भाषा हरे। हृदय के भाषा ह भाव ले भरे होथे। अउ, 

(4) ’वैखरी’ - येहर कंठ ले पैदा होथे। पैदा हो के ये ह जन-जन तक पहुँचथे। माने येकर फैलाव या बिखराव होथे इही पाय के ऐला ’वैखरी’ कहे गे हे। येला सुने अउ बोले जा सकथे। ’सुन के समझना अउ बोल के समझाना’ एकरे द्वारा संभव हो पाथे। भाषा विज्ञान म एकरे अध्ययन करे जाथे। आत्मा के आवाज होय कि मन के बात होय या कि हृदय के भाव; इंकर प्रगटीकरण ’वैखरी’ के बिना संभव नइ हे। 

अब केहे के जरूरत नइ हे कि प्रकृति म जउन चीज ह पैदा होथे वोकर प्रगटीकरण होथेच होथे। माने ’अभिव्यक्ति’ ह एक प्राकृतिक, स्वाभाविक अउ अनिवार्य प्रक्रिया हरे।

व्यवहार म भाषा ह केवल ध्वनि, वर्ण, अक्षर, शब्द अउ वाक्य भर ले पूरा नइ होवय। आंगिक क्रिया जइसे आँखी के विकृति, हाथ के इशारा, मुड़ी के डोलाना, मुँह बनाना, नाक-भौं सिंकोड़ना अउ बोले के लहजा के घला प्रयोग होथे। ये सब ल भाषा के सहायक अंग माने गे हे। ये सब के योग ले भाषा ह कभू मीठ लगथे त कभू करू, कभू अमृत कस लगथे त कभू जहर कस, कभू हँसाथे त कभू रोवाथे, कभू सुख देथे त कभू दुख देथे, कभू सहलाथे त कभू ठठाथे, कभू जियाथे त कभू मारथे। फेर भाषा ह जब एके संघरा मीठ अउ करू लागथे, अमृत अउ जहर बन जाथे, हँसाथे घला अउ रोवाथे घला, सहलाथे घला अउ ठठाथे घला अउ जियाथे अउ मारथे घला तब अइसने भाषा ह ’व्यंग्य’ बन जाथे। अइसन भाषा के प्रयोग करने वाला ह व्यंग्यकार बन जाथे। अउ जउन साहित्य म अइसन भाषा के प्रयोग होथे वोहर व्यंग्य कहलाथे।

आंगिक क्रिया, जउन मन ल भाषा के सहायक अंग माने गे हे, के प्रयोग बोल-चाल म, श्रुति परंपरा के लोक साहित्य म, दृश्य काव्य माने नाटक उवा म तो संभव हे पन लिखित साहित्य म इंकर सहयोग लेना संभव नइ हे। तब एक व्यंग्यकार ह व्यंग्य लिखे बर भाषा के कोन से सहायक अंग के उपयोग करथे? जाहिर हे - वक्र कथन, व्यंजना अउ लक्षणा के मदद लेथे। एकर अलावा, जइसे बोले के लहजा होथे वइसने लिखे के घला लहजा होथे। इही ह लेखक के लिखे के शैली आय। वक्र कथन, व्यंजना अउ लक्षणा के अलाव लेखक ह व्यंग्य लेखन म अपन लिखे के विशिष्ट लहजा के याने विशिष्ट शैली के सबले जादा प्रयोग करथे। समाज अउ व्यक्ति के व्यवहार म व्याप्त विडंबना मन ऊपर व्यंग्य लेखक के सतत अउ सतर्क निगाह रखना अनिवार्य हे। विडंबना मन ल पहिचान के वोला बिना डरे अउ जोर लगा के लिखना जरूरी हे। विडंबना मन ल पहिचान के अउ देख के आँखीं मूंद के चुप रहि जाने वाला लेखक ह कभू व्यंग्य नइ लिख सकय। व्यंग्य के भाषा ल तुतारी कस होना चाही; कभू हुदरने वाला अउ कभू कोचकने वाला।

छत्तीसगढ़ी भाषा म इक्कीसवीं सदी के शुरुआतेच ले गद्य लेखन म घला गति      साफ-साफ दिखाई देवत हे। अब कविता के बरोबर कहानी अउ उपन्यास के घला सृजन होय लगे हे तब व्यंग्य लेखन ह कइसे पीछू रहितिस। छत्तीसगढ़ी भाषा म व्यंग्यकार मन के एक नवा पीढ़ी ह जोर लगा के व्यंग्य लेखन म जुट चुके हें। इही नवा पीढ़ी के व्यंग्यकार मन म महेंद्र बघेल ह घला अपन व्यंग्य संग्रह ’झन्नाटा तुंहर द्वार’ ल लेके अपन झन्नाटादार उपस्थिति दर्ज करे हें। महेंद्र बघेल के व्यंग्य संग्रह ’झन्नाटा तुंहर द्वार’ म चौबीस ठन व्यंग्य रचना संकलित हें। संकलित सबो व्यंग्य मन गजब के झन्नाटादार हें अउ पाठक मन के मन-मस्तिष्क ल हुदरे-कोचके म न कोनो कमी करंय अउ न ककरो लिहाज करंय। अधिकतर व्यंग्य मन म गाँव के समस्या अउ वातावरण ल विषय बनाय गे हे। महेंद्र बघेल ह अपन व्यंग्य मन म गाँव-परिवार म आवत रहन-सहन अउ सामाजिक बदलाव के भीतर जाके वोकर रेशा-रेशा ल खोले के प्रयास करे हे। शीर्षक रचना ’झन्नाटा तुंहर द्वार’ अउ ’दिखावा के सामाजिक ज्ञान’ व्यंग्य मन म सरकार के आबकारी नीति अउ पारिवार के मांगलिक प्रसंग मन म दारू के बाढ़त हस्तक्षेप ल उजागर करे गे हे। लेखक ह दारू बर नवा नाम गढ़े हे ’झन्नाटा’। ये व्यंग्य मन म अपन शान-शौकत के देखावा करे बर किसान मन ह कइसे अपन पुरखौती खेत ल बेंच के कंगाल होवत जात हें एकरो हिसाब-किताब प्रस्तुत करे गे हे।

आज के जमाना ह मोबाइल अउ बाबा मन के हे तब ये विषय मन एक जिम्मेदार अउ सतत पारखी नजर वाले व्यंग्यकार के निगाह ले कइसे छूट सकत रिहिन हें। ’कतका करंव बखान’ अउ ’प्राशन-पाचन अउ पंचेड़ बूटी’ व्यंग्य मन मोबाइल अउ बाबा महिमा ले ओतप्रोत हें।

गाँव-गाँव म गुटखा-पाऊच के कब्जा होय या नाली निर्माण के बहाना ग्राम पंचायत म होवइया भ्रष्टाचार होय, कि पर्यावरण संरक्षण के नाम म वृक्षारोपण के आड़ म होवइया भ्रष्टाचार होय, महेंद्र बघेल ह सबके खबर लेय हे। ’तरिया के बेंदरा-बिनाश’ व्यंग्य म गाँव तरिया के उपेक्षा करे ले गाँव के संस्कृति अउ सामाजिकता ऊपर पड़त असर ल लेके व्यंग्य करे गे हे। गाँव-गोढ़ा ले निकलके बघेल ह राज्य अउ देश के राजनीति डहर घलाव अपन खोजी नजर घुमाय बर नइ भूले हे। अभी हाल-हाल म ’नीट’ परीक्षा म जउन नाटक खेले गे हे वोकर खबर ’परीक्षा म कोचिंग कोचिया के खब-डब’ व्यंग्य म लेय गे हे, तब सरकारी स्कूल के शिक्षा व्यवस्था के पोल ’बनौती बनादे’ व्यंग्य म खोले गे हे। भारतीय न्याय व्यवस्था ऊपर पइसावाले मन कतका जमगरहा भारी हें एकर पोल ’दुधपिया के मौजमस्ती अउ निबंध’ म खोले गे हे। ये घटना ह घला हाले हाल के हरे अउ आप भुलाय नइ होहू, दूधपिया माने नाबालिग, जउन ह दारू के नशा म बेसुध हो के कार चलावत एक्सीडेंट करके दू झन ल मार डारिस अउ वोला सजा मिलिस 300 पेज के निबंध लिखे के। 

  महेंद्र बघेल के व्यंग्य के भाषा ह बहुत सरल अउ सहज संप्रेषणीय हे। इंजेक्शन के समान पाठक के मन-मस्तिष्क ऊपर तुरंत असर करथे। व्यंग्य के भाषा, विषय, वातावरण सबो मन पाठक के अनुभव के दुनिया ले आथें इही पाय के पाठक ल व्यंग्य मन ल पढ़त समय अइसे महसूस नइ होवय कि वोहर अपन दुनिया ले दुरिहा गे हे। वोला अइसे महसूस होथे कि लेखक संग वोकर सालों-साल के मितानी हे या कि जान पहिचान हे अउ वोहर वोकर संग फुरसतहा म बड़ घरेलू माने अनौपचारिक गपशप या गोठ-बात करत हे। कहूँ कोनो बनावटीपन नहीं, प्रवचन या उपदेश नहीं। बस आँखों देखा हाल के बखान हे; अउ अइसन हाल के बखान हे जउन मन खुदे बेहाल हो चुके हे। 

फेर जब-जब सरकार के बात आथे तब महेंद्र बघेल ह सरकार ल कुछ जरूरी सलाह अउ सुझाव देय ले खुद ल रोक नइ सके हे। उदाहरण बर ’ताते तात चहा के भौतिक सत्यापन’ व्यंग्य के येदे अंश ल देखव - ’’चाय बर मनखे मन के दीवानापन ल देखत देश भर म हस्ताक्षर अभियान घलव चलना चाही। जेकर ले नीति आयोग ह “नवा चहा नीति“ बनाके विदेशी निवेश पाय बर मजबूर हो जाय। हम तो यहू कहिथन कि सन् 2025 ल चहा बरस घोषित कर देना चाही। अउ एकाद झन चहेड़ी टाइप के नेता मन के जनमतिथि ल चहा दिवस के रुप म मान्यता देवावत एक दिन के सरकारी छुट्टी अउ गाँव-गाँव म चहा-तिहार मनाय के घोषणा हो जतीस ते हम धन्य घलव हो जतेन। .......... मनखे-मनखे के अंतस म चहा बर गजबेच मया ल देखत ग्राम पंचायत, तहसील अउ जिला स्तर म “चहा ओलंपिक“ प्रतियोगिता के आयोजन घलव होना चाही। जेमा पहिली अवइया ल “चहेड़ी नंबर वन“ अउ दूसरइया ल “परम चहावीर“ के सम्मान ले सम्मानित करे जाय। बाकी प्रतिभागी चहेड़ी मन ल एक कप चहा पीयाके धन्यवाद ले सम्मानित करत चहा-धरम निभाय के बूता करे जाय। चुनाव के हारे-हपटे विधायक प्रत्याशी होय चाहे मुँहफूलोय बड़े कद के कार्यकर्त्ता, एकाद झन ल ’चहा आयोग’ के अध्यक्ष बनाके लाल बत्ती ल बुगुर-बुगुर जलवाय के एक ठन बड़का काम घलव करवाय जा सकत हे।’’

महेंद्र बघेल ह मूल रूप म कवि हरे इही पाय के शुरू ले आखिरी तक वोकर भाषा म गजब के काव्यात्मकता देखे बर मिलथे। कोनो-कोनो जघा तो अइसे लगथे कि हम कोनो गद्य नइ भलुक व्यंग्य कविता पढ़त हन। अपन कथन के सरेखा म मंय ह एक दू उदाहरण पेश करत हंव - 

- ’’अनुदानी महासपना देखे के साद म लइका मन नीट परीक्षा म निटोर दिन, धन-दोगानी ल कोचिंग म बोर दिन अउ दाई-ददा के सपना ल रट्ट ले टोर दिन।’’(सपना के पंचनामा) 

- ’’फेर जनता के भाग म, न राग हे न फाग हे। जनता ल पाँच साल बर बुकिंग करइया विकास मंत्री के फोटू वाले पाकिट म चाऊर-दार अउ बरी साग हे। अहोभाग हे कि जनता बर मंत्री के अतना अनुराग हे।’’(अमृत चांटे के भरम) अउ  

- ’’बीरबल के कुछ अलग इमेज हे, अपन ह सुधवा अउ भौजी ह तेज हे। वो अतिक सुधवा कि कई घाँव अपन सुध ल घलव भूला जथे। भौजी ह बजार ले जब मुनगा मँगाथे त ये मुरगा धर के आ जथे.., एक दिन कतरा (हलवा) पागे बर सूजी मॅंगाइस त वीरबल ह कपड़ा सीले के सूजी ल धरके आगे। आजकल गली-मुहल्ला, बजार-हाट अउ रद्दा-बाट म बारो-महिना मुरगा मिलना सहज हे फेर मुनगा ह नोहर होगे हे।’’ (छाँटत-छाँटत अटल कुंवारी)

- ’’सरकारी निकाय के हालत खस्ता हे, महंगाई म सिरिफ भाषण ह सस्ता हे, कालाधन वाले मन लाल होगें, मोर देश के कइसन हाल हो गे।’’ (नेता चरित बखान)

महेंद्र बघेल ह हिंदी म सोच के छत्तीसगढ़ी म लिखइया लेखक नोहे। वोहर छत्तीसगढ़ी म लिखथे तब छत्तीसगढ़ीच म सोचथे। इही पाय के वोकर लेखन म छत्तीसगढ़ी के कतरो अइसन शब्द अउ हाना भरे पड़े हें जउन मन या तो नंदा गे हें या फेर बोलचाल ले दुरिहा गे हें। महेंद्र बघेल ह अइसन जम्मों शब्द अउ हाना मन ल प्रचलन म ला के वोला जिंदा करे के कोशिश करे हे, जइसे कि - ’बरेंडी, रंगझाझर, गुलाझांझरी, मुनूबिलई, सुकुड़दुम, ताते-तात चहा, पीत मारना, बेमझउव्वल बूता, सुहाफी, नोखियाना, खात-खवई, छट्ठी-बरही, लघियांत, झिल्ली-सनपना, जी कव्वुआना, झारोझार, हाड़ा-गोड़ा, घोलंडइया मारना, निटोर देना, उबुक-चुबुक होना, सुनगुन-सुनगुन, रकम-रकम के, चुचरना, भदभिद-भदभिद भगई, पेल-ढकेल के, बारा हाल होना, अधियाय गोठ ल लमाना, हब-डब’ उवा उवा। 

विहिंचे लेखक ल अंग्रेजी भाषा के शब्द मन ले घला कोनो परहेज नइ हे। येमा अइसन अंग्रेजी शब्द तो हाबेंच जउन मन छत्तीसगढ़ी जन मानस म मिसरी कस घुर के मिंझर गे हें, अइसनो शब्द मन हें जउन मन आज के नवा पीढ़ी के जुबान म रच-बस गे हें, जइसे - मीडिया, ब्रेकिंग न्यूज, आर्गनिक प्रॉडक्ट, कंपीटीशन, ऑनलइन, हाईटेक, बीजी, एक्सप्रेस, डिक्शनरी, स्मार्ट क्लास, फैशन, कोचिंग, सिंथेटिक दूध, स्वीप शाट, डुप्लीकेट, ओरिजनल, उवा उवा।

महेंद्र बघेल ह नवा-नवा शब्द अउ नवा-नवा मुहावरा बनाय म घला कोनो कंजूसी नइ करय, जइसे - झन्नाटा (दारू), सेटिंग-सहमति, बुधियार (बुद्धिमान) मौनासन, हुमेलासन, भड़कासन, दूधपिया (नाबालिग), बोलक्कड़, सुनक्कड़, ठगतुल्य चहा, हर-हर गंगा हर-हर पाई नहाखोर के बासी खाई, सपनाशास्त्र के महान सपनज्ञ, गूगल गली म किंदरत आज्ञाकारी शिष्य, मुनगा चुचरो प्रतियोगिता, उवा उवा।

महेंद्र बघेल ह नवा-नवा नारा अउ नवा-नवा सूक्ति वाक्य गढ़े म घला सिद्धहस्त हे, जइसे येदे नवा नारा मन ल देखव - 

’नाली ले थाली तक’, 

’न खाता न बही दबंग जे कही उही सही’

’केसर मुक्त अउ केंसर युक्त गुटका’

महेंद्र बघेल के नवा-नवा सूक्ति वाक्य मन ल देख के व्यंग्य के पुरोधा परसाई के सुरता आ जाथे। उदाहरण बर येदे वाक्य मन ल देखव -

’डबरा ल का कहिबे नरवा ह खुदे नाली के पानी म उबुक-चुबुक हे।’

’अइसन मन के भाग म राजयोग ह उबुक-चुबुक होवत रहिथे।’

’सरकार अउ खाद्य विभाग के बीच म कंपीटीशन चलत हे।’

’सपना ह कतिक अपना हे येहा तो सपना के वेरायटी अउ क्वालिटी ऊपर डिपेंड करथे।’

’हाईटेक जमाना म सबे लइका मन सरकारी समय सीमा के पहिली सज्ञान हो जाथे।’

’छत्तीसगढ़िया मन मुनगा चुचरे म व्यस्त हें ओती ठढ़बुदिया मन छत्तीसगढ़ ल चुहके म व्यस्त हें।’

’जब-जब पइसा बोलथे तब-तब ईमान डोलथे।’

’चमक-दमक के आगू म सोच ह अतिक अंखरी हो गे हे कि सुवारथ के रद्दा म रेंगे बर एक गोड़ म खड़े हो जाथे।’ 

’शपथ लेवई अउ पथ बदलई के खेल म हरियर धरती के सपना ह लतपथ हो जाथे।’

’हर हाल म सभ्यता अउ धार्मिकता ल मुद्रा के कोलकी डहर ले होके गुजरनाच पड़थे।’

महेंद्र बघेल के व्यंग्य मन म बिंब अउ प्रतीक योजना के घला प्रयोग होय हे।  ’कुटनी चाल’ म येला देखे जा सकत हे। पूरा संग्रह ह शब्द के बाजीगरी ले भरे हे। शब्द के अइसन बाजीगरी ह पाठक के मन-मस्तिष्क म मोहनी-थापनी डारे कस असर करथे। शब्द मन के बाजीगरी दिखाना महेंद्र बघेल बर बड़ सहज बात आय, जइसे कि - 

’’येला हरियर मद कहव चाहे हरियर फंड येकर फंडा ल समझे बर थोकिन फंडामेंटल नियम-धियम ल जानना घलव जरूरी होथे।’’ (हरियर आदेश म गुलाझांझरी)

’’खवई अउ जियई के गोठ-बात के बारे म आप मन गुनत रहव। अब हम खवई अउ पचई डहर चलथन। येकर विषय म कहूँ ज्ञान मिल जाय ते हमर खवई धरम ह घलव धन्य हो जाय। निरवा खवई अउ खात-खवई के इतिहास ह कतका प्राचीन हे येला इतिहासकार मन जाने।’’(प्राशन-पाचन अउ पंचेड़ बूटी)


कुल मिलाके महेंद्र बघेल ह गजब के प्रतिभाशाली व्यंग्यकार हे। ये व्यंग्य संग्रह ल पढ़के पाठक मन अतका उम्मीद तो अवश्य करहीं कि इंकर कलम के सियाही ले छत्तीसगढ़ी साहित्य के भविष्य ह अउ पोठ होही। हमला भरोसा हे कि महेंद्र बघेल ह भविष्य म पाठक मन के ये भरोसा ल जरूर पूरा करहीं। 

कुबेर

शनिवार, 17 जनवरी 2026

समीक्षा - साहित्य अउ लोकभाषा के संगम छत्तीसगढ़ी में मैक्सिम गोर्की के ‘बाज के गीत अउ दूसर कहानी’ - डुमन लाल ध्रुव छत्तीसगढ़ी भाषा में प्रकाशित कहानी-संग्रह ‘बाज के गीत अउ दूसर कहानी’ केवल एक अनूदित पुस्तक नहीं है यह विश्व साहित्य और लोकभाषा के बीच बना एक सशक्त सांस्कृतिक सेतु है। यह संग्रह महान रूसी लेखक मैक्सिम गोर्की की चुनिंदा कहानियों का छत्तीसगढ़ी अनुवाद है जिसे अनुवादक श्री कुबेर सिंह साहू जी ने अत्यंत निष्ठा, संवेदना और साहित्यिक समझ के साथ प्रस्तुत किया है। मानसी पब्लिकेशंस दिल्ली से प्रकाशित यह पुस्तक छत्तीसगढ़ी साहित्य को वैश्विक विचारधारा से जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बनकर सामने आती है। मैक्सिम गोर्की का साहित्य मानवीय संघर्ष, सामाजिक यथार्थ, श्रमिक चेतना औरतों क्रांतिकारी विचारों का साहित्य है। वे उन लेखकों में हैं जिन्होंने साहित्य को केवल सौंदर्य की वस्तु न मानकर सामाजिक परिवर्तन का औजार बनाया। गोर्की की कहानियों में हाशिए का मनुष्य केंद्र में होता है वह मनुष्य जो गरीबी, शोषण, अपमान और अकेलेपन के बीच भी अपने भीतर गरिमा और प्रतिरोध की लौ जलाए रखता है। ऐसे लेखक की रचनाओं का छत्तीसगढ़ी में अनुवाद इस अर्थ में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि छत्तीसगढ़ स्वयं श्रमिक, किसान और वंचित समुदायों की भूमि रहा है। गोर्की की चेतना यहां सहज रूप से अपनी जमीन पहचान लेती है। इस संग्रह में कुल तेरह कहानियां शामिल हैं—‘पतझड़ के एक रात’, ‘बाज के गीत’, ‘कामरेड’, ‘छब्बीस मरद अउ एक लड़की’, ‘एक गद्दार के मों’, ‘वेल्काश’, ‘वोकर मयारुक’, ‘इजरगिल डोकरी’, ‘वो नन्हा बालक’, ‘वो नन्हा गौरैया’, ‘सूरज अउ समुंदर’, ‘हड़ताल’ और ‘तूफानी पितरेल के गीत’। ये कहानियां विषय, शिल्प और संवेदना के स्तर पर एक-दूसरे से भिन्न होते हुए भी मनुष्य और समाज के मूल प्रश्नों पर एक साझा दृष्टि प्रस्तुत करती हैं। संग्रह का क्रम ऐसा है कि पाठक व्यक्तिगत पीड़ा से सामाजिक चेतना और फिर क्रांतिकारी स्वर तक की एक वैचारिक यात्रा करता है। ‘बाज के गीत’ इस संग्रह की केंद्रीय और प्रतीकात्मक कहानी है। बाज यहां स्वतंत्रता, साहस और विद्रोह का प्रतीक बनकर उभरता है। छत्तीसगढ़ी अनुवाद में बाज की उड़ान और उसकी चुनौतीपूर्ण आवाज अत्यंत प्रभावशाली हो उठती है। यह कहानी पाठक के भीतर दबी हुई स्वतंत्रता की आकांक्षा को झकझोरती है। ‘कामरेड’ और ‘हड़ताल’ जैसी कहानियां श्रमिक एकता, वर्ग-चेतना और सामूहिक संघर्ष की भावना को मुखर रूप देती हैं। छत्तीसगढ़ जैसे श्रमप्रधान समाज में ये कथाएं केवल साहित्य नहीं रह जाती बल्कि सामाजिक अनुभव का विस्तार बन जाती है। ‘वेल्काश’ संग्रह की सबसे लंबी और गहरी कहानियों में से एक है। यह कहानी मनुष्य के भीतर छिपे दर्द, स्मृति और टूटन की मार्मिक अभिव्यक्ति है। वेल्काश का जीवन, उसकी असफलताएं और उसकी आत्मिक पीड़ा छत्तीसगढ़ी भाषा में अत्यंत आत्मीय रूप ले लेती है। पाठक को यह महसूस नहीं होता कि वह किसी दूर देश की कथा पढ़ रहा है बल्कि वह उसे अपने आसपास का, अपने समाज का ही एक चेहरा लगती है। इसी प्रकार ‘इजरगिल डोकरी’ में गोर्की का दार्शनिक और प्रतीकात्मक स्वर उभरता है। प्रेम, बलिदान और अहंकार की यह कथा छत्तीसगढ़ी अनुवाद में लोककथा सी प्रवाहशील और प्रभावी हो गई है। संग्रह की बाल और प्रकृति केंद्रित कहानियां ‘वो नन्हा बालक’, ‘वो नन्हा गौरैया’ और ‘सूरज अउ समुंदर’ पुस्तक को भावनात्मक संतुलन प्रदान करती हैं। इन कहानियों में मासूमियत, करुणा और प्रकृति के प्रति संवेदनशील दृष्टि दिखाई देती है। छत्तीसगढ़ी भाषा की कोमलता इन कथाओं में विशेष रूप से उभरती है और यह सिद्ध करती है कि यह भाषा केवल संघर्ष और आक्रोश ही नहीं स्नेह और सौंदर्य को व्यक्त करने में भी सक्षम है। अनुवाद की दृष्टि से यह संग्रह अत्यंत सराहनीय है। श्री कुबेर सिंह साहू जी ने शब्दानुवाद के बजाय भावानुवाद को प्राथमिकता दी है। उन्होंने रूसी परिवेश को बनाए रखते हुए भी भाषा को इतना सहज और आत्मीय बनाया है कि पाठक को किसी प्रकार का भाषिक बोझ महसूस नहीं होता। संवाद स्वाभाविक है वर्णन चित्रात्मक है और पूरी पुस्तक में छत्तीसगढ़ी की लोकलय बनी रहती है। यह अनुवाद पढ़ते हुए ऐसा लगता है मानो गोर्की स्वयं छत्तीसगढ़ी में बोल रहे हों। मानसी पब्लिकेशंस दिल्ली द्वारा किया गया प्रकाशन भी प्रशंसनीय है। पुस्तक की प्रस्तुति, मुद्रण और संपादन संतोषजनक है। यह संग्रह केवल साहित्य प्रेमियों के लिए ही नहीं छात्रों, शोधार्थियों और अनुवाद अध्ययन से जुड़े पाठकों के लिए भी अत्यंत उपयोगी है। समग्र रूप से देखा जाए तो ‘बाज के गीत अउ दूसर कहानी’ छत्तीसगढ़ी साहित्य में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है। यह पुस्तक सिद्ध करती है कि छत्तीसगढ़ी भाषा में विश्व साहित्य को पूरी वैचारिक गहराई और कलात्मक गरिमा के साथ प्रस्तुत किया जा सकता है। यह संग्रह रूसी क्रांतिकारी चेतना और छत्तीसगढ़ की लोकसंवेदना के बीच एक जीवंत संवाद स्थापित करता है। श्री कुबेर सिंह साहू जी का यह अनुवाद कार्य निस्संदेह अद्भुत है और छत्तीसगढ़ी साहित्य के इतिहास में इसे एक मील का पत्थर माना जाएगा। - डुमन लाल ध्रुव मुजगहन, धमतरी (छ. ग.) पिन - 493773 मोबाइल - 9424210208