बुधवार, 3 जून 2026

किताब - छत्तीसगढ़ी दानलीला

 छत्तीसगढ़ी दानलीला

पं. सुंदरलाल शर्मा


(छत्तीसगढ़ी भाषा में रचित अनुपम खंडकाव्य)

टीकाकार - कुबेर

प्राक्कथन

छत्तीसगढ़ी दानलीला के सर्जक पं सुन्दरलाल शर्मा व भाष्यकार कुबेर: साहित्याकाश के सुकुवा तारे

(01)

अपने भावों, विचारों और चिंतनों का प्रजापति तो साहित्यकार ही है जो स्रष्ठा है इसीलिए उसकी सर्जना शक्ति आकर्षण और विकर्षण के संतुलन पर टिकी है। उसकी सर्जना शक्ति त्रिमुखी होती है। साहित्य की विधा उतनी महत्वपूर्ण नहीं होती जितनी उसके भीतर से फूटने वाली दृष्टि होती है। साहित्य को समाज से जोड़ने वाला सबसे महत्वपूर्ण तत्व वही दृष्टि ही तो है जो जीवन और जगत को आर-पार सही अर्थों में देख पाने की शक्ति से सम्पन्न है। यही अतीत के कुहासा को साफ करता है और वर्तमान के शोभन-अशोभन, सुन्दर-असुन्दर को परखकर भविष्य के बनते-बिगड़ते अस्पस्ट चित्रों को रूपायित करता है। इस अर्थ में प्रजापति साहित्यकार ऋषि है या उससे बड़ा भी क्योंकि वह अपनी दृष्टि की सृष्टि भी करता है और जो दृष्टव्य है उसे ’जो होने वाला है’- उससे जोड़ता है। आर्ष साधना का स्वर्णिम पुष्प धरती पर पुष्पित करने वाला तो साहित्यकार ही होता है।  आधुनिक छत्तीसगढी साहित्य के ऐसे ही अपूर्व दृष्टि-सम्पन्न आर्ष साधक, पं सुन्दरलाल शर्मा कृत खंडकाव्य ’छत्तीसगढ़ी दानलीला’ के भाष्यकार भाई कुबेर की लेखनी को शत्-शत् नमन करता हूँ।

कुबेर सिंह साहू का जन्म राजनांदगाँव के निकट भोडि़या गाँव में पांच भाइयों के एक संयुक्त और संपन्न कृषक परिवार में 16 जून 1956 को श्रीमती ग्वालिन बाई साहू तथा श्री अमर दास साहू के घर में हुआ। सबसे बड़े पिता जी श्री उभू दास साहू तथा बड़ी माता श्रीमती राजकुंवर बाई निःसंतान थे, आपका लालन-पालन इन्हीं के द्वारा हुआ और कालांतर में आप इनके दत्तक पुत्र बन गए। धर्मपत्नी का नाम ब्रह्मलीन श्रीमती सोहद्रा बाई साहू है। वर्तमान में परिवार में एक पुत्र देवेन्द्र कुमार और एक पुत्री अपर्णा हैं।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी कुबेर सिंह साहू विज्ञान में स्नातक और हिंदी साहित्य में परास्नातक हैं। आप हिंदी और छत्तीसगढ़ी, दोनो भाषाओं में समान रूप से लिख रहे हैं। आप समकालीन कथा साहित्य के एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी रचनाएँ प्रगतिशील विचारधारा से पोषित हैं और साहित्य में आप  कुबेर के नाम से जाने और पहचाने जाते हैं।

पं सुन्दरलाल शर्मा कृत दानलीला का टीका प्रसंग - अद्भूत है भाष्यकार कुबेर की विवेचना। मैं दानलीला को उनकी (कुबेर) नजरों से पढ़ रहा हूँ। जैसे हम रामायण और भगवान श्रीराम को तुलसीदास (रामचरितमानस) की नजरों से पढ़ते-देखते और समझते हैं, ठीक वैसे ही। इस खंडकाव्य की रचना का काल (1907 ई.) है जिसे हिन्दी साहित्य के उत्तर-मध्यकाल या रीतिकाल का अवसान काल माना जा सकता है। यह भाष्यकार भाई कुबेर का मत है और मेरा भी। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने पूरी शताब्दि को हिन्दी साहित्य के काल विभाजन का आधार बनाते हुए सन् 1700-1900 ई. को उत्तर-मध्यकाल कहा है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने युगीन प्रवृतियों के आधार पर इस कालखंड को रीतिकाल कहा हैं (परन्तु कालखंड 1643-1843 ई. माना है)। यहाँ पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल की कालखंड गणना समीचीन नहीं लगती। रीतिकालीन काव्य परंपरा में शृंगारिक भावों से युक्त पदों की रचना को कवियों ने प्रश्रय दिया जो नायिका के देह व शृंगार के साथ मनोवैज्ञानिक प्रवृतियों के अलंकारिक वर्णन पर केन्द्रित रहा। यह खंडकाव्य भी रीतिकालीन काव्य परंपरा का अनुसरण करता हुआ प्रतीत है परन्तु भाष्यकार कुबेर के इस कथन से मैं भी सहमत हूँ कि शृंगार तथा भक्तिरस से युक्त इस खंडकाव्य में आद्यांत भक्ति और अध्यात्म के ही दर्शन होते हैं। इसमें अश्लीलता रंचमात्र भी नहीं है जैसे रीतिकालीन काव्य परंपरा में देखे जा सकते हैं।

शृंगारिक रचनाओं में अलंकार का प्रयोग स्वाभाविक रूप से पदों में होता है। छत्तीसगढ़ी दानलीला में कवि पं सुन्दरलाल शर्मा के पदों में अर्थगत चमत्कार के दिग्दर्शन होते हैं। उपमा, संदेह, उत्प्रेक्षा, रूपक, अतिशयोक्ति, भ्रांतिमान, दृष्टांत, ब्याज निंदा व विभावना अंलंकारों का बड़ा ही सुंदर प्रयोग दृष्टव्य है।

विभावना अलंकार के एक दृश्य में जहाँ गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं - 

      बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। 

      कर बिनु करम करइ विधि नाना।

अर्थात वह (ईश्वर) बिना पैरों के चलता है। बिना कानों के सुनता है और बिना हाथों के नाना प्रकार के कार्य करता है। 

वहीं पं सुन्दरलाल शर्मा लिखते हैं-

     पिरथी सरग पताल औ, चन्दा सुरुज लगाय।

     तीन लोक चौदा भुवन, राज हमारेच आय। 

अर्थात श्रीकृष्ण गोपियों से कहते हैं - ’धरती,  स्वर्ग और पाताल से लेकर चंदा और सुरुज तक तीन लोक और चौदह भुवन में हमारा ही राज है।’

(02)

पौराणिक गाथाओं में श्रीकृष्ण को सोलह कलाओं से युक्त एक अलौकिक पूर्ण पुरूष माना गया है अखिल ब्रह्मांड में ऐसा और कोई पुरूष नहीं है जो सोलह कलाओं से युक्त हो। वहीं श्रीराम को बारह कलाओं से युक्त माना जाता है। ज्ञान, मेधा, विवेक, धन, ऐश्वर्य, यश, कीर्ति, योग, विनय, कर्मण्यता, निष्कपटता, सौंदर्य, मोहक वाणी, लीला, आधिपत्य और सत्य ये ही सोलह कलाएँ हैं। रीतिकाल के श्रृंगारी दरबारी कवियों ने राधा, कृष्ण (और गोपियों) के रास लीला को सामान्य नायक एवं नायिका के रूप में चित्रित करते हुए सहज मानवीय वृत्तियों का रोपण किया तब आलोचकों ने इसे छिछले प्रेम का प्रदर्शन और अश्लील तक कहा। यह आलोचना स्वाभाविक भी है क्योंकि जनसामान्य में श्रीकृष्ण भगवान के रूप में पूजित हैं और पौराणिक गाथाओं में श्रीकृष्ण और राधा के प्रेम को अलौकिक माना गया है।

व्यक्ति अपने जन्म से लेकर किशोरावस्था तक प्रकृति, माता-पिता और समाज से कुछ-न-कुछ दान पाता रहता है। इससे वह बहुत कुछ सीखता है और उसके व्यक्तित्व का निर्माण होता है। रीतिकाल में वर्णित रास लीलाओं में श्रीकृष्ण के इसी कालखंड का वर्णन है इसीलिये पं सुन्दरलाल शर्मा ने इसे दानलीला कहा, अर्थात दान प्राप्त करने की लीला। अद्भूत है उनकी परिकल्पना। यह कथा प्रसंग श्रीमद्भागवत महापुराण के दसम स्कंध से लिया गया है जिसमें श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं का वर्णन है। हालाकि कुछ प्रसंगों में भिन्नता भी है मगर यह स्वाभाविक है। अनेक महाकाव्यों के रूपान्तरित कथा प्रसंगों में देश काल एवं सांस्कृतिक विविधताओं के कारण ऐसा देखने को मिलता है। वाल्मिकी कृत संस्कृत महाकाव्य ’रामायण’ का काव्यानुवाद भारत के लगभग सभी भाषाओं में  हुआ है परन्तु कथा प्रसंगों में काफी भिन्नता है।

.     छत्तीसगढ़ की माटी में पले-बढ़े भाई कुबेर की लेखनी में छत्तीसगढ़ के माटी की सौंधी-सौंधी खुशबू मन को मोह लेती है। उन्होंने खूब लिखा। राष्ट्रभाषा हिन्दी में लिखा और मातृभाषा छत्तीसगढ़ी में भी लिखा। महान लेखकों के आंग्ल भाषा में रचित कहानियों का छत्तीसगढ़ी में अनुवाद किया। बालकथाएँ और व्यंग्य लिखा तो छत्तीसगढ़ी लोककथाओं को सुपाठ्य और सरल भाषा में लिखकर संकलित भी किया। आप शिक्षक होने का धर्म निभाते हुए बेहद समर्पित भाव से स्कूली विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए लगातार काम करते हुए साहित्य सेवा में संलग्न रहे। आपकी साहित्यिक यात्रा सतत् संघर्षों की कहानी है। आँसुओं की स्याही से शब्दों को गढ़ा है इसलिए उसमें संवेदनाओं का ज्वार है। ’काव्य शास्त्र’ के अनुसार साहित्य को व्यवहारिक ज्ञान की शिक्षा देने वाला, अमंगल का नाश करने वाला और रंजनकारी भी होना चाहिए। इस कसौटी पर आपके द्वारा रचित साहित्य एकदम खरा उतरता है। 

डॉ बुद्धिनाथ मिश्र ने ठीक ही लिखा है कि ’मातृभाषा के बिना मौलिक चिंतन नहीं।’ मातृभाषा से व्यक्ति का भावनात्मक जुड़ाव कितना सघन होता है, इसका ऐतिहासिक उदाहरण 21 फरवरी, 1952 को ढाका के लोगों ने दिया था, जब मजहबी उन्माद में बंगाल को बाँटकर बने पूर्वी पाकिस्तान की जनता ने अपनी मातृभाषा बांग्ला की जगह उर्दू को राजभाषा बनाने से साफ इन्कार कर दिया था। उस दिनांक को पहले छोटे स्तर पर ’मातृभाषा दिवस’ मनाया गया। यही पाकिस्तान के विभाजन की पृष्ठभूमि भी बनी और बांग्लादेश बनने के बाद 1972 में यूनेस्को द्वारा और 2000 में संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा उसी दिनांक को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ’मातृभाषा दिवस’ मनाया जाने लगा। आज इसी दिवस को सारा विश्व मातृभाषा दिवस मनाकर अपनी-अपनी भाषाओं का अभिनंदन करता है। पं सुन्दरलाल शर्मा ने लगभग 120 साल पहले छत्तीसगढ़ी दानलीला का सृजन कर महतारी-माटी का कर्ज चुकाया है। लोकव्यापी घटना को रचना का आधार बना लेना सरल तो है किन्तु उसका निर्वाह उतना ही कठिन बल्कि ’तलवार के धार पे धावनों’ जैसा होता है। इस तथ्य को वे रचनाकार भलीभाँति जानते होंगे जिन्होंने पौराणिक गाथाओं या इतिहास प्रसिद्ध घटनाओं को रचनाओं का वर्ण्य विषय बनाया है। भाष्यकार कुबेर की लेखनी इस बात को प्रमाणित करती है। चाहे उन्होंने आँग्ल भाषा की विश्वप्रसिद्ध कहानियों का छत्तीसगढ़ी में अनुवाद किया हो, व्यंग्य लिखा हो, कविता लिखा हो या पं सुन्दरलाल शर्मा कृत छत्तीसगढ़ी खंडकाव्य का टीका। उनमें सृजन, अनुवाद और भाष्य की अद्भूत क्षमता है। ऐसे भाष्यकार विरले ही मिलते हैं।

(03)

साहित्य की किसी भी विधा: कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक या अनुवाद का मुख्य उद्देश्य मानवीय मूल्यों का संरक्षण और संवर्धन होता है। दया, प्रेम, करुणा, समानता, सद्भाव, भाईचारा: ये ही मनुष्य को मनुष्य बनाते हैं। लोगों को जागरूक करना, उनके भ्रांतियों का शमन करना, दिशा दिखाना - यही साहित्य और साहित्यकार का कार्य है।  खंडकाव्य ’छत्तीसगढ़ी दानलीला’ के भाष्यकार भाई कुबेर ने श्रीकृष्ण के जीवनचरित के किशोरावस्था पर रीतिकालीन काव्य परंपरा का अनुसरण करते हुए लिखित ’छत्तीसगढ़ी दानलीला’ में वर्णित श्रीकृष्ण के रासलीला का नीर-क्षीर विवेचन-विश्लेषण करते हुए श्रीकृष्ण-राधा के अलौकिक प्रेम, भक्ति, अध्यात्म और सेवा के सुंदर प्रतिमान गढ़े हैं। वस्तुतः यह ग्रंथ अपनी घनीभूत संवेदना, दायित्वबोध और उद्दाम आवेग से सम्प्रक्त होने के कारण सतत् कल्याणमनी, वंदनीय और मनुष्य भाव की रक्षा के लिए दृढ़ संकल्पित है। यह स्थापित सत्य है कि साहित्य की विधा या शिल्प उतनी महत्वपूर्ण नहीं होती जितनी उसके भीतर से फूटने वाली दृष्टि होती है। चाहे कबीर के दोहे हों या तुलसी की चौपाईयाँ, उनकी प्रासंगिकता उस काल में भी थी जब उसे लिखा गया और वे आज भी प्रासंगिक हैं। मानवीय संरक्षा का भाव इस ग्रंथ की अन्तर्वर्ती शक्ति है इसीलिए यह आज भी प्रासंगिक है और इसकी प्रासंगिकता आगे भी बनी रहेगी। साहित्य लोक जागरण का मशाल लेकर आगे-आगे चलता है। यह ग्रंथ भी इसी परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। 

अंतरिक्ष में जगमगाते असंख्य ग्रह-नक्षत्र एवं तारक-तारिकाओं के बीच एक बड़ा ही प्रकाशवान ग्रह होता है जिसे हम शुक्र तारा या ’भोर के तारा’ के नाम से जानते हैं। यह आदिकाल से ही हमारे कौतुहल का केन्द्र रहा है। छत्तीसगढी और भोजपुरी में यह समान रूप से ’सुकवा तारा’ के नाम से विख्यात है। लोक का यही स्वभाव है और यही उसका सत्य है। संप्रति, साहित्याकाश में अपनी आभा विखेरता यह ग्रंथ, कवि पं सुन्दरलाल शर्मा और भाष्यकार भाई कुबेर लोक में ’सुकवा तारे’ की तरह जाने और पहचाने जायेंगे, ऐसा मेरा विश्वास है। शुभाशंसा है कि भाष्यकार के सारस्वत साधना का मार्ग प्रशस्त हो, समस्त-विश्व-सत्त्व-रूपिणी प्रकाशदायिनी माँ वीणापाणि के आशीष से नवीन कथ्य का दान मिलता रहे, पुण्य-पंथ हो। 

             - डॉ विनोद कुमार वर्मा 

       व्याकरणविद्,कहानीकार,समीक्षक 

               बिलासपुर ( छत्तीसगढ)

आत्मनिवेदन


’छत्तीसगढ़ के गांधी’ नाम से विख्यात पं. सुंदरलाल शर्मा छत्तीसगढ़ में सामाजिक क्रांति के अग्रदूत माने जाते हैं। वे आजीवन किसानों, मजदूरों और दलितों के पक्ष में खड़े रहे और उनके अधिकारों के लिए लड़ते रहे। छत्तीसगढ़ में उनके दलित उद्धार के कार्यों को देखकर महात्मा गांधी ने स्वयं उन्हें अपना गुरू माना था। जिस व्यक्ति को महात्मा गांधी जैसे युग पुरुष ने अपना गुरू माना हो उनकी महानता और उनके विराट व्यक्तित्व का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। छत्तीसगढ,़ छत्तीसगढिया औऱ छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रति उनके समर्पण और प्रेम को उनकी कालजयी कृति ’छत्तीसगढ़ी दानलीला’ को पढ़कर सहज ही समझा जा सकता है। ’छत्तीसगढ़ी दानलीला’ छत्तीसगढ़ी भाषा का प्रथम खण्डकाव्य है। इसकी रचना का समय 1907 ई. के आसपास माना गया है। कृति के अंत में कवि ने स्वयं इस ग्रंथ के पूर्ण होने के समय का उल्लेख इस प्रकार किया है -

सम्मत दृग रस अंक शशि, तिथि तृतिया गुरुबार।

कृष्णपक्ष आसौज मह, भयेउ ग्रन्थ तय्यार।।  

(इस पद की विवेचना इस कृति में यथास्थान किया गया है।) 

हिंदी साहित्य में यह समय ब्रजभाषा का समय था। ऐसे समय में खंडकाव्य की रचना के लिए छत्तीसगढ़ी भाषा को चुना जाना अपारंपरिक परंतु साहसिक कार्य था। पं. सुंदरलाल शर्मा ने इस कृति के लिए न केवल छत्तीसगढ़ी भाषा को चुना बल्कि दानलीला के प्रसंग को छत्तीसगढ़ की संस्कृति, लोक परंपरा और वेशभूषा के साथ संपृक्त भी किया। ग्वालिनों के लिए ’रौताइन’ संबोधन, - 

’’रौताइन सब सुनत-रिसाइन। कब ले श्याम साव बन आइन।।’’  

नंद बाबा के लिए ’गौटिया’ और गोचारन करने वाले यादवों के लिए ’पहटिया’ संबोधन, -  

’’गांव-गांव में रथैं गौंटिया। 

कोनो ऐसन करथैं? धीया।।’’

’’नन्द गौंटिया के बेटवा हर ओ। 

मोर आइस आंखिन के तर ओ।।’’

तथा -

’’कहिबे संझहा नन्द गौंटिया। 

देहै एक झिन लगा पहटिया।।’’


तथा श्रीकृष्ण सहित ग्वालों के हाथ में लाठी, पैरों में भदई, पहनावे में मयूर पंख का साजू, कंबल तथा सिर पर खुमरी का समावेश इसी क्रम में किया गया है। ग्वालिनों द्वारा धारित समस्त आभूषण छत्तीसगढी़ आभूषण हैं। श्रीकृष्ण और ग्वालिनों के बीच संवाद और नोक-झोक भी छत्तीसगढ़ी संस्कृति के अनुरूप है। कृति में सर्वत्र छत्तीसगढ़ी ’हाना’ (मुहावरे, कहावतें और लोकोक्तियाँ) के सहज प्रयोग से छत्तीसगढ़ की संस्कृति और लोक परंपरा के चित्रण की प्रभावोत्पादकता में वृद्धि हुई है। लोक संस्कृति और लोक परंपराएँ ही मुहावरों, कहावतों और लोकोक्तियों के उत्स होते हैं। अब कह सकते है कि इस खंडकाव्य के नामकरण में ’दानलीला’ के पूर्व ’छत्तीसगढ़ी’ जोड़ना भी सोद्देश्य, सायास और अर्थपूर्ण है। ’दानलीला’ का अर्थ श्रीकृष्ण के द्वारा ग्वालिनों से दान लेने के लिए किया गया लीला है।

इस खंडकाव्य में ’दान’ के लिए ’जगात’ शब्द का प्रयोग किया गया है। जगात शब्द इस्लामिक परंपरा के ’जकात’ का छत्तीसगढ़ी तद्भव प्रतीत होता है। इस्लामिक परंपरा में प्रत्येक दीनी के लिए पांच अनिवार्य कर्तव्य निश्चित किए गए है। जकात इन्हीं में से एक है जिसके अनुसार प्रत्येक दीनी को अपने आय का एक निर्धारित हिस्सा दीनी कार्यों के लिए दान करना अनिवार्य होता है। 

इस कृति में जगात का दूसरा अर्थ ’कर’ भी अभिव्यंजित होता है। इस पद को देखिए - 

’’तेखर भेजे ले मैं आयेंव। तुम्हला इहां जगात सुनायेंव।।’’ 

अर्थात ’’मैं उसी (राजा) के द्वारा भेजा गया हूँ और तुम लोगों से जगात मांग रहा हूँ।’’ यहाँ जगात का आशय राज-कर ही प्रतीत होता है। 

’छत्तीसगढ़ी दानलीला’ का कथा-प्रसंग श्रीमद्भागवत् महापुराण के दशम स्कंद से लिया गया माना जाता है। दशम स्कंद में भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन है। परंतु इस कृति में वर्णित कुछ प्रसंगों का श्रीमद्भागवत् महापुराण के दशम स्कंद के प्रसंगों से कोई तादात्म्य नहीं बैठता। श्रीकृष्ण द्वारा ग्वालिनों से जगात वसूल करने का प्रसंग ऐसा ही प्रसंग है। इस खंडकाव्य में गोपियों तथा श्रीकृष्ण के गोप सखाओं द्वारा डकैत अथवा लुटेरे के अर्थ में पेंडारा शब्द का भी उल्लेख हुआ है - 

’’श्याम पेंडारा परे लगेव तब।।’’

’’चिटिक डेरावौ झन भौजी-मन। कोनो चोर पेंडारा नोहन।।’’

पेंडारा (पंडारा, पिण्डारी अथवा पण्डारी) अठारहवीं शताब्दि और उन्नीसवीं शताब्दि के पूर्वार्द्ध में दक्षिण और पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों में सक्रिय लड़ाकों के समूह होते थे। ये अत्यंत क्रूर और साहसी होते थे और युद्धों में हिस्सा लेते थे। बाद में ये चोरी, डकैती और लूटपाट करने लगे थे। जिस गाँव से इनका दल गुजरता था उसे ये पूरी तरह नष्ट कर देते थे। इन्हें राजाओं का संरक्षण प्राप्त होता था और लूटे गए धन का एक हिस्सा ये उन्हें देते थे। बाद में अंग्रेजों ने इनका उन्मूलन किया था। इसका भी श्रीमद्भागवत् महापुराण के दशम स्कंद की कथा से कोई तादात्म्य नहीं है। इन प्रसंगों का उल्लेख तत्कालीन सामाजिक व्यवस्थाओं और मान्यताओं का प्रभाव ही माना जा सकता है। समीक्षकों के मतानुसार ’छत्तीसगढ़ी दानलीला’ का कथा प्रसंग महाकवि सूरदास और घनानंद की रचनाओं से प्रेरित है।

इस खंडकाव्य में वर्णित कुछ प्रसंग कवि की सर्वथा मौलिक और नवीन परंतु चमत्कृत करने वाली कल्पना प्रतीत होती है। श्रीकृष्ण द्वारा ग्वालिनों से यह कहना कि कंस से भला कौन डरता है? हम जिस राजा के चाकर हैं उसका नाम सुनो। हम तो कामदेव के चाकर हैं जिसका साम्राज्य तीनों लोकों में है और चढ़ती हुई भरपूर जवानी उनकी राजधानी है। हम उन्हीं के दूत हैं। उन्हीं ने हमें जगात वसूल करने के लिए भेजा है -

’’काम महीप नाव ओखर है। राज तीन लोकन के भर है।।

भरती चढ़ती अयन जवानी। तौन आय ओखर रजधानी।।’’

कथावाचकों और आचार्यों ने भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का अनेक प्रकार से औचित्यपूर्ण, तार्किक, मनोहारी और युग-सापेक्ष व्याख्याएँ की हैं। उदाहरणार्थ - चीरहरण लीला प्रसंग की व्याख्या में कहा जाता है कि ग्वालीन युवतियों का श्री यमुना जी में निर्वस्त्र होकर स्नान करना अमर्यादित और धर्मविरुद्ध आचरण था। ग्वालीन युवतियों को इसी का बोध कराने के लिए श्री भगवान ने चीरहरण लीला की रचना की थी। इस खंडकाव्य में वर्णित दानलीला का औचित्य कवि ने इस प्रकार सिद्ध किया है -

’’रोज बिहिनिया मथुरा जाथौ। रात भये ले गोकुल आथौ।।

भल मानुख के बेटी होके। काम करत हौ चोरपने के।।’’

(अरी! सखियों, जगात देने से बचने के लिए तुम लोग सुबह होते ही मथुरा चली जाती हो और देर रात तक लौटती हो। भले घर की बहू-बेटियों को क्या ऐसा करना चाहिए? यह तो चोरी है। अर्थात सुरक्षा और मर्यादा की दृष्टि से दिन रहते ही घर लौट आना चाहिए।)

इस खंडकाव्य की रचना का काल हिंदी साहित्य के उत्तर-मध्यकाल अर्थात रीतिकाल के अवसान का काल था। शृंगार रस की प्रधानता और नायिका के नख-शिख शृंगार का आलंकारिक वर्णन, नायिका के विभिन्न मनोभावों और मनोवृत्तियों का सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक वर्णन रीतिकालीन काव्य परंपरा की प्रमुख विशेषताएँ हैं। इस खंडकाव्य में भी इस परंपरा का औचित्यपूर्ण निर्वहन किया गया है। कुछ आलोचक निम्न पदों में अश्लीलता का आरोपण करते हैं, यथा - 

’’नगरी-नगरी ऊपर आयेव। तौन दिना के याद भुलायेव।।’’

(गोपियों को चीरहरण लीला प्रसंग का स्मरण कराते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि क्या वह दिन भूल गई हो जब अपना वस़्त्र लेने के लिए निर्वस्त्र ही यमुना जी से बाहर आई थी?) 

इसी प्रकार -

’’भिरिन कछोरा सबो झन, बस्ती बाहिर आय।

उघरे उघरे जांघ हर, केरा असन देखाय।।’’

तथा -

’’टीका-बेंदी अलखन पारे। रेंगैं छाती कुला निकारे।।’’

’’ग्वालिनें दूध-दही बेचने के लिए जा रही हैं। बस्ती से बाहर आने पर वे कछोरा भीर लेती है जिससे उनके जांघ खुल जाते हैं। (छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा में बड़ों-बुजुर्गों की मर्यादा में महिलाएँ उनके समक्ष कछोरा नहीं भीरती। कवि द्वारा इसी परंपरा का यहाँ निर्वहन किया गया है।) खुले हुए जांध केले के स्तंभ के समान दिख रहे हैं।’’ तथा ’’सजी-संवरी ग्वालिन युवतियाँ छातियाँ अर्थात स्तनों और कुला अर्थात नितंबों को निकले हुई चलती हैं।’’ (सिर पर रखे बोझ के भार के कारण, रेंगने पर स्तनों और नितंबों का हिलना स्वाभाविक रूप से होता ही हैं।) 

इस खंडकाव्य में ग्वालिनों का ऐसा शृंगारिक वर्णन रीतिकालीन काव्य परंपरा के अनुरूप ही है। 

इस तरह का वर्णन कुछ संस्कृत साहित्य में भी दिखाई देता है। 12वीं शताब्दि में भगवान श्रीकृष्ण के परम् भक्त कवि जयदेव रचित ’गीत गोविंदम्’ में ऐसे और भी पदों का समावेश है, यथा -

धीर समीरे यमुना तीरे वसति वने वनमाली।

गोपी पीनपयोधर मर्दन चंचलकरयुगशाली।।

(यमुना तट पर वन में गोपियों के उभरे हूए स्तनों को देखकर उसे मसलने के लिए श्रीकृष्ण के हाथ चंचल हो उठते हैं।)

तथा

पùापयोधरतटीपरिरम्भलग्न-काश्मीरमुद्रितमुरो मधुसूदनस्य।

व्यक्तानुरागमिव खेलदनंगखेदस्वेदाम्बुपूरमनुपूरयतु प्रियं वः।।

(पद्मा श्रीराधाजी के कुंकुम छाप से चिह्नित स्तन युगल का परिरंभण करने से जिन श्रीकृष्ण का वक्षःस्थल अनुरंजित हो गया है, मानो हृदय स्थित अनुराग ही रंजित होकर व्यक्त होने लगा है, साथ ही कंदर्पक्रीड़ा के कारणजात स्वेद बिंदुओं से जिनका वक्षःस्थल परिप्लुत हो गया है, ऐसे मधुसूदन का संभोगकालीन वक्षःस्थल आप सब का मनोरथ पूर्ण करे।)

’छत्तीसगढ़ी दानलीला’ के निम्न पदों पर भी अभद्र भाषा का आरोपण किया जा सकता है, यथा -

’’दंउर श्याम पहुंचा ला पकरिन। 

जाहौ कहां भला भोंसड़ी मन।।’’

तथा

’’जाथौं बंधवा मेर बताथौं। भुंसड़ा तोर अभी खेदवाथौं’’

छत्तीसगढ़ी लोकभाषा में भोंसड़ी तथा भुंसड़ा जैसे अपशब्दों का प्रयोग बहुत ही सहज रूप से किया जाता है और इसकी अभद्रता पर कोई ध्यान भी नहीं देता अतः इस कृति में ऐसे प्रयोग को लोकभाषा का सहज प्रभाव ही मानना चाहिए। छत्तीसगढ़ी में ’भुसड़ी (मच्छर) खेदारना’ एक हाना है जिसका अर्थ होता है - पराजित करना, निरुत्तर करना, निश्तेज करना, नीचा दिखाना, मानमर्दित करना।

कई समीक्षक इस कृति का संबंध भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ते हुए राजा कंस को अंग्रेजों का प्रतीक तथा श्रीकृष्ण को अंग्रेजी शासन का विरोध करने वाले साहसिक युवक के रूप में प्रस्तुत करते हैं परंतु संपूर्ण खंडकाव्य का अनुशीलन करने पर भी इसमें इस प्रकार के किसी रूपकत्व का सर्वथा अभाव ही दिखाई देता है। शृंगार तथा भक्तिरस से युक्त इस खंडकाव्य में आद्यांत भक्ति और अध्यात्म के ही दर्शन होते हैं। कवि ने भी आरंभ में कहा है -

सिरी कृष्ण भगवान के, कहिहौं चरित सुनाय।। 

समय प्रवाह के साथ साथ-भाषा का स्वरूप भी परिवर्तित होता है। इस खंडकाव्य की भाषा लगभग सौ साल पूर्व प्रचलित भाषा के अनुरूप है। इस काव्य ग्रंथ में प्रयुक्त छत्तीसगढ़ी भाषा के बहुत सारे शब्द वर्तमान में प्रचलन से बाहर हो चुके हैं, यथा - दौंरी, धीया, बिरदान्त, खड़ोर, रकसा-रकसिन, अउठ आदि ...। इसी प्रकार ग्वालिनों के शृंगार वर्णन में उनके द्वारा धारित अनेक आभूषण, जैसे - ककनी, बहुटा, पछेला, गठिया, तोड़ा, सूता, सुर्रा आदि .. भी अब प्रचलन में नहीं हैं। इसके कारण इस खंडकाव्य के पदों का भावार्थ लिखने में कुछ कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है। इसके निवारण के लिए गाँव के बुजुर्ग महिलाओं की सहायता ली गई है फिर भी अर्थ विन्यास में कुछ कमी अथवा त्रुटि का रह जाना संभावित है। भावार्थ पढ़कर ऐसे शब्दों का अर्थ सहज ही समझा जा सकता है। यही कारण है कि भावार्थ के साथ-साथ पृथक रूप से ऐसे शब्दों के मायने अथवा अर्थ नहीं दिए गए हैं। 

संपूर्ण खंडकाव्य में अनेक अलंकारों का प्रयोग हुआ है। सर्वाधिक प्रयोग अनुप्रास, उपमा, रूपक, घ्वन्यर्थ व्यंजना, लोकोक्ति जैसे अलंकारों का हुआ है। भावार्थ के साथ यथास्थान इसका उल्लेख किया गया है। मूल कृति में चौपाइयाँ लगातार दी गई है। परंतु यहाँ पर भावार्थ लिखते समय विषय और भाव को ध्यान में रखकर इनके अनुच्छेद किए गए है। ऐसी मान्यता है कि खंडकाव्य में एक ही प्रकार के छंद का प्रयोग किया जाता है परंतु इस खंडकाव्य में दोहा और चौपाई के अलावा सवैया, तथा त्रोटक छंद का भी प्रयोग किया गया है। 

अंत में मैं भाषाविद्, व्याकरणाचार्य तथा साहित्यकार डॉ. विनोद कुमार वर्मा का हृदय से आभारी हूँ जिन्होंने इस कार्य में मुझसे हुई त्रुटियों को परिमार्जित करके इसे प्रकाशन योग्य बनाया। आशा है, मेरे इस लघुप्रयास अथवा धृष्टता को आप अन्यथा नहीं लेंगे। यह प्रयास इस खंडकाव्य का रसास्वादन करने में आपका सहायक ही होगा। इसी आशा और विश्वास के साथ आपका ...  

कुबेर

23 जनवरी 2026

बसंत पंचमी

मंगलाचरण


जय-जय सुंदर, जय जगदीश हरे।


असुर निकंदन, देवकी नंदन, 

रास रचावत, गोपी चित्त नित वास करे।

जय-जय सुंदर, जय जगदीश हरे।


गो-वर्धन हित, गोवर्धन नग -

उठा अंगुलिया, इंद्राभिमान-मर्दन करे।

जय-जय सुंदर, जय जगदीश हरे।


बरसाने, गोकुल, वृंदावन-जन- 

मनरंजन, मोहन, नित-नव लीला करे। 

जय-जय सुंदर, जय जगदीश हरे।


मनविकार निवार, भक्तन हिय -

निर्मल करन, ’दानलीला’ सृजन करे।

जय-जय सुंदर, जय जगदीश हरे।


राधा अंग, अनंग रूप धरि -

बसत कन्हैया, भक्त मनोरथ पूर्ण करे।

जय-जय सुंदर, जय जगदीश हरे। 


देर अबेर, ’कुबेर’ के हिय नित

प्रेम-रस सींचत, राधारमण बिहार करे।

जय-जय सुंदर, जय जगदीश हरे। 

-0-


अथ पं. सुंदरलाल शर्मा कृत ’छत्तीसगढ़ी दानलीला’

(सब ले आगू देंवता संउरे के मड़वना)


दोहा


जगदिश्वर के पांव में, आपन मूड़ नवाय।

सिरी कृष्ण भगवान के, कहिहौं चरित सुनाय।।

पंचगोठ (कवि का कथन)

मन में मन तो मिल गइस, आंखी रहिस समाय।

मया-फन्द में राधिका, मछरी अस तड़फाय।।


भावार्थ:- कवि (पं. सुंदरलाल शर्मा) कहते हैं - मन से मन (श्रीराधा और श्रीकृष्ण का) मिल गया है, वह (श्रीकृष्ण) राधा जी की आँखों में समा चुका है। माया रूपी फंदे (जाल) में फंसकर श्री राधिका अब मछली के समान तडप रही है।

अलंकार:- ’माया-फन्द’ में रूपक अलंकार तथा ’राधिका, मछरी अस तड़फाय’ में पूर्णोपमा अलंकार है।


राधागोंठ (राधा उवाच)

जा दिन ले नन्दलाल ला, ठाढ़े देखेंव खोर।

कांहीं नहीं सुहावै, गोई! किरिया तोर।।


भावार्थ:- राधा सखियों से  कहती है - नंदलाल को जिस दिन से गली में खड़े हुए देखा है, हे! सखी, तुम्हारी कसम खाकर कहती हूँ, मुझे कुछ भी सुहाता नहीं है।


सवैया

सुन आज मुहाटी में ठाढ़े रहेंव, 

बेटवा जसुदा तहं आइस ओ।।

हंस के मोला देख भऊं टेंड़गा,

करके मुंह ला बिचकाइस ओ।।

तव दौंर पोटार निकार के लाज, 

धरेंव मूड़ा छोंड़ पराइस ओ।।

खरिखा के तनी वो धनी लरिका, 

ठेंगवा मोला आज बताइस ओ।।


भावार्थ:- राधा सखियों से कहती है - हे! सखी, सुनो। आज जब मैं दरवाजे के पास खड़ी थी तभी यशोदा का बेटा आया, मुझे देखकर हँसा, भौंहों को टेढ़ा करके, मुँह बनाकर मुझे चिढ़ाया। तब मैंने लज्जा त्यागकर, दौड़कर उसे अपने अंक में भर लिया। लेकिन मेरा वह प्रिय, खुद को छुड़ाकार, मुझे ठेंगा दिखाकर, गौठान की ओर भाग गया। 


दोहा

खरिखा में लरिका लिये, देखेंव नन्द किशोर।

चरखा सरिखा तभिच ले, गिंजरत है मन मोर।।

कोनों जतन लगाय के, देते श्याम मिलाय।

धोकर-धोकर के रात-दिन, परतेंव तोरेच पांय।।


भावार्थ:- राधा कहती है - हे! सखी, सुनो। गौठान में ग्वालबालों के साथ जब से नंदलाल को देखा है, तभी से मेरा मन चरखे की तरह घूम रहा है। कोई जतन करके यदि तुम मुझे मेरे श्याम से मिलवा दोगी तो मैं दिन-रात धरती में लोट-लोटकर तुम्हारा, पांव पड़ूँगी। 

अलंकार:- ’चरखा सरिख गिंजरत हे मन मोर’, इस पद में पूर्णोपमा अलंकार है।


त्रोटक छन्द

जब ले सपना मैं निहारंव ओ। 

तव ले मिलकी नइ मारेंव ओ।।

दिन-रात मोला हयरान करै। 

दुखहाई ये दाई! जवानी जरै।।

मैं गोई! अब कोन उपाय करौं। 

के कहूं दहरा बिच बूड़ मरौं।।

मोला कोनों उपाय नइ सूझत है। 

ये गोई गोदना अस गूदत है।।

भावार्थ:- राधा कहती है - हे! सखी, सपने में मैंने उसे जब से देखा है तब से पलक भी नहीं झपकाई है। दिन-रात हैरान करता है। यह जवानी बड़ी दुखदाई है, जलाता है। हे, सखी,  मैं कौन सा उपाय करूँ, दहरा (नदी के गहरे पानी में) में डूब मरूँ? मुझे कोई उपाय नहीं सूझता है। गोदने के समान यह मुझे गोदता रहता है।

अलंकार:- ’जब ले सपना मैं निहारंव ओ, तव ले मिलकी नइ मारेंव ओ’ में अतिशयोक्ति अलंकार तथा विरह वेदना की तुलना गोदने की पीड़ा से की गई है अतः यहाँ उपमा अलंकार है।


जब ले वोला मूड में मौर धरे। 

गर में बने फूल के माला करे।।

लवड़ी दुहनी कर में लटुका। 

पहिरे पिंयरा-पिंयरा पटुका।।

मैं तो जात चले देख पारेंव ओ। 

वोला कुंज के कोती निहारेंव ओ।।

तब ले गोई! मैं बनि गेयेंव बही। 

थोरको सुरता मोला चेत नहीं।।

 

भावार्थ:- राधा कहती है - हे! सखि, जब से उसे सिर पर मुकुट धारण किए, गले में सुंदर फूलों की माला पहने, हाथ में लाठी, दुहनी-लटुका (लोटा) धरे, पीले रंग का पटुका पहने, कुंज की ओर जाते हुए देखा है, तब से हे! सखि, मैं बावरी बन गई हूँ। तब से मुझे कुछ भी स्मरण नहीं है। होश नहीं है।


चिटको नइ अन्न सुहावै मोला। 

बिरदान्त मैं कोन बतावौं तोला।।

बढ़ के तोला गोई! बतावौं नहीं। 

थोरको तोर मेर लुकावौं नहीं।।

हस जानत मोर सुभाब गोई। 

कतको दुखहाई बतावैं कोई।।


भावार्थ:- राधा कहती है - हे! सखि, अन्न जरा भी सुहाता नहीं है। अपनी कहानी मैं किसे सुनाउँ सखि?  हे सखि! मैं कुछ भी बढ़ा-चढ़ाकर नहीं बता रही हूँ और न कुछ छिपा रही हूँ। तुम तो मेरा स्वभाव जानती ही हो। निंदा करने वाले चाहे कुछ भी कहे। 


मिलिके कभू गौकुल जातेन ओ। 

मन के मरजी ला बतातेन ओ।।

दुख औ सुख ला गोंठियातेन ओ। 

घर सांझक ले फिर आतेन ओ।।

धर लेतेन थोरिक दूध-दही। 

गोठियाथौं गोई! मन आथै नहीं।।


भावार्थ:- राधा कहती है - हे! सखि, मैं अपने मन की इच्छा बता रही हूँ - किसी दिन सब मिलकर गोकुल जाते। सुख-दुख की बात करते हुए और सांझ होने से पहले घर लौट आते। साथ में दूध-दही भी रख लेते। अपने मन की बात कह रही हूँ सखि, तुम्हें अच्छी लगी?


बेंच देतेन वीर बेंचातिस तो। 

कन्हैया ला खवातेन खातिस तो।।

लेवना बने लाल ला देतेन वो। 

लाहो ला जिनगी के ले लेतेन वो।।

करेजा में खड़ोर-के नातेन वो। 

मुंह देखत में सुख पातेन वो।।


भावार्थ:- हे सखि! जितना बिकता, बेच देते, नहीं तो कन्हैया यदि राजी होगा तो उसे खिला आते। अच्छा-अच्छा मक्खन लाला को देते। जितनी मस्ती करना होता कर लेते। जीवन का सुख भोग लेते। हृदय (रूपी सागर के) तट में बसा लेते। उसके दर्शन का सुख पा लेते।

अलंकार:- ’करेजा में खड़ोर-के नातेन’ पद में रूपक अलंकार है।


नन्द गौंटिया के बेटवा हर ओ। 

मोर आइस आंखिन के तर ओ।।

तब ले चिटको नइ भूलत है। 

मोर आंखिच आंखी में झूलत है।।

जब कान उटेर लगाथौं ओ। 

घुंघरू के कभू गम पाथंव ओ।।


भावार्थ:- हे! सखि, नंदराजा का बेटा जब से मेरी आँखों में समाया है, तब से झणभर के लिए भी उसे भूल नहीं पाती हूँ, (उसकी छबि) सदा मेरी आँखों के सामने झूलता रहता है। जब भी मैं उस ओर कान लगाती हूँ मुझे (उसके पैरों की) घुंघरू ही बजती हुई सुनाई देती है।  


जब झक्क ले आगू निहारथौं ओ। 

दहि-चोर ला मैं देख पारथौं ओ।।

मन ही मन में लगथै डर ओ। 

हरि देइस मोला, कुछू कर ओ।।

मन मोर चोराय सु लेइस है। 

मोहनी कुछू थोप धौं देइस है।।

कोन जानथै जो कुछू जाहै होई। 

ये जवानी ला कइसे निभाहौं गोई।।


भावार्थ:- हे! सखि, और जब कभी सहसा आँखें खोलती हूँ, सामने दही-चोर को ही खड़े हुए पाती हूँ। मन ही मन में डर लगता है कि हरि ने मेरे साथ कुछ (सम्मोहन, मोहनी-थापनी) कर दिया है। मेरे मन को तो पहले ही चुरा लिया है, मोहनी-थापनी भी कुछ कर दिया होगा। कौन जाने अब मेरा क्या होगा? कुछ हुआ तो हे! सखि, इस जवानी को किस तरह निभा पाऊँगी?

अलंकार:- ’मन ही मन .... निभाहौं गोई’’ में भ्रांतिमान अलंकार।

दोहा

देखे बिन नन्दलाल के, अब तो नइ रहि जाय।

जात सगा डर छांड़ के; धरिहौं मोहन पांय।।


भावार्थ:- हे! सखि, नंदलाल को देखे बिना अब तो रहा नहीं जाता। जाति-बिरादरी का डर छोड़कर, अब तो मोहन के पांव पकड़ लूँगी।


चलो आज चलबो गोई! बृन्दाबन के बाट।

दही बेंचबो जाय के; मथुरा जी के घाट।।


भावार्थ:- हे सखि! दही बेचने के लिए मथुरा जी के घाट पर तो जाते ही हैं। आज हम वृंदाबन के रास्ते होकर चलेंगी।  


पंचगोंठ (कवि का कथन)

ललिता औ चन्द्रावली; सुन प्यारी के बात।

चलो चलो चलिबो गोई! कहि के पकरिन हांत।।


भावार्थ:- कवि कहते हैं - (सखियों को राधा जी की बात जंच जाती है।) प्यारी राधा जी की बात सुनकर ललिता और चन्द्रावली नाम की सखियाँ, चलो-चलो सखि, चलते हैं, कहते हुए एक-दूसरे का हाथ पकड लेती हैं।

चौपाई

जतका दूध-दही अउ लेवना। जोर-जोरके दुधहा जेवना।।

मोलहा-खोपला-चुकिया-राखिन। तउला ला जोरिन हैं सबझिन।।

दुहना-टुकना बीच मड़ाइन। 

घर घर ले निकलिन रौताइन।।


भावार्थ:- प्यारी राधा जी की बात सुनकर सभी गोप-बालाएँ दूध, दही, मक्खन मटकियों में भरकर और नाप-तौल का तराजू-बर्तन लेकर बर्तनों को टोकरी के बीचोंबीच रखकर अपने-अपने घरों से निकल पड़ती हैं।


एक जंवरिहा रहिन सबे ठिक। 

दौंरी में फांदे के लाइक।।

कोनों ढोंगी कोनो बुटरी। 

चकरेट्ठी दीखैं जस पुतरी।।

ऐन जवानी उठती सबके। 

पन्द्रा सोला बीस बरस के।।


भावार्थ:- सभी सखियाँ, दौंरी (बैलों के द्वारा धान मिंजाई करने की पारंपरिक विधि) में फांदने लायक, समान उम्र की थी। कोई लंबी थी, कोई ठिंगनी थी। कोई भरी बदन और बड़ी-चौड़ी नितंबोंवाली थी और पुतली की तरह दिख रही थी। सभी की आयु पंद्रह-सोलह और बीस बरस के बीच थी। सबकी जवानी उठान पर थी।

अलंकार:- ’चकरेट्ठी दीखैं जस पुतरी’ में उपमा अलंकार है।


काजर आंजे अंलगा डारे। 

मूड़ कोराये पाटी पारे।।

पांव रचाये बीरा खाये। 

तरुवा में टिकली चटकाये।।

बड़का टेंड़गा खोपा पारे। 

गोंदा खोंचे गजरा डारे।।


भावार्थ:- सखियाँ आँखों में काजर लगाए थीं, आंचल से छाती को ढंके हुए थीं। बाल सबके विशेष रूप से संवरे हुए थे। पांवों में महावर रंगे थे। पान का बीड़ा खा रही थी। माथे पर टिकली चमक रही थी। किसी का खोपा बढ़ा था किसी का टेढ़़ा था। बालों में गजरा लगाई थी और गेंदे का फूल खोंचे हुए थी।


नगता लाली मांग लगाये। 

बेनी में फुन्दरी लटकाये।।

टीका-बेंदी अलखन पारे। 

रेंगैं छाती कुला निकारे।।


भावार्थ:- मांग में नगता-लाली (मांग का आभूषण) लगाए हुई थी। चोटी में फुदरा लटकाए हुए थी। टिकिया-बिंदिया लगी हुई थी। आँचल कमर में खुंची हुई थी। छाती और नितंबों को मटकाते हुए चली जा रहीं थीं।


कोनों हैं झाबा गंथवाये। 

कोनो जुच्छा बिना कोराये।।

भुतही मन अस रेंगत जावैं। 

उड़-उड़ चुन्दी मुंह में आवैं।।


भावार्थ:- कुछ सखियाँ बालों में झाबा गुँथाए हुए थीं तो कुछ ऐसी भी थीं जिन्होंने बाल नहीं संवारे थे और भूतही (चुड़ैल) की तरह चल रहीं थी। उनके बाल उड़-उड़कर मुँह को ढंक लेते थे।

अलंकार:- ’भुतही मन अस’ में उपमा अलंकार है।


पहिरे रंग-रंग के गहना। 

ठलहा कोनो अङ्ग रहे ना।।

कोनों पैरी चूरा जोंड़ा। 

कोनो गंठिया कोनो तोंड़ा।।

कोनो ला घुंघरू बस भावै। 

छुमछुम छुमछुम बाजत जावै।।

खनर-खनर चूरी सब बाजै। 

खुल के ककनी हांथ बिराजै।।

पहिरे बहुंटा और पछेला। 

जेखर रहिस सौख है जेला।।


भावार्थ:- सभी सखियाँ आभूषणों से विभूषित थीं। नाना तरह के आभूषण पहनी हुए थीं। कोई भी अंग बिना आभूषण के नहीं था। कोई पैरी और चूड़े का जोड़ा, कोई गठिया, कोई तोड़ा पहनी हुई थी। कोई केवल घुंघरू पहनी थी और छमछम बजाती हुई चल रही थी। चूडि़याँ  खनकने की ध्वनियाँ आ रही थी। कोई हाथों में ककनी धारण किए हुए थी। कोई बांह में बहुंटा और पछेला पहनी थी। जिसे जो पसंद था वह वही पहनी थी।

अलंकार:- ’छुमछुम छुमछुम बाजत जावै, खनर-खनर चूरी सब बाजै में घ्वन्यार्थ व्यंजना अलंकार।


बिल्लोरी चूरी हलबाही। 

रत्तन-पिंउरी औ टिकलाही।।

कोनो छुच्छा लाख बंधाये। 

पिंउरा पटली ला झमकाये।।

पहिरे हैं हरियर धूपाही। 

कोनो छुटुंवा कोनो पटाही।।


भावार्थ:- कुछ सखियाँ कलाई में बिल्लौरी और लाल-पीले और टिकलाही चूडि़याँ पहनी हुई थी, कुछ लाख की चूडि़याँ पहनी हुई थी। कोई पीले रंग की पटली झमका रही थी, कोई हरे रंग की धूपाही, कोई छुटुंवा तो कोई पटही पहनी हुए थी। 


दोहा

करधन कंवरपटा पहिर, रेंगत हांथी चाल।

जेमा ओरमत जात हैं, मोती हीरा लाल।।


भावार्थ:- सखियाँ करधन और कमरपट्टा पहनी हुई थी जिसमें से हीरे, मोती और लाल लटक रहे थे। वे हथिनों की तरह चल रही थी,   


चौपाई

चांदी के सूंता झमकाये। 

गोदना ठांव-ठांव गोदवाये।।

दुलरी तिलरी कटवा मोहैं। 

औ कदमाहीं सुंर्रा सोहैं।।

पुतरी अउर जुगजुगी माला। 

रूपस मुंगिया पोत बिशाला।।

हीरा लाल जड़ाये मुंदरी। 

सब झन चक-चक पहिरे अंगरी।।


भावार्थ:- गले में चांदी का सूता झलक रहा है। जगह-जगह  गोदना गुदवाए हैं, दुलरी, तिलरी और कटवा मन को मोहते हैं।  कदमों में सुर्रा शोभित हो रहे हैं। गले में पुतरी और जुगजूगी माला है जिसमें मूंगे के बड़े-बड़े पोत लगे हुए हैं। सभी सहेलियों की ऊँगलियों में हीरे और लाल रत्न जटिम मूंदरी चमक रहे हैं।


पहिरे परछैंहा देवराही। 

छिनी अंगुरिया अउ अंगुठाही।।

खोटिला तितरी ढार बिराजैं। 

खिलवां-तरकी कानन राजैं।।

तेखर खाले झुमका झूलै। 

देखत डउकन के दिल भूलै।।

नाकन में सुन्दर नथ हालै। 

नहि कोउ अउठ तोला के खालै।।

कोनो तिरैंया पांव रचाये। 

लाल महाउर कोनो देवाये।।

चुटकी चुटका गोड़ सुहावै। 

चुटचुट चुटचुट बाजत जावै।।

कोनो अनवट बिछिया दोनो। 

दंग दंग ले छुच्छा हैं कोनो।।

रांड़ी समझैं पांव निहारैं। 

ऊपर एंहवांती मुंह मारैं।।


भावार्थ:- पांव की कनिष्ठा ऊँगलियों में देवराही और परछैंहा तथा अंगूठे में अंगुठाही पहने हुए हैं। कानों में खोटिला, तितरी ढार, खिलवा और तरकी विराजित हैं जिसके नीचे झुमका झूल रहे हैं जो पुरुषों के मन को मोह लेने वाले हैं। नाक में सुंदर नथनी है जो तोले भर से कम के नहीं हैं। कोई तिरैया से पांव रंगाए हुए है, कोई लाल महावर रंगाए है। पैरों में चुटकी- चुटका (पतले तलों वाला खड़ाऊ जो चलने पर पैर के तलुवों से टकराकर चुट-चुट की आवाज करता है।) पहने हुए हैं जिससे चुट-चुट की ध्वनि निकल रही है। किसी की ऊँगलियों में अनवट बिछिया है तो किसी की ऊँगलियाँ बिलकुल खाली है इनके पैरो को देखने से इसके विधवा होने का भ्रम होता है परंतु ऊपर मुँह को देखने पर उनकी सुंदरता सधवा को भी मात करने वाली हैं।

अलंकार:- ’चुटचुट चुटचुट बाजत जावै’ में ध्वन्यर्थ व्यंजना और ’रांड़ी समझैं पांव निहारैं’ में संदेह अलंकार। 


दांतन पाती लाख लगाये। 

कोनो मीसी ला झमकाये।।

एक एक के धरे हाथ हैं। 

गिजगिज गिजगिज करत जात हैं।।

एक दोय हो तो कहि जावै। 

अटाटूट ला कउन बतावै।।


भावार्थ:- कई गोप बालाएँ दांत की पंक्तियों में लाख लगाए हुई हैं तो किसी के दांत मिसी से चमक रहे हैं। सभी एक दूसरे का हाथ थामें हँसते-खिलखिलाते जा रही हैं। कवि कहते हैं कि एक-दो हो तो कोई उनकी बात बताए अटूट झुंड का वर्णन कौन कर सकता है? 

अलंकार:- ’एक दोय हो तो कहि जावै, अटाटूट ला कउन बतावै’ में अतिशयोक्ति अलंकार।  


पहिरे लूगा लाली-पिंयरा। 

देखत में मोहत हैं जियरा।।

डोरिया पातल सारि अंचरहा। 

मेघी चुनरी कोर लपरहा।।

मुंडा ढिंक के सोरा हंत्थी। 

पहिरे रेंगत हैं एक संत्थी।।

हलबिन पाटा तिरनी मोरे। 

कोनो थंड़ अंचरा हैं जोरे।।

कोनो-कोनो डेरी खंधेला। 

कोनो लिये जेवनी के ला।।


भावार्थ:- गोपिकाएँ लाल-पीले रंग के लुगरा पहने हुए हैं जो प्राणों को मोहने वाले हैं। आंचल वाली साडि़याँ महीन धागों से बुनी हुई हैं। मेघ के समान चुनरियों के किनारे लहरदार हैं। सिर ढंके साडि़यों की लंबाई सोलह हाथ की है जिसे पहनकर सभी एक साथ चल रही हैं। कोई साड़ी को तिरनी (चुन्नट) मोड़कर तो कोई हलबिन पाटा मारकर (बिना चुन्नट के) पहनी हुई है तो कोई आंचल को कमर में खोचे हुए है। आंचल को कोई बाएँ खांद लेकर तो कोई दाएँ खांद लेकर पहनी हुई है।


लडि़हा सूरज के रफ पावै। 

चकमक चकमक चमकत जावै।।

औ पहिरे रेशमाही चोली। 

करत जात हैं ठोली बोली।।

चिमटैं-मसकैं भरे जवानी। 

होत जात हैं गिद्द-मसानी।।


भावार्थ:- साड़ी की लडि़याँ सूरज की आभा से चकमक-चकमक चमक रहीं हैं। सभी रेशमी चोली पहने हुई है। गोपबालाएँ एक-दूसरे को व्यंग्य-उलाहना देती, ठिठोली करती हुई चली जा रही हैं। कोई किसी की चिकोटी कांट रही है तो कोई किसी के यौवन को मसल रही है। भगदड़ में सब अपना-अपना मनमानी कर रही हैं।

अलंकार:- ’करत जात हैं .... चिमटैं-मसकैं भरे जवानी। होत जात हैं गिद्द-मसानी।’ इस पद में गोपियों के दल और उनके बर्ताव को मरे जानवर का मांस खाते समय गिद्धों के लड़ने-झगड़ने (गिद्ध-मसानी) के बर्ताव का दृष्टांत देकर समझाया गया है अतः यहाँ दृष्टांत अलंकार ।


कोनो तो मुड़ उघरा जावैं। 

छाती ओढ़ना कोनो गिरावैं।।

कोनो के लुगरा खिंच लेवै। 

गुदगुदाय कोनो ला देवैं।।

नथ उठाय के पाछू झूकैं। 

औ फेर कोनो पिच्चले थूंकैं।।

कोनो हांसैं कोनो हंसावैं। 

टेंड़गा देखैं मुहं बिचकावैं।।


भावार्थ:- कोई किसी के सिर से आँचल खींचकर उसका सिर अनावृत्त कर देती है तो कोई किसी के छाती से ओढ़नी गिरा देती है। कोई किसी की साड़ी खींच लेती है, कोई किसी को गुदगुदाती है। कोई पीछे से झुककर किसी का नथ उठा लेती है। तब उसकी भर्त्सना में कोई पिच्च से थूंक देती है। कोई हँसती है, कोई हँसाती है तो कोई तिरछी निगाह करके मुँह बिचकाती है। 


दोहा

पँडरी-पँडरी देंह के, रूपस सबे अघात।

श्याम मिले के खुशी में, फसफसात हैं जात।।

भिरिन कछोरा सबो झन, बस्ती बाहिर आय।

उघरे उघरे जांघ हर, केरा असन देखाय।।


भावार्थ:- श्याम से मिलने की खुशी में गोरी-गोरी देहधारी अनिंद्य सुंदरियाँ चुहलबाजी करती हुई जा रही हैं। बस्ती से बाहर आने के बाद सभी युवतियाँ कछोरा भीड़ लेती हैं जिससे उनके जांघ खुल जाते हैं। खुले हुए जांघ केले के स्तंभ की तरह सुंदर दिख रहे हैं।

अलंकार:- ’उघरे उघरे जांघ हर, केरा असन देखाय’ में उपमा अलंकार।


चौपाई

करे सवांग सबो दूरी मन। 

चलैं छनाक-छनाक सबो-झन।।

कर हियाव कोनो गोंठियावैं। 

डरपोकनी मन बीच डेरावैं।।

उरभट भेंट कहूं जो-होई। 

तब तो कैसे करबो गोई।।

संगी लिये अगाड़ी आहैं। 

मोहन ठौंका दही नगाहैं।।


भावार्थ:- श्र्ृंगार करके सभी लड़कियाँ पायल झनकाती चली जा रही हैं। कोई परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए सावधानी पूर्वक बात करती है तो डरपोक लड़कियाँ बीच-बीच में डर जाती हैं। कहती हैं - हे सखि! यदि श्रीकृष्ण से एकाएक आमना-सामना हो गया तो हम क्या करेंगी। अपने साथियों के साथ आकर वह दही छीनने लगे तब हम क्या करेंगी? 


कोनो कह पकर हम लेबो। 

लाल गाल में गुलचा देबो।।

आगू कर लेबो मन भाई। 

फेर ले जाबो जसुदा ठांई।।

कोनो कुछू करौ तुम कोई। 

हरि ला जो पहुंचातेंव गोई।।

दौंरत पांव बीच गिर जातेंव। 

देखथ रहितेंव नयन जुड़ातेंव।।


भावार्थ:- तब कोई गोपबाला कहती है - तब हम उसे पकड़ लेंगी। उसके लाल गालों में गुलचा देंगी। फिर उसे आगे करके  यशोदा मैया के पास लेकर जायेंगी। तब एक अन्य बाला कहती है - अरी, सखियों! तुम लोग चाहे जो करो, यदि हरि मिल गया तो, मैं तो दौड़कर उसके चरणों में गिर जाऊँगी। उसे मन भरकर देखूँगी और अपने मन के संताप को शीतल करूँगी। 


एको घरी छोंड़तेंव नाहीं। 

रहितेंव बैठ न करतेंव कांही।।

माखन गोरस दही खवातेंव। 

किरिया! तोर कहूं जो पातेंव।।

ऐसन-ऐसन करत बिचारा। 

बिन्द्राबन में पहुंचिन झारा।।


भावार्थ:-  वह आगे कहती है - उसे घड़ी भर के लिए भी  नहीं छोड़ूँगी। कुछ नहीं करूँगी, बस उसे देखती रहूँगी। यदि कहीं वह मिल गया तो हे! सखि, तुम्हारी कसम है उसे मन भरकर मक्खन, दूध और दही खवाऊँगी। इसी तरह की बातें करती हुई गोपियों का झुंड वृंदावन पहुँच जाता है।


ओ कोती कान्हा हैं ठाड़े। 

लइका-मन ला लिये अगाड़े।।

माथे मौर लहरिया पागा। 

खौरे चन्दन करे संवागा।।

पहिरे हैं मजुराही साजू। 

ओरमे हवै फूंदना बाजू।।

खुल के पीताम्बरी सुहावैं। 

लौड़ी देखत लोग मोहावैं।।


भावार्थ:-  उधर अपने साथियों को लेकर कन्हैया सामने खड़े हैं। माथे पर मुकुट, चंदन का टीका और सिर में लहरिया पगड़ी धारण किए हुए हैं। वक्ष स्थल पर मयूर पंख का बना साजू पहने है जिसमें से फुदना लटक रहे हैं। पीतांबरी अत्यंत शोभायमान है। हाथ में लाठी देखकर लोगों का मन मुग्ध हो जाता है। 


भदंई अउर पैंजनी सोहै। 

कहै सुंदरइ ऐसन को है।।

मोहन देख परत हैं ऐसे। 

खासा चेलिक डौका जैसे।।

मुसकी ढारत झारत रज-कन। 

बोले लगिन श्याम-संगी सन।।

एक मनसुभा है रे भाई! 

आज चलो दहि दूध नगाई।।


भावार्थ:-  पैरों में भंदई (ग्रामीण चर्मकारों के द्वारा बनाया चमड़े का पारंपरिक देशी, बंद सैंडिल) और पैजनिया शोभित हैं। ऐसी सुंदरता का बखान कौन कर सकता है? मोहन गबरू जवान की तरह दिख रहे हैं। हाथों का धूल झाड़ते और मुट्ठी बांधते हुए श्री श्याम जी अपने साथियों से कहते हैं - भाइयों! आज के लिए एक योजना है, चलो आज दूध-दही लूटते हें।

अलंकार:- ’मोहन देख परत हैं ऐसे। खासा चेलिक डौका जैसे।।’ इस पद में उपमा अलंकार है।


दोहा

मन तुम्हार जो आतिस, खातेन लेवना-लूट।

लेतेन यार जगात सब, रौताइन के जूट।।


भावार्थ:-  श्रीकृष्ण जी ग्वाल-बालों से कहते हैं - भाइयों! यदि तुम लोगों को यह ठीक लगता हो तो आज मन भरकर मक्खन लूटेंगे और गोपियों के झुंड से जगात (जकात, इस्लामिक परंपरा में एक तरह का धार्मिक दान या कर) वसूल करेंगे।


चौपाई

सुनत कान लुटब दहि दूदे। 

हो! हो! करके लइका कूदे।।

ठौंका बनि है हरि संग जाबो। 

चलौ अरे! दहि माखन खाबो।।

ऐसन कहि कहि कूदैं नाचैं। 

एक बतावैं एके टांचैं।।


भावार्थ:-  श्रीकृष्ण जी के श्रीमुख से दूध-दही लूटने की बात सुनकर सभी ग्वाले आनंदित होकर हो! हो! करते हुए नाचने-कूदने लगते हैं। कहते हैं, अच्उा है, हरि के संग चलेंगे और दूध-दही खायेंगे। वे एक-दूसरे को उकसाने लगते हैं।


कहे श्याम तब सुनौ रे भाई। 

सब झन चढ़ौ रूख में जाई।।

तुम ला जब मैं करौं इशारा। 

कूद-कूद आहौ तब झारा।।

ऐसे हंस के कृष्ण कहिन जब। 

येते-वोते सखा चढि़न सब।।


भावार्थ:-  इस तरह ग्वालों से समर्थन पाकर श्रीकृष्ण अपनी योजना समझाते हुए ग्वालों से कहते हैं - तब सुनो भाइयों! अभी तुम सब अलग-अलग वृक्ष की शाखाओं में छिपकर बैठ जाओ। जब मैं इशारा करूँगा तब सब एक साथ कूदकर नीचे आ जाना। हँसकर श्रीकृष्ण के ऐसा कहते ही सभी ग्वाले इधर-उधर पेड़ों की शाखाओं में चठ़कर छिप जाते हैं।


आगू ठाढ़ भइन हरि जाके। 

लौड़ी लिये हांथ परसा के।।

वोती ले आइन रौताइन। 

श्याम देख डगडग ले पाइन।।

झरफर सबो कछोरा छोरिन। 

ढांकिन मूड़-बांह ला तोपिन।।

ठोठक गइन सब हरि ला देखे। 

कोंचकन लगिन एक ला एके।।


भावार्थ:-  श्रीकृष्ण जी स्वयं परसा (पलास पेड़ के जड़ से बनी लाठी) की लाठी लिए सामने खड़े हो जाते हैं। उधर से आती हुई ग्वालिनें श्याम को इस तरह प्रत्यक्ष देखकर जल्दी-जल्दी अपना-अपना कछोरा खोलने लगती हैं। सिर, बांह और वक्ष को आंचल से ढंकने लगती हैं। हरि को सहसा सामने देखकर सभी ग्वालिनें ठिठक जाती हैं। किसी से कुछ कहा नहीं जाता और एक-दूसरे को कुचकने लगती हैं। 


रेंगे बर आगू में होके। 

परिस हियाव नहीं कोनो के।।

ले-देके सब चलिन अगारी। 

सब ले चतुरी राधा प्यारी।।

दू पग चलैं ठोठक फिर जावैं। 

मन में मया उपर डर खावैं।।


भावार्थ:-  आगे आने का साहस किसी में नहीं हो रहा है। ले-देकर सभी आगे बढ़ीं। राधा रानी सबसे अधिक चतुर है। वह दो पग आगे बढ़ाती है और ठिठक जाती है। उसके मन में प्रेम हिलोरें मार रही है परंतु ऊपर से वह डर भी रही हैं।

(इस पद में नायक को सहसा पाकर नायिका के हृदय में जागृत रसदशा और उनके मनोभावों को व्यक्त करने वाली अनुभावों का सुंदर, मनोवैज्ञानिक वर्णन किया गया है।)


दोहा

साम्हू में सूंटी लिये, ठाढ़ भइन हरि आय।

आगू मोर जगात दे, पाछू पाहौ जाय।।


भावार्थ:-  छड़ी लेकर हरि सामने आकर खड़े हो जाते हैं। कहते हैं - अरी! गोपियों, पहले मुझे मेरा जगात दे दो। जगात दिए बिना आगे नहीं जा पाओगी।


चौपाई

रोज-रोज चोरी कर जावौ। 

मोला नहीं जगात पटावौ।।

ठौंका आज पकर म पायेंव। 

जातेव भाग तैसने आयेंव।।

तुमला आज जान तब देहौं। 

जब सब दिन के सेती लेहौं।।

रोज बिहिनिया मथुरा जाथौ। 

रात भये ले गोकुल आथौ।।

भल मानुख के बेटी होके। 

काम करत हौ चोरपने के।।


भावार्थ:-  तर्क देते हुए श्रीकृष्ण ग्वालिनों से कहते हैं -  तुम सब रोज-रोज छिपकर निकल जाती हो, मुझे जगात नहीं चुकाती हो। आज भी तुम सब भाग ही जाती लेकिन ऐन वक्त पकड़ी गई हो। सब दिनों का बकाया जगात लिए बिना तुम लोगों को आज जाने नहीं दूंगा। श्रीकृष्ण आगे और भी तर्क देते हैं - सुबह होते ही तुम लोग दूध-दही बेचने मथुरा चली जाती हो और (मुझसे बचने के लिए) रात में गोकुल लौटती हो। अरी सखियों! भले घर की बेटियाँ होकर भी ऐसा चोरों वाला ओछा काम करती हो? (बेटियों का देर रात तक घर के बाहर रहना अमर्यादित भी है।) 


रौताइन सब सुनत-रिसाइन। 

कब ले श्याम साव बन आइन।।

चोरी करत उमर सब मेले। 

भयेव बड़े मोहन छोटे ले।।

तउन आज ऐसन बोलत हौ। 

चोट्टी कहि हम ला ठोलत हौ।।

चोर तुम्हारे ऐल्हे पैल्हे। 

अउ तुम चोर, चोर के चेले।।


भावार्थ:-  श्रीकृष्ण की ऐसी बातें सुकर गोपियाँ नाराज होकर कहती हैं - हे श्याम! हमें चोर ठहरा रहे हो। तुम कब से साव बन गए हो? चोरी करते तो तुम्हारी उमर निकल रही है। हे मोहन! चोरी करते तो तुम छोटे से बड़े हुए हो। और तुम हमसे ऐसा कह रहे हो। हमें चोर ठहरा हो। चोरी करना तो तुम्हरा स्वभाव है। तुम्हीं चोर हो और चोरों के चेले हो।  


काल चोराय जो माखन खाये। 

आजेच मोहन गयेव भुलाये।।

मूसर में जब बांधिस लाके। 

तब हम सबो छोड़ायेन जाके।।

काले रोयेव अभी भुलायेव। 

आजेच भोंगचन्द बन आयेव।।


भावार्थ:-  गोपियाँ कहती हैं - हे मोहन! कल चोरी करके तुमने जो माखन खाए थे वह आज भूल गए क्या? याद करो, इसीलिए माता यशोदा ने तुम्हें मूसल से बांधा था। तब हमी लोगों ने तुम्हें छुड़ाया था। कल का रोना भूलकर आज ही बड़ा साव बन रहे हो।


दोहा

कंसराय के राज में, करौ न ऐसन काम।

घुसड़ अभी जाहैं सबो, बनेव जगाती श्याम।।


भावार्थ:-  गोपियाँ कहती हैं -हे श्याम! कंस राजा के राज में जगाती (जगात वसूलने वाला) बनकर ऐसा काम न करो। तुम्हारी सब चालाकी अभी धरी की धरी रह जाएगी।


चौपाई

चाहे भलुक मांगके खावौ। 

आवा! बइठौ! दोना लावौ।।

नाम जगात बूंद नइ पाहौ। 

आखिर चुचवावत रहि जाहौ।।


भावार्थ:-  गोपियाँ श्रीकृष्ण से कहती हैं - खाना ही है तो मंगकर खा लो। आओ! दोना लेकर बैठो। परंतु जगात के नाम से  बूंद भर भी नहीं पाओगे। आखिर में पछताते रह जाओगे।


ऐसे सुनत श्याम मुसकाइन। 

थोरिक आंखी मार बताइन।।

चिटिक मुलाजा नइ छू जाथै। 

मुह में कथौ जैसने आथै।।

हंडि़या के मुंह में परई दै। 

मनखे के मुंह में का सी दै?

मात गये हौ सब मोटियारी। 

नहिं खियाल मस्ती में भारी।।


भावार्थ:-  गोपियों की ऐसी बातें सुनकर श्याम मुसकाते हैं आँख नचाकर कहते हैं - गोपियों! तुम लोग लाज-लिहाज बिलकुल भूल गई हो। मुँह में जो आ रहा है, कही जा रही हो।    हांडी के मुँह को तो परई से बंद किया जा सकता है पर आदमी के मुँह को कोई कैसे सी सकता है? यौवन के मद में तुम सब मात गई हो, मस्ती में मर्यादा भूल गई हो। 


आंय-बांय मनमुखी बकत हौ। 

भूत धरे अस बात करत हौ।।

फोकट कौन जीभ पिरवावै। 

माछी मारै हाथ बसावै।।

जो मुंह आहै तउन बताहौ। 

दान दिये बिन जान-न पाहौ।।

आव सबे डूमर कस किरवा। 

का जानौ? तुम दूसर बिरवा।।


भावार्थ:-  श्रीकृष्ण जी गोपियाँ से कहते हैं - क्या तुम लोगों को प्रेत बाधा हो गया है? मन में जो आ रहा है वही सब अंट-शंट बके जा रही हो? अब तुम लोगों से व्यर्थ में बहस करके जीभ को कौन कष्ट दे? मक्खी मारकर हाथ ही गंदा होगा। मुँह में जो आए, कहती रहो पर सुन लो! दान दिये बिना कोई जा नहीं पाओगी। तुम लोग गूलर के कीड़े की तरह हो। गूलर के अलावा दूसरे वृक्ष के बारे में क्या जानो?

अलंकार:- ’आव सबे डूमर कस किरवा’ में उपमा अलंकार। गोपियों की अल्पज्ञता बताने के लिए यहाँ गूलर के कीड़े का दृष्टांत दिया गया है अतः यहाँ दृष्टांत अलंकार भी है।


एक कंस ला तुम सुन पायेव। 

आपन भर औखाद बतायेव।।

टेटका के पहुंचान कहां ले?

भांड़ी - बारी तीर जहां ले।।


भावार्थ:-  तुम सब केवल कंस का ही नाम सुन रखी हो,। यही तुम लोगों की औकात है। आखिर गिरगिट की पहुँच कहाँ तक होगी? जहाँ तक बाड़ी और भांड़ी (बाड़ी की सुरक्षा के लिए मिट्टी की बनाई गई कच्ची दीवार) होती है वहीं तक न?

अलंकार:- ’टेटका के पहुंचान कहां ले? भांड़ी-बारी तीर जहां ले’ में दृष्टांत अलंकार। 


दोहा

पिरथी सरग पताल औ, चन्दा सुरुज लगाय।

तीन लोक चौदा भुवन, राज हमारेच आय।।


भावार्थ:-  श्रीकृष्ण जी गोपियाँ से कहते हैं - गोपियों! राजा तो हम हैं, धरती, स्वर्ग और पाताल से लेकर चंदा और सुरुज तक, तीन लोक और चौदह भुवन में हमारा ही राज है। 

अलंकार:- श्रीकृष्ण के इस कथन का संकेत उनके ईश्वर अवतारी स्वरूप की ओर है अतः यहाँ विभावना अलंकार है।


चौपाई

इहां कंस ला कउन डेरावै। 

ऐसन कंस हजारों आवै।।

चूंदी धरके अभी पछारौं। 

चोंगी पियत भरे में मारौं।।

तेखर डर-मोला डरुवाथौ। 

मोला लइका जान बताथौ।।

मैं कैसन लइका हौं तेला। 

जानत हो लड़कापन के ला।।


भावार्थ:-  अपने पराक्रम का बखान करते हुए श्रीकृष्ण जी गोपियाँ से कहते हैं - गोपियों! कंस से यहाँ कौन भय खाता है? इस कंस के समान हजारों कंस भी आ जाय तो भी चोंगी खपने (बीड़ी के जलने) से पहले ही सबके बाल पकड़कर सबको पछाड़ दूँ। मुझे बालक समझकर कंस का भय दिखाती हो। मैं कैसा बालक हूँ नहीं जानती हो, बालपन में मैंने क्या-क्या पराक्रम किया है।

अलंकार:- ’चोंगी पियत भरे में मारौंे’ में अतिशयोक्ति अलंकार।


रकसा रकसिन खेलत मारेंव। 

नाथेंव विखहर सांप-निकारेंव।।

गोबर्धन पहाड़ उपकायेंव। 

छिनिया अंगुरी बीच-उठायेंव।।

ऐसन मैं लैकई दिखावौं। 

जानत हौ का गुन गोंठियावौं?

मोला माखन चोर बताथौ। 

का गुण आपन ऐब लुकाथौ।।


भावार्थ:-  श्रीकृष्ण जी गोपियाँ से अपने पराक्रम का वर्णन करते हुए आगे कहते हैं - गोपियों! बालपन में ही मैंने राक्षसों और राक्षसनिनों (पूतना, बकासुर आदि) को मारा। विषधर कालिया को नाथकर बाहर निकाला। गोवर्धन पहाड़ को उखाड़कर अपने छोटी ऊँगली से उठाया। लड़कपने की बात मत करो। मैं अपने मुँह से क्या बताऊँ? तुम लोग सब जानती हो। मुझे माखन चोर कहकर अपना ऐब न छिपाओ।


सुरता है तुम्हला वो दिन के। 

लुगरा ला लेके सब झिन के।।

बांधेंव मैं कदम्ब के डारी। 

कैसन मजा उडि़स? तब भारी।।

नगरी-नगरी ऊपर आयेव। 

तौन दिना के याद भुलायेव।।

नाक रगर के कुनश बजायेव। 

तब सब आपन लुगरा पायेव।।


भावार्थ:-  श्रीकृष्ण जी गोपियाँ को स्मरण दिलाते हुए कहते हैं - गोपियों! तुम्हें उस दिन का स्मरण है कि नहीं जब तुम सब की साडि़याँ लेकर मैंने कदंब की शाखाओं पर बांध दिया था। (चीरहरण की लीला) अहा! कितना आनंद आया था। निर्वस्त्र ही तुम सब यमुना से बाहर आई थी। वह दिन भूल गए क्या? नाक रगड़कर, कुनश बजाकर (कुनश अर्थात कोर्निश बजाना। मुगल परंपरा में बादशाह के सामने झुककर तीन बार सलाम करना।) क्षमा मांगी थी तब साडि़याँ वापस मिली थी। 


दोहा

सुनके ऐसन बात ला, सब झन रहिन लजाय।

आपुस में लागिन कहे, कैसे कथैं कन्हाय?


भावार्थ:-  श्रीकृष्ण जी की ऐसी बातें सुनकर सभी गोपियाँ लजा जाती हैं। सब एक-दूसरे से कहने लगती हैं कि ये कन्हैया कैसी-कैसी बातें कहते हैं?


चौपाई

एक कोंचक के एक बतावैं। 

सब मुचमुच-मुचमुच मुसकावैं।।

देखे गोई! कहब कन्हाई। 

निच्चट निल्लज होगै दाई।।

बोलत वोला लाज नइ लागै। 

अभी ले कैसे कलऊ खरागै?

कहां के कहां जोर चटकाथै। 

फोकट हमला लाज मराथै।।


भावार्थ:-  श्रीकृष्ण जी की ऐसी बातें सुनकर गोपियाँ एक-दूसरे को चिकोटी कांटते और मंद-मंद मुसकाते हुए कहती हैं - हे सखि! देखो तो कन्हैया क्या कह रहे हैं। हे माँ! यह तो बिलकुल निर्लज्ज हो गया है। ऐसा कहते हुए इसे लाज भी नहीं आती। क्या कलियुग का प्रभाव अभी से इतना प्रबल हो गया है? कहाँ-कहाँ की बात जोड़-तोड़कर कहते हैं, अकारण ही हमें शर्मिंदा करते हैं।

काखर-काखर मुह ला धरिहै। 

जौने सुनिहै हांसी करिहै।।

चार झना के बीच बताथै। 

मूंड़ हमार नीच करवाथै।।

ऐसन दूसर जघा बताहै। 

ठट्ठा भला कौन पतियाहै?

लेतो भला! बता दे कोई। 

हरि ला ऐसन चाहिय गोई?


भावार्थ:-  गोपियाँ आगे कहती हैं - अब किस-किस का मुँह बंद करोगी? जो सुनेगा वही हँसेगा। चार लोगों के बीच ऐसा कहकर हमारा सिर झुकाने वाली बात करता है। ऐसी बातें यह दूसरी जगह कहेगा तो इनका विश्वास कौन करेगा? अरी सखि! कोई तो बताए, हरि को क्या ऐसी बातें कहना चाहिए?


ऐसे सुनत श्याम मुसकाये। 

भऊं नचावत आगू आये।।

सेर बांध चतुरी खोजवायेंव। 

नहीं तुम्हार बरोबर पायेंव।।

चलिहै नहि मोर मेर चलाकी। 

अभी संउरिहौ दाई-काकी।।

मानो सोझ जगात मड़ा दौ। 

लेखा करके सबो चुका दौ।।


भावार्थ:-  गोपियों की ऐसी बातें सुनकर श्याम जी मुसकाए और भौंहें नचाकर कहने लगे - मैंने शेर बंधवाया, चतुर से चतुर लोगों से खोजावाया पर तुम लोगों के समान चतुरी और  कहीं नहीं मिली। मेरे सामने तुम लोगों की चालाकी एक न चलेगी। अब आगे जो कहूँगा तो माँ-चाची की याद आने लगेगी। सीधे -सीधे हिसाब करके जगात चुकाओं और जाओ।


दोहा

एकक सबो हिसाब के, कर देव मोर चुकाव।

मंझन होवत जात है, सोज हंसत घर जाव।।


भावार्थ:-  श्रीकृष्ण जी कहते हैं - दुपहरी होने को है। एक-एक करके सभी मेरा हिसाब चुका दो और खुशी-खुशी सीधे अपने-अपने घर लौट जाओ।


चौपाई

नहिं तो फटफट में पर जाहौ। 

फोकट इज्जत अपन गंवाहौ।।

देखत अभी नगा मैं लेहौं। 

औ फेर सबो हाल कर देहौं।।

आखिर फेर हांथ का आहै। 

बात तुम्हार कोन रहि जाहै?

कीर खींच के कथौं चेता के। 

मोला किरिया नन्द बबा के।।


भावार्थ:-  श्री कृष्ण जी चेतावनी देते हुए गोपियाँ से कहते हैं - गोपियो! अन्यथा झंझट में पड़ जाओगी। ईज्जत जायेगी सो अलग। देखो! अभी मैं सब झीन लूँगा। हालत खराब कर दूंगा। आखिर हाथ क्या आयेगा, तुम लोगों का क्या मान रह जायेगा? मर्यादा में रहकर (लकीर खींचकर) अंतिम चेतावनी देता हूँ, मुझे नंद बाबा की कसम है। 


चाहे मूड़ पटक मर जावौ। 

कतको चाहौ हड्ड बड़ावौ।।

जबले नहीं जगात मड़ाहौ। 

कैसनो करौ जान न पाहौ।।


भावार्थ:-  श्रीकृष्ण जी कहते हैं - चाहे सिर पटक-पटककर मर जाओ, जितना चाहे जिद्द कर लो। कुछ भी कर लो, जगात चुकाए बिना जा नहीं पाओगी।


ऐसन सुनत सबौ रौताइन। 

मुँह बिचकाइन और रिसाइन।।

बिच झाड़ी में सुन्ना पाके। 

डेरुवावत हौ हम ला आके।।

लोखन केर उधैया आये।

छेंकत बेटी-पतो पराये।।

अभी जाय घर अपन बताथन। 

लिगरी दू के चार लगाथन।।


भावार्थ:-  श्रीकृष्ण जी की बातें सुनकर सभी गोपियाँ मुँह बिचकाकर रूठ जाती हैं। कहती हैं - हे! कन्हैया, झाडि़यों के बीच हमें अकेला पाकर डराते हो। बड़े उगाही करने वाले बनते हो। पराए बहू-बेटियों का रास्ता रोकते हो। अभी घर जाकर सारी बातें बढ़ाचढ़ाकर बताएँगी, तुम्हारा शिकायत करेगी। 


तौ फेर श्याम हाल को होहै? 

हांसी-खेल बात ये नो है

जाथौं बंधवा मेर बताथौं। 

भुंसड़ा तोर अभी खेदवाथौं


भावार्थ:-  श्रीकृष्ण को चेतावनी देते हुए गोपियाँ कहती हैं - तुम यह जो कर रहे हो वह हँसी-खेल वाली बात नहीं हैं। अभी हम अपने-अपने भाइयों को जाकर बताती है फिर देखना तुम्हारा क्या हाल होता है। सब होशियारी चली जाएगी।


दोहा

टूरी-टूरी जान के, मोहन करत अबेर।

घुंचौ! चलौ! अब जान दौ, ढरकन लागिस बेर।।


भावार्थ:-  गोपियाँ कहती हैं - हे मोहन! हमें लड़कियाँ जानकर और विलंब न करो। हटो, जाओं और हमें भी जाने दो। सूरज ढलने वाला है।   


चौपाई

लहत-बिहत के रहब भला अय। 

बहुंतों के तपबो हर का अय?

गांव-गांव में रथैं गौंटिया। 

कोनो ऐसन करथैं? धीया।।

जात-पांत में सबो बराबर। 

नै अय गोई घाट? कोनो हर।।

दू-कोरी गेरुवा के मारे। 

आंखी भइस बेलन्द तुम्हारे।।


भावार्थ:-  गोपियाँ कहती हैं - हे मोहन! गाँव में लड़ते झगड़ते भी हैं पर सभी मिलजुलकर रहते हैं। तुम्हारा इस तरह का सताना क्या है? हर गाँव में गौंटिया होते हैं पर कोई एैसा करता है क्या? अलग-अलग जाति के लोग रहते हैं पर सभी बराबर हैं। कोई छोटा है क्या? तुम्हारे पास दो कोरी (चालीस) गऊएँ हैं इसी से तुम्हरी आँखों में गर्व समाया हुआ है।


छो-छो करके गाय चरावै। 

राजा कहत लाज नइ आवै?

कमरा औ खुमरी ओढ़े बर। 

बड़े-बड़े सांहुंत जोरे बर।।

ढोंग बघारे बर हो जेला। 

कहै जौन नइ जानै तेला।।

हमला कौन बतावै लाला। 

जानत हवन तीन पुरखा-ला।।


भावार्थ:-  गोपियाँ कहती हैं - हे! मोहन, छो-छो करते दिन भर गायें चराते हो और खुद को राजा कहते हुए तुम्हें लाज नहीं आती? कमरा-खुमरी ओढ़ते हो पर सपने बड़े-बड़े देखते हो। ढोंग मत करो, जो नहीं जानता हो उससे कहो। हमको मत बताओ लाला हम तो तुम्हारे तीन पुरखों को जानती हैं।  


तुम तो आव नन्द के बेटा।

जनमें हवौ जसोदा पेटा।।

गड़े हवै गोकुल में नेरुवा। 

घर में है दू कोरी गेरुवा।।

चोरी कर-कर लेवना खायेव। 

कहूं बंधायेव कहूं पिटायेव।।

नइ चोरी में पेट भरिस जब। 

श्याम पेंडारा परे लगेव तब।।


भावार्थ:-  हे मोहन! तुम नंद के बेटे हो, यशोदा के पेट से जनमें हो। गोकुल में ही तुम्हरा नेरुवा (गर्भनाल) गड़ा है। घर में दो कोरी गऊएँ हैं पर चोरी कर-करके माखन खाते हो। इसीलिए तो तुम कहीं बांधे जाते हो, कहीं पीटे जाते हो। चोरी करते भी जब तुम्हारा पेट नहीं भरा तब, श्याम! अब पेंडारी का काम करने लगे हो।


जब तुम दिन भर गाय चराथौ। 

तब घर में खाये बर पाथौ।।

सुरता तउन भुला गय मुहना! 

कहां गंवायेव नोई-दुहना?

पंड़रा नन्द जशोदा पंड़री। 

तुम कैसे हौ करलुठुवा हरि?


भावार्थ:-  गोपियाँ उलाहना देते हुए आगे कहती हैं - हे मोहन! दिन भर जब तुम गाएँ चराते हो तभी घर में तुम्हें खाना मिल पाता है। भूल गए क्या? नोई और दुहना कहीं खो गया क्या? हे हरि! नंद गोरे हैं, यशोदा गोरी है पर तुम  कोयले की तरह काले कैसे?

अलंकार:- ’पंड़रा नन्द जशोदा पंड़री। तुम कैसे हौ करलुठुवा हरि?’ में वक्रोक्ति कथन अलंकार है।


दोहा

परिस दुकाल-गुपाल जब, हमर राज में आय।

दुइ काठा कोंदो बदल, तुमला लइन बिसाय।।


भावार्थ:-  गोपियाँ कहती हैं - अरे! गोपाल, तुम्हरे राज्य में जब अकाल पड़ा था तब तुम हमारे राज्य में आए और दो काठा कोदों के बदले खरीदे गए हो। (अर्थात नंद-यशोदा के बेटे नहीं हो।)


चौपाई

जो राजा हो भला बताथौ। 

हांथी कहौ कहां ले पाथौ?

छाता मौर कहां तुम डारे। 

नौकर-चाकर कहां तुम्हारे?

गादी बइठौ चंवर डुलावौ। 

तौ फेर का गुण गाय चरावो?

देखे गोई! आखिर अहिरे। 

राजा होके भदाईं पहिरे।।

भावार्थ:-  गोपियाँ कहती हैं - हे मोहन! यदि तुम राजा हो तो बताओ तुम्हारे हाथी कहाँ हैं? क्षत्र और मुकुट कहाँ हैं? तुम्हारे सेवक कहाँ हैं? सिंहासन में बैठतो हो, चंवर डुलवाते हो, तो किस हेतु गाय वराते हो? देखो तो सखियों! आखिर ये हैं तो अहीर ही, राजा होकर भी भदाई पहने हैं।


हीरा मोती लाल कहाँ गय?

गोंगची पहिरे लाज नहिं लागय।।

पीक मजूर लगाये पागा। 

लाज चिटिक नइ लागै का गा?

फेंकौ खुमरी ढंठ्ठा बांधौ। 

कमरा चीर अंगरखा साधौ।।

कहिबे संझहा नन्द गौंटिया। 

देहै एक झिन लगा पहटिया।।


भावार्थ:-  गोपियाँ कहती हैं - हे! मोहन, तुम्हारे हीरे, मोती और लाल कहाँ गए? गले में गोंगची का हार, सिर में पगड़ी और मोर पंख खोंचे हुए हो, तुम्हें लाज नहीं आती क्या? खुमरी को फेंको और चिंदी बांध लो। कमरे को फाड़कर अंगरखा बना लो। (यदि तुम राजा हो तो) आज संध्या घर जाकर नंद गौंटिया से कहना कि (तुम्हारे लिए) एक पहटिया नौकरी पर लगा दे।


फबित नहीं आवे थोरको के। 

ठेंगा पकरे राजा होके।।

बिन मनखे-तनखे बिन बाजा। 

नेवाई के देखेन राजा।।

ऐसन सुनत श्याम मुसुकाइन। 

निधड़क निचट अगाड़ी आइन।।

सूवा झन पोंष चारिक ठन। 

रौताइन राखैं घर दू झन।।


भावार्थ:-  गोपियाँ कहती है - राजा होकर भी लाठी लिए घूम रहे हो, जरा लाज नहीं आती क्या? बिना प्रजा के राजा बने घूमते-फिरते हो, काहे का राजा? गोपियों की ऐसी कठोर उपहास सुनकर श्रीकृष्ण मुसकाते है और निःशंक होकर आगे बढ़ते हैं और गोपियों का उपहास करते हुए कहते हैं - कोई अपने घर में चार-चार तोते न पाले; बस! दो झने ग्वालिनों को पाल ले। (अर्थात तुम लोग तोते से अधिक बातूनी हो।)

अलंकार:- ’सूवा झन पोंष चारिक ठन। रौताइन राखैं घर दू झन।’ में विभावना अलंकार।


दोहा

कोयली अस बासत हवौ, कहौ न बात बिचार।

मुंहुलग्गी हो गये हव, गोकुल के दू चार।।


भावार्थ:-  मोहन कहते हैं - अरी, गोपियों! बिना सोचे-विचारे कोयली की तरह कूक रही हो। गोकुल की लड़कियों, तुम में से दो-चार लोग निर्लज्ज और मुँहलगी हो गई हो।

अलंकार:- ’’कोयली अस बासत हवौ’’ में उपमा अलंकार है।


चौपाई

तभे सभे मिलकी मारत हौ। 

तुम मोला निदरे डारत हौ।।

सुन तो ओ! पूछत हौं तोला। 

कब जन्मत देखे हस मोला?

कहां ले नन्द जसोदा आइन। 

जनथौ इन्हला कोन बनाइन?

मही सिरजथौं मही चराथौं। 

मही जियाथौं मही मराथौं।।


भावार्थ:-  श्रीकृष्ण गोपियों से कहते हैं - अरी गोपियों! तभी तो तुम लोग इतनी बातें कर रही हो। मुझे दबाए जा रही हो। ऐ सखी, मैं तुमसे पूछता हूँ, तुमने मुझे जन्म लेते कहाँ देखा है? नंद और यशोदा कहाँ से आए? जानती हो तो बताओ। सखियों! मैं ही सिरजन कर्ता (सृष्टि का) हूँ। मैं ही पालनकर्ता हूँ। जन्म देने वाला भी मैं हूँ और मारने वाला भी मैं ही हूँ।

अलंकार:- ’सुनतो ओ! पूछत हौं तोला ...... मही जियाथौं मही मराथौं’ इस पद में विभावना अलंकार।


मोर बिना पाना नइ हालै। 

आखिर तुमला कहौं कहां ले।।

पाप अघात भुंया गरुवाइस। 

मोर मेर रोवत तब आइस।।

तब मैं मन में मया मड़ायेंव। 

मनखे के चोला धर आयेंव।।

जेमा मनुवा-चारी करिहैं। 

लीला गाहैं सुनिहैं तरिहैं।।

तेला अड़हा-मन का जानौ? 

टेंड़गा सोझहा अपने तानौ।।


भावार्थ:-  आगे श्रीकृष्ण जी कहते हैं - (इस सृष्टि में) मेरी ईच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता। आखिर तुमसे क्या-क्या कहूँ? जब धरती को पाप का भार असहनीय होने लगा तब वह रोते हुए मेरे पास आई। (पृथ्वी का गो रूप धारण करके भगवान श्री विष्णु के पास आने की कथा) तब धरती को पाप के भार से मुक्त करने के लिए मैंने यह माया रची है। मानव रूप धारण करके पृथ्वी पर आया हूँ। मेरी इस लीला को जानने वाले, सुनने और भजने वाले इस भवसागर से पार हो जाते हैं। तुम अज्ञानी लोग इस बात को क्या जानों। केवल अपनी ही उल्टी-सीधी बात मनवाती हो। 

कमरा के तुम निन्दा करथौ। 

वही कमरहा पाले परथौ।।

का जानौ कमरा के गुण ला?

दही औ कपसा एके तुमला।।

तीन लोक में मैं खोजवायेंव। 

कमरा के न बरोबर पायेंव।।

ग्वालिन सुनत कहन अस लागिन। 

कोन गोंठ ला कहां निकालिन?


भावार्थ:-  श्रीकृष्ण जी आगे कहते हैं - जिस कमरे की तुम निंदा करती हो वही कमरा तुम्हारे जीवन का सार है। कमरे का गुण तुम क्या जानों, तुम्हारे लिए कपास और दही बराबर है। तीनों लोक में मैंने ढुंढवाया पर कमरे के बराबर गुण वाला कुछ भी नहीं पाया। श्रीकृष्ण की बातें सुनकर ग्वालिनें कहती हैं - सखियों! लो सुन लो। कहाँ की बात ये कहाँ ले जा रहे हैं।


दोहा

अजगुत अजगुत बात ला, कोन सुनै मन मार।

कब के उपजे कोलिहा, कब देखे खरिहार?


भावार्थ:- ग्वालिनें कहती हैं - सखियों! इनकी उटपुटांग बातों को मन मारकर कौन सुने। अभी का पैदा हुआ यह सियार जैसे पूरी दुनिया देख लिया हो?

अलंकार:- ’कब के ... खरिहार’ में रूपक अलंकार है।


चौपाई

गोकुल में गोई? तउन खटावै। 

मारै मूड़ औ गोड़ बतावै

हमहूं खार खोजायेन सबरा। 

नइ पायेन मोहन अस-लबरा

जावौ मोहन तहां बतावौ। 

लबरा जहां बरोबर पावौ


भावार्थ:- ग्वालिनें कहती हैं - सखियों! गोकुल में तो अब वही टिक सकता है जो किसी के सिर को फोड़कर पैर में मारना बताए। हमने भी दुनियाभर में ढूंढकर देख लिया है, इसके समान झूठा कहीं नहीं मिला। ऐ मोहन! तुम अपना झूठ वहाँ जाकर चलाओ जहाँ अपने समान झूठे लोग पाओ।


कमरा के जो करेव बड़ाई। 

तौन सबो ठौंका है भाई !

यही ओढ़ के गाय चरावौ। 

येखरे घोंघी झड़ी लगावौ

यही ओढ़ के जाड़ बुतावौ। 

यही ओढ़ के घाम घलावौ

काम परे ले यही डसावौ। 

येखरे सींसा मूंड़ मड़ावौ


भावार्थ:- ग्वालिनें कहती हैं - कान्हा! कमरे की जो बाते तुमने कही वह बिलकुल सही है। इसे ही ओढ़कर गाय चराओ। इसी में घोंघे की लड़ी लगाओ, इसी को पहनो, जाड़े से बचने इसे ही ओढ़ो। इसे ही ओढ़कर धूप से बचो। जरूरत पड़ने पर इसे ही बिछाओ और इसका ही पगड़ी पहनो। 

अलंकार:- इस पूरे पद में ब्याजनिंदा अलंकार है।


सबो रकम में ये जाथै बन। 

है कमरा तुम्हार पत राखन

आभा करके कहैं हरी ला। 

तुम्हरे कमरा फबै तुम्ही ला

भावार्थ:- ग्वालिनें कहती हैं - यह कमरा ही है जो हर तरह का काम आता है। इसी से तुम अपनी लाज बचाओ। व्यंग्य करते हुए गोपियाँ कहती हैं, कान्हा! तुम्हारा कमरा तुम्हें ही शोभा देता है।

अलंकार:- इस पूरे पद में ब्याजनिंदा अलंकार है।


करियै देह करिये कमरा हर। 

जोंड़ी दूनो मिलिस बरोबर।।

ऐसे कहिके सब रौताइन।

तब रेंगे बर पांव उठाइन।।

दंउर लाल आगू ला छेंकिन। 

जात कहां हौ दान दिए बिन?


भावार्थ:- गोपियाँ कहती हैं - तुम भी काले, तुम्हारा कमरा भी काला, अच्छी जोड़ी बन पड़ी है। ऐसा कहकर गोपियाँ आगे बढ़ती हैं तब आगे रास्ता रोककर श्री कृष्ण कहते हैं कि रुको, दान दिए बिना कहाँ जाती हो।

 

दोहा

बिना जगात पटाये, नइ पाहौ तुम जाय।

लेहौं अभिच नगाय मैं, जाहौ ठसक भुलाय


भावार्थ:- श्री कृष्ण कहते हैं - बिना जगात पटाए तुम लोग जा नहीं पाओगी। अभी सब छीन लूंगा। तुम लोग सारी हेकड़ी भूल जाओगी।


चौपाई

सुनके ऐसन बात-कन्हाई। 

सब रौताइन गइन रिसाई।।

भले बाप के बेटा होबे। 

तो तैं नइ नगाय बस! लेबे

ऐसे कहि पेलिन अगुवा मन। 

चलिन छनाक-छनाक सबो झन


भावार्थ:- श्रीकृष्ण जी की ऐसी बातें सुनकर गोपियाँ रूठ जाती हैं। कहती हैं - यदि तुम भले बाप का बेटा हो तो खबरदार, कुछ भी छीने तो। खाना हो तो मंगकर खाओं। ऐसा कहकर आगे की ग्वालिनें आगे बढ़ने लगती है। उनके पीछे वाली भी गुस्से में पैर पटकती हुई उनका अनुसरण करती हैं।


दंउर श्याम पहुंचा ला पकरिन। 

जाहौ कहां भला भोंसड़ी मन।।

दइन हांथ झटकार जोरकर। 

मोहन गइन उड़ाय कोस भर।।

झुरमुट करिन श्याम फेर मांगिन। 

झुमटा झुमटा होवन लागिन।।


भावार्थ:- श्रीकृष्ण गोपियों को ललकारते हुए एक का बांह पकड़ लेता है। तब वह ग्वालिन ऐसा हाथ झटकती है कि श्रीकृष्ण छिटककर कोस भर दूर जाकर गिरते हैं। मोहन उठकर फिर आते हैं और झूमा-झटकी होने लगती है।

अलंकार:- ’मोहन गइन उड़ाय कोस भर’ में अतिशयोक्ति अलंकार है।


कजिया के ओखी ला करके। 

हरि ला सबो पोटारैं धरके।।

कोनो पकरें कोनो नगावैं। 

ऐसने-ऐसने साध बुतावै।।ं


भावार्थ:- गोपियाँ आंचल की आड़ ले-लेकर हरि को अपने-अपने आगोश में लेने के लिए आतुर होने लगती हैं। कोई पकड़ती है, कोई छीनती है और इस तरह अपना-अपना साध पूरा करती हैं।


तब मोहन सुंसरी ला पारिन। 

हलर हलर हालिन डारी-मन।।

सुंसरी सुनिन जबे संगी-मन। 

धमा-धम्म कूदिन सब्बो झन।।


भावार्थ:- तब श्रीकृष्ण ने अपने सखों को संकेत देते हुए सीटी बजाते हैं। वृक्ष की शाखाएँ हलर-हलर हिलने लगती हैं और गोप नीचे कूदकर इकट्ठा होने लगते हैं।


अकबकाय देखैं रौताइन।

जैसे टीड़ी-फांफा आइन।।

कोउ तुंतरू कोउ संख बजाइन। 

सुनके सब गोहार कौआइन।।


भावार्थ:- टिड्डी-पतंगों के समान ग्वालबालों के समूह को देखकर ग्वालिनें अचंभित होकर देखती हैं। कोई तुतरू बजा रहा था तो कोई शंख। सुनकर ग्वालिनें झल्ला जाती हैं।

अलंकार:- ’जैसे टीड़ी-फांफा आइन’ इस पद में ग्वालबालों को टिड्डी-फांफा कहा गया है अतः इसमें उत्प्रेक्षा अलंकार है।


दोहा

कोनो हैं झालर धरे, कोनो हैं घडि़याल।

उत्ताधुर्रा ठोकैं, रन झांझर के चाल।।


भावार्थ:- ग्वालबालों में से किसी के हाथ में झालर है, कोई घडि़याल बजा रहा है तो कोई लगातार झांझर बजा रहा है।


चौपाई

पहिरे पटुका ला हैं कोनो। 

कोनो जंघिया चोलना दोनो।।

कोनो नीगोटा झमकाये। 

पूछेली ला हैं ओरमाये।।

कोनो टूरा पहिरे साजू। 

सुन्दर आड़ बन्द है बाजू।।

जतर कतर फुंदना ओरमाये। 

लकठा लकठा में लटकाये।।


भावार्थ:- ग्वालबालों में से कोई केवल पटुका पहना हुआ है, कोई जांघिया और चोलना दोनों पहना हुआ है, कोई लंगोट पहना हुआ है जिसके दोनों छोर लटके हुए हैं, कोई सुंदर बाजूबंद वाला साजू (मोर पंखों से बना हुआ वक्ष स्थल में धारण करने वाला विशेष अंगवस्त्र जो युद्ध के समय रक्षा कवच के रूप में पहना जाता है।) पहना हुआ है जिसमें नजदीक-नजदीक में फुदने लटके हुए हैं। 


ठांव ठांव में गूंथे कौड़ी। 

धरे हांत में ठेंगा लौड़ी।।

पीछू में खुमरी ला बांधे। 

परै देखाय ढाल अस खांधें।।

ओढ़े कमरा पंड़रा करिहा। 

झारा टूरा एक जंवरिहा।।

हो हो करके छेंक लइन तब। 

ग्वालिन संख उड़ाय गइन सब।।


भावार्थ:- साजू में नजदीक-नजदीक में कोैड़ी गुथे हुए हैं। हाथ में ठेंगा-लाठी धरे हैं और पीठ में ढाल के समान खुमरी बांधे हुए हैं। सफेद और काले रंग के कमरा ओढ़े हुए हैं। सभी लड़के समान वय के हैं। जब सब मिलकर हो! हो! की आवाज करते हुए ग्वलिनों का रास्ता रोक लेते हैं तब ग्वालिनें अचंभित हो जाती हैं।


हत्तुम्हार जौंहर हो जातिस। 

देबी दाई तुमला खातिस।।

ठौंका चमके हन सब्बो झन। 

डेरुवा दइन हवैं भडुवा मन।।


भावार्थ:- ग्वालबालों के शोर मचाते हुए अचानक प्रगट होने से गवालिनें बुरी तरह चौंककर डर जाती हैं और ग्वालबालों  को कोसते हुए कहती हैं - तुम्हारा नाश हो। जौहर करके मर जाओ। तुम्हें देवी माँ खा जाय। हम सबको चौंका दिया। इन भड़ुवों ने हमें डरा दिया।


झझकत देखिन सबो सखा जब। 

हाहा! हाहा! हांस दइन सब।।

चिटिक डेरावौ झन भौजी-मन। 

कोनो चोर पेंडारा नोहन।।

हरि के सांझ जगात मड़ावौ। 

सिट-सिट करत घर तनी जावौ।।


भावार्थ:- ग्वालिनों को चौकते और डरते हुए देखकर सभी सखा लोग हो! हो! करके हँसने लगते हैं। कहते हैं - भाभियों! जरा भी डरो मत। हम कोई चोर-पेंडारे नहीं हैं। सीधे-सीधे हरि का जुगात चुकाओं और चुपचाप अपने-अपने घर को जाओ।


दोहा

श्याम अकेल्ला जान के, रहे हौ पेलत जात।

अब तो हम सब आ गयेन, करिहौ कउन जुगात?


भावार्थ:- ग्वालसखा लोग ग्वालिनों से कहते हैं - श्याम को अकेला जानकर उससे हुज्जत कर रही थी न। अब हम लोग आ गए हैं। अब कौन सा जुगत करोगी?


चौपाई

चीन्ह लइन टूरा-मन ला जब। 

चरचर ले अङ्गरी फोरिन सब।।

कहां बसैया कहां रहैया? 

आयेव भौजी बड़ा कहैया।।

तोर भाई भड़ुवा ला ला तो। 

देखौं कैसन हवै देखा तो।।

अभी तोर भाई भड़ुवा के।

खेदवाथौं भुंसड़ा ला जाके।।


भावार्थ:- ग्वालिनें लड़कों को पहचान लेने के बाद उन लोगों कीे भर्त्सना में हाथ की ऊँगलिया चटकाते हुए कहती हैं - अरे! कहाँ के रहने-बसने वालो! बड़े आए भौजी कहने वाले? तुम्हारा भड़ुवा भाई कहाँ है, दिखाओं तो जरा। जाकर उस भड़ुवे की खबर लेती हैं।


ऐसन सुनत सखा मुसकाइन। 

अंगरी मोहन तनी बताइन।।

अब देखे भाई भड़ुवा ला। 

देखन तो? का करिथौ तेला।।

है तुम्हार आगू में ठाढ़े। 

डग-डग ले सरई अस बाढ़े।।

गइन लजाय सुनत सब्बो झन। 

बक्का नइ फूटिस एक्को-ठन।।


भावार्थ:- ग्वालसखा लोग ग्वालिनों की ऐसी बातें सुनकर मुस्कुराते हुए मोहन की ओर ऊँगली से इशारा करके कहते हैं - वो देखो, तुम लोगों के सामने सरई (पटसन का पौधा) के समान प्रत्यक्ष खड़ा है। देखें, भला क्या कर लोगी। ग्वालबालों की ऐसी बातें सुनकर सभी ग्वालिनें लजा जाती हैं। किसी के भी मुँह से एक शब्द नहीं किलते। 

अलंकार:- ’डग-डग ले सरई अस बाढ़े’ यहाँ श्रीकृष्ण के कद की तुलना सरई के पौधे (पटसन का पौधा) से किया गया है अतः इस पद में उपमा अलंकार है। 


रिस करके तब मोहन लाला। 

ठाढ़े भइन रोक रसदा ला।।

अब तो जान तभे मैं देहौं। 

लेखा गतर-गतर के लेहौं।।

ठौंका चढ़ती अयन जवानी। 

हवे तुम्हार अवो मोर रानी!!

गहना गूंठा लादे जाथौ। 

कम्भुच नहीं जगात पटाथौ।।


भावार्थ:- तब मोहन लाला रास्ता रोककर खड़े हो जाते है और रूठते हुए कहते हैं - अब तो मैं इन्हें तभी जाने दूंगा जब हिसाब करके पाई-पाई वसूल कर लूंगा। ऐ मेरी रानियों! एक तो तुम लोगों की ऐन चढ़ती जवानी है। उस पर गहनों से लदी हुई हो पर जकात कभी नहीं पटती हो। 

दोहा

उटकापंची छांड़ के, देव जगात हमार।

अभी तभी लेहौं झटक, रहि जाहौ झकमार।।


भावार्थ:- अब व्यर्थ की बहानेबाजी छोड़ों। मेरा जगात चुकाओ नहीं तो अभी सब छीन लूंगा। झखमार के हाथ मलती रह जाओगी। 


चौपाई

आज अरे ठौंका पहुँचायेंव। 

गंज दिना में मैं सपड़ायेंव।।

बघवा हांथी लादे जाथौ। 

छुच्छा ठेंगवा मोला चुमाथौ।।

आनीबानी माल रखे हौ। 

कुच्छू नैये ऐसन कहिहौ।।

तुम्हीं बतावौ कइसे बनिहै? 

थोरिक हो तो कोनो मनिहै।।


भावार्थ:- कई दिनों बाद आज पकड़ में आई हो। बाघ और हाथी लादे हुई घूमती-फिरती हो पर मुझे खाली अंगूठा बताती हो। नाना प्रकार के धन रखे हुए हो और हमारे पास कुछ भी नहीं है ऐसा कहती हो। तुम्हीं लोग बताओ, ऐसे में कैसे बनेगा। कुछ तो देकर जाओ, तभी तो बनेगा?


मोती केंरा कंवल लदायेव। 

हंडुला सोन अतेक-गढ़ायेव।।

तेमा फेर समुंद रखे हौ। 

पंड़की अउर परेवा हैहो।।

कुंदरू दरमी धनुवा-लायेव। 

सूरुज-चन्दा घलो लदायेव।।

सांप घलाय सबो पोषे हौ। 

सबो जगात आज मोर देहौ।।


भावार्थ:- मोती, केला और कंवल से लदी हुई हो। सोने के इतने हंडे गढ़वाई हुई हो फिर ऊपर से सागर तुम्हारे पास है। पंडकी और परेवा की तरह तुम लोग स्वयं हो ही। चंदा और सुरुज को लजाने वाले, कुंदरू और अनार के समान धन लेकर आई हो। सांप भी सभी लोग पाले हुए हो। आज तो मेरा सब दिन का जगात चुका ही दो।


सुनत बात ऐसन रौताइन। 

अबके सब्बो झन कौवाइन।।

देखे गोई! कहां बताथै। 

कैसे अंढ़त-गंढ़त गोंठियाथै।।

ऐसन गोंठ फबित नइ आवै। 

मोहन हमला लाज मरावै।।

कोनो ऐसन कथे? जेठानी! 

मंगथैं श्याम जगात जवानी।।


भावार्थ:- मोहन की ऐसी बातें सुनकर सभी ग्वालिनें खीझ जाती हैं। कहती हैं - अरी! सखी, देखो तो ये क्या कहता है? कैसे बेढंगी और मनगढ़ंत बातें बताता है। ऐसी बातें शोभा नहीं देती हैं, सुनकर हमें लाज आती है। अरी! जेठानी, क्या कोई ऐसा भी कहता है? यह श्याम जकात नहीं, हमारा यौवन ही मांगता है। 


दोहा

सुन पाहैं कोनो कहूं, तब का होहै हाल?

आगी लग जातिस अओ! ऐसन ठट्ठा-ख्याल।।


भावार्थ:- ग्वालिनें कहती हैं - इनकी ऐसी बातें कोई सुन ले तो अरी! सखी, पता नहीं हमारा क्या हाल होगा। इनके इस मजाक को आग लगे।


चौपाई

जानेन चेलिक भइन कन्हाई। 

तेखरे ये चोचला ऐ दाई!

नगरा-नगरा फिरत रहिन हैं। 

आजेच चेलिक कहां भइन हैं?

कौन गुरु मेर कान फुंकाइन? 

बड़े डपोर-संख बन आइन।।

दाई-ददा ला जे नइ मानै। 

ते फेर दूसर ला का जानै?


भावार्थ:- श्रीकृष्ण को उलाहना देते हुए ग्वालिनें कहती हैं - हे! सखी, अब समझ में आया। कान्हा अब जवान हो गया है इसलिए ऐसी बातें कर रहा है। लेकिन कल तक तो यह बिना कपड़ों के घूम-फिर रहा था (बच्चा था) और आज एक ही दिन में ये जवान कैसे हो गया? पता नहीं किस गुरू के पास कान फूंकाकर आया है; बड़ा ढपोरसंख बना घूम रहा है? जो माँ-बाप की न माने वह दूसरों का भला क्या मान करेगा?

अलंकार:- इस पूरे पद में वक्रोक्ति अलंकार है।


आजेच गम पायेन सब्बो-झन। 

फोर भिंभोरा जनमिन मोहन।।

जनमिन भलुक ईंखरे पेटी। 

बेटा नन्द जसोदा बेटी।।

गंज दिनाके ये बुढ़ुवा ऐ। 

मेछा-दाढ़ी घलो खियागै।।

तेला नइ जानत हौ कोई। 

बुढ़ गंडाके तपनी गोई।।


भावार्थ:- आज ही हमें यह भी पता चला है कि यह तो बांबी फोड़कर पैदा हुआ है। बेटा नंद और बेटी यशोदा तो इन्हीं के गर्भ से पैदा हुए है। पता नहीं यह कब का बूढ़ा है, देखते नहीं इनकी दाढ़ी-मूँझें भी साफ हो गई हैं। सखियों! इस बात को कोई नहीं जानती हो कि सिर मुड़ाकर यह तपस्वी बना है।


गहना गूठा पहिरब ओढ़ब। 

नइ सुहाय जेला हमार जब।।

कोंचक लेय दूनो आंखी ला।

देखे ओ! अनदेखना के ला।।

नइ येखर अमाय आंखी में। 

सालत हैं एखरो छाती में।।

रसदा चलती में ओरझत है। 

गहना गूंठा ला उटकत है।।


भावार्थ:-  ग्वालिनें कहती हैं - हमारा वस्त्र-आभूषण पहनना-ओढ़ना जिसे न सुहाता हो वह अपनी दोनों आँखें क्यों न कोंच ले। देखो तो सखी! इस ईर्ष्यालु को, हमारी सुंदरता देखी नहीं जाती, इनके हृदय को सालता है। राह चलते हमसे उलझ रहा हैं। हमारे कपड़ों-गहनों के बारे में बोल रहा है?


दोहा

पहिरब-ओढ़ब घला हर, कसके लगिस हमार।

जर जातिस ऐसन गोई! गोकुल के बसवार।।


भावार्थ:- ग्वालिनें कहती हैं - अब तो हमारा पहनना-ओढ़ना भी इनकी आँखों को खटकने लगा है। हे! सखि, ऐसे गोकुल में रहनें से बाज आए। 


चौपाई

बघवा बन में रहिथै गोई! 

तेला भला! पकरथैं? कोई।।

तौनो ला हम मेर बताथै। 

कइसे-कइसे के डेरूवाथै?

हांथी ला हम कहां लुकायेन? 

हंडुला सोन कहां ले पायेन?

कोनो समुंद ला लाये सकथै। 

तेला भला कहां ले रखथै?


भावार्थ:- ग्वालिनें कहती हैं - हे! सखि, बाघ तो जंगल में रहता है, उसे कोई पकड़कर अपने पास रख सकता है क्या? यह तो उसे भी हमारे पास बताता है। कैसी-कैसी बातें करके हमें डराता है? हाथी को हमने कहाँ छिपाया? सोने का हंडा हमने कहाँ से पाया? समुद्र को भला कोई अपने पास ला सकता है? उसे भला हम लोग कहाँ, कैसे रखेंगी? 


चन्दा-सुरुज सरग में होथै। 

कैसे तेला इहां घटोथै?

कुंदरु-दरमी कहां लदायेन?

पंड़की-सुवा कहां टरकायेन?

मोती केरा कंवल कहां है?

तभ्भे बनि है जभे देखाहै।।

कइसे कइसे के गोंठियाथै?

हमला कमठा तीर बताथै


भावार्थ:- ग्वालिनें आगे कहती हैं - हे! सखि, चांद-सुरज तो स्वर्ग में रहते है, उसे भी यह हमारे पास बताता है? कुंदरू और अनार हम भला कहाँ लादे हुए हैं? पंड़की और सुवा को हमने कहाँ छिपाया? मोती, केला और कंवल हमारे पास कहाँ हैं? अब तो तभी बात बनेगी जब यह इन सबको सिद्ध करके दिखायेगा। हमें नीचा दिखाने के लिए देखो तो, कैसी-कैसी बातें कहता है?


विखहर सांप कहां पहुंचायेन?

तेला हम कैसे के लायेन?

झारा झरती लेय बताहै। 

नहि तो बात बिगर सब जाहै।।

बहुंतो हर ऐसनो के काहै। 

गढ़-गड़ के सब बात बताहै।।

मन-के मुखी होय गैं मोहन। 

कोनो हम्मन मनखे नोहन।।


भावार्थ:- ग्वालिनें आगे और कहती हैं - हे! सखि, विषैला सांप हमें कहाँ मिला? उसे हम भला कैसे ला सकते हैं? ये सब बातें यह कान्हा प्रमाण सहित हमें बताए अन्यथा अब तो बात बिगड़ ही जायेगी। बहुत हुआ। यह भी कोई बात हुई? यह तो सब बातें गढ़-गढ़कर कहता है। यह मोहन तो मन में जो आए कहता जा रहा है। क्या हम लोग मनुष्य नहीं हैं?


दोहा

लेतो भला! देखाव-तो, तम्भे बनिहै बात।

फोकट के नोहै बने, कखरो करबो घात।।


भावार्थ:- ग्वालिनें कहती हैं - मोहन! तुमने जो-जो कहा है, वह सब प्रमाणित करो, तभी बात बनेगी। यूँ ही किसी के ऊपर घात लगाना अच्छी बात नहीं है। 


चौपाई

नीकलिहै तम्भे तो भरबो। 

नहि तो फेर जौंहर कर डरबो


भावार्थ:- ग्वालिनें कहती हैं - मोहन! तुमने जो-जो हमारे पास होना बताया है वह सब हमारे पास से बरामद होना चाहिए। तब तो ठीक है अन्यथा हम लोग जौहर कर लेंगी।


सुनत बात मुसकाइन मोहन। 

हम फोकट कहवैया नोहन।।

कतको बढ़-बढ़ के गोठियावै। 

सूइन मेर नइ पेट लुकावै।।

सब्बो के जगात मड़वाहौं। 

अभ्भी एकक खोल देखाहौं।।

रेंगब हर हांथी लुर आथै। 

पातर कन्हिया बाघ हराथै?


भावार्थ:- ग्वालिनों की बातें सुनकर मोहन मुस्कुराकर कहते हैं -  अरी! सखियों, हम व्यर्थ की बातें करने वाले नहीं हैं।  चाहे जितनी बढ़-चढ़कर बातें कर लो, दाई से पेट छिपता नहीं है। अभी एक-एक बात स्पष्ट करूँगा और सबसे जगात वसूलूँगा। सुनो! तुम लोगों की चाल हथिनी की चाल के समान है। पतली कमर की लोच बाघ के चाल को मात देने वाली है।

अलंकार:- संपूर्ण पद में उपमा और उत्प्रेक्षा अलंकार है। ’कतको बढ़ .... नइ पेट लुकावै’ में लोकोक्ति अलंकार है।


केरा जांघ नख्ख है मोती। 

कहौ बांचिहौ कोनौ कोती?

कंवल बरोबर हांथ देखाथै। 

छाती हंडुला सोन लजाथै।।

बोड़री समुंद हबै पंड़की गर। 

कुंदरू ओठ दाँत दरमी-थर।।।

सूरुज चन्दा मुंह में आहै। 

टेंड़गा भऊं अओ! कमठा है।।


भावार्थ:- अरी! ग्वालिनों, तुम लोगों की जांघें केले के स्तंभ की तरह और नख मोतियों के समान हैं। कहो! अब बचकर कहाँ जाओगी? तुम्हारे हाथ कंवल के समान कोमल हैं। छातियाँ सोने के हंडे की तरह, नाभि समुद्र की तरह और गर्दन पड़की (कबूतरी) के समान हैं। तुम्हारे होठ पके हुए कुदरू की तरह और दंतावलियाँ अनार के पंक्तियों की तरह हैं। तुम्हारे मुख सूरज की तरह आभायुक्त और टेढ़े भौंहें चंदा से क्या कम हैं?

अलंकार:- संपूर्ण पद में उपमा और उत्प्रेक्षा अलंकार है।


तुरतुराय मछरी अस आंखी। 

हैं हमार संगी मन साखी।।

सूवा चोंच नाक ठौंके है। 

सांप सरिक बेणी ओरमे है।।

अभ्भो दू-ठन बांचे पाहौ। 

फोर बताहौं सुनत लजाहौ।।


भावार्थ:- मोहन आगे कहते हैं - अरी! ग्वालिनों, जल में अठखेलियाँ करती हुई मछलियों के समान तुम्हारे चंचल नेत्र हैं। विश्वास न हो तो साक्षी देने के लिए मेरे सखा गण उपस्थित हैं। तुम्हारे नाक सुवा के चोंच की तरह हैं और लटकती-लहराती हुई वेणियाँ सांप के समान हैं। अब भी कुछ बचा हो तो कहो, आगे जो बताऊँगा उसे सुनकर लजा जाओगी।

अलंकार:- संपूर्ण पद में उपमा और उत्प्रेक्षा अलंकार है।


दोहा

खात-खात सिट्ठाय-गै, दूध दही औ भात।

नइ तेखर संग काम है, लेहौं यही जगात।।


भावार्थ:- अंत में मोहन कहते हैं - अरी! ग्वालिनों, दूध, दही और भात खा-खाकर मुँह का स्वाद चला गया है। उससे काम नहीं चलेगा। अब तो मुझे केवल यही जगात चाहिए।  


चौपाई

पातर-फूहर गोंठ सुनिन जब। 

मुचमुच-मुचमुच करे लगिन सब।

कोनो कोनो मुंह बिचकाइन। 

कोनो भऊं नचाय पराइन

कोनों कोनो आंखिन मारिन। 

कोनो भुंय्या तनी निहारिन।।

कौनो गुदगुदाय मुसकावैं। 

फुसुर-फुसुर सब्बो गोठियावैं।।


भावार्थ:- मोहन की ऐसी हल्की-फुल्की फूहड़ बातें सुनकर ग्वालिनें मुचमुचाने लगी। किसी ने मुँह बिचकाया, किसी ने भौंहे नचाई, किसी ने आँखें मारी, कोई लजाकर सिर नीचा करके धरती की ओर देखने लगी। किसी ने मुस्कुराकर दूसरे को गुदगुदाया और इस तरह सभी ग्वालिनें फुसफुसाकर आपस में बातें करने लगी। 


नइ अय कुछू ठिकाना दाई!

सुने ओ! कैसे कथैं कन्हाई।।

एखरे खातिर चोली छूथै। 

झुरमुट करथै लूसे लेथै।।

जान गयेन मनसूभा भइ गय। 

दूध-दही के लालच नइ अय।।

मात गहन मस्ती में मोहन। 

गंज बेरी में गम पाये हन।।


भावार्थ:- मोहन की बातों से लज्जित और विस्मित ग्वालिनें एक-दूसरे से कहती हैं - ओ! माँ, इसका अब कोई भरोसा नहीं रहा। सखी! सुना तुमने, यह मोहन क्या कह रहा है? इसी कारण यह हमारी चोली को छूता है, झूमा-झटकी करता है, उपद्रव मचाता है। सखियों! बस, अब इनका असली मनसूबा समझ में आया है। दूध-दही का इनको कोई लालच नहीं है। मोहन तो मस्ती के मद में है। काफी देर बाद यह रहस्य समझ में आया है।


चलो अओ जसुदा मेर जाबो। 

बेटा के गुण ला गोंठियाबो।।

घुसड़ अभी जाहै सब्बो हर। 

सबो बड़े आपन आपन घर।।

आज सबो मरजाद अओ! गै। 

यही लुवाठ गौंटिया हो गै।।

सुन्ना पा के हुरमत लेथै। 

मुँह आथै तौने कहि देथै।।

कखरो इज्जत हर नइ बांचै। 

छुच्छा नगरा हो-के नांचै।।


भावार्थ:- ग्वालिनें परस्पर कहती हैं - सखियों! चलो जसोदा के पास चलकर उनके बेटे के इस गुण (इस करनी को) को बताएँ। इनकी मस्ती अभी धरी की धरी रह जाएगी। अरे! अपने-अपने घर में सब बड़े हैं। सबकी मर्यादा है परंतु आज तो सभी मर्यादा चली गई। क्या यही सबसे बड़ा गौंटिया है? सूना देखकर हुज्जत करता है, मन में जो आये वही कहता है। किसी की इज्जत नहीं करता। नंगा नाच करता है।


दोहा

गोकुल में हाड़ा नइ, अपटत हवन घलाय।

गाज परै आगी लगै, काले चलब पराय।।


भावार्थ:- ग्वालिनें अंत में खीझकर कहती हैं - सखियों!  अब तो इस गोकुल में हमारी हड्डियाँ दफन नहीं करानी हैं, बदनाम होकर कोई कैसे रहे, कैसे जीये? ऐसे गोकुल में वज्र गिर जाय, आग लग जाय। कल ही इसे छोड़कर हम चली जायेंगी।


चौपाई

सबो रकम-में हम-मन हारेन। 

दही-दूध के नाव बिसारेन।।

धोकर-धोकर के पांव परत हन। 

दंडा-शरण जान दे मोहन!

डंगनी अकन बेर है बांचिस। 

भइगे मूड़ा पूर गइस बस।।

हाहा! घुंचो अभी रोको-मत। 

डौकी मन के कतका इज्जत।।


भावार्थ:- ग्वालिनें हार मानती हुई कहती हैं - मोहन! अब हम लोग सब तरह से हार गई हैं। दूध-दही का नाम भी भूल गई हैं। लोट-लोटकर, दंडवत होकर तुम्हारे पैर पड़ती हैं। सूरज डूबने में बस डंगनी (लंबाई मापने का बांस का बना देशी जुगाड़) इतनी दूरी रह गई है। अब कहने-सुनने को कुछ नहीं रहा। हाय! अब रोको मत, हटो। आखिर महिलाओं की इज्जत जाने में, बदनाम होने में कितना समय लगता है?  


डौका जात आव तुम टूरा। 

फूटे बर चूरी ना चूरा।।

घर-में दाई गारी देहै।।

बंधवा एकक लेखा लेहै।

तब का? ओखी आज बतावो। 

कब ले लबरी होय खटाबो।।


भावार्थ:- तुम लोग लड़के हो, मर्द हो। तुम लोगों का क्या होना-जाना है? हमारे घर में माँ डाटेगी। भाई एक-एक पल का हिसाब पूछेगा। तब हम लोग क्या बहाना बनाएँगी? झूठ बोल-बोलकर कब तक बचेंगी?


सुनत श्याम मुसक्याय अगारी। 

आइन पकरे ठेंगा भारी।।

तुमला कहूं छोड़ मैं देहौं। 

राजा मेर फेर का? गोंठियेहौं।।

लेखा जभे मागिहैं मोला। 

कहां ले लान पटाहौं वोला।।


भावार्थ:- ग्वालिनों की चिरौरी सुनकर श्याम मुस्कुराते हैं और अपना भारी लाठी लेकर आगे आकर खड़े हो जाते हैं। कहते हैं - यदि तुम लोगों को मैं ऐसे ही छोड़ दूँगा तब अपने राजा को क्या जवाब दूँगा? वह जब मुझसे हिसाब मांगेगा तब मैं कहाँ से क्या लाकर हिसाब दूंगा?


ऐसन बात सुनत ग्वालिन-मन। 

सब्बो भकभकाय के हांसिन।।

अब ठौंका रसदा में आयेव। 

अब कैसे राजा ला डेरायेव।।


भावार्थ:- कन्हैया की ऐसी बातें सुनते ही सभी ग्वालिनें ठठाकर हँसती हैं और कहती हैं - कन्हैया! अब रास्ते में आये हो। अब राजा से डर क्यों लगने लगा?


दोहा

चौंके रहेव अघात तुम, छेंवट आयेव ठांव।

कतको हरिना कूदै, परिहे भुय्यां पांव।।


भावार्थ:-  बहुत चौकड़ी भर रहे थे, अब पास में आए हो। हिरण चाहे जितना उछल-कूद ले, पांव आखिर धरती पर ही पड़ेंगे।

अलंकार:- इस पद में दृष्टांत अलंकार है।


चौपाई

मोहन कहिन सुनौ रौताइन! 

राजा कंस ला कौन डेराइन।।

हम जो राजा-के चाकर अन। 

तेला सुनौ! बतावत हम हन।।

काम महीप नाव ओखर है। 

राज तीन लोकन के भर है।।

भरती चढ़ती अयन जवानी। 

तौन आय ओखर रजधानी।।

लिगरी आंखी दूत लगाइन। 

मोला बीरा देय पठाइन।।

तेखर भेजे ले मैं आयेंव। 

तुम्हला इहां जगात सुनायेंव।।


भावार्थ:- ग्वालिनों की उपहास करने वाली बातें सुनकर कन्हैया कहते हैं - अरी! ग्वालिनों, सुनो। राजा कंस से भला कौन डरता हैं? हम जिस राजा के चाकर हैं उसका नाम सुनो, बताता हूँ। उस राजा का नाम कामदेव है और तीनों लोकों में  उसका शासन है। भरी हुई ऐन चढ़ती जवानी उनकी राजधानी है। दूतों ने मेरी शिकायत की हैं इसीलिए जगात का यह बीड़ा उन्होंने मुझे सौंपा है। उन्हीं का भेजा हुआ मैं आया हूँ और तुम लोगों से जगात वसूल कर रहा हूँ। (ऐसा कहकर हरि ने अपनी माया फेर दी।)


सुनत गोठ ऐसन रौताइन। 

सब्बो सुरता चेत भुलाइन।।

कोनन? काबर कहां खड़े हन? 

रहिस नहीं सुरता एक्को-ठन।।

आंखी गइन मुंदाय सबो-के। 

मन भीतर हरि मिलन जमो के।।


भावार्थ:- श्रीकृष्ण की ऐसी गूढ़ बातें सुनते ही सभी ग्वसलिनें सुध-बुध खो बैठीं। वे कौन हैं, क्यों हैं, कहाँ हैं, इन बातों का उन्हें कुछ भी ज्ञान नहीं रहा। सबकी आँखें बंद हो गईं और मन में हरि मिलन की छबि समा जाती है।


होइस तौन बखत सुख जैसे। 

तेला सुनो! कहौं मैं कैसे।।

साध नहीं बांचिस थोरको अस। 

आठो अङ्ग जुड़ाय गइस बस।।

गइन अघाय रहिस बांकी-ना। 

थपथप टपके लगिस पसीना।।

सुक सुक सुक सुक लागे लगिस। 

नस नस नस नस भींद गइस बस।।


भावार्थ:- कवि कहते हैं, उस छण गोपियों को जिस सुख की अनुभूति हुई उसका वर्णन मैं कैसे करूँ? सारी मनोरथें पूरी हो गईं। आठों अंगों की तपन शांत हो गईं। वे पूर्णतः तृप्त हो गईं कुछ भी शेष नही रहा। तन में सिहरन होने लगी। नस-नस में आनंद समा गया।


हरि तब तीर लइन छबि बाहिर। 

आंखी खोल निहारिन सब फिर।।

गइन मोहाय देख मोहन ला। 

सपना असन भइन सब झन ला।।

कहे लगिन तब सब रौताइन। 

कोनो नइ तुम्हला गम पाइन।।


भावार्थ:- कवि कहते हैं, हरि ने तब अपनी माया समेट ली। आँखें खोलकर गोपियाँ एक-दूसरे को देखने लगी। मोहित होकर जब मोहन को देखते हैं तब उन्हें ऐसा प्रतीत होता है मानो वे स्वप्न देख रहीं हों। तब सभी ग्वालिनें कहती हैं - हेे! मोहन, तुम अगम हो, तुम्हारा गम कोई नहीं पा सकता।


दोहा

कै तुम ही बैगा हरी, डारेव टोना आय।

थोपनी ऐसन थोप के, मन-ले गयेव चोराय।।


भावार्थ:- गोपियाँ कहती हैं, हे! हरि, क्या तुम बैगा (झाड़फूंक करने वाला, जादूगर) हो? मोहनी जादू करके, सम्मोहित करके हमारा मन चुराते हो?

अलंकार:- ’कै तुम बैगा हरि’ पद में ब्याज स्तुति एवं ’थोपनी .... चोराय’ में भ्रांतिमान अलंकार है।


चौपाई

मोहन सुंदर श्याम! सुनौ अब। 

ग्वालिन हवन तुम्हार शरण सब।।

करिहौ क्षमा जउन कहि पारेन। 

हम तुमला सर्बस दे डारेन।।

चाहौ करौ प्राण है हाजिर। 

दही-दूध के बात कउन फिर।।

साध हमार पुरोयेव मोहन। 

येखर ऋणिया रहिबो सब झिन।।


भावार्थ:- ग्वालिनें कहती हैं, हे! श्याम सुंदर, अब हम तुम्हारे शरण में हैं। हमने तुम्हारे प्रति जो भी कहा उसके लिए हमें क्षमा कर दो। हमने तुम्हें अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया है; अब चाहे तो हमारे प्राण ही ले लो। दूध-दही की क्या बात है, मोहन! तुमने हमारी सारी इच्छाएँ पूरी कर दी इसके लिए हम सदा तुम्हारे ऋणी रहेंगी।


आवौ! बैठो! दोना लावौ! 

जतका चाहौ वोतका खावौ।।

सुनत बात हांसत हैं मोहन। 

बैठे गइन लेके संगी मन।।

आपन आपन दही निकारिन। 

रौताइन मन परुसे लागिन।।

मोहन खावैं सखा खवावैं।

कइसे कहौं कहत नइ आवैं।।


भावार्थ:- ग्वालिनें कहती हैं, - मोहन! आओ, बैठो, दोना लाओ और जितना चाहो उतना खाओ। ग्वालिनों की बातें सुनकर मोहन हँसते हैं और अपने गोप सखों को लेकर दही खाने बैठ जाते हैं। ग्वालिनें अपने-अपने मटके से दही निकाल-निकालकर परोसने लगती हैं। मोहन अपने ग्वाल सखों के साथ दही खाते हैं। कवि कहते हैं - इस दृश्य का वर्णन मैं कैसे करूँ, कहा नहीं जाता?


बांधे मौर मूंड ़के माहीं। 

पहिरे हैं साजू मजुंराही।।

कन्हिया में खौंचे बंसुरी ला। 

देखत में मोहत हैं जी ला।।

दूनो गोड़ पैजनी सोहैं। 

सोभा लिखे सके अस को है?


भावार्थ:- कवि कहते हैं, हरि सिर में मोर मुकुट धारण किए हुए हैं। मोर पंखों का बना साजू अंग में पहने हुए हैं। कमर में  वंशी खोंचे हुए हैं। श्रीकृष्ण की यह छबि मन को मोहित करने वाला है। दोनों पैरों में पैजनिया पहने हुए हैं। इस शोभा का वर्णन कौन कर सकता है?


हरि तब राधा तनी निहारिन। 

आंखी मिलत हांस दूनो पारिन।।

राधा सबके नजर बचावैं। 

कोनो हंसत देख झन पावैं।।

ठाढ़े भइन फेर मुख राधा। 

चितवैं नयन कनेखी आधा।।

देख मने मन-में सुख पावैं। 

एते हंसैं वोते गौंठियावैं।।


भावार्थ:- कवि कहते हैं, हरि ने तब राधा की ओर देखा। आँखें मिलते ही दोनों हँस पड़े। हँसते हुए कोई देख न ले इस लिए राधा आँखें चुराने लगती हैं। राधा तब श्याम की ओर मुँह फेरकर खड़ी हो जाती है और कनखियों से उसे निहारने लगती हैं। कभी वह मुस्काती हैं, कभी बतियाती हैं।


दोहा

कहे लगिन मुसक्याय तब, मोहन सुन्दर श्याम।

आज दही अड़गंज तुम, सबो खवायेव राम!


भावार्थ:- श्रीकृण तब मुस्कुराकर कहते हैं - अरी! सखियों, आज तो तुम लोगों ने छककर दही खिलाया है।


चौपाई

राध मेर लेवना हरि मांगत। 

चीखौं तो तुम्हर कस लागत।।

सबके-दुहनी के मैं खायेंव। 

नइ तुम्हार चीखा ला पायेंव।।

दिखथै बने सवो मेर के-ले। 

लालच लगत हवै देखे-ले।।

कइसे उलथै दया खवाहौ? 

के हमला छुच्छा टरकाहौ।।


भावार्थ:- राधा से मक्खन मांगते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं - सबकी दुहनी से मैंने माखन खाया अब तुम्हारे दुहनी का भी मक्खन चखकर देखूँ, कैसा है? तुम्हारा मक्खन तो सबके मक्खन से बढि़या दिख रहा है। देखकर ही लालच आ रहा है। कैसे? हम पर कुछ दया करोगी या खाली हाथ लौटा दोगी?


नस-नस भींद गइस छिन माहीं।

राधा रहे सकिन सुन नाहीं।।

लेवना एक थपोल उठाइन। 

मुच-मुच करत अगाड़ी आइन।।

ओंठ हलाय डार मुह देइन। 

गाल पिचक आपन करि लेइन।।

हरि चबुलावत मूंड हलाइन। 

बढ़के मजा सबो ले पाइन।।


भावार्थ:- श्रीकृष्ण का ऐसा वचन सुनते ही पलभर में राधा का नस-नस (प्रेम रस से) भींग गया। वह और कुछ सुन नहीं पाई। अंजुली भर मक्खन लिया और मुस्काती हुई आगे आई। उसने उनके होठों को खोला और मुँह में मक्खन भर दिया। फिर अपने हाथों से उनके गालों को पिचक दिया। श्री हरि सिर हिलाते हुए बड़े मजे से मक्खन खाने लगे। इस मक्खन में सबके मक्खन से अधिक स्वाद आ रहा था।


कहिन गोपाल बहुंत मैं खायेंव। 

येखर नहीं बरोबर पायेंव।।

कोनो दगरा पानी डारे। 

कोनो लेवना हवैं निकारे।।

कखरो दही मही अम्मठ है। 

सेर भरके मैदा मिलवट है।।


भावार्थ:- श्रीगोपाल ने आनंदित होते हुए कहा - मैंने बहुत दही खाया है पर इस दही के समान स्वादिष्ट किसी का भी नहीं मिला। किसी ने ढेर सारा पानी मिलाकर रखा है तो किसी ने मक्खन ही निकाल लिया है। किसी का दही-मही खट्टा है तो किसी ने सेर भर मैदा मिलाया हुआ है। 


कैसनो कोनो हजार बतावैं। 

तोर सवाद-ला-नइ कोनो पावैं।।

ऊपर ले देखत में सादा। 

है मिठास सब्बो ले जादा।।


भावार्थ:- श्रीकृष्ण ने राधा की प्रशंसा करते हुए कहा - कोई चाहे कितनी ही बातें कर ले परंतु तुम्हारे दही और मक्खन का स्वाद कोई नहीं पा सकता। देखने में तो साधारण हैं पर मिठास सबसे अधिक है।


राधा आभा बचन सुनिन जब। 

गतर गतर में भेद गइस सब।।

सुख में आठो अंग जुड़ाइस। 

जइसे तिनहा हंडा पाइस।।


भावार्थ:- श्रीकृष्ण की बातें सुनकर राधा के अंग-अंग में आनंद समा गया। सुख में आठों अंग शीतल हो गए जैसे गरीब को स्वर्ण-कलश मिल गया हो।


दोहा

रोंवा हो गय ठाढ़ सब, आनंद कहे न जाय।

आंखी ले आंसू घलो, बहे लगिस सुख पाय।।


भावार्थ:- हर्ष और रोमांच में राधा के रोम-रोम खड़े हो गए। प्रेम के आँसू बहने लगे। इस आनंद का बखान नहीं किया जा सकता। 


चौपाई

जेखर मन में जैसने आइस। 

तैसन तेहर श्याम जेंवाइस।।

रस बस कर लौटिन आपन घर। 

सबके प्राण-ज्ञान मोहन पर।।

श्याम सरूप त्रिभंग अंग जस। 

सबके मन में रहिस वही बस।।

कोनो नइ कखरो गम पावैं। 

बही बरोबर रेंगत जावैं।।


भावार्थ:- जिसके मन में जैसा आया उसने वैसे ही श्री श्याम को जेवन कराया। इस प्रकार प्रेम रस के बस होकर सब अपने-अपने घरों को लौटने लगी। सबके प्राण और ज्ञान मोहन  पर अटके हुए हैं। सबके मन में बस श्री मोहन के त्रिभंगी स्वरूप (त्रिभंगी, नृत्य की एक मुद्रा है जिसमें शरीर तीन जगहों - घुटना, कमर और गर्दन से मुड़े होते हैं। अधिकांशतः भगवान श्रीकृष्ण की इसी मृद्र की पूजा होती है।) ही बसे हुए हैं। किसी को किसी का पता नहीं है। बही (बावरी, पागल) की तरह बस चली जा रही हैं।


फोकट के गोटी गड़ डारैं। 

कोनों कांटा गोड़ निकारैं।।

कोनो ला चूरा कसकावै। 

कोनो पैरी पांव चढ़ावै।।

उलट उलट के आंखी मारैं। 

ओढ़र करके सबो निहारैं।।


भावार्थ:- घर जाने की इच्छा किसी की नहीं हो रही है। कोई पैरों में कंकड़ चुभने का बहाना बनाकर, कोई पैरों से कांटा निकालने का बहाना बनाकर, कोई चूड़ा कसकने का बहाना बनाकर तो कोई पांव की पैरी (पैजनिया) ऊपर चढ़ाने का बहाना बनाकर पलट-पलटकर आँख मार रही हैं। ओट ले-लेकर श्रीकृष्ण को निहारे जा रही हैं।


चोहल करें रमूज मड़ावैं। 

तोला गोई! ठौंका भावैं।।

हरि के कहैं चरित्तर फिर-फिर। 

जैसे-जैसे भाव करिन हरि।।

झझक जांय सब्बो झन रहि-रहि। 

घर कोती बर पांव उठै नहि।।


भावार्थ:- गोपियाँ चुहलबाजी करती हुई और एक-दूसरे पर व्यंग करती हुई कह रही है कि हे! सखि, श्याम को तुम ही सबसे अधिक भाई हो। गोपियाँ रह-रहकर चौंक जाती हैं और नाना प्रकार से श्रीहरि के चरित्र का बखान करती हैं। घर चलने का प्रयास करती हैं परंतु पांव किसी के नहीं उठते हैं।


ऐसन सबो मया-में साने। 

रात अघात जान नइ जाने।।

ब्रह्मा जेला ध्यान लगावैं। 

महादेव जेखर गुण गावैं।।

कोन सुने अरु कोन बतावै। 

गोकुल तउन जगात उघावै।।

अपन भगत खातिर भगवाना। 

करथैं चरित अनेक विधाना।।


भावार्थ:- कवि वर्णन करतेे है - प्रेम रस में पगी गोपियों को रात हो जाने का भी पता नहीं चलता। ब्रह्मा जिस परब्रह्म का ध्यान लगाता हो, महादेव जिसका गुण गाता हो उसके लीला का बखान कौन करे और कौन सुने? वही परब्रह्म गोकुल में आज जगात उगाहने का लीला कर रहे हैं। भगवान अपने भक्तों को सुख देने के लिए नाना विधान करते हैं। 


जेखर जइसन भाव-रथै मन। 

तेला तइसन मिलथैं मोहन।।

देखैं नन्द अपन बेटवा अस। 

रौताइन मन जीवन धन-जस।।

काल बरोबर कंस निहारै। 

भगत प्रगट भगवान विचारैं।।

अपन भगत बर सरग बिहाई। 

मनखे लीला करिन कन्हाई।।

जेमा मनुवा गाहैं सुनिहैं। 

सगुण समझि के मोला गुनिहैं।।


भावार्थ:- कवि कहतेे है - जो अपने मन में जैसा भाव लाता है श्री मोहन उसे उसी रूप में प्राप्त होते हैं। नंद बाबा ने उसे बेटा रूप में देखा, ग्वालिनों ने जीवन-धन के रूप में देखा। कंस उसे साक्षात काल के रूप में देखते हैं। भक्त उसे प्रगट रूप में देखना चाहता है। अपने भक्तों के लिए श्री हरि स्वर्ग  त्यागकर पृथ्वी पर मनुष्य रूप धारण करके मानव लीला करते हैं। श्री हरि कहते हैं - नर मुझे सगुण मानकर मेरे चरित्र को गाते और सुनते हैं, मेरा चिंतन करते हैं।


दोहा

मन-थिर करके जउन हर, भज लेहै एक बेर।

नइ आहै निस्तुक कहौं, ते भव सागर फेर।।


भावार्थ:- श्री हरि कहते हैं - जो नर मन को स्थिर करके मुझे एक बार भज लेता है सत्य कहता हूँ, वह इस भव सागर में फिर लौटकर नहीं आता है।


है ये लीला श्याम-के, जो सुनि हैं चितलाय। 

हरि ठेंगा दुहनी धरे, तेखर होंय सहाय।।


भावार्थ:- कवि कहते हैं - जो मानव श्री श्याम के इस लीला को चित लगाकर सुनता है, श्री हरि लाठी और दुहनी धारण करके (ग्वाले का रूप धारण करके) उसकी सहायता करते हैं।


कवित्त

छत्तिस के गढ़ के मझोत एक राजिम, 

सहर जहां जतरा महीना मांघ भरथै।

देस-देस गांव-गांव के जो रोजगारी भारी, 

माल असबाब बेंचें खातिर उतरथै।

राजा और, जमीदार मंडल किसान, धनवान, 

जहां जुरके जमात ले निकरथै।

सुन्दर सुलाल द्विजराज नाम हबै एक, 

भाई! सुनौ तहां कबिताई बैठि करथै।


भावार्थ:- अंत में कवि अपना परिचय देते हुए कहते हैं - छत्तीसगढ़ के मध्य में राजिम नाम का एक शहर है जहाँ माघ महीने में मेला लगता है। देश-देश और गाँव-गाँव के व्यापारी जहाँ अपना माल-असबाब बेचने के लिए एकत्र होते हैं। राजा, जमींदार, मंडल, किसान और धनवान जहाँ मिलजुलकर निकलते हैं; भाइयों! वहीं सुंदर लाल नाम का एक ब्राह्मण निवास करता है और अवकाश पाकर कविताई करता है।


त्रोटक छन्द

तउने हर एला बनाइस है। 

अवखाद बरोबर गाइस है

गलती कहुं एमा देखा परिहैं। 

लेड़गा मोला जान क्षमा करिहैं।


भावार्थ:- कवि आगे कहते हैं - उसी ने इस काव्य की रचना की है। इसमें यदि कहीं कोई त्रुटि हो गई हो तो बुद्धिहीन समझकर मुझे क्षमा कर देना।

काव्य

छत्तिसगढ़ भाषा बिभूषि निर्मान कीन्ह यह।

नहि कछु काव्यकला प्रचूर पाँडित्य मोर मँह।।

पढि़ उदार उपकार उचित यद्यपि कछु मानै।

सेवक-श्रम-सार्थक सुभाग आपन तब जाने।।


भावार्थ:- कवि आगे कहते हैं - मैंने इसकी रचना सुंदर छत्तीसगढ़ी भाषा में की है। न तो मेरे पास कोई काव्यकला  है और न ही मेरे अंदर पर्याप्त पाण्डित्य ही है। फिर भी यदि इसमें कुछ भी उचित जान पड़े तो उदार भाव से इसे पढ़कर मुझ पर उपकार करें। तभी यह सेवक अपने श्रम को सार्थक और स्वयं को सौभाग्यशाली मानेगा।


दोहा

सम्मत दृगरस अंक शशि, तिथि तृतिया गुरुबार।

कृष्ण पक्ष आसौज मह, भयेउ ग्रन्थ तय्यार।।


भावार्थ:- इस कृति की रचना-काल का उल्लेख करते हुए कवि कहते हैं - संवत दृगरस, अंक शशि, तिथि तृतिया, दिन गृरुवार, कृष्णपक्ष, असौज माह (क्वांर महीना) में यह ग्रंथ पूर्ण हुआ। (टीप:- सुप्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता व विद्वान श्री राहुल कुुमार सिंह अपने ’छत्तीसगढ़ी दानलीला’ नामक आलेख में इस दोहे की तार्किक व्याख्या इस प्रकार करते हैं - 

’’इस संस्करण (द्वितीय) के अंत में ग्रंथ तैयार होने की प्रामाणिक तिथि स्वयं कवि द्वारा इस प्रकार बताई गई है -


सम्मत दृग रस अंक शशि, तिथि तृतिया गुरुबार।

कृष्णपक्ष आसौज मह, भयेउ ग्रन्थ तय्यार।।

उक्त दोहे के आधार पर ग्रन्थ तैयार होने का वर्ष, दृग-2 रस-6 अंक-9 शशि-1 मान अर्थ लगावें तो यह विक्रम संवत 1962 की तिथि होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त दृग का मान आंख के गोलक के कारण 0 की संभावना व्यक्त की जा सकती है, ऐसी स्थिति में यह विक्रम संवत् 1960 होगा। रचना-प्रकाशन की तिथि की पुष्टि यों भी हो जाती है कि सन 1915 ई. में प्रकाशित छत्तीस-गढ़ी-दानलीला के द्वितीय संस्करण में ‘विद्वानों की कतिपय सम्मतियां‘ में पं. जगन्नाथ प्रसाद जी शुक्ल द्वारा शुक्रवार, 21 जून 1907 को ‘श्रीवेंङ्कटेश्वर समाचार’ पत्र का भी हवाला है।


यहां स्पष्ट करना आवश्यक है कि शब्दों के माध्यम से संख्याओं को अभिव्यक्त किए जाने की परंपरा बहुत पुरानी है, जिसे शब्दांक या भूतसंख्या (क्रोनोग्राम) कहा जाता है। इस पद्धति में ‘वाम-गति‘, जिसे ‘अंकानां वामतो गतिः‘ कहा गया है, होती है अर्थात् अंकों को दाहिने से बाएं व्यवस्थित किया जाता है। इस पद्धति में अंकों के लिए विभिन्न शब्द निर्धारित हैं, किंतु शब्दों के लिए मान्य अंकों से भिन्न प्रयोग कर, परंपरा के उल्लंघन के भी उदाहरण मिलते हैं।’’


इति शुभं भूयात

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