स्मृतियों के सुवासित पुष्प
(संपादकीय)
1969 में हमारे गाँव में बिजली आई तो कुछ ही दिनों में घर में बिजली से चलने वाला रेडियो भी आ गया। इसके पहले रात्रि जेवन के बाद पड़ोसी चाचा के, सेल से चलने वाले जापानी याशिका ट्रांजिस्टर से गाँव के अन्य बड़े-बुजुर्गों के साथ अपने ही चैरा में बैठकर मैं भी गीत-संगीत का आनंद लिया करता था। आकाशवाणी रायपुर से प्रसारित बरसाती भइया का चैपाल सबका पसंदीदा कार्यक्रम हुआ करता था। अपनी गुरतुर छŸाीसगढ़ी भाषा में खेती-किसानी के गोठ-बात के बीच-बीच में पारंपरिक छŸाीसगढ़ी गीतों - बांस गीत, सुवा गीत, गौरा गीत, ददरिया आदि को सुनकर मन आनंद से भर जाता था। सास गारी देवय ..., तोला जोगी जानेव गा भाई .... खुसरा चिरई के बिहाव .. मोर छत्तीसगढ़ ल कहिथे भइया धान के कटोरा भइया ..... जैसे गीतों की ठसक अलग ही हुआ करती थी। इसी बीच, मंय बंदत हंव दिन रात ओ मोर धरती मइया, मोर संग चलव रे मोर संग चलव गा, मन डोले रे मांघ फगुनवा रस घोले रे मांध फगुनवा जैसे और भी सुमधुर गीतों की मनभावनी बयार चलने लगी। और सुनने वालों के मन में यह जानने की सहज उत्सुकता होने लगी कि छŸाीसगढ़ के लोगों को सम्मोहित करने वाले इन गीतों को बनाने वाले कौन लोग हैं? और जब किसी तरह यह जानकर उत्सुकता शांत हुई कि इन गीतों को लिखने वाले और गाने वाले का नाम लक्ष्मण मस्तुरिहा है, संगीतकार का नाम खुमान साव है तब एक और नई उत्सुकुता मन में जागने लगी कि आखिर ये विलक्षण कला साधक किस गाँव के रहने वाले हैं? देखने में कैसे हैं? दिव्य पुरुषों की तरह दिखते हैं या किसी जादूगर की तरह?
अब खुमान साव और लक्ष्मण मस्तुरिहा किंवदंती बन चुके थे। मेरे लिए भी ये किंवदंती बन चुके थे। इन्हें प्रत्यक्ष देखने की साध लिए दिन और साल गुजरते गए। धीरे-धीरे मैं भी कुछ लिखने लगा और साहित्यकारों के बीच बैठने का अवसर मिलने लगा। 23 मार्च 1999 के दिन हम सुरगी अंचल के रचनाकारों ने मिलकर सुरगी में ’साकेत साहित्य परिषद’ का गठन किया।
01 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य बना। अजीत जोगी पहले मुख्यमंत्री बने। श्री जोगी साहित्य और कला के प्रति संवेदनशील थे। प्रत्येक जिले में जिला स्तर पर साहित्य और कला के वार्षिक आयोजनों के लिए वे शासकीय अनुदान देने लगे। इसी योजना के तहत 17 मार्च 2002 के दिन राजनांदगाँव के दिग्विजय स्टेडियम के सभागार में राजनांदगाँव जिले का जिला स्तरीय आयोजन हुआ। जिला प्रशासन ने सुचारु आयोजन का दायित्व दिग्विजय महाविद्यालय को सौंपा। दिग्विजय महाविद्यालय में तब स्नातकोŸार हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष डाॅ. नरेश कुमार वर्मा हुआ करते थे। इस आयोजन को व्यवस्थित करने में उनकी अहम भूमिका थी।
डाॅ. नरेश कुमार वर्मा ’साकेत साहित्य परिषद सुरगी’ के हम नवोदित रचनाकारों के संरक्षक और मार्गदर्शक भी थे। आयोजन के मुख्य अतिथि के रूप में खुमान सर भी आमंत्रित थे। खुमान सर समय के पाबंद थे। यह उनके अनुशासन का एक अनिवार्य अंग हुआ करता था। कार्यक्रम के लिए निर्धारित समय पर वे अयोजन स्थल पर पधार चुके थे। कुछ अन्य विशिष्ट अतिथियों के आगमन में विलंब होने के कारण कार्यक्रम शुरू नहीं हो पा रहा था। आयोजन में सम्मिलित होने आये साहित्यकारों, कलाकारों और अन्य गणमान्यों के बीच धोती-कुर्ता धारण किए खुमान सर की आभा सबसे अलग, सब तरफ बिखर रही थी। मैं उन्हें लगातार निहारे जा रहा था। डाॅ. वर्मा ने मुझसे पूछा, ’’खुमान साव को जानते हो कि नहीं?’’ मैंने कहा, ’’उन्हें कौन नहीं जानता होगा सर। पर उनसे मिलने का सौभाग्य मुझे आज तक नहीं मिला।’’ डाॅ. वर्मा ने कहा, ’’तो चलिए, आज मिल लिजिए।’’ और इस तरह मेरी वर्षों की अभिलाषा पूरी हुई।
पं. श्याम लाल चतुर्वेदी छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के प्रथम अध्यक्ष बनाए गए। उन्हीं के संयोजन में, मार्च 2012 में रायपुर के टाउनहाल में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग का एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित हुआ। डाॅ. नरेश कुमार वर्मा इस आयोजन में आमंत्रित थे। उनके साथ मैं भी इस आयोजन में गया हुआ था। अपने छात्र जीवन में पृथक छत्तीसगढ़ की माग के समर्थन में अपने खून से पत्र लिखने वाले और छत्तीसगढ़ी कविता संग्रह ’माटी महतारी’ लिखने वाले डाॅ. नरेश कुमार वर्मा छत्तीसगढ़ महतारी के सच्चे सपूत थे। इस आयोजन में खुमान सर भी आमंत्रित थे। भेट होने पर उन्होंने पूछा, ’’तुमन कामा आय हव?’’ वर्मा सर ने कहा, ’’हमन तो रेलगाड़ी से आय हन।’’ ’’तब जाती खानी मोर संग चलहू। कार ले के आय हंव। बनही कि नहीं?’’ खुमान सर ने कहा। हम लोगों के लिए यह प्रस्ताव गर्व का विषय था।
रायपुर से ठेकवा तक वे रोचक संस्मरण सुनाते रहे। हम लोग मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहे। इसी क्रम में उन्होंने ग्राम बादराटोला के जंगल सत्यग्रह का व्Ÿाांत सुनाया और बताया कि कैसे इस आंदोलन में रामाधीन नामक आदिवासी युवक शहीद हो गया था। इस यात्रा का और खुमान सर के अपनत्व भरी बातों का ऐसा असर हुआ कि इसके बाद तो मैं स्वयं को उनके परिवार का सदस्य ही मानने लगा। खुमान सर न केवल संगीत से अपितु साहित्य से भी गहरा लगाव रखते थे। लोगों को जोड़ने और लागों से जुड़ने की उनमें अद्भुत क्षमता थी।
03 जून 2012 को साकेत साहित्य परिषद सुरगी का तेरहवाँ स्थापना समारोह ग्राम करेला के सुप्रसिद्ध माँ भवानी मंदिर प्रांगण में मनाया जा रहा था। खुमान सर आए और कार्यक्रम में किसी तरह का व्यवधान न हो, इस बात का ध्यान रखते हुए मंच के सामने श्रोताओं के लिए बिछाए गए दरी में बैठ गए। हम लोग सकते में आ गए। उनके पास जाकर उनका आशिर्वाद लिए और मंच पर चलने का आग्रह करने लगे। उन्होंने कहा, ’’तुंहर कार्यक्रम के समाचार ल अखबार म पढ़ेन। आय के मन होइस ते आ गेन। अब हमला इही करा बइठ के सुनन दव। मंच म नइ जावन।’’ और बार-बार अनुनय-विनय करने पर भी हमारे आग्रह को उन्होंने शालीनतापूर्वक अस्वीकार कर दिया। इसके बाद तो वे साकेत साहित्य परिषद सुरगी से परिषद के नियमित सदस्य की तरह जुड़ गए। खुमान सर का परिवार विशाल है। छŸाीसगढ़ के कलाकार, कवि और कलमकार उनके परिवार का हिस्सा थे। साहित्य के प्रति उनके अनुराग का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा।
बस इतना ही। और भी बहुत सारी बातें इस किताब में पढ़ पायेंगे।
मैं यह स्वीकार करता हूँ कि खुमान सर के विराट व्यक्तित्व को समझने के लिए इस स्मारिका में संकलित सामग्रियाँ बहुत अल्प हैं। फिर भी मुझे आशा है कि इस संकलन के द्वारा, अपने जीवन काल में ही किंवदंती बन चुके, छŸाीसगढ़ी लोक संगीत के महान संगीतसाधक श्री खुमान लाल साव के व्यक्तित्व को कुछ अंशों में ही सही, हम समझ पायेंगे।
इस स्मारिका के लिए लेख लिखने वाले सभी साहित्यकारों का मैं आभारी हूँ। श्री संजीव तिवारी, श्री अरुण कुमार निगम एवं श्री राहुल सिंह का भी मैं आभारी हूँ जिन्होंने अपन-अपने ब्लाग से खुमान सर से संबंधित सामग्रियों का उपयोग करने की मुझे अनुमति दी। इस संकलन की भूमिका लिखने के लिए श्री मुकुल के. पी. साव सर का मैं विशेष आभारी हूँ। इस संग्रह में संकलित सभी सामग्रियों में दी गई जानकारियों व तथ्यों के प्रति उनके लेखक उत्तरदायी हैं। संपादक की सहमति अनिवार्य नहीं है।
कुबेर
20 सितंबर 2025