शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2018

आलेख, निबंध और संपादकीय

आलेख, निबंध और संपादकीय
(संग्रह की पांडुलिपि

कुबेर

1 - साहित्य की वाचिक परंपरा कथा-कंथली:लोक जीवन का अक्षय ज्ञान कोश 

समग्र साहित्यिक परंपराओं पर निगाह डालें तोे वैदिक साहित्य भी श्रुति परंपरा का ही अंग रहा है। कालांतर में लिपि और लेखन सामग्रियों के आविष्कार के फलस्वरूप इसे लिपिबद्ध कर लिया गया क्योंकि यह शिष्ट समाज की भाषा में रची गई थी। श्रुति परंपरा के वे साहित्य, जो लोक-भाषा में रचे गये थे, लिपिबद्ध नहीं हो सके, परंतु लोक-स्वीकार्यता और अपनी सघन जीवन ऊर्जा के बलबूते यह आज भी वाचिक परंपरा के रूप में लोक मानस में गंगा की पवित्र धारा की तरह सतत प्रवाहित है। लोक मानस पर राज करने वाले वाचिक परंपरा की इस साहित्य का अभिप्राय निश्चित ही, और अविवादित रूप से, लोक-साहित्य ही हो सकता है।

लोक जीवन में लोक-साहित्य की परंपरा केवल मन बहलाव, मनोरंजन अथवा समय बिताने का साधन नहीं है; इसमें लोक-जीवन के सुख-दुख, मया-पिरीत, रहन-सहन, संस्कृति, लोक-व्यवहार, तीज-त्यौहार, खेती-किसानी, आदि की मार्मिक और निःश्छल अभिव्यक्ति होती है। इसमें प्रकृति के रहस्यों के प्रति लोक की अवधारण और उस पर विजय प्राप्त करने के लिए उसके सहज संघर्षों का विवरण; नीति-अनीति का अनुभवजन्य तथ्यपरक अन्वेशण और लोक-ज्ञान का अक्षय कोश निहित होता है। लोक-साहित्य में लोक-स्वप्न, लोक-इच्छा और लोक-आकांक्षा की स्पष्ट झलक होती है। नीति, शिक्षा और ज्ञान से संपृक्त लोक-साहित्य लोक-शिक्षण की पाठशाला भी होती है। यह श्रमजीवी समाज के लिए शोषण और श्रम-जन्य पीड़ाओं के परिहार का साधन है। यह लिंग, वर्ग, वर्ण और जाति की पृष्ठभूमि पर अनीति पूर्वक रची गई सामाजिक संरचना की अमानुषिक परंपरा के दंश को अभिव्यक्त करने की, इस परंपरा के मूल में निहित अन्याय के प्रति विरोध जताने की शिष्ट और सामूहिक लोकविधि भी है। जीवन यदि दुःख, पीड़ा और संघर्षों से भरा हुआ है तो लोक-साहित्य इन दुःखों, पीड़ाओं और संघर्षों के बीच सुख का, उल्लास का और खुशियों का क्षणिक संसार रचने का सामूहिक उपक्रम है। लोक-साहित्य सुकोमल मानवीय भावनाओं की अलिखित मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति है, जिसमें कल्पना की ऊँची उड़ानें तो होती है, चमत्कृत कर देने वाली फंतासी भी होती है।

लोक-साहित्य मानव सभ्यता की सहचर है। इसकी उत्पत्ति कब और कैसे हुई होगी, यह अनुमान और अनुसंधान का विषय है, परंतु एक बात तय है कि इसकी उत्पत्ति और विकास उतना ही प्राकृतिक, सहज, और अनऔपचारिक है जितना कि मानवीय सभ्यता की उत्पत्ति और विकास। लोक-कथाएँ, लोक-गाथाएँ, लोक-गीत तथा लोकोक्तियाँ, लोक-साहित्य के विभिन्न रूप हैं। लोक-साहित्य में लोक द्वारा स्वीकार्य पौराणिक एवं ऐतिहासिक प्रसंगों का, पौराणिक पात्रों सहित ऐतिहासिक लोक-नायकों के अदम्य साहस, शौर्य और धीरोदात्त चरित्र का, अद्भुत लोकीकरण भी किया गया है। शिष्ट साहित्य का लोकसाहित्य में यह संक्रमण सहज और लोक ईच्छा के अनुरूप ही होता है। लोक साहित्य का नायक आवश्यक नहीं कि मानव ही हो; इसका नायक कोई मानवेत्तर प्राणी भी हो सकता है।

लोक-कथाओं की उत्पत्ति, उद्देश्य और अभिप्रायों को समझने के लिए यहाँ पर कुछ लोक-कथाओं का उल्लेख करना आवश्यक है। आदिवासी अंचल में प्रचलित इस लोककथा की पृष्ठभूमि पर गौर करें -

चिंया अउ साँप

जंगल म बर रुख के खोड़रा म एक ठन सुवा रहय। एक दिन वो ह गार पारिस। गार ल रोज सेवय। एक दिन वोमा ले ननाचुक चिंया निकलिस। सुवा ह चारा लाय बर जंगल कोती गे रहय। एक ठन साँप ह चिंया ल देख डरिस। चिंया तीर आ के कहिथे - ’’मोला गजब भूख लागे हे, मंय ह तोला खाहूँ।’’

चियां ह सोंचिस, अब तो मोर परान ह नइ बांचे। मोर मदद करइया घला कोनों नइ हें। ताकत म तो येकर संग नइ सक सकंव, अक्कल लगा के देखे जाय।
चिंया ह कहिथे - ’’अभी तो मंय ह नानचुक हंव नाग देवता; तोर पेट ह नइ भरही। बड़े हो जाहूँ, तब पेट भर खा लेबे।’’

साँप ल चिंया के बात ह जंच गे। वो ह वोकर बात ल मान तो लिस, वो दिन वोला छोड़ तो दिस फेर लालच के मारे वो ह रोज चिंया तीर आय अउ खाय बर मुँहू लमाय। चिंया ह रोजे वोला विहिच बात ल कहय - ’’अभी तो मंय ह नानचुक हंव; तोर पेट नइ भरही। बड़े हो जाहूँ, तब पेट भर खा लेबे।’’
अइसने करत दिन बीतत गिस। धीरे-धीरे चिंया के डेना मन उड़े के लाइक हो गे।
एक दिन साँप ह कहिथे - ’’अब तो तंय बड़े हो गे हस। आज तोला खा के रहूँ।’’
चिंया ह किहिस - ’’खाबे ते खा ले।’’ अउ फुर्र ले उड़ गे।
साँप ह देखते रहिगे।
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शिल्प, विषय, उद्देश्य और लोकसंम्पृक्तता की दृष्टि से छोटी सी यह लोककथा किसी भी शिष्ट कथा की तुलना में अधिक प्रभावोत्पादक और चमत्कृत कर देने वाली है। इस लोककथा में लोककथा के अभिप्रायों और संदर्भों का सूक्ष्मावलोकन करने पर अनेक प्रश्न पैदा होते है और इन्हीं अनसुलझे प्रश्नों के उत्तर में कई अनसुलझे तथ्यों का खुलासा भी स्वमेव हो जाता है।
इस लोककथा में निहित निम्न बातें ध्यातव्य हैं -
1. इस लोककथा का नायक एक सद्यजात चूजा है जिसकी अभी आँखें भी नहीं खुली हैं। यहाँ पर नायक कोई धीरोदात्त मानव चरित्र नहीं है।

2. इस लोककथा का प्रतिनायक भी मानवेत्तर चरित्र है लेकिन वह नायक की तुलना में असीम शक्तिशाली है।

3. इस लोककथा में वर्णित घटना से पृथ्वी पर जैव विकास से संबंधित डार्विन के प्रसिद्ध सिद्धांत ’ओरजिन आफ द स्पीसीज बाई द मीन्स आफ नेचुरल सलेक्सन’ की व्याख्या भी की जा सकती है। ध्यातव्य है कि इस लोककथा का सृजन डार्विन के विकासवाद के अस्तित्व में आने से हजारों साल पहले ही हो चुकी होगी।

4. इस लोककथा में वर्णित घटना प्रकृति के जीवन संघर्ष की निर्मम सच्चाई को उजागर करती है। हर निर्बल प्राणी किसी सबल प्राणी का आहार बन जाता है। यह न सिर्फ प्रकृति का नियम है अपितु प्रकृति द्वारा तय किया गया खाद्य श्रृँखला भी है।

5. प्रकृति में जीवन संघर्ष की लड़ाई प्राणी को अकेले और स्वयं लड़ना पड़ता है।

6. जीवन संघर्ष की लड़ाई में शारीर बल की तुलना में बुद्धिबल अधिक उपयोगी है।

7. विपत्ति का मुकाबला डर कर नहीं, हिम्मत और आत्मविश्वास के साथ करना चाहिये।

8. जीत का कोई विकल्प नहीं होता। दुनिया विजेता का यशोगान करती है। इतिहास विजेता का पक्ष लेता है। विजेता दुनिया के सारे सद्गुणों का धारक और पालक मान लिया जाता है।

9. दुनिया का सारा ऐश्वर्य, स्वर्ग-नर्क, धर्म और दर्शन जीतने वालों और जीने वालों के लिए है। जान है तो जहान है। अतः साम, दाम, दण्ड और भेद किसी भी नीति का अनुशरण करके जीतना और प्राणों की रक्षा करना ही सर्वोपरि है।

इस लोककथा से कुछ सहज-स्वाभाविक प्रश्न और उन प्रश्नों के उत्तर भी छनकर आते है, जो इस प्रकार हैं -
1. ऐसे सार्थक और प्रेरणादायी कहानी के सृजन की प्रेरणा लोक को किस प्राकृतिक घटना से मिली होगी?
कथासर्जक ने अवश्य ही किसी निरीह चूजे को, किसी शक्तिशाली साँप का निवाला बनाते और अपनी प्राण रक्षा हेतु तड़पते हुए देखा होगा। इस धरती का हर प्राणी हर क्षण प्रकृति के साथ जीवन संघर्ष की चुनौतियों से गुजर रहा होता है। इस लोककथा का सर्जक भी इसका अपवाद नहीं हो सकता। उसने साँप की जगह नित्यप्रति उपस्थित प्राकृतिक आपदाओं को, प्रकृति की असीम शक्तियों को तथा प्राकृतिक आपदाओं से जूझते हुए स्वयं को, चूजे की जगह कल्पित किया होगा और परिणाम में इस प्रेरणादायी लोककथा का सृजन हुआ होगा।

2. विभिन्न लोक समाज में प्रचलित लोककथाओं की विषयवस्तु का प्रेरणा-स्रोत क्या हैं?
जाहिर है, लोककथा की विषयवस्तु अपने पर्यावरण से ही प्रेरित होती है। यही वजह है कि वनवासियों में प्रचलित अधिकांश लोककथाओं का नायक कोई मानवेत्तर प्राणी होता है। वहीं राजसत्ता द्वारा शासित लोक की लोककथाओं का नायक कोई राजा, राजकुमार अथवा राजकुमारी होती है। मनुवादी सामाजिक व्यवस्था का दंश झेलने वाले लोक की लोककथाओं में इस व्यवस्था से प्रेरित शोषण के विरूद्ध प्रतिकार के प्रतीकात्मक स्वर सुनाई देते हैं। पुरूष प्रधान समाज में नारियों की स्थिति सदा ही करुणाजनक रही है। अतः नारी चरित्र प्रधान लोककथाओं में (अन्य लोक साहित्य में भी) नारी-मन की अभिव्यक्ति और उनकी वेदनाओं का वर्णन प्रमुख होता है। आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक शोषण से शोषित लोक की कथाओं में शोषण तथा शोषक वर्ग के प्रति कलात्मक रूप में प्रतिकार के स्वर मुखर होते है।

3. लोककथा-सर्जक को क्या अशिक्षित मान लिया जाय?
लोककथा-सर्जक, आधुनिक संदर्भों में, अक्षर-ज्ञान से वंचित होने के कारण, जाहिर तौर पर अशिक्षित हो सकता है। परंतु पारंपरिक अर्थों में न तो वह अशिक्षत होता है और न ही अज्ञानी होता है। उसकी शिक्षा प्रकृति की पाठशाला में संपन्न होती है। लोककथा-सर्जक प्राकृतिक कार्यव्यवहार रूपी विशाल फलक वाली खुली किताब का जितना विशद् अध्ययन किया होता है, विश्वविद्यालयीन पाठ्यक्रमों में वह सब संभव नहीं है। धर्म, दर्शन और नीतिशास्त्र, सबका उसे ज्ञान होता है।
धर्मोपदेशकों और धार्मिक आख्यानककारों द्वारा विभिन्न अवसरों पर, विभिन्न संदर्भों में अक्सर एक बोध कथा कही जाती है जो इस प्रकार है -
’चार वेद, छः शास्त्र, अउ अठारहों पुरान के जानने वाला एक झन महापंडित रिहिस। वोला अपन पंडिताई के बड़ा घमंड रहय। पढ़े-लिखे आदमी ल अपन विद्या के घमंड होइच् जाथे, अनपढ ह का के घमंड करही? अब ये दुनों म कोन ल ज्ञानी कहिबे अउ कोन ल मूरख कहिबे? पढ़े-लिखे घमंडी ल कि सीधा-सादा, विनम्र अनपढ़ ल?

एक दिन वो महापंडित ह अपन खांसर भर पोथी-पुरान संग डोंगा म नदिया ल पार करत रहय। डोंगहार ल वो ह पूछथे - ’’तंय ह कुछू पढ़े-लिखे हस जी? वेद-शास्त्र के, धरम-करम के, कुछू बात ल जानथस?’’

डोंगहार ह कहिथे - ’’कुछू नइ पढ़े हंव महराज? धरम कहव कि करम कहव, ये डोंगा अउ ये नदिया के सिवा मंय ह अउ कुछुच् ल नइ जानव। बस इहिच् ह मोर पोथी-पुरान आय।’’

महापंडित - ’’अरे मूरख! तब तो तोर आधा जिंदगी ह बेकार हो गे।’’
डोंगहार ह भला का कहितिस?

डोंगा ह ठंउका बीच धार म पहुँचिस हे अउ अगास म गरजना-चमकना शुरू हो गे। भयंकर बड़ोरा चले लगिस। सूपा-धार कस रझरिझ-रझरिझ पानी गिरे लगिस। डोंगा ह बूड़े लागिस। डोंगहार ह महापंडित ल पूछथे - ’’तंउरे बर सीखे हव कि नहीं महराज? डोंगा ह तो बस अबक-तबक डूबनेच् वाला हे।’’
सामने म मौत ल खड़े देख के महापंडित ह लदलिद-लदलिद काँपत रहय; कहिथे - ’’पोथी-पुरान के सिवा मंय ह अउ कुछुच् ल नइ जानव भइया।’’
डोंगहार ह कहिथे - ’’तब तो तोर पूरा जिनगी ह बेकार हो गे महराज।’’
  ’’पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े से पंडित होय।’

पंण्डित और पोथियों के ज्ञान को अव्यवहारिक और असार सिद्ध करते हुए, प्रेम की सार्थकता को प्रतिपादित करने वाली कबीर की इस ऊक्ति का समर्थन करती यह कथा यद्यपि शिष्ट समाज में, शिष्ट साहित्य में समादृत है, पर इसकी विषयवस्तु, शिल्प और अभिप्रायों पर गौर करें तो वास्तव में यह लोककथा ही है। पोथी-पुराणजीवी पंडित वर्ग स्वयं अपना उपहास क्यों करेगा? सत्य को अनावृत्त करने वाली यह कथा निश्चित ही लोक-सृजित लोककथा ही है। यह तो इस लोककथा में निहित जीवन-दर्शन की सच्चाई की ताकत है, जिसने पंडित वर्ग में अपनी सार्थकता सिद्ध करते हुए स्वयं स्वीकार्य हुआ। यदि विभिन्न पौराणिक संदर्भों और पात्रों ने लोक साहित्य में दखल दिया है, तो पौराणिक और शिष्ट साहित्य में भी लोक साहित्य ने अपनी पैठ बनाई है। उपर्युक्त लोककथा इस बात को प्रमाणित करता है।

अपने पूर्वजों द्वारा संचित धन-संपति और जमीन-जायदाद को, जो कि धूप-छाँव की तरह आनी-जानी होती हैं, हम सहज ही स्वस्फूर्त और यत्नपूर्वक सहेजकर रखते हैं। लोककथाओं सहित संपूर्ण लोकसाहित्य भी हमारे पूवर्जों द्वारा संचित; ज्ञान, शिक्षा, नीति और दर्शन का अनमोल और अक्षय-कोश है। कंप्यूटर और इंटरनेट की जादुई दुनिया से सम्मोहित वर्तमान पीढ़ी स्वयं को इस अनमोल ज्ञान से वंचित न रखें।
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2  --  छत्तीसगढ़ी भाखा म हाना बिचार हाना ह छत्तीसगढ़ी भाखा के परान तो आयेच् येकर सुभाव अउ सिंगार घला आय

मुहावरा, कहावत अउ लोकोक्ति मन भाखा के आत्मा होथंय। छत्तीसगढ़ी म मुहावरा, कहावत अउ लोकोक्ति खातिर एके ठन शब्द हे ’हाना’। जउन बात ल घंटा भर ले प्रवचन दे के कि दसों पेज के पत्री लिख के समझाना मुश्किल होथे वहू ल लाइन-आधालाइन के कहावत नइ ते मुहावरा के जरिया सफा-सफा, फरिया के समझाय जा सकथे। मूरख से मूरख आदमी ह घला मुहावरा, कहावत अउ लोकोक्ति के जरिया कहे गे बात के अर्थ ल साफ-साफ समझ लेथे। येकर एके कारण हो सकथे अउ वो ये कि मुहावरा, कहावत अउ लोकोक्ति मन लोक-व्यवहार, लोक -संस्कृति, लोक-परंपरा, लोक-रीति, लोक-नीति अउ लोक-व्यवसाय के उपज आय। येकर नेरवा ह लोक समाज रूपी जमीन म गड़े रहिथे।

मुहावरा होय कि कहावत होय कि लोकोक्ति होय; अर्थ बोध के हिसाब से सब म एक बात समान हे; सबे म लक्षणा शब्द शक्ति होथे अउ इंकर अरथ निकालत खानी इंकर लक्ष्यार्थ ल ही ग्रहण करे जाथे।

मुहावरा अउ कहावत के अंतर मन ह एकदम साफ हे। मुहावरा ह मुख्य वाक्य के बीच म, वोकर हिस्सा बन के, माने वाक्यांश के रूप म ही प्रयुक्त होथे। मुहावरा ल मुख्य वाक्य ले निकाल देय ले वाक्य ह अर्थहीन हो जाथे, उरक जाथे। उदाहरण बर येदे वाक्य ल देखन, - सालिक के एकलौता टूरा ह आजकल छानी म होरा भूँजत हे। इहाँ वाक्य के बीच म प्रयुक्त छानी म होरा भूँजना वाक्यांश ह एक ठन मुहावरा आय। येला मुख्य वाक्य ले अलग कर देय से बचल वाक्य ’सालिक के एकलौता टूरा ह आजकल’ के कोनो अरथ नइ निकल सकय, मतलब ये वाक्य ह उरक गे।

कहावत ह अपन आप म सुतंत्र वाक्य होथे। मुख्य वाक्य या कथन के बाद अपन बात ल अउ जादा स्पष्ट करे खातिर, अपन कथन ल अउ जादा वजनदार बनाय खातिर अलग से येकर प्रयोग करे जाथे। मुख्य वाक्य ह अर्थबोध के हिसाब ले पूरा रहिथे अउ कहावत ल हटा देय से घला येकर अर्थ ह जस के तस बने रहिथे। एक ठन उदाहरण देखव - रमेसर ल का के कमी हे। तभो ले वो ह जब देखो तब नाक म रोवत रहिथे। इही ल कहिथे, रांड़ी ह रोय ते रोय एहवाती ह घला रोय। इहाँ ’रांड़ी ह रोय ते रोय एहवाती ह घला रोय’ एक ठन कहावत आय। ये ह वक्ता के मुख्य कथन ल अउ जादा बजनदार बना देय हे। येला निकाल देय से घला वक्ता के मुख्य कथन म कोनों फरक नइ पड़य।

विद्वान मन कहावत अउ लोकोक्ति ल एके मानथें। पर बारीकी ले जांच करे जाय त दुनों के फरक ह जगजग ले दिखाई पड़ जाही। कहावत अउ लोकोक्ति मन लक्षणा के संगेसंग व्यंजना शब्द शक्ति ले घला भरपूर रहिथे। इंकर उद्गम लोक व्यवहार के कोनो अटल अउ मान्य सच्चाई के कोख ले होथे।

लोकोक्ति शब्द के संधि बिलगाव करे ले दू ठन शब्द मिलथे - लोक+ऊक्ति; माने लोक व्यवहार म प्रचलित ऊक्ति। लोक समाज म घटित होय कोनों अइसन विशेष घटना, जेकर असर ह व्यापक होथे अउ तीनों काल म जेकर सत्यता ह अमिट रहिथे, के कोख ले लोकाक्ति के जनम होथे। जादातर लोकोक्ति मन काव्यात्मक होथे अउ येमा अन्योक्ति अलंकार के गुण साफ-साफ झलकथे। खाल्हे के उदाहरण मन ल देखव -
1. कब बबा मरे, त कब बरा चुरे।
2. ददा मरे दाऊ के, बेटा सीखे नाऊ के।
कबीर दास के एक ठन दोहा हे -
माली आवत देख के, कलियन करे पुकार।
फूले-फूले चुन लिये, काल्ह हमारी बार।

ये दोहा म बात होवत हे फुलवारी, फूल, कली अउ माली के, पन इशारा होवत हे मानव जीवन के अटल सच्चाई अउ जीवन के नश्वरता डहर। फुलवारी, फूल, कली अउ माली के उदाहरण दे के ये दोहा म मानव जीवन के अटल सच्चाई अउ जीवन के नश्वरता ल समझाय गे हे। फुलवारी ह संसार, माली ह काल, कली ह बालपन अउ फूल ह सियानापन के सच्चाई ल फोर-फोर के बतावत हे। येला अन्योक्ति अलंकार कहे गे हे। अइसने इशारा लोकोक्ति मन म घला रहिथे।

भाषा म वोकर प्रयोक्ता समाज के संस्कृति अउ सभ्यता ह व्यक्त होथे। ये ह मुहावरा, कहावत अउ लोकोक्ति मन के बिना संभव नइ हे।

मुहावरा होय कि कहावत होय कि लोकोक्ति होय, छत्तीसगढ़ी म सबोच ह हाना आय। हाना कइसे बनत होही, येकरो बिचार करके देखथन। येदे कहानी ल देखव -
बुधारू घर के बहू के पाँव भारी होइस, बुधारू के दाई ह गजब खुस होईस। फेर बिचारी ह नाती के सुख नइ भोग पाईस। बहू के हरू-गरू होय के पंदरा दिन पहिलिच् वोकर भगवान घर के बुलव्वा आ गे। बुधारू के बहू ह सुंदर अकन नोनी ल जनम दिस, सियान मन किहिन “डोकरी मरे छोकरी होय, तीन के तीन।”

बहू के दाई ह महीना भर ले जच्चा-बच्चा के सेवा-जतन करिस। दाईच् आय त का होईस, कतका दिन ले अपन घर-दुवार ल छोड़ के पर घर म जुटाही नापतिस, दू दिन बर घर जावत हंव बेटी कहिके गिस तउन हा हिरक के अउ नइ देखिस। लहुटबेच् नइ करिस। लइका के थोकुन अउ टंच होवत ले बहु ह थिराईस, तहन फेर बनी-भूती म जाय के शुरू कर दिस। पर के आँखीं म के दिन ले सपना देखतिस। बनिहार अदमी, के दिन ले घर म बइठ के रहितिस। परोसिन दाई के गजब हाथ-पाँव जोरिस अउ वोला लइका के रखवारिन बने बर राजी करिस। परोसिन दाई के घर लोग-लइका नइ रहय, वहू ह सरको म राजी हो गे।

पर के लइका के नाक-मुहूँ ह के दिन ले सुहातिस। डोकरी ह लंघियांत कउवा गे। साफ-साफ सुना दिस कि अब वो ह ये लइका के जतन नइ कर सकय। कहूँ ऊँच-नीच हो गे ते बद्दी म पड़ जाहूँ।

बहू ह रोजे परोसिन डोकरी के किलोली करय, संझा-बिहाने वोकर पाँव परय। जइसने-तइसने दिन निकालत गिस। परोसिन डोकरी ह कउवा जातिस त कहितिस - “परोसी के भरोसा लइका उपजारे हे दुखाही-दुखहा मन ह। हमर मरे बिहान कर के रखे हें।

ये कहानी म “डोकरी मरे छोकरी होय, तीन के तीन।” अउ “परोसी के भरोसा लइका उपजारना’’ ये दुनों हाना अउ कहानी के घटना म संगत बिठा के देखे ले बात ह समझ म आ जाही।

हाना अउ छत्तीसगढ़ी भाखा के का बरनन-बिखेद करे जाय। छत्तीसगढ़ी भाखा म हाना बिचार करबे ते चकरित खा जाबे। छत्तीसगढ़ी भाखा ह हाना प्रधान भाखा आय। हाना ह येकर परान तो आयेच् येकर सुभाव अउ सिंगार घला आय। छत्तीसगढ़ के गाँव मन म जा के देख लव, बात-बात म, हर वाक्य म हाना सुने बर मिल जाही। छत्तीसगढ़िया मन के कोनों वाक्य ह बिना हाना के संपूरन होयेच् नहीं। जमाना ह अब बदलत जावत हे। लोग लइका मन पढ़त-लिखत जावत हें। छत्तीसगढ़ी भाखा के सरूप ह घला बदलत जावत हे। हाना के प्रयोग ह कम होवत जावत हे। भाखा के मिठास ह उरकत जावत हे। पढ़े-लिखे लइका मन ल अपन मातृ-भाखा ल बोले बर शरम आथे। अब के जवनहा मन अपन गुरतुर मातृ-भाखा ल भुलावत जावत हें, हाना मन ल ये मन का सरेखहीं, का जानहीं? अइसे जनावत हे कि अवइया पढ़े-लिखे पीढ़ी ह हाना ल बिसर जाही। हमर साकेत साहित्य परिषद् के संगवारी मन बाते बात म अइसने भूलत-बिसरत हाना मन ल सकेले-संजोय के प्रयास करे हंे। येकर मात्रा ह कम हे। थोकुन अउ मेहनत करे ले, अउ कोशिश करे ले येकर ले कई गुना हाना अउ सकेले जा सकत हे। ये स्मारिका म सकेले गेय हाना मन के हिन्दी म अरथ बताय के कोशिश घला करे गे हे। सकेले गेय हाना के बनावट अउ वोकर अरथ म चूक होना संभव हे। अइसन कोनों बात होही तब पढ़इया विद्वान संगवारी मन ले निवेदन हे कि हमला वोकर जानकारी देय के कृपा करहीं।

स्मारिका म गीत, कविता, कहानी, व्यंग्य अउ दूसर विधा के रचना मन ल घला सकेले गेय है। स्मारिका खातिर रचना भेजइया जम्मों संगवारी मन के हम हिरदे ले आभारी रहिबो।
जय हिंद-जय छत्तीसगढ़।
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3  -  संपादकीय


(लोक साहित्य म लोकप्रतिरोध के स्वर’ के संदर्भ)
(लोकसाहित्य में निहित लोक प्रतिकार और लोकप्रतिरोध के स्वर को स्वयं शोषक भी नहीं समझ पाता है। लोक प्रतिरोध की सबसे बड़ी विशेषता यही है। यह लोककथा केवल हास्य और मनोरंजन के लिए ही नहीं रची गई होगी। इसकी रचना शोषण और अपमान से ग्रस्त किसी खड़बाज ने ही शोषकों के विरूद्ध अपना आक्रोश व्यक्त करने के लिए किया होगा। समाज के ऐसे सारे खड़बाज अपनी परिथितिजन्य असहायता और मजबूरी की वजह से शोषकों के विरूद्ध प्रत्यक्ष लड़ाई लड़ने की स्थिति में नहीं होते हैं। विकल्पहीन खड़बाजों के लिए अपने मन की पीड़ा, प्रतिरोध और प्रतिशोध को व्यक्त करने के लिए लोकसाहित्य की विभिन्न विधाओं के अलावा और क्या बचता है? वे इसी का आश्रय लेते है। यही लोक का प्रतिरोध है, लोक प्रतिरोध के स्वर हैं। लोक प्रतिरोध के लिए लोकसाहित्य में रची गई घटनाएँ और बिंब इतने प्रतीकात्मक और इतने कलात्मक होते हैं कि ये लोककथाएँ (लोकसाहित्य) शोषकों के बीच भी समान रूप से ही लोकप्रिय होते हैं।)

21 मार्च 2015 के दिन साकेत साहित्य परिषद् सुरगी ह सोला बरस के हो गे। जीवन म सोलवाँ साल के विशेष महत्व होथे। इही उमर म मनखे के तन अउ मन ह सबल होय के शुरूआत होथे। बुद्धि अउ विचार ह पाके लागथे। नवा-नवा सपना देखे के अउ वोला सच करे के उदिम होय लागथे। ’समाज सेवा और साहित्य उत्थान’ के उद्देश्य अउ सपना ल ले के साकेत साहित्य परिषद् के जनम होइस अउ इही ल अपन आदर्श बना के परिषद ह अपन जीवन यात्रा के शुरूआत करिस। परिषद् के हर गतिविधि अउ क्रियाकलाप ह जनतांत्रिक ढंग ले जनता के बीच म होवत आवत हेे। परिषद् ह अपन उद्देश्य म कहाँ तक सफल हो पाइस यहू ह आपके सामने हे। सफलता के कोई विकल्प नइ होय, पन कोनों काम बर जी-परान दे के भिड़ जाना अउ सरलग भिड़ेच रहना, यहू घला छोटे बात नो हे। परिषद् ल इही बात के गुमान हे। पन यहू जरूरी हे कि आज परिषद् के हर सदस्य खुद ले इही सवाल घेरीबेरी पूछंय कि परिषद् ह अपन उद्देश्य म कहाँ तक सफल हो पाइस।

साकेत साहित्य परिषद् सुरगी ह पीछू सरलग सोलह बरस ले अपन सालाना कार्यक्रम म कोनों न कोनों महत्वपूर्ण विषय ल ले के विचार गोष्ठी के आयोजन करत आवत हे। निर्धारित विषय ऊपर केन्द्रित स्मारिका के प्रकाशन घला करे जाथे। विषय विशेषज्ञ के रूप म आमंत्रित विद्वान मन गोष्ठी म विचार मंथन करथें। पीछू साल इही सिलसिला म 23 फरवरी 2014 म गंडई पंडरिया म छत्तीसगढ़ी हाना ल ले के विचार गोष्ठी के आयोजन करे गे रिहिस। गोष्ठी म डॉ. विनय पाठक, डॉ. गोरेलाल चंदेल, डॉ. जीवन यदु, डॉ. पीसी लाल यादव, डॉ. दादूलाल जोशी जइसे विद्वान मन के अनमोल विचार सुने बर मिलिस। गोष्ठी अउ ये मौका म प्रकाशित स्मारिका ह सब ल भाइस। एसो के, सोलहवाँ सालाना गोष्ठी के परिचर्चा के विषय हे- ’लोक साहित्य म लोक प्रतिरोध के स्वर’। ये मौका म प्रकाशित एसो के स्मारिका के मेड़वार घला, जेंकर चारों मुड़ा बिचार रूपी दौरी के बइला मन घूमहीं, इही विषय ल बनाय गे हे।

संगी हो! छत्तीसगढ़ ह लोकसाहित्य के मामला म समृद्ध हे। विभिन्न प्रकार के लोकगीत, लोककथा, लोकगाथा, लोक परंपरा म प्रचलित प्रतीक चिह्न अउ हाना, जम्मों ह लोकसाहित्य म समाहित हे। आप सबो झन जानथव कि साहित्य ह अभिव्यक्ति के माध्यम आय। हिरदे के प्रेम-विषाद्, हर्ष-उल्लास, सुख-दुख, के अभिव्यक्ति ल तो हम साहित्य के माध्यम ले करबे करथन, येकर अलावा घला मन के सहमति-असहमति अउ वो जम्मों गोठ, जम्मों काम, जउन ल हम क्रियात्मक रूप म नइ कहि सकन, नइ कर सकन, वो सब ल साहित्य के माध्यम ले कहिथन, करथन। अइसन तरह के अभिव्यक्ति करे के मामला म लोक अउ लोकसाहित्य के बराबरी कोनों साहित्य ह नइ कर सकय। लोकसाहित्य के माध्यम ले लोक ह अपन असहमति अउ विरोध ल अतका मारक ढंग ले पन अतका सुंदर अउ कलात्मक रूप म व्यक्त करथे कि वोकर मन के भड़ास ह घला निकल जाथे अउ सुनइया ल खराब घला नइ लगय। उदाहरण बर सुवा गीत ल ले सकथन। वइसे तो सुवा गीत के माध्यम ले नारी-मन के हर्ष-उल्लास के अभिव्यक्ति घला होथे फेर ये गीत ह प्रमुख रूप ले पुरूष प्रधान समाज द्वारा नारी उत्पीड़न के विरोध म नारी-मन के सामूहिक अभिव्यक्ति के गीत आवय। एक पद देखव -
’ठाकुर पारा जाइबे तंय घुम-फिर आइबे,
तंय घुम-फिर आइबे,
कि सेठ पारा झन जाइबे,
रे सुवा न, कि सेठ पारा झन जाइबे।
सेठ टुरा हे बदन इक मोहनी,
बदन इक मोहनी,
कि कपड़ा म लेथे मोहाय।
रे सुवा न, कि कपड़ा म लेथे मोहाय।’

विचार करव, सेठ वर्ग ल शोषक वर्ग के पर्याय माने जाथे। ये पद म शोषक वर्ग के प्रतिरोध जतका सौम्यता, शिष्टता अउ जउन कलात्मक सौन्दर्य के साथ करे गे हे वो ह कला अउ सौन्दर्य, दोनों के पराकाष्ठा नो हे? हमर लोकसाहित्य ह अइसनहे कतरो कलात्मक प्रतिरोध के स्वर ले भरे पड़े हे। एक हाना देखव - ’खेत बिगाड़े सोमना, गाँव बिगाड़े बाम्हना।’ ये ह लोक प्रतिरोध के स्वर नो हे त अउ काये? देवार मन अपन लइका-बच्चा के नाम रखथें - पुलिस, कप्तान, तहसीलदार, श्रीदेवी, आदि। सोचव, ये ह का आवय।
सुवा कहव के कहिनी, लोक साहित्य के सब्बो विधा म इही तरह ले लोक के  प्रतिरोध ह रचे बसे हे, इंकरे चिन्हारी करके वोला ये स्मारिका म साधे के कोशिश करे गे हे।
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यह लोककथा छत्तीसगढ़ में कही जाती है।
एक राजा था। (लोक में बड़ा जमीदार भी राजा ही होता है।) नौकरों या सेवकों की नियुक्ति वह अपनी शर्तों पर करता था। उसी राज्य में दो भाई रहते थे। वे बहुत गरीब थे। बड़ा भाई बहुत भोला और सीधा-सादा था। लोग उसे सिधवा कहते थे। छोटा भाई बुद्धिमान और चतुर था। वह खड़बाज के नाम से प्रसिद्ध था। बड़ा भाई, सिधवा राजा के यहाँ नौकर हो गया। नियुक्ति के समय राजा की शर्तों में ये शर्तें भी थी -

’सुबह-शाम केवल एक-एक पत्तल में, जो पाँच पत्तों का बना होगा, भोजन दिया जायेगा। भोजन की मात्रा उतनी ही होगी जितना पत्तल में आ सके। शर्तों का उल्लंघन करने पर या नियत अवधि से पूर्व नौकरी छोड़ने पर चेथी का मांस देना होगा।’

लोक कथाकार कहते हैं - सिधवा को भोजन परोसने के लिए राजा बबूल की पत्तियों से पत्तल बनवाता था। काम बेहिसाब लिया जाता था। जल्द ही बड़ा भाई सिधवा निर्बल और बीमार हो गया। जान है तो जहान है, उसने चेथी का मांस देकर अपनी जान बचाई।

सिधवा किसी तरह घर लौटा। खड़बाज ने बड़े भाई की दुर्गति देखी। राजा के इस अन्याय, छल और धूर्ततापूर्ण व्यवहार के कारण उसका खून खौलने लगा। उसके दिल में प्रतिशोध की आग दहकने लगी। उसे जल्द ही मौका भी मिल गया, जब राजा ने मुनादी कराई कि महल के लिए एक नौकर की सख्त जरूरत है।

राजा ने फिर वही शर्तें रखी जो सिधवा के समय रखी गई थी। खड़बाज ने कहा - महाराज! मेरी भी शर्त है। पत्तल मैं अपनी इच्छानुसार बनाऊँगा और भोजन मेरी रूचि का होना चाहिए।

राजा को नौकर की सख्त जरूरत थी। उसने शर्तें मान ली।

भोजन के लिए खड़बाज ने पुराइन के पाँच पत्तों को जोड़कर एक पत्तल बनाया। पुराइन का पत्ता अपने आप में ही एक पत्तल के आकार का होता है। पाँच पत्तों को जोड़कर बनाये गए उस पत्तल का आकार बहुत बड़ा था। उसने पत्तल भरकर भोजन लिया। जितना खा सकता था खाया, बाकी को जनवरों के आगे डाल दिया। इससे किसी शर्त का उल्लंघन नहीं होता था, अतः राजा इसका विरोध नहीं कर सका। शर्त में काम के बारे में भी कुछ नहीं कहा गया था, अतः खड़बाज हर काम अपनी मर्जी से करता था। भरपेट खाता और चैन की नींद सोता था। खड़बाज की हरकतों से राजा को कई तरह से नुकसान होने लगी। राजा अब और अधिक नुकसान सहने की स्थिति में नहीं था लेकिन वह कर भी क्या सकता था? खड़बाज को नौकरी से हटाने का मतलब अपने चेथी का मांस देना था।

खड़बाज की हरकतों से राजा का इकलौता पुत्र भी मारा जाता है। उसे जन-धन की अपार हानि हाने लगी। उसकी प्रतिष्ठा और मान-सम्मान भी धूमिल होता गया। पर खड़बाज को नौकरी से हटाने का मतलब था अपने चेथी का मांस देना। राजा के लिए ऐसा करना संभव नहीं था।

राजा अब खड़बाज के नाम से थर्राने लगा था। अंततः वह रानी के साथ गुप्त मंत्रणा करता है। रात के अंधेरे में गुप्त रूप से बेटी-दामाद के घर पलायन करने की योजना बनती है। खड़बाज को राजा की योजना का पता चल जाता है और वह उस झांपी के अंदर छिपकर बैठ जाता है जिसे रानी ने यात्रा के लिए जरूरी सामानों के साथ तैयार किया था।

बेटी के घर पहुँचकर भी खड़बाज की हरकते जारी रहती हैं। अंत में बेटी की समझाइश पर राजा अपने चेथी का मांस देकर खड़बाज से छुटकारा पाता है।
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इस लोककथा में राजा को सताने और उसका नुकसान करने के लिए खड़बाज कई तरह के मनोरंजक और हास्यास्पद काम करता है। बहुत सी हरकतें जुगुप्सा पैदा करने वाली भी होती है। उनकी हरकतों से खूब हास्य पैदा होता है। राजा की बेबसता और उनका मानमर्दन होने से श्रोताओं की आत्मतुष्टि होती है। उनका खूब मनोरंजन होता है। खड़बाज श्रोताओं की कल्पना का नायक बन जाता है। लोक कथाकार अपनी कल्पना से इन हरकतों का सृजन करता है। इस समय खड़बाज स्वयं लोक कथाकार के अंदर साकार हो उठता है और दोनों में तादात्म्य स्थापित हो जाता है।

लोकसाहित्य में निहित लोक प्रतिकार और लोकप्रतिरोध के स्वर को स्वयं शोषक भी नहीं समझ पाता है। लोक प्रतिरोध की सबसे बड़ी विशेषता यही है। उपर्युक्त लोककथा केवल हास्य और मनोरंजन के लिए ही नहीं रची गई होगी। इसकी रचना शोषण और अपमान से ग्रस्त किसी खड़बाज ने ही शोषकों के विरूद्ध अपना आक्रोश व्यक्त करने के लिए किया होगा। समाज के ऐसे सारे खड़बाज अपनी परिथितिजन्य असहायता और मजबूरी की वजह से शोषकों के विरूद्ध प्रत्यक्ष लड़ाई लड़ने की स्थिति में नहीं होते हैं। विकल्पहीन खड़बाजों (शोषितों) के लिए अपने मन की पीड़ा, प्रतिरोध और प्रतिशोध को व्यक्त करने के लिए लोकसाहित्य की विभिन्न विधाओं के अलावा और क्या बचता है? वे इसी का आश्रय लेते है। यही लोक का प्रतिरोध है, लोक प्रतिरोध के स्वर हैं। लोक प्रतिरोध के लिए लोकसाहित्य में रची गई घटनाएँ और बिंब इतने प्रतीकात्मक और इतने कलात्मक होते हैं कि ये लोककथाएँ (लोकसाहित्य) शोषकों के बीच भी समान रूप से उतने ही लोकप्रिय होते हैं। इन लोककथाओं का श्रवण अथवा कथन करते समय, लोकसाहित्य का रसास्वादन करते हुए, स्वयं शोषक वर्ग भी हास्य और मनोरंजन से सराबोर हो जाता है। यही लोक के प्रतिरोध और प्रतिकार की सफलता है। ऊपरी तौर पर ऐसे लोक साहित्यों का प्रमुख लक्ष्य केवल मनोरंजन ही प्रतीत होता है। ऐसा प्रतीत होना लोकसाहित्य, असकी भाषा और उसकी शैली का चमत्कार नहीं तो और कया है? जरूर इसे लोक का निष्क्रिय प्रतिरोध ही माना जायेगा, पर लोक के इस प्रतिरोध को खारिज कर पाना संभव नहीं है।
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4  -- ’लोक का बाजार और बाजार में लोक’ के संदर्भ 

लोक की जब-जब बात होती है, निगाहें अनायास ही गाँव की ओर मुड़ जाती हैं। गाँव में पहुँचकर निगाहें वहाँ की नदियों, ताल-तलैयों, डोंगरी-पहाड़ों, जंगल-झाड़ियों की प्राकृतिक सुंदरताओं के सम्मोहन को तलाशती हैं। फिर ये निगाहें पहुँचती हैं वहाँ के खेतों पर और खेतों को अपने पसीनों से सींचते हुए भूमिपुत्रों-पुत्रियों पर। वहाँ पहुँचकर निगाहें वहाँ के खलिहानों में किसानों की खुशियाँ, साधन-संपन्नता और स्वाभिमान का भी जायजा लेना चाहती हैं, चैपालों में जाकर लोक-जीवन की सरलता, सहजता, अल्हड़ता और उन्मुक्तता को तलाशना चाहती हैं। वहाँ आपकी निगाहें लोकगीतों, लोक-संगीतों, लोक-कथाओं और लोक-गाथाओं की सरणियों-सरिताओं-सोताओं में डूबना-उतराना चाहती हैं। इस तरह की उम्मीदों के आधार या तो आपके पूर्व-अनुभव होंगे या गाँवों के बारे में विभिन्न स्रोतों से आपका अर्जित ज्ञान। परन्तु आज गाँवों में पहुँचकर आपको इनमें से कुछ भी हासिल नहीं होगा। निराशा और नाउम्मीदी के अलावा आपके हाथों कुछ भी नहीं आयेंगे। लेकिन यदि आप वहाँ जाकर कुछ बेचना, या फिर कुछ खरीदना चाहेंगे, तो वहाँ आप बेच भी सकते हैं, और खरीद सकते हैं, वह भी अपनी शर्तों पर।

गाँवों में आप अनुभव करेंगे - जिन खेतों में पहुँचकर मजदूरों और किसानों के चेहरे उमंग और उल्लास से खिल-खिल उठते थे, अंग-अंग में जीवन-रस की हिलोंरे हिलोर लेने लगती थीं, भाव-पूरित हृदय से छलक-छलककर श्रृँगार की मधुर धुने वातावरण को रसमय बना देती थीं, मन की इन्द्रधनुषी सरल, निर्दोष और अबोध कल्पनाएँ उन्मुक्त पँक्षियों की भाँति मुक्त और सीमाहीन आकाश की सीमाओं को छूने के लिए निकल पड़ती थीं, उन्हीं किसानों के, कृषि मजदूरों के चोहरों पर अब निराशाओं और उदासियों के धुंध नजर आते हैं। जिन खेतों में किसानों को, कृषि मजदूरों को जीवन की सार्थकता प्राप्त होती थी उन्हीं खेतों में अब उन्हें आत्महत्या की भयावह काली परछाईयाँ डराती हैं। जिस कृषिकर्म को गाँव के लोग लाभ-हानि के व्यापारिक गणितीय तथ्यों से अछूता और बेखबर रहकर, धर्म की तरह, ईश्वर की पूजा की तरह पवित्र भाव से करते थे, उसी कृषिकर्म से वे अब दूर भागने लगे हैं। आखिर क्यों?

परंपरागत लोक-साहित्य और लोक-संस्कृतियों के प्रति आज लोक में न तो आकर्षण रह गया है और न ही आस्था। और लोक-साहित्य और लोक-संस्कृति के नाम पर लोक आज जिसके प्रति आकर्षित हो रहा है उसमें अश्लीलता और अपसंस्कृति के अलावा और कुछ भी नहीं है। कृषकों के चेहरों पर आज उल्लास नहीं, हताशा नजर आते हैं। कृषि के प्रति अब आस्था की जगह विवशता के भाव नजर आते हैं। कृषि मजदूर लगातार अब शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। आखिर क्यों? क्या इसके पीछे बाजार की शक्तियाँ तो काम नहीं कर रही हैं? उदारीकरण के इस दौर में बाजार ने लोक, लोक-संस्कृति और लोक-साहित्य को कहाँ तक प्रभावित किया है। लोक के बाजार का स्वरूप पहले क्या था, कैसा था, और आज के उत्तरआधुनिक दौर में लोक के बाजार का स्वरूप क्या है और कैसा है? बाजार में लोक की स्थिति और हैसियत पहले क्या थी, कैसी थी और आज क्या है, कैसी है? सवाल और भी हैं और ये सब ऐसे सवाल हैं जो आज निर्मम रूप से समाज, साहित्य और संस्कृति के परंपरागत ढांचे पर निरंतर आघात कर रहे हैं, उसे मूल्यहीन और संवेदनशून्य बना रहे हैं; व्यक्ति और विचारों को निर्जीव उपभोक्ता वस्तुओं में रूपान्तरित कर रहे हैं। इस स्मारिका में इन्हीं कुछ सवालों के कुछ पहलुओं को आंशिक रूप से ही सही, छूने का प्रयास किया गया है।

इस स्मारिका में प्रकाशित सामग्रियों के रचनाकरों-साहित्यकारों के प्रति साकेत साहित्य परिषद्
आभार अर्पित करता है।
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5  - लोक का बाजार और बाजार में लोक

लोक का बाजार:- लेन-देन एक सामाजिक आवश्यकता है। आदिम मानवसमाज ने अपनी इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए वस्तुविनिमय की प्रणाली विकसित की होगी, क्योंकि तब मुद्रा का चलन नहीं रहा होगा। लेन-देन की प्रक्रिया व्यक्तिगत अथवा पारिवारिक स्तर पर संपन्न कर ली जाती होगी, जैसा कि कई बार आज भी होता है। यह पूर्णरूप से मैत्री, विश्वास और सहयोग जैसी पवित्र मानवीय भावनाओं पर आधारित होती है। जल्द ही इस प्रणाली को अधिक व्यावहारिक और लेन-देन की प्रक्रिया को अधिक सुविधाजनक बनाने के लिए लोग किसी नियत समय और नियत स्थान पर इकत्रित होना शुरू किये होंगे और लोकबाजार ने एक स्वरूप पाया होगा। बाजार का यह रूप गाँवों में आज भी अस्तित्व में है, परंतु वस्तुविनिमय के द्वारा लेन-देन की प्रक्रिया का स्थान अब पूरी तरह मुद्रा ने ले लिया है। लोक का यह बाजार लोक की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए रहा होगा और लोक के नियंत्रण में रहा होगा तथा इसका स्वरूप भी लोककल्याणकारी रहा होगा। गाँवों में गाँव द्वारा नियुक्त लोकसेवकों (पौनी-पसेरी) यथा - बरदिहा, बैगा, नाई, कोटवार आदि को मजदूरी के रूप में आज भी अनाज दिया जाता है, इसी शर्त पर इनकी नियुक्तियाँ होती हैं। अब से ढाई-तीन दशक पहले तक गाँवों में मजदूरों को मजदूरी के रूप में अनाज ही दिया जाता था। मेरा व्यक्तिगत अनुभव कहता है, तब खेतिहर मजदूरों की हालत अब की तुलना में बेहतर हुआ करती थी। हारी-बीमारी और ठेलहा (बेरोजगारी) के दिनों के लिए वे मजदूरी के रूप में प्राप्त अनाज की पर्याप्त मात्रा संग्रह करके रख पाते थे। यह उनकी आर्थिक सुरक्षा का दृढ़ आधार होता था। आज मजदूरी के रूप में मुद्र पानेवाले मजदूरों के पास भविष्य के लिए किसी तरह की संचित निधियाँ नहीं होती; कारण चाहे जो भी हो - अपर्याप्त मजदूरी अथवा मजदूरों की आवश्यकताओं का विस्तार।

समाज में धनलोलुपों की कमी नहीं होती। स्वभावतः ये चतुर, धूर्त और छली होते हैं। इन्होंने बाजार को अपनी आजीविका का साधन बनाया होगा। बाजार को इन्होंने कल्पवृक्ष के रूप में पाया होगा जो न केवल धन रूपी फलों की वर्षा करनेवाली है अपितु मात्र चाहने भर से दुनिया के सारे सुख और वैभव प्रस्तुत कर देने वाली है। इस तरह दुनिया में नये शक्तिशाली शोषक वर्ग का उदय हुआ। वर्तमान में पूरी दुनिया के ऐसे ही सौ से भी कम लोगों का एक समूह है। इनकी शक्ति की कल्पना कीजिए कि दुनिया की सत्तर प्रतिशत पूंजी इन्हीं के कब्जे में है। ये ’ग्रुप आफ इल्युमिनाटी’ के रूप में जाने जाते हैं। कहने को तो दुनिया में सैकड़ों देश हैं परन्तु इनके लिए पूरी दुनिया न सिर्फ एक गाँव है, एक बाजार है बल्कि एक देश है, एक साम्राज्य है और इस साम्राज्य के ये बेताज बादशाह हैं।

लोकबाजार का प्रांभिक रूप सुदूर वनांचलों में आज भी देखा जा सकता है, और देखा जा सकता है - यहाँ पर वन में निवास करने वाले अबोध, सहज, सरल हृदयवाले लोक को धनलोलुपों के द्वारा शोषित होते। धनलोलुपों का, दुनिया रूपी बाजार का बेताज बादशाह बनने की प्रक्रिया को यहाँ स्पष्टता के साथ देखा और समझा जा सकता है। अबोध वनवासियों का जीवन मुख्यतः आज भी वनोपजों पर आधारित है। गुड़, चाय और नमक जैसी वस्तुएँ वनों से प्राप्त नहीं होती। इनके लिए ये बाजार पर आश्रित होते हैं और इन्हें ये अपने बहुमूल्य चिरौंजी, महुआ और इमली से वस्तुविनिमय द्वारा प्राप्त करते हैं।

बाजार में लोक:- लोकबाजार आज लगभग पूरी तरह वैश्विक बाजार में परिवर्तित हो चुका है। बाजार का नियंत्रण अब लोक के हाथों से निकलकर पूरी तरह ’इल्युमिनाटियों’ के हाथों में आ चुका है। बाजार का लोककल्याणकारी रूप अब पूरी तरह नष्ट हो चुका है। बाजार अब लोक के शोषण का केन्द्र बन चुका है। आज के बाजार में लोक की हैसियत कुछ भी नहीं है। दुनिया की सर्वाधिक शक्तिशाली चीज पूंजी आज बाजार के हाथों में है। बाजार के पास आज विज्ञान है, तकनीक है और दुनिया के सर्वाधिक शातिर दिमागों की फौज है जिसने लोक को आज पूरी तरह से देह रूपी जीन्स में (उत्पाद के रूप में) परिवर्तित कर दिया है - एक ऐसा जीन्स, जिसे खरीदा जा सकता है, बेचा जा सकता है और जिसे मनमाफिक भोगा जा सकता है।


इतना सब कुछ एकाएक नहीं हुआ है परन्तु जिस तेजी से हुआ है वह निसंदेह आश्चर्यजनक है। सजीव, विवेकशील, बुद्धिमान और विचारवान मनुष्य एक उपभोक्ता वस्तु में रूपान्तरित हो जाये और उसे पता भी न चले, यह तो एक करिश्मा है और इसे कर दिखाया है आज बाजार ने। मनुष्य को सम्मोहित किये बिना ऐसा करिश्मा संभव नहीं है। बाजार ने सबसे पहले लोक के उत्पादन के साधनों को हथियाया और फिर उसने लोक की परंपराओं और रीतिरिवाजों को अपने लाभ के अनुरूप बनाया। बाजार आज न सिर्फ हमारे दरवाजे पर पहुँच चुका है अपितु इसका प्रवेश अब हमारी रसोई और हमारे शयनकक्ष तक हो चुका है। अब यह हमारे पारिवारिक संबंधों को भी परिभाषित और नियंत्रित करने लगा है। आजकल टी. वी. चैनलों पर प्रसारित हो रहे एक विज्ञापन से इसे समझा जा सकता है जो इस प्रकार है -

’’युवा पति-पत्नी के अलावा घर में और कोई नहीं है, फिर भी दोनों अकेले हैं। पति अपने किसी इलेक्ट्रानिक उपकरण के साथ व्यस्त और मस्त है। पति के साहचर्य और प्रेम की आस लिए पत्नी अकेली टी. वी. के सामने सोफे पर बैठी हुई है। तभी पति चुपके से परन्तु सावधानीपूर्वक आकर पत्नी की बगल में बैठ जाता है। पति को पाकर पत्नी के मन में शायद अंतरंग क्षणों की उम्मीदें जागने लगती है परन्तु यह केवल उनका भ्रम साबित होता है क्योंकि पति वहाँ पर दरसल पत्नी के लिए नहीं अपितु टी. वी. के रिमोटकंटोल के लिए आया था। पति को न तो पत्नी की परवाह है और न हीं उस पर कोई रूचि ही है। तभी दरवाजे पर दस्तक होती है। निराश पत्नी उठती है और मोमबत्ती को बुझाकर बेडरूम में चली जाती है। पत्नी द्वारा मोमबत्ती को बुझाना किस बात का प्रतीक है? क्या कोई इलेक्ट्रानिक उपकरण  पत्नी से अधिक सुंदर और अधिक उपयोगी हो सकता है?’’

बाजार द्वारा लोक के आर्थिक उत्पादन के साधनों को, उनके पारंपरिक व्यवसायों - गृह और कुटीर उद्योगों को, पहले ही नष्ट किया जा चुका है। उनकी निगाहें अब कृषि पर टिकी हुई हैं। कुछ साल पहले की बात है। गाँव के पानठेले पर एक दिन कुछ पढ़े-लिखे युवक चर्चा कर रहे थे। एक युवक कह रहा था - ’’कंपनीवाले आजकल किसानों के लिए अच्छी-अच्छी योजनाएँ लेकर आ रहे हैं। एक बड़ी कंपनीवाले का कहना है कि गाँव के सारे किसान अपनी जमीनें 40 साल के लिए पट्टे पर हमें दे दें। पट्टे के लिए तय राशि प्रतिवर्ष किसानों के खाते में जमा कर दी जायेगी। 40 साल के बाद कंपनी किसानों को उनकी जमीनें वापिस कर देगी।’’ उस युवक के अनुसार गाँव के सारे किसानों को कंपनी की इस योजना को स्वीकार कर लेना चाहिए।
मैंने उस युवक से कुछ सवाल पूछे जो इस प्रकार हैं -

1. कंपनी की ईमानदारी पर कोई शंका न करते हुए मान लेते हैं कि 40 साल तक वह नियमित रूप से तयशुदा राशि का भुगतान करती रहेगी। यह भी मान लेते हैं कि 40 साल बाद हमारी जमीनें हमें वापिस मिल जायेंगी। तब क्या वह जमीन इतनी ही उपजाऊ और खेती करने लायक रहेंगी? ये उद्योगपति हैं। इनका उद्देश्य अन्न पैदा करना नहीं बल्कि धन कमाना है। अधिक धन-लाभ के लिए ये जल और जमीन का निर्ममतापूर्वक दोहन करेंगे।

2. 40 साल बाद जमीनें वापिस लेने के लिए क्या हम लोग जीवित बचे रहेंगे? अगर बचे भी रहे तो आगे खेती करने के लिए न तो हमारे पास बीज होंगे, न कृषि उपकरण और न ही हमारे पास खेती करने की क्षमता-दक्षता और जानकारी ही बची रहेगी और न ही खेतों के प्रति हमारी आस्था और लगाव।

3. 40 साल की इस अवधि में हम अपनी आजीविका के लिए कौन-सा काम करेंगे? हमें तो खेती के अलावा कुछ आता भी नहीं?

4. हमारे बच्चे हमारे साथ खेतों में काम करके खेती के काम को और कृषिसंस्कृति को स्वभावतः सीखते हैं। 40 साल की अवधि में हमारे बच्चे खेती के तौर तरीकों से और कृषिसंस्कृति से पूर्णतः वंचित हो जायेंगे। हमारे गाँव की, और हमारी यह संस्कृति एक ही झटके में मिट जायेगी। हम और हमारे बच्चे पूर्णतः दिहाड़ी मजदूर बनकर रह जायेंगे। पूर्णतः संभव है कि मजदूरी की तलाश में हम अपने परिवार के साथ इस गाँव से पलायन कर जायेंगे। अपनी जड़ों से कट जायेंगे।

5. कंपनीवाले अपने साथ अपने कर्मचारी लेकर आयेंगे। ये विभिन्न प्रांतों के होंगे। इससे गाँव का वातावरण पूरी तरह से बदल जायेगा। इस बदलाव में सब कुछ अच्छा ही होगा, ऐसा संभव नहीं लगता।

गनीमत है, अब तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है। पर इस घटना से आज के युवाओं की मानसिकता को समझा जा सकता है। ये अच्छी तरह जानते हैं कि हमारी पारंपरिक खेती आज या तो घाटे का काम है अथवा कठोर श्रम के बाद भी इससे इतना भी लाभ नहीं होता जिससे किसान अपने पारिवारिक दायित्वों को निभा सके।

मानसून की दया पर आश्रित किसान लाभ के बारे में सोंचे भी तो कैसे? कृषि को लाभदायक बनाने के लिए पहली आवश्यकता सिंचाई-संसाधनों की है और ये हमारे पास पर्यात मात्रा में नहीं हैं। जो हैं, वे कारखानों, नगरों, और श्हरों की प्यास बुझाने के लिए आरक्षित कर लिये जाते हैं। यदि किसानों को मानसून की निभर्रता से मुक्ति मिल जाये तो कृषि के नये तकनीकों को अपनाने में उन्हें भला परहेज क्यों होगा; तब कृषक परिवारों से जुड़े शिक्षित बेरोजगार भी कृषि की ओर आकर्षित होंगे ही। परन्तु आजादी के बाद सिंचाई-संसाधन उपलब्ध कराने के तमाम सरकारी प्रयास धोखा ही साबित हुए हैं।

अनेक अवसरों पर महसूस होता है कि सरकार को किसानों की की तुलना में बाजार की चिंता अधिक होती है। शायद बाजार को यह मंजूर नहीं है। बाजार की मंशा शायद यही है कि किसानों के लिए कृषि कभी भी लाभदायक न हो और वे मजबूर होकर अपनी जमीनें उनके हवाले कर दे। देश भर में कर्ज के बोझ से दबे किसान लगातार आत्महत्या कर रहे हैं। सरकार आत्महत्या करनेवाले इन किसानों का उपहास उड़ती है और मुआवजे के नाम पर कुछ धन बतौर भीख इनके परिवारवालों के सामने फेंक आती है। इस समाचार को पढ़कर आप भी मेरी बातों से इन्कार नहीं कर सकेगे -

(नई दुनिया, रायपुर, दिनांक 02 दिसंबर 2015 पृष्ठ 05 में ’’आत्महत्या करने वाले अधिकांश किसान सरकार की नजर में शराबी व झगड़ालू’’ शीर्षक से खबर छपी है। और यहीं पर बाक्स में 12 सितंबर 2015 से 28 नवंबर 2015 के बीच छत्तीसगढ़ में आत्महत्या करने वाले 10 किसानों की सूची भी दिया गया है जो इस प्रकार है -)

1. 12 सितंबर 2015: छुरिया बलाक (जिला - राजनांदगांव) के बादराटोला में किसान उदेराम चंद्रवंशी ने घर में फांसी लगा ली थी।

2. 30 अक्टूबर 2015: छुरिया बलाक (जिला - राजनांदगांव) के किरगाहाटोला में किसान ईश्वर लाल ने अपने खेत में ही फांसी लगा ली थी।

3. 30 अक्टूबर 2015: बालोद के दर्री ग्राम निवासी  किसान रेखू राम साहू ने रात में खुदकुशी कर ली।

4. 15 नवंबर 2015: डोंगरगांव बलाक (जिला - राजनांदगांव) के ग्राम संबंलपुर में किसान हिम्मत लाल साहू ने फांसी लगा ली थी।

5. 16 नवंबर 2015: धमतरी जालमपुर निवासी जुगेश्वर साहू (45 वर्ष) ने कीटनाशक पी लिया।

6. 17 नवंबर 2015: गुरूर ब्लाक के गांव घोघोपुरी के  57 साल के हरबन उर्फ हरधर नायक ने भी कीटनाशक पीकर जान दे दी।

7. 18 नवंबर 2015: डोंगरगढ़ (जिला - राजनांदगांव) के ग्राम ग्राम पंचायत पीटेपानी के आश्रित ग्राम बांसपहाड़ के किसान पूनम उइके ने जहर खाकर आत्महत्या कर ली थी।

8. 27 नवंबर 2015: धमतरी जिले के खपरी निवासी किसान राधेश्याम साहू ने जहर सेवन कर आत्महत्या की।

9. 27 नवंबर 2015: डोंगरगांव बलाक (जिला - राजनांदगांव) के ग्राम संबंलपुर के किसान रामखिलावन साहू ने फांसी लगा ली।

10.  28 नवंबर 2015: बालोद जिला के गुंडरदेही विकासखंड अंतर्गगत ग्राम भांठागांव के किसान डोमेश्वर ने की आत्महत्या।

11. और अब आज समाचार छपा है कि 01 दिसंबर 2015 को बालोद जिला के ग्राम भोयनापार लाटाबोड़ निवासी किसान व्यास नारायण टंडन (50 साल) की आत्महत्या से मृत्यु हुई है। व्यास नारायण टंडन ने 24 नवंबर 2015 को जहर सेवनकर आत्महत्या का प्रयास किया था जिसका घमतरी के एक अस्पताल में उपचार चल रहा था।
(आज की स्थ्तिि में शायद यह आँकड़ा लगभग डेढ़ दर्जन की संख्या को छू चुका होगा। छत्तीसगढ़ के राजनांदगाँव, बालोद और धमतरी मात्र तीन जिलों में ही लगभग एक दर्जन किसान आत्महत्या कर चुके हैं, परन्तु न तो यह राष्ट्रीय स्तर का समाचार बन पाया है और न ही राष्ट्रीय चैनल्स इन समाचारों को प्रसारण योग्य ही समझती हैं। किसानों, मजदूरों और आदिवासियों की राष्ट्रीय उपेक्षा का इससे अच्छा उदाहरण और कहाँ मिलेगा?)

इल्युमिनाटी
(आज के बाजार का संवेदनहीन और क्रूरतम रूप)
आलेख के बीच में ग्रुप आफ इल्युमिनाती का जिक्र किया गया है। वर्तमान संदर्भ में इसे बाजार की अदृश्य परन्तु सर्वशक्तिमान, संवेदनहीन और क्रूरतम रूप में परिकल्पित किया जा सकता है। इस संबंध में इंटरनेट से प्राप्त कुछ जानकारी इस प्रकार है -

इल्युमिनटी या इलूमिनाती एक ऐसा नाम (समूह) है जो कई समूहों - ऐतिहासिक और आधुनिक दोनों तथा वास्तविक और काल्पनिक दोनों को संदर्भित करता है। ऐतिहासिक तौर पर, यह विशेष रूप से बवारियन इलूमिनाती को संदर्भित करता हैं, जिसकी स्थापना इंगोलस्ताद (बवारिया) में, 1 मई 1776 को ऐडम वाइसहाउप्त (Adam Weishaupt] 1748-1830) द्वारा की गई थी। ऐडम वाइसहाउप्त इंगोलस्ताद विश्वविद्यालय में कलीसाई कानून के पहले साझे प्रोफेसर थे। यह एक प्रबुद्धता-युग गुप्त समिति थी जिसका उद्देश्य था राजनीतिक शक्ति प्राप्त करना तथा एक नई विश्व व्यवस्था की स्थापना करना। ( in order to gain political power and influence and to establish a new world order)

उस समय के लेखकों, जैसे - सेठ पेसन, का मानना था कि, आंदोलन यूरोपीय राज्यों की सरकारों को घुसपैठ और उखाड़ फेंकने की साजिश दर्शाता था। कुछ लेखकों, जैसे ऑगस्टिन बारुएल और जॉन रॉबिंसन, ने यहां तक दावा किया कि इलूमिनाती फ्रांसीसी क्रांति के पीछे थे।

इस समूह के अनुयायियों को ’इलूमिनाती’ नाम दिया गया, हालांकि वे खुद को ’पर्फेक्टेबिलिस्ट्स’ बुलाते थे। समूह को इलूमिनाती ऑर्डर और बवारियन इलूमिनाती भी कहा गया है और स्वयं आन्दोलन को इलूमिनाटिज्म (इलूमिनिज्म के बाद) के नाम से निर्दिष्ट किया गया है। 1777 में, कार्ल थियोडोर बवारिया का शासक बन गया। वह प्रबुद्ध तानाशाही का समर्थक था और 1784 में उसकी सरकार ने इलूमिनाती सहित सभी गुप्त समाजों पर प्रतिबंध लगा दिया।

आधुनिक समय में यह एक कथित षड़यंत्रपूर्ण संगठन के संदर्भ में उल्लिखित किया जाता है, जो ’सिंहासन के पीछे एक अस्पष्ट शक्ति’ के रूप में कार्य करता है, यह समूह कथित रूप से वर्तमान सरकारों और निगमों के माध्यम से दुनिया के मामलों को नियंत्रित करता है तथा आमतौर पर स्वयं को बवारियन इलूमिनाती के एक आधुनिक अवतार के रूप में प्रस्तुत करता है। इस प्रकरण में, इलूमिनाती अक्सर एक नई विश्व व्यवस्था के संदर्भ में प्रयोग किया जाता है। कई साजिश सिद्धांतकारों का मानना है कि इलूमिनाती उन घटनाओं के पीछे के योजना बनाने वाले व्यक्ति हैं जो नई विश्व व्यवस्था की स्थापना को बढ़ावा देंगे.

आधुनिक इलूमिनाटी
लेखक - जैसे मार्क डाइस, डेविड इके, रयान बर्क, जूरी लीना और मोर्गन ग्रीसर, का कहना है कि बवारियन इलूमिनाती संभवतः इस दिन तक जीवित है। इनमें से कई सिद्धांत प्रस्तावित करते हैं कि दुनिया की तमाम बड़ी घटनाएं खुद को इलूमिनाती कहने वाली एक गुप्त समिति के द्वारा नियंत्रित और धूर्तता पूर्वक प्रबंधित की जा रही हैं। साजिश सिद्धांतकारों ने दावा किया है कि विंस्टन चर्चिल, बुश परिवार, रॉथ्सचाइल्ड परिवार, डेविड रॉकफेलर और ज्बिगनियेफ ब्रेजिंस्की सहित कई प्रमुख लोग इलूमिनाती के सदस्य थे या हैं। ये सभी विश्व के प्रमुख पूंजीपति तथा सर्वाधिक धनी व्यक्ति हैं। आज कई अस्पष्ट और गुप्त संगठन के अलावा, कई आधुनिक भ्रांत्रिक समूह बवारियन इलूमिनाती के ’वारिस’ होने का दावा करते हैं।

बाजार: सर्वशक्तिमान
इल्युमिनाती के रूप में बाजार आज दुनिया का बेताज बादशाह बन चुका है। इनकी शक्तियों को चुनौती देने की क्षमता आज किसी के पास नहीं है। दुनिया की महाशक्तियाँ स्वयं इन्हीं से निर्देशित और शासित होती हैं। एक बहुप्रचलित उक्ति है कि - ’’अमेरिका का राष्ट्रपति वहाँ के बहुराष्ट्रीय कंपनियों का सी. ई. ओ. होता है।’’ आज दुनिया का हर राष्ट्राध्यक्ष बाजार द्वारा उपलब्ध धन की बदौलत चुनाव जीतकर सत्ता तक पहुँचता है, बाजार के विरुद्ध भला वे कैसे जा सकते हैं? बाजार के सामनेे सरकारें और प्रजातंत्र का चौेथा स्तंभ किस हद तक विवश हैं इसका अंदाजा इस खबर को पढ़कर लगाया जा सकता है। यह समाचार इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि शायद इस अखबार के अलावा और किसी अखबार में अथवा टी. वी. चैनल में प्रकाशित-प्रसारित नहीं हुआ है और वह भी केवल एक दिन -

’’दैनिक नई दुनिया 02 नवंबर 2015
रघुनाथ साहू, भटगांव। ग्राम पंचायत सलौनीकला क्षेत्र में स्थित गोंड आदिवासियों की बस्ती शबरीयाडेरा में सोमवार को देसी व अंग्रेजी शराब ठेकेदार मनोज कुमार सिंह के लठैतों ने आबकारी व पुलिस के साथ मिलकर अवैध शराब पकड़ने के नाम पर जमकर कोहराम मचाया।

आरोप है कि लठैतों ने शराब की जांच के नाम पर आदिवासियों के घरों में घुसकर तोड़फोड़ व लूटपाट की और जाते-जाते दो युवकों को अपने वाहनों से कुचल दिया। एक युवक की मौके पर ही मौत हो गई जबकि गंभीर रूप से घायल एक अन्य आदिवासी युवक को बिलाईगढ़ के अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

आदिवासियों ने शराब ठेकेदार के लठैतों, पुलिस व आबकारी विभाग के कर्मियों पर हत्या, लूटपाट और मारपीट का आरोप लगाया है जबकि पुलिस व आबकारी विभाग का कहना है कि युवकों को जानबूझकर वाहनों से नहीं कुचला गया, जो हुआ वह महज हादसा था। मामले में काफी हुज्जत के बाद पुलिस ने अज्ञात वाहन चालक के विरूद्ध भादवि की धारा 147, 148, 323, 452, 304 (क) के तहत मामला दर्ज किया है लेकिन फिलहाल किसी की गिरफ्तारी नहीं की गई है।

सलौनीकला इलाके में राधास्वामी सत्संग व्यास स्थल गदहाभाटा के पास गोंड आदिवासियों की बसाहट है जिसे शबरीयाडेरा कहा जाता है। सोमवार दोपहर कसडोल के आबकारी सब इंस्पेक्टर रविशंकर साय व प्रशांत खांडे के साथ आबकारी आरक्षक फागूराम टंडन, संतराम मिंज व पुलिस के आरक्षक रूपेश चंद्रवंशी, भारत भूषण बनर्जी के साथ भटगांव शराब दुकान के मैनेजर शर्मा और उनके साथ भटगांव तथा कसडोल इलाके से आए शराब ठेकेदार के साठ सत्तर लठैतों ने शबरीयाडेरा में धावा बोला।

ये सभी यहां आदिवासियों के घरों में कच्ची शराब की जांच करने पहुंचे थे। आदिवासियों ने बताया कि ये लोग सात गाड़ियों में सवार होकर पहुंचे थे और आते ही लोगों के घरों में घुस-घुसकर तलाशी लेना शुरू कर दिया। जिन घरों में ताले लगे थे उनमें ताला तोड़कर तलाशी ली गई।

घरों में जो भी मिला उससे बेरहमी से मारपीट की गई। लठैतों ने घरों में रखे ड्रमों, घड़ों को फोड़ दिया। आरोप लगाया गया है कि उन्होंने घरों में मौजूद नगदी और सोने चांदी के जेवरों को लूट लिया तथा विरोध करने पर जान से मारने की धमकी दी।

मंगलवार को जब नईदुनिया की टीम मौके पर पहुंची तो गांव में दहशत का माहौल था। शराब ठेकेदार के लठैतों का कहर झेलने वाले पंडाराम, रामाधार, मनीराम, लालजी, कृष्णा, गुड्डू, राजेंद्र, कमला बाई आदि ने बताया कि लठैतों ने गांव के हर घर में तलाशी ली और लोगों से मारपीट व लूटपाट की हालांकि किसी भी घर में शराब नहीं मिली। सात गाड़ियों में आबकारी पुलिस, थाना पुलिस के साथ शराब ठेकेदार गुंडे छापा मारने पहुंचे थे। ग्रामीणों ने बताया कि जाते वक्त उन्होंने अपने घर में सो रहे मिथुन गोंड को जबरन गाड़ी में बिठा लिया और लेकर जाने लगे।

गांव से कुछ दूर जाने के बाद गदहाभाटा मार्ग पर मिथुन गाड़ी से कूद गया या शायद उसे धक्का दिया गया। नीचे गिरने के बाद वह मदद के लिए गांव वालों को पुकारने लगा। तभी गाड़ी वापस मुड़ी और मिथुन को रौंदती हुई निकल गई। इस संबंध में मनोज प्रजापति, इंचार्ज, भटगांव पुलिस चैकी का कहना है कि शराब ठेकेदार के लठैत अगर पुलिस व आबकारी की टीम के साथ गए थे तो यह गलत है।

किस ड्रायवर ने दुर्घटना की है यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है। वहीं सहदेव सिंह सिदार, अध्यक्ष आदिवासी समाज ने कहा शराब भठ्ठी के कोचियों व लठैतों पर शिकायत के बाद भी कार्रवाई नहीं होती जबकि गरीब आदिवासी अगर शादी व अन्य आयोजनों के लिए भी शराब बनाते हैं तो उनपर इस तरह की कार्रवाई की जाती है। मिथुन के हत्यारों पर कार्रवाई नहीं की गई तो समाज उग्र आंदोलन को बाध्य होगा।’’

लोग आज पुलिस और कानून से अधिक शराब माफियाओं के लठैतों से डरते हैं। इल्युमिनती के ये स्थानीय चेहरे हैं। इल्युमिनाती आज इतने ताकतवर हैं कि उनके हितों को नुकसान पहुँचाने की बात तो कोई भी सरकार हो, सोच ही नहीं सकती। इनकी उपेक्षा करने वाली सरकार सत्ता में रह नहीं सकती। इनका विरोध करने वाला राष्ट्राध्यक्ष रहस्यमय तरीके से मार दिया जाता है। लोगों का मानना है कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जाॅन एफ. केनेडी की हत्या में इल्युमिनाटियों का ही हाथ है। हत्या के सात दिन पहले उन्होंने क्या कहा था, पढ़िए -

बाजार पर इल्युमिनाटियों का ही कब्जा है और इनको अलग करके नहीं देखा जा सकता। इनका एक ही उद्देश्य है - अकूत धन अर्जित करना और इसके बल पर दुनिया को शासित करना। युद्ध में प्रयुक्त होने वाले सामग्रियों का व्यवसाय ही सर्वाधिक धन पैदा करनेवाला व्यवसाय है। इनकी खपत होती रहे इसके लिए जरूरी है - दुनिया युद्ध, आतंक और हिंसा से कभी मुक्त न हो।
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6  - लोककला मंचों के सांस्कृतिक अवदान

छत्तीसगढ़ी लोकसाहित्य को छत्तीसगढ़ के जन-जन तक पहुँचानेवाले, इसे जनजागृति तथा समाज-सुधार के लिए साधन के रूप मेें प्रयुक्त करनेवाले; इसे देश और देश की सीमा के बाहर प्रतिष्ठित करनेवाले छत्तीसगढ़ के यशस्वी सपूतों की; जिनमें लोकगायक, लोककलाकार, लोकसंगीतकार, साहित्यकार सभी शामिल हैं, लंबी परंपरा रही है। परंतु लोकनाट्य नाचा और लोककला मंचों की आभामय आकाशगंगा पर ध्यान केन्द्रित करते ही कुछ सितारे हमारी आँखों के सामने अनायास चमकने लगते हैं। अपने-अपने क्षेत्र में अपनी अप्रतिम प्रतिभाओं के द्वारा आजीवन सतत् साधना में लीन रहनेवाले कलासाधकों में - मदराजी दाऊ, मदन निषाद, गोविन्द निर्मलकर, दाऊ रामचंद्र देशमुख, दाऊ महासिंह चंद्राकर आदि, और इनकी कला परंपराओं को जीवित रखनेवाले खुमान साव, लक्ष्मण मस्तूरिहा, जैसे शीर्षस्थ विभूतियों के अवदानों को विस्मृत कर पाना संभव नहीं है। साकेत स्मारिका के इस अंक में नाचा तथा चंदैनी गोंदा व अन्य लोककला मंचों के सांस्कृतिक अवदानों पर चर्चा किया गया है। लोकसंस्कृति का स्वरूप विराट है; लोक की परंपराएँ, उसके आचार-विचार, उसका जीवन-दर्शन एवं उसकी लोककलाएँ, सब कुछ इसमें समाहित हैं। साहित्य भी इसमें समाहित है। इस अंक में लोककला मंचों के साहित्यिक अवदानों पर भी विचार किया गया है।

बापू ने कहा है - लोक निरक्षर हो सकता है परंतु अज्ञानी और मूर्ख नहीं। लोक का ज्ञान उनकी परंपराओं और अनुभवों से अर्जित ज्ञान है। लोक के इसी ज्ञान पर उत्पादन के तमाम साधन आश्रित हैं जो समाज की सभ्यता और विकास के मूल कारक हैं। लोक के इसी ज्ञान के सत्व से समस्त लोककलाएँ पुष्पित और पल्लवित हुई हैं। इसके बावजूद लोक के इस विराट और उत्पादक ज्ञान को सदैव दोयम दर्जे का साबित करने का और अनुत्पादक और कल्पित शास्त्रीय ज्ञान को धर्म और अध्यात्म का आवरण चढ़ाकर इसे लोकज्ञान पर वरीयता दिये जाने का कुत्सित प्रयास होता रहा है। इस तरह लोकज्ञान को हीन और दोयम दर्जे का साबितकर लोकमानस में हीनता का बीजारोपण किया गया जिससे उनका हर प्रकार से शोषण किया जा सके। लोक इसे भी अच्छी तरह समझता है और अपने ढंग से इसका प्रतिकार भी करता रहा है। लोक प्रतिकार के इस रूप को हम उसके विभिन्न कलामाध्यमों में देख सकते हैं। छत्तीसगढ में लोकनाट्य नाचा की परंपरा इसी प्रतिकार का प्रस्तुतिकरण है। छत्तीसगढ में लोकनाट्य नाचा की परंपरा पुरानी है जिसने खड़े साज की, अपने परंपरिक परिधान और स्वरूप को परिष्कृतकर, अपने नवीन और आधुनिक रूप में आज भी पूरे दमखम के साथ लोकजीवन में कायम है। इसकी तुलना में, छत्तीसगढ़ की लोककलाओं के माध्यम से छत्तीसगढ़ी लोकमानस को झंकृत और उद्वेलित करने का विराट उद्देश्य लेकर चलनेवाले छत्तीसगढ़ी लोककला मंचों का स्वरूप नवीन है।

7 नवंबर 1970 को दुर्ग जिले के बघेरा ग्राम में लोककला मर्मज्ञ दाऊ रामचंन्द्र देशमुख ने अपनी उत्कट कल्पनाशीलता और नवीन रचनात्मक प्रतिभा के द्वारा छत्तीसगढ़ के प्रथम लोककला मंच ’चंदैनी गोंदा’ को स्थापित किया। छत्तीसगढ़ी लोककला के इस सर्वथा नवीन और मौलिक रूप का यहाँ की जनता ने अभूतपूर्व उत्साह के साथ स्वागत किया और इसे अपने सिर-आँखों पर बिठाया। ’चंदैनी गोंदा’ के प्रति लोक की इसी अभूतपूर्व उत्साह का परिणाम था कि रातों-रात यह मंच लोकमानस पर छा गया। जल्द ही ’चंदैनी गोंदा’ की व्यापक प्रसिद्धि से प्रेरित होकर छत्तीसगढ़ के विभिन्न अंचलों में छोटे-बड़े अन्यान्य लोककला मंचों की स्थापना और प्रदर्शन का दौर प्रारंभ हो गया और इस तरह छत्तीसगढ़ी लोककला मंचों ने छत्तीसगढ़ी लोकसाहित्य को नये कलेवर के साथ समाज के समक्ष प्रस्तुत किया।

चंदैनी गोंदा के इस विराट लोकप्रियता के मूल में चंदैनी गोंदा के यशस्वी संगीतकार खुमान साव की अद्भुत् कल्पनाशीलता का अप्रतिम योगदान रहा है। श्री साव ने छत्तीसगढ़ी लोकगीतों की मौलिकता को अक्षुण्ण बनाये रखते हुए इसे फिल्म संगीत की चासनी में डुबोकर कर्णप्रिय और जन-जन में लोकप्रिय बनाया। तत्कालीन गीतकारों और साहित्यकारों ने इसमें अपनी सहभागिता निभाई। इन गीतकारों और साहित्यकारों ने अपने गीतों में छत्तीसगढ के समस्त श्रमयोगी सपूतों की सदियों से दमित आकांक्षाओं को मूर्त रूप दिया; मूक लोक की अव्यक्त वाणियों को स्वर दिया।

चंदैनीगोंदा की स्थापना और उसके बाद वर्तमान तक इसकी परंपरा को पोषित-पल्लवित करनेवाले छत्तीसगढ़ी लोकसंगीत के जीवित किंवदंती - खुमान लाल साव को, 4 अक्टूबर 2016 को छत्तीसगढ़ी लोक संगीत के क्षेत्र में अप्रतिम योगदान के लिए भारत सरकार की प्रतिष्ठित ’संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2015’ से भारत के महामहिम राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी द्वारा राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक भव्य एवं गरिमामय समारोह में सम्मानित किया गया है। श्री खुमान साव का साकेत साहित्य परिषद् के प्रति भी विशेष लगाव रहा है। उनका स्नेह और सान्निध्य सतत रूप से परिषद् को मिलता रहा है। परिषद् के गत वार्षिक आयोजन में ही साकेत स्मारिका के इस अंक को श्री साव के व्यक्तित्व और उनके सांस्कृतिक अवदानों पर केन्द्रित करने का निर्णय लिया गया था। श्री साव का व्यक्तित्व विराट है। लोक संगीत के क्षेत्र में उनका अवदान भी विराट है। उनके अवदानों का सम्यक मूल्यांकन करने के लिए गहन शोध की आवश्यकता होगी। इस संबंध में हमारा प्रयास अत्यन्त सीमित रहा है। श्री खुमान साव के व्यक्तित्व और कृतित्व के संबंध में जो भी सामग्रियाँ हमें मिली उसे भी हमने इस अंक में समेटने का प्रयास किया है।
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7  -  छत्तीसगढ़ी लोकसंगीत के महान् साधक: खुमान साव 

खुमान साव के संबंध में श्री विमल पाठक लिखते हैं - ’’यदि साव जी छत्तीसगढ़ी के संगीत निर्देशक न होकर फिल्मी दुनिया के संगीतकार हुए होते तो नौशाद ही होते, यदि जादूगर होने का सौभाग्य इन्हें मिलता तो निश्चय ही पी. सी. सरकार ही होते और अगर कवि होने का मौका पाते तो निश्चय ही नीरज होते; कहने का तात्पर्य यह कि जिस क्षेत्र में वे होते, सर्वश्रेष्ठ ही होते।’’ (छत्तीसगढ़ी लोक-संगीत के महान् सर्जक, छत्तीसगढ़ के रत्न ... श्री खुमान साव, से साभार)

भारतवर्ष में नदियों को माँ कहा जाता है। ब्रह्मपुत्र को छोड़कर यहाँ सभी नदियों के नाम स्त्रीलिंग-बोधक हैं। ब्रह्मपुत्र की तरह छत्तीासगढ़ में भी एक नदी है - शिवनाथ। शिवनाथ महानदी की प्रमुख सहायक नदी है। महानदी में मिलने से पहले यह राजनांदगाँव, दुर्ग, बिलासपुर और जांजगीर-चांपा जिले के एक बड़े भू-भाग को ऊवर्रा बनाता जाता है। अं. चैकी, राजनांदगाँव, दुर्ग-भिलाई, तथा धमधा इसी के तट पर बसे हुए हैं। संस्कारधानी के नाम से विख्यात राजनांदगाँव के दक्षिण-पश्चिम में लगभग दस किलोमीटर की दूरी पर इसी नदी के तट पर एक गाँव बसा है - जंगलेशर। जमींदारी प्रथा के जमाने में इसी गाँव में सिद्धनाथ साव नामक गौंटिया हुए थे। राजनांदगाँव रियासत के राजा बलराम दास के साथ सिद्धनाथ साव के मधुर और आत्मीय संबंध थे। सिद्धनाथ साव की दो पुत्रियाँ थी - बड़ी रेवती और छोटी कमला। रियासत के काम से जब भी वे राजनांदगाँव जाते, कमला को साथ ले जाना नहीं भूलते। राजा बलराम दास निःसंतान थे और संभवतः संतान-सुख की चाह में नन्हीं कमला को वे अपनी गोद में लेकर बैठते, उनसे खेलते, बतियाते। और इस तरह कमला का बचपन जमींदारी और रियासत के वैभवपूर्ण माहौल के संस्कारों से संस्कारित होता रहा। इस बालिका की अवस्था जब माँ-बाप की गोद में समाने लायक नहीं रही, इनका विवाह डोंगरगाँव से सात किलोमीटर दूर ग्राम खुर्सीटिकुल के जमीदार कन्हैया लाल साव जिन्हें लोग सम्मानपूर्वक बड़े गौंटिया के नाम से संबोधित करते थे; के सुपुत्र टीकम नाथ साव से कर दिया गया। टीकम नाथ साव को लोग टिकइत गौंटिया के नाम से जानते थे। अपनी नफासतपूर्ण जीवनशैली के कारण ये चिकनू दाऊ के नाम से अधिक विख्यात हुए। यहाँ कमला ने तीन यशस्वी पुत्रों और पाँच पुत्रियों को जन्म दिया। आज समूचे छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढी लोकसंगीत के क्षेत्र में जीते-जी किंवदंती बन चुके खुमान साव इन्हीं आठ संतानों में से पाँचवीं संतान हैं।

खुमान साव का जन्म 5 सितंबार 1929 को हुआ था। अपने जन्मतिथि के संबंध में खुमान साव कहते हैं - ’’जब मंय ह स्कूल जाय के लाइक होयेंव, मोर पिताजी ह रामचरण कोतवाल ल बुला के किहिस, ’अरे कोतवाल! तंय ये लइका ल धर के स्कूल जा, येकर नाम ल लिखवा देबे। बड़े गुरूजी ह जनम तारीख पूछही तब सन उन्नीस सौ उन्तीस बता देबे।.........अउ सुन, येला रेंगावत झन लेग, खांद म बइठार ले।’
कोतवाल ह मोला अपन खांद म बइठार के स्कूल लेगिस। मोर नाम ल लिखवाइस। लहुटेन तब पिताजी हा कोतवाल ल पूछिस - ’जनम तारीख ल बने लिखायेस कि नहीं?’
कोतवाल ह किहिस - ’तंय ह बताय रेहेस वइसनेच् लिखवाय हंव मालिक।’
’का?’
’तीस।’
’मंय ह तो उनतीस केहे रेहेंव रे।’
कोतवाल ह चेथी डहर ल खजवाय लगिस, किहिस - ’उन ह भुलागिस।’
पिताजी ह किहिस - ’ले, कुछू नइ होय। हमला कोनों सरकारी नउकरी थोड़े करवाना हे।’
ये तरीका ले, कोतवाल ह उनतीस के उन ल भुला गिस अउ मोर जनम तारीख ह उनतीस ले तीस हो गे।’’

भाइयों में अपना क्रम बताने का भी खुमान साव का अपना ही तरीका है, वे कहते हैं - ’’हमर ममा गाँव हरे जंगलेशर। माँ मन दू बहिनी होवंय। दुलार सिंह साव! जानथस न? मदराजी दाऊ? वो ह बड़े बहिनी के बड़े बेटा; अउ मंय ह छोटे बहिनी के छोटे बेटा।’’

संक्षिप्त परन्तु किसी काव्यात्मक-पहेली के समान इस विवरण पर गौर कीजिए। कितनी सारी जानकारियाँ समायी हुई है इसमें? वाह! इसे कहते हैं - गागर में सागर भरना। दोनों बड़े भाई उम्र के हिसाब से खुमान साव से काफी बड़े थे। खुमान साव का आकर्षक और प्रभावशाली व्यक्तित्व हम सब के सामने है। माँ कमला ने जमींदारी और रियासत के वैभवपूर्ण माहौल से जो संस्कार अर्जित किया था शायद वही संस्कार होंगे, जो विरासत के रूप में इन्हें मिला है। शेष दोनों भाइयों का व्यक्तित्व भी इन्हीं के समान ही था। मंझले भाई का नाम था, कामता प्रसाद साव, जिन्हें आज भी हम, श्रद्धा और सम्मान के साथ, के. पी. साव सर के नाम से स्मरण करते हैं। गणित विषय के विद्वान शिक्षक तथा मयुनिसिपल स्कूल के प्राचार्य होने के नाते एक कुशल प्रशासक के रूप में उनकी छवि यहाँ के लोगों के दिलो-दिमाग में आज भी रची-बसी है। बड़े भाई का नाम चन्द्रशेखर साव था। आमतौर पर वे रणछोर दाऊ के नाम से जाने जाते थे। इनका चेहरा अशोक कुमार से मिलता था। इन्हें हिन्दी फिल्मों में काम करने का बड़ा शौक था। अपने इस शौक के चलते वे मुंबई पहुँच गये। वहाँ उस समय की सुप्रसिद्ध नायिका लीला चिटनिस के यहाँ उन्होंने चाकरी भी की; परन्तु उनके स्वभाव में मालगुजारी का जो अक्खड़पन और स्वाभिमान के संस्कार थे, उसने उन्हें वहाँ टिकने नहीं दिया और असफल होकर वे लौट आये। बाद में कुछ ऐसा ही शौक खुमान साव को भी हुआ। फिल्मी दुनिया में संगीतकार बनने के लिए ये भी, बड़े भाई के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए मुंबई जा पहुँचे, और उन्हीं के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए, उसी तरह लौट भी आये। बाद में राजनांदगाँव में उन्होंने ’खुमान एण्ड आर्केस्ट्रा’ नाम से आर्केस्ट्रा बनाया। राजनांदगाँव के इतिहास में यह पहला आर्केस्ट्रा था। संगीत के प्रति लगाव और दीवानगी की अपनी कहानी खुमान साव कुछ इस तरह बयाँ करते हैं -

’’हमर घर म एक ठन हारमोनियम रिहिस हे, पिताजी हा येला कलकत्ता ले खरीद के लाने रिहिस। येकरो एक ठन कहानी हे। वो समय इहाँ हारमोनियम नइ मिलय। हमर पिताजी, मंदराजी, अउ हमर ममा (जंगलेशर वाले वीरेन्द्र साव के दादा जी), तीनों झन गिन कलकत्ता, हारमोनियम खरीदे बर। तीनों झन अपन-अपन बर हारमोनियम खरीदिन। मंदराजी ह गांजा के शौकीन रिहिस हे, कलाकार मन ल कोनों न कोनों नशा घेरेच् रहिथे। उहाँ कोनों दुकान म चोरी-लुका चरस बेचावत रिहिस होही। येमन एक-दू रूपिया के खरीद लिन अउ हारमोनियम म लुका के रख लिन। लहुटती म पुलिस ल पता चल गे। टाटानगर के एक स्टेशन पहिलिच पुलिसवालेमन येमन ल पकड़ लिन। अलकरहा होगे। .... वो समय हमर गाँव के परऊ राम साहू नाम के आदमी उहाँ, कंपनी म काम करय। हमर पिताजी ल वोकरे सुरता आ गिस। पुलिस वाले मन ल बोलबुला के, दुनों झन ल थाना म छोड़ के वो ह विही आदमी तिर गिस। वोला धर के लानिस अउ जमानत कराइस। हफ्ता-दस दिन ले वोमन ल उहाँ रुके बर पड़गे। इही बीच वोमन ल उहाँ एक आदमी के पता मिलिस, जउन ह हारमोनियम सिखाय के काम करय। उहाँ जा के, ये मन हारमोनियम बजाय बर सीख गें। हारमोनियम बजाय बर सीखे के खुशी म येमन ल पुलिस लफड़ा के दुख ह घला भुला गे।’’

खुमान साव ने हारमोनियम बजाना कैसे सीखा और नाचा में वे कैसे आये, इसकी भी एक कहानी है; खुमान साव बताते हैं - ’’एक घांव मातेखेड़ा म मुक्तानंद के भागवत होइस। (मातेखेड़ा गाँव जंगलपुर के आगे पड़ता है। जंलपुर में इनका दुघेरा है।) सब झन सुने बर गिन। मंय ह नइ गेंव। नौकर चाकर मन रांध के खवांय। रात म सकला जांय। कहंय - चल न जी हारमोनियम ल निकाल, गाना गाबोन। वो मन गावंय अउ मंय ह पीं-पां, पीं-पां, करत रहंव। कोनों तो नइ रहंय घर म, काकर डर। तीन-चार दिन म बजाय बर सीख गेंव। बनेच् सीख गेंव नौ-दस दिन म। अब तो रमायन होय तिहां बजाय लगेंव।

विही समय सीताकसा म नाचा होइस, मदराजी मन के। मदराजी ह मोसी घर बइठे बर आय रहय। (मां के साथ खुमान साव भी वहाँ गये हुए थे।) मां ह मदराजी ल किहिस - यहू ह तो पीं-पां बजाथे रे! मदराजी, बजवा न। तोरनकटावाले पंचराम ह गाना गाइस, मंय ह हारमोनियम बजायेंव, पास हो गेंव।

वो समय हमर एक झन कका रिहिस, रामरतन, मटियावाले। वो ह चिकारा के गजब नचकरहिन रिहिस। सात ठन लोटा ल बोहि के नाचे। वइसनेच् एक झन नचकरहिन अउ रिहिस, माटेकसा म राजाराम नाम के। बसंतपुर म तीन झन सियान रिहिन, नाचा के बड़ नामी कलाकार - रामभरोसा अउ सीताराम गम्मत करंय अउ सुखराम ह नचकरहिन के काम करय। खुर्सीटिकुल तीर झिटिया नाम के गाँव हे। उहाँ के मालगुजार सुखूराम दाऊ, तबला बजावय। वो ह अपन गाँव म नाचा कराइस। बसंतपुर के ये तीनों सियान मन पहुँचे रहंय। मोहड़ म जगतराम देवंागन नाव के आदमी रिहिस जउन ह चिकारा बजावय। नाचा के दिन वोकर तबीयत हो गे खराब। मोर घर आ गें। किहिन - हारमोनियम बजाय बर चल। 13-14 साल के उमर रिहिस होही मोर। खांद म हारामोनियम ल अरो के रातभर बजाना रहय। हमर गाँव म नाचा के एक झन शौकीन रहय, सुंदरलाल नाम के। वो ह मोर माँ ल दीदी कहय, किहिस - चल न भांचा, तंय काबर फिकर करथस।

पहुँच गेन झिटिया। मेकप होवत रहय। राजा राम ह सुखू ल पूछिस - तबला ल तो तंय ह बजाबे, चिकारा ल कोन ह बजाही?
सुखूराम हा मोर कोती इशारा कर दिस।
राजाराम ह किहिस - ये! मेचका ह?
मोला गुस्सा आ गे, केहेव - बबा! रात भर तंय ह जउन-जउन गाना ल गाबे तउन ल बता।
वो ह दस-बारा ठन गान गा के बताइस। मंय ह केहेंव, बजा लेहूँ। अउ बजा के बता देंव।
स्टेज म गेन। सुंदर ह हारमोनियम ल गमझा म बांध के मोर खांद म अरो दिस। कोकर गेंव - ’दाई, दाई ....।’ सुंदर ह पीछू डहर खड़े हो के गमछा मन के छोर ल धर के हारमोनियम ल उठा लिस। पूछिस मोला - ’अब बजा सकबे कि नहीं भांचा? ’
मंय केहेंव - ’अइसन म बजा लेहूं।’
रातभर हारमोनियम बजायेंव। बसंतपुर के वो कलाकार मन संग इही ह मोर पहिली अउ आखरी नाचा होइस।’’
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राजनांदगाँव के म्युनिसिपल स्कूल, जहाँ बड़े भाई के. पी. साव शिक्षक थे, वहाँ के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में छात्रों को रिहर्सल करवाने के लिए खुमान साव को अक्सर बुलाया जाता था। बाद में इन्हें यहाँ की पूर्व माध्यमिक शाला में शिक्षक पद पर नियुक्ति दी गई। यहाँ ये ’खुमान सर’ के नाम से प्रसिद्ध हुए और सेवानिव्त्त होते तक कक्षा सातवीं ’अ’ के कक्षा शिक्षक बने रहे; गणित तथा अंग्रेजी जैसे महत्वपूर्ण विषय का अध्यापन करते रहे। बाईं बगल में उपस्थिति पंजी लेकर ठीक सवा सात बजे स्टाफ रूम से निकलने और अपनी कक्षा में प्रवेश करने के दौरान इनका रौबीला व्यक्तित्व और अनुशासन प्रिय शिक्षक सवभाविक रूप से प्रस्तुत हो जाता। 60 और 80 के दशक तक म्यूनिसिपल स्कूल के तीन दिवसीय वार्षिकोत्सव की धुरी खुमान साव ही होते। शहर में यह समारोह लोकप्रियता के चरम तक पहुँच गया। इसी समारोह के माध्यम से खुमान साव ने शहर के अनेक प्रतिभाओं को सामने लाया, उन्हें तराशा, निखारा और जो आज स्थापित कलाकरों की श्रोणी में गिने जाते हैं। कविता वासनिक, प्रकाश देवांगन, मिलिंद साव, राजा बेनर्जी, लता खापर्डे, कृष्ण कुमार सिन्हा, सुदेश यादव और ललित हेड़ऊ आदि के नाम अल्प स्मरण में सामने आते हैं।

अनुशासनप्रिय कक्षाशिक्षक, समय के पाबंद और कुशल प्रबंधक के अद्भुत कौशल से समाहित उनका व्यक्तित्व आज भी एक विराट सांस्कृतिक संस्था के संचालक के तौर पर स्पष्ट उभरता है। अवगत हो, ’चंदैनी गोंदा’ के सभी कलाकार उन्हें ’खुमान सर’ ही संबोधित करते हैं।

अविभाजित मध्य प्रदेश में 14 नवंबर को प्रतिवर्ष राज्य स्तरीय ’बालमेला’ आयोजित होता था। इसमें स्कूल स्तर पर सम्पूर्ण प्रदेश के जिला स्तर पर चयनित छात्र-छात्राओं के सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति होती थी। इस समारोह में म्युनिसिपल स्कूल राजनांदगाँव ने सतत् रूप से प्रथम स्थान प्राप्त कर इतिहास रच दिया। इस इतिहास के लेखक खुमान साव ही हैं। खुमान साव बताते हैं - ’’पहिली हर साल राज्य स्तर के प्रतियोगिता होवय; अब होथे कि नहीं, पता नहीं। 79  से लेकर 88 तक हर प्रतियोगिता म हम प्रथम आय रेहेन।’’ होशंगाबाद, उज्जैन, भोपाल, दुर्ग जैसे स्थनों में आयोजित हुई। इन प्रतियोगिताओं के माध्यम से प्रदेश में छत्तीसगढ़ी लोक संगीत और लोकनृत्यों की धूम मची और छत्तीसगढ़ की सुव्यवस्थित सांस्कृतिक पहचान बनी।

1971 ई. में बघेरा के दाऊ रामचन्द्र देशमुख ने छत्तीसगढ़ के प्रथम परिष्कृत लोकमंच ’’चंदैनी गोंदा’’ की स्थापना की, तब खुमान साव चंदैनी गोंदा में संगीत निर्देशक के रूप में जुड़ गए। चंदैनी गोंदा की प्रसिद्धि में उसके संगीत पक्ष का योगदान किसी से छिपा नहीं है। रामचंद्र देश्मुख के बाद 198र्0 इ. से आज तक खुमान साव चंदैनी गोंदा को गरिमापूर्ण ढंग से संचालित करते आ रहे हैं। खुमान साव के ही मार्गदर्शन में मदराजी के जन्म गाँव रवेली में विगत तेईस सालों से निरंतर, प्रतिवर्ष 01 अप्रेल को मदराजी महोत्सव आयोजित हो रहा है।

छत्तीसगढ़ी लोकसंगीत अथवा चंदैनीगोंदा का नाम आते ही खुमानलाल साव का व्यक्तित्व प्रकाशित होने लगता है। जयंती यादव, कविता हिरकने (अब कविता वासनिक), सुनील तिवारी जैसे लोकगीत और लोककला के साधकों, तथा अन्य अनेकों कलाकारों को मैंने उनके सामने श्रद्धा से शीश झुकाते हुए देखा है। आज की तिथि में ग्राम ठेकवा स्थित उनका आवास इन कलाकारों के लिए किसी तीर्थ से कम नहीं है। लोककलाकार उनका सम्मान करके खुद को धन्य मानते हैं। छत्तीसगढ़ी लोककला-लोकसंगीत को खुमान साव का अवदान तथा खुमान साव की प्रतिभा आज किसी से छिपी नहीं है। छत्तीसगढ़ का कोई भी व्यक्ति इससे अनजान नहीं है।

खुमान साव के संदर्भ में कहें तो 85 वर्ष (2015) की अवस्था में यद्यपि वे आज भी ऊर्जावान बने हुए हैं, कला की आभा उनके मुखमण्डल पर देखी जा सकती है, परन्तु उनके अवदानों के परिप्रेक्ष्य में देखें तो ऊर्जा प्रवाह के संतुलन को बनाये रखने के लिए अब समय आ गया है कि उनके अवदानों के लिए राज्य सरकार भी उनका समुचित सम्मान करे, योग्य अलंकरण से उन्हें अलंकृत करे। खुमान साव उत्कट स्वाभिमानी प्रकृति के इन्सान हैं। किसी सम्मान अथवा अलंकरण के लिए वे अपनी योग्यताओं का विज्ञापन हरगिज नहीं करेंगे। अपने अवदानों के लिए वे कभी भी, किसी भी प्रकार के सम्मान अथवा पुरस्कार की मांग नहीं करेंगे। शासन से अपेक्षा है कि श्री खुमान साव को अलंकृत करने की दिशा में विचार करे।

साकेत साहित्य परिषद् के इस मंच पर खुमान साव के रूप में आज नाचा और लोकसंगीत की एक पूरी परंपरा ही उपस्थित है। साकेत साहित्य परिषद् के रचनाकारों के प्रति उनके हृदय में निश्चित ही वात्सल्य का भाव समाया हुआ है। यह उपस्थिति इसी का सुपरिणाम है, जो हमारे लिए सबसे बड़ा आशीर्वाद है। हम उन्हें शत-शत नमन करते हैं।

(टीप:- यह लेख श्री खुमान साव से साक्षातकार तथा उनके पारिवारिक सूत्रों से उपलब्ध जानकरियों के आधार पर तैयार किया गया है।)      
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8 - पुस्तक समीक्षा - अस्वभाविक कथानकों वाला कहानी संग्रह


पुस्तक का नाम - जेठ की धूप (कहानी संग्रह)
कहानीकार - डाॅ. रामचंद्र यादव
प्रकाशक - वातायन, फ्रेजर रोड, पटना, 800001
पृष्ठ - 96
मूल्य - 100 रू.

’जेठ की धूप’ डाॅ. रामचंद्र यादव की कहानियों का संग्रह है, जिसमें 1986 (सात भर सोना) से लेकर अक्टूबर 2011 (गौरैया) तक की अवधि में लिखी उनकी चैबीस कहानियाँ संग्रहित हैं। पच्चीस वर्ष की इस लंबी अवधि में भी डाॅ. यादव की संग्रहित कहानियों की भाषा व शिल्प में किसी प्रकार का विकास नजर नहीं आता। एक कथाकार के रूप में यह उनकी विफलता है।

संग्रह की कहानियों को स्पष्टतः दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है। पहले वर्ग में उन दो तिहाई कहानियों को रखा जा सकता है जिनमें कहीं न कहीं, चाहे सेवानिवृत्त हो या कार्यरत, एक प्रोफेसर (या शिक्षक) अवश्य उपस्थित है, और जिसकी वजह से ये सभी कहानियाँ किसी एक ही कथानक का विस्तार प्रतीत होती हैं। प्रोफेसर समाज का बौद्धिक वर्ग होता है। किसी भी कहानी में इस वर्ग की उपस्थिति से पाठक एक गंभीर और वैचारिक कथानक की अपेक्षा करता है। ’अपनी रोटी’ कहानी की प्रोफेसर डाॅ. सरोज के अलावा पाठक की इस अपेक्षा को किसी और कहानी का दूसरा प्रोफेसर पूरा नहीं कर पाता। ’अपनी रोटी’ कहानी मंडल कमीशन के रिपोर्ट आने पर महाविद्यालयों में भड़की हिंसा पर आधारित है। कहानी के प्रोफेसरों के बौद्धिक दिवालियेपन की हद तो तब हो जाती है जब ’ढलते सूरज का दर्द’ कहानी के प्रोफेसर कल्पनाथ,, जिसकी प्रसिद्धि एक सुलझे हुए शिक्षक की है,, जिसके दो बड़े पुत्र भी प्रोफेसर हैं,, अपने तीसरे पुत्र कर्मशील की पढ़ाई और अपनी आर्थिक बदहाली को ठीक करने के लिये उसकी शादी किसी समृद्ध परिवार में करना चाहता है जिससे दहेज की रकम से समस्या का हल हो सके। एक सुलझे हुए प्रोफेसर की यह दकियानूसी सोंच अपनी विडंबना स्वयं प्रगट करती है। उनका तर्क देखिये - ’’...  ऊपर से जो चाहो मिलेगा। पैसे की तंगी समाप्त और उसकी पढ़ाई देश में क्या विदेश में भी हो सकती है।’’

संग्रह की अन्य कहानियों के प्रोफेसर भी ऐसे ही हैं।
इसके विपरीत दूसरे वर्ग में उन कहानियों को रखा जा सकता है जिनमें प्रोफेसर अनुपस्थित हैं। इस वर्ग की कहानियाँ अधिक प्रभावशाली और स्वभाविक बन पड़ी हैं। ’अलगू राम’, ’गंगिया बोल उठी’ ’परख’ ’चाक’ और ’मजबूरी की मजदूरी’ इसी वर्ग की कहानियाँ हैं जो बदलते आधुनिक भारतीय समाज के समक्ष आदर्श भी प्रस्तुत करते हैं और उसकी सच्चाई का बयान भी। ये कहानियाँ भारतीय समाज के शोषित और दमित वर्ग द्वारा, अपनी पीड़ा और उत्पीड़न से मुक्ति  के लिये, शोषकों के विरूद्ध उठ खड़े होने की कहानी है, जो किसी हद तक पाठक की बौद्धिक और वैचारिक विषय की मांग को भी पूरा करने में सक्षम हैं।

जिस प्रकार से रस, छंद और अलंकार पद्य की कला पक्ष के लिये आवश्यक हैं उसी प्रकार गद्य का कला पक्ष उसकी भाषा-शैली और संवाद से निखरता है। आलोच्य संग्रह के संवाद (कथोपकथन)   की भाषा न तो पात्रों के अनुकूल हैं और न ही प्रभावोत्पादक। ’जेठ की धूप’ कहानी के आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली छात्रा भारती के इस संवाद को देखिये - ’’सर! मुझे अब तक जानकारी नहीं थी कि शिक्षा पाना इस देश में  इतना कठिन है। मुझे क्या मालूम कि यहाँ दो तरह के स्कूल हैं। एक पैसे वालों के लिये और दूसरे आर्थिक-सामाजिक रूप से कमजोर छात्रों के लिये। आजादी के पहले तो अंग्रेज कहा करते थे भारत वासियों के लिए कि ये उनके बोझ हैं, इन्हें ढोना असंभव है। लेकिन आज भी, जब हम गोरों के पशुवत व्यवहार से मुक्त हैं, हमारे देश में हमें बाबुओं से मुक्ति नहीं मिल पाई। सरकार तो स्कूल काॅलेज चलाती है, खर्च भी धन कुबेेर की तरह करती है, लेकिन परिणाम शून्य के बराबर है। कहने को तो घंटी बजती है, टीचर वर्ग में आते हैं और फिर जाते हैं। सिर्फ खाना पूरी होती है, ऐसे स्कूलों मे सुनती हूँ सिर्फ गरीब के नंगे-भूखे बच्चे ही जाते हैं। शायद इसलिये उनके प्रति शिक्षकों को कोई कर्तव्य बोध नहीं है।’’

’बस्ते का बोझ’ कहानी में आठ साल के आकाश का यह संवाद देखिये -
आकाश ने अपनी बात समेटते हुए दादा को यह कह कर चकित कर दिया - ’’लेकिन आज इस देश में मेरी तरह लाखों-करोड़ों बच्चे हैं जिनके लिए रोटी की समस्या है और वे इन कान्भेन्ट स्कूलों तक किसी भी सूरत में नहीं पहुँच पाते, लेकिन मेरी समझ में मोटी रकम देकर भी इन स्कूलों में सिर्फ बस्ते का बोझ ही ढोना पड़ता है। ये सुविधा संपन्न बच्चे क्या हमारे समाज के काम आयेंगे या अपनी संपन्नता के आतंक से देश-दुनिया में अशांति फैलायेंगे? मुझे तो लगता है झूठे ज्ञान का प्रभाव इन बच्चों को अज्ञानी ही बनायेगा लेकिन मैं तो सही मनुष्य ही बनना चाहता हूँ।’’

इस तरह के संवाद न सिर्फ कहानी के कथानक को अस्वाभाविक बनाते हैं, बल्कि कहानी के शिल्प में कृत्रिमता भी पैदा करते हैं। आठ साल के बच्चे का यह संवाद न सिर्फ दादा जी को बल्कि किसी भी  पाठक को चकित कर सकता है। संग्रह इसी तरह के अस्वभाविक संवादों से भरा पड़ा हैं।

’जेठ की धूप’ कहानी में जेठ के महीने में स्कूल लगना बताया गया है। जहाँ तक मैं समझता हूँ, जेठ में हमारे देश में गर्मी की छुट्टियाँ चल रही होती हैं। आज देश में शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू हो चुका है और बच्चों को किसी भी तरह की सजा देना अपराध की श्रेणी में आता है। भारती को जेठ की धूप में दिन भर खडा रखने वाले शिक्षक को क्या यह पता नहीं है। इन बातों को यदि ध्यान रखा गया होता तो निसंदेह ये कहानियाँ श्रेष्ठ कहानियाँ हैं।

अब संग्रह की कहानियों की भाषा पर ध्यान दीजिये -
’सच्चो की माँ ने धीरे से उनके कान मेें फुसफुसाया।’ (जमानत) कान में क्या कोई जोर से भी फुसफुसाता है?
’अगर घर के बाहर मैं खेत में मजूरी के लिये न निकलूँ तो मेरे घर वाले तो भूखे ही पानी पीकर सो जायेंगे।’ (परख)

खेतों में मजूरी के लिये घर से बाहर तो निकलना ही पड़ेगा न। ’अगर मैं मजूरी के लिये न निकलूँ तो मेरे घर वाले भूखे ही सो जायेंगे।’ इतना लिखना क्या पर्याप्त नहीं होता?
इस तरह के भाषायी दोषों से भी संग्रह भरा पड़़ा है। कथाकार द्वारा इन बातों पर ध्यान नहीं दिया जाना आश्चर्यजनक है।

इन सबके बावजूद संग्रह पठनीय है तथा ’अलगू राम’, ’गंगिया बोल उठी’ ’परख’ ’चाक’ और ’मजबूरी की मजदूरी’ जैसी कहानियाँ पाठक की संवेदना को छूने और जागृत करने मेें सक्षम हैं। पुस्तक की छपाई तो अच्छी है लेकिन बाइंडिंग कमजोर है।
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 9 - प्रतिक्रिया

कृति - मोर ग़ज़ल के उड़त परेवा

(छत्तीसगढ़ी  गजल संग्रह)
शायर - मुकुंद कौशल
प्रकाशक - वैभव प्रकाशन, रायपुर
संस्करण - प्रथम, 2012
मूल्य - रू. 100/-
आध्यात्मिकता से प्रारंभ होकर, समकालीनता का निर्वहन करते हुए श्रृँगार को अंज़ाम देने वाले मुकुंद कौशल की ग़ज़ल संग्रह ’मोर ग़ज़ल के उड़त परेवा’ की छत्तीसगढ़ी ग़ज़लों को पढ़कर मन में सुखद अनुभूति होती है।

काया के का गरब करत हस, जब तक चले चला ले,
एक्केदारी घुर जाही, ये काया हवै बतासा।
(ग़ज़ल क्र. - 1, पृ. 10)
धरे कांसड़ा ऊपर बइठे, तेकर ग़म ल का पाबे,
जिनगी के गाड़ा ल वो हर, कोन दिसा मा मोड़ दिही।
(ग़ज़ल क्र. - 5, पृ. 13)
ये गरीब के कुरिया संगी, वो दाऊ के बाड़ा है।
ये मन सूतै लांघन वोती, चाँऊर गाड़ा-गाड़ा हे।
इन्कर अँधियारी कुरिया के चिमनी घलो बुता जाथे,
उन पोगराए हें अँजोर ल, ये कइसन गुन्ताड़ा हे।
(ग़ज़ल क्र. - 21, पृ. 29)
बादर अइसन छाए लगिस।
सुरता उन्कर आए लगिस।
मन झूमे-नाचे कौशल,
माँदर कोन बजाए लगिस।
(ग़ज़ल क्र. - 48, पृ. 56)

यह सुखद अनुभूति उसी तरह की होती है, जैसे दुश्यंत कुमार की ’साये में धूप’ को पढ़कर होती है; अतः यहाँ पर ’साये में धूप’ की संक्षिप्त चर्चा जरूरी है।

गजल की ताकत और नफासत के विषय में कुछ कहने की जरूरत नहीं है। परंतु इतना तो तय लगता है; और यहाँ ऐसा लगने में कोई अतिशयोक्ति भी नहीं होगी, कि इसे यह ताकत और नफासत उर्दू से मिलती है। उर्दू के अतिरिक्त दिगर भाषा से इसे ऐसी ताकत और नफासत मिलना मुश्किल है। यही वजह है कि ग़ज़ल ने जो ख्याति उर्दू में अर्जित किया है, अन्य भाषाओं में नहीं। इस कथन के विरोध में आप बेशक ’साये में धूप’ को सामने ला सकते हैं, परंतु ऐसा करने से पहले ’साये में धूप’ को पुनः पढ़कर देख लीजिये। और नहीं तो इसकी सबसे बेहतरीन और सर्वाधिक मक़बूल ग़ज़लों और शेरों को पढ़कर देख लीजिये। जैसे -
आज यह दीवार परदे की तरह हिलने लगी,
शर्त मगर यह थी कि बुनियाद हिलनी चाहिये।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं था,
मेरी कोशिश थी कि सूरत बदलनी चाहिये।

यहाँ दीवार, बुनियाद, मक़सद, और सूरत की जगह भित्ति, नींव, उद्देश्य और परिस्थिति जैसे शब्द रखकर देख लीजिये। हंगामा के बदले में तो कोई दूसरा शब्द सोचा भी नहीं जा सकता।

’साये में धूप’ को चाहें हम हिन्दी की गजल मानते रहें हैं, पर इसकी लोकप्रियता में हिन्दी का कोई बड़ा योगदान नहीं दिखता। इसकी लोकप्रियता इसकी विषयवस्तु और दुश्यन्त कुमार की शिल्पगत कुशलता में निहित है। आम आदमी अपने हक की जिन बातों को, या अपने मन के जिन आक्रोशों को व्यक्त नहीं कर पाता है; उन्हीं सारी बातों को शायर ने अपनी ग़ज़ल का विषय बनाया है। ज़ाहिर है, संग्रह को पढ़ते वक्त आम पाठक स्वयं को, स्वयं के आक्रोश को, अभिव्यक्त करता हुआ महसूस करता है। इस संग्रह की गज़लों में कही गई बातें उन्हें अपनी ही बातें प्रतीत होती हैं। इस तरह दुश्यन्त कुमार ने ’साये में धूप’ के माध्यम से जानता की आवाज को ही बुलंद किया है और यही बात इस संग्रह की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण है।

विषयवस्तु के स्तर पर यही बात मुकुंद कौशल की छत्तीसगढ़ी में लिखी ’मोर ग़ज़ल के उड़त परेवा’ की ग़ज़लों पर भी लागू होती है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद; इसके लिये, और यहाँ की सवा दो करोड़ जनता के लिये, ’अमीर धरती के गरीब लोग’ उक्ति प्रचलित हुई।  इस उक्ति ने छत्तीसगढ़ का किसी तरह भला किया होगा, इसमें संदेह है। छत्तीसगढ़ राज्य की परिकल्पना एक आदिवासी राज्य के रूप में की गई थी। यहाँ आदिवासियों और पिछड़ों की संख्या लगभग बराबर है।  अनुसूचित जातियों की भी बड़ी संख्या यहाँ निवास करती है। जाहिर है, शुरू से ही यहाँ की जनता आर्थिक, शैक्षिक और धार्मिक शोषण का शिकार होती रही है। आजादी के बाद भी यही सूरत बनी रही। पृथक छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद कुछ उम्मादें जगी थी, परन्तु गैर छत्तीसगढ़ियों के द्वारा आज इस अमीर धरती के अमूल्य प्राकृतिक संसाधनों, जिन्हें यहाँ के लोग बड़े जतन से, सहेजकर रखे हुए थे, को लूटने की होड़ मची हुई है। इन्हीं विषयों को, इन्हीं सारी बातों को, मुकुंद कौशल ने बड़ी खूबी और धारदार तरीके से अपनी ग़ज़लों का विषय बनाया है। कुछ उदाहरण प्रस्तुत है -

राज बनिस ते राज करे बर, बाहिर ले मनखे आवत हें,
हम मर-मरके चूल्हा फूँकेन, चुरे-पके म सगा हबर गे।
साहेब, बाबू, नेता जुरमिल, नाली-पुलिया तक खा डारिन,
गरूवा मन बर काहीं नइये, मनखें सब्बो चारा चरगें।
(ग़ज़ल क्र. - 18, पृ. 26)

भुँइया महतारी के जेमन, खुद ला समझिन मालिक,
आज उही मन हो गे हावैं, अपने घर मा दासा।
का गोठियावौं कौसल मैं हर, भुँइया के दुख पीरा,
भूख मरत हे खेती अउ, तरिया मरे पियासा।
(ग़ज़ल क्र. - 2, पृ. 10)

बने फायदा हावै संगी, राजनीति बैपार मा।
इही पाय के सबो झपाथें, ये पूरा के धार मा।।
ये कइसन सरकार हवै, का अइसन ल सरकार कथैं?
हमरे बिजली बेच के हमला, राखत हें अँधियार मा।
(ग़ज़ल क्र. - 4, पृ. 12)

यहाँ कहना न होगा कि राजनीति की बाढ़ में झपाने वाले लोग कौन हैं और कहाँ के हैं। बिजली निश्चित ही यहाँ के प्राकृतिक संसाधनों और समृद्धि का प्रतीक है।

छत्तीसगढ़ बनने के बाद छत्तीसगढ़ियों का सपना किस कदर चूर-चूर हुआ है, यह शेर उसी की बानगी प्रस्तुत करता है, -
सुने रेहे हन छत्तीसगढ़ म, सूरूज नवा अवइया है,
खोजौ वो सपना के सूरूज, कोन दिसा म अटक गइस।
(ग़ज़ल क्र. - 20, पृ. 28)

पूरी तरह छत्तीसगढ़ी में लिखी गई मुकुंद कौशल के इस ग़ज़ल संग्रह ने छत्तीसगढ़ी  भाषा के सामथ्र्य को भी स्थापित किया है। संप्रेषणीयता की ताकत और नफासत के मामले में मुकुंद कौशल की ये छत्तीसगढ़ी ग़ज़लें उर्दू गजलों से किसी भी माने में कम नहीं है। इस मामले में छत्तीसगढ़ी भाषा हिन्दी से बीस ही साबित हुई हैं। हाना छत्तीसगढ़ी भाषा की जान है। संग्रहीत ग़ज़लों में न सिर्फ हाना का स्वभाविक प्रयोग हुआ है, जिससे इनकी सम्प्रेषणीयता बढ़ी हैं, अपितु शायर ने ऐसे नये-नये प्रतीकों और उपमानों का प्रयोग किया है, जिससे पाठक चमत्कृत हुए बिना नहीं रहता।

चिमटत हावै जूड़ हवा,
अगहन बइठे पाँव पसार।
संझा बेरा सूरूज ल,
खांद म बोहे चलिन कहार।
(ग़ज़ल क्र. - 47, पृ. 55)
जब देखौ तब गावत रहिथे,
पुरवाही त हवै भजनही।
डहर रेंगइया संसो झनकर,
पाँव रहत ले सौ ठन पनही।
(ग़ज़ल क्र. - 37, पृ. 45)
इसमें कोई संदेह नहीं है कि -
कौसल के संदेश लिखाए, मया-दया के पाती ल,
मोर ग़ज़ल के उड़त परेवा, गाँव-गली अमरावत हे।
(ग़ज़ल क्र. - 42, पृ. 50)

लेकिन लगता है कि शायर को छत्तीसगढ़ी संस्कृति का पूर्ण ज्ञान नहीं है। अपने पहले ग़ज़ल संग्रह में उन्होंने बैल को सोहई पहनाया था -
पीरा कांछन चघे, साँट लेवय जिनगी के मातर मां,
सुख संग दुख के बइला ल, तैं घलो सुहई पहिराए कर।
(छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल, द्वितीय संस्करण, पृ. 29)
इसी तरह की अक्षम्य गलतियाँ मोर ग़ज़ल के उड़त परेवा में भी हुई हैं।
आँखीं फारे सबके आगू जे हर जादा अँइठे ते,
एक चरू दारू ला पीके, घेरी-बेरी गोड़ धरै।
(ग़ज़ल क्र. - 8, पृ. 16)

यहाँ चरू में दारू पीने की न तो परंपरा है और न ही चरू का उपयोग किसी पैमाने के लिये ही किया जाता है। इसका उपयोग मांगलिक कार्यों में किया जाता है।
जुच्छा चूरी होगे जब ले, एक बनिहारिन मोटियारी,
(ग़ज़ल क्र. - 9, पृ. 17)

यहाँ जुच्छा चूरी कहने की परंपरा नहीं है; अपितु जुच्छा हाथ, या खाली हाथ ही कहा जाता है।
कांड़ बंधाये डोरी धर के ढेंकी म उत्ता-धुर्रा
ओरम-ओरम के अपन धान ल छरिन तहाँ ले भगवान।
(ग़ज़ल क्र. - 3, पृ. 11)

ढेंकी में धान कूटने वाले कार्य कुशलता और सहारे के लिये डोरी को मयार में बाँधते हैं, कांड़ में नहीं। इसी तरह धान को कूटा जाता है, छरा नही जाता। छरना क्रिया मेरखू, चाँवल या दाल के लिये किया जाता है। छरना का अर्थ होता है, पाॅलिश करना।
खरही ल राखे रहिथे रखवार असन,
ब्यारा के रूँधना ला राचर कहिथें।
(ग़ज़ल क्र. - 8, पृ. 16)

रूँधना और राचर, दानों ही अलग-अलग चीजें है। रूँधना को कहीं भी राचर नहीं कहा जाता।
शायर से ये गलतियाँ चाहे अनजाने में हुई हों, पर भविष्य में ये गलतियाँ छत्तीसगढ़ की संस्कृति की गलत जानकारियाँ प्रस्तुत करेंगी। इस तरह की गलत जानकारी देने के लिये किसी भी लेखक या कवि को कभी माफ नहीं किया जाना चाहिये।
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10 - छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य नाचा के पुरखा: मदराजी दाऊ

लोकनाट्य ह वोतकच् पुरातन आय जतका मनुष्य के सामाजिक जीवन। सत्य अउ सनातन के खोज म लोक कलाकार मन जउन सपना देखथें अउ वोला मंच म अभिनय के माध्यम ले प्रगट करथें विही ह लोकनाट्य कहलाथे। छत्तीसगढ़ के लोकनाट्य ल हम नाचा कहिथन। नाचा कलाकार मन लोकजीवन से जुड़े अपन अनुभव ल जउन सरलता, सहजता अउ सुंदरता ले प्रस्तुत करथें विही ह नाचा के संप्रेषणीयता के राज आय; एकरे ले नाचा म सामूहिक सम्मोहन के प्रभाव पैदा होथे। देखइया मन नाचा के मोहनी म अतका मोहा जाथे कि रात भर अपन जघा ले टसमस नइ होवंय। लोक संस्कृति के सतरंगी चमक, मनमोहक खुशबू अउ लोकहित के भाव ह नाचा के आत्मा आय। नाचा के कोनों संवाद ह लिखित म नइ रहय, कलाकार मन भुक्त संवेदनात्मक आवेग के भावात्मक ताकत से उत्पन्न विलक्षण हाजिरजवाबी द्वारा प्रसंग अनुसार अपन संवाद ल खुदे बोलत जाथें। इंखर संवाद म हंसी-मजाक तो रहिबेच् करथे, समाज के आर्थिक, धार्मिक अउ सामाजिक शोषण-जनित दुख- पीरा ऊपर करारा ब्यंग घला रहिथे।

छत्तीसगढ़ के नाट्य परंपरा ह संसार के सबले पुरातन नाट्य परंपरा आय। (रामगढ़ के पहाड़ी म स्थित रंगशाला ल दुनिया के सबले जादा जुन्नेट रंगशाला माने जाथे।) फेर नाचा के जउन सरूप ल आज हम देखथन वो ह जादा पुरातन नो हे। पहिली खड़े साज के चलन रिहिस हे। जेवन करके गांव के कोनो चंउक म सब सकला जावंय। कलाकार मन मुंह मा छुही-कोयला पोत के हाजिर हो जावंय। तबलची, मंजीरहा, चिकरहा, मसालची अउ परी, सब मिल के खड़े-खड़े ब्रह्मानंद अउ कबीर के निरगुनिया भजन गावंय। गम्मत नइ होवय। कोनों संगठित नाचा पार्टी नइ रहय। नाचा पार्टी ल संगठित करके वोला आज वाला सरूप देवइया महान लोक-रंगकर्मी, संगीतकार, सुंदर सामाजिक शुचिता अउ सौहाद्र के स्वप्न-द्रष्टा, समाज सुधारक अउ नाचा बर अपन तन-मन-धन ल अर्पित करइया महान विभूति के नाम रिहिस हे, दाऊ दुलार सिंह साव, जउन ल हम मंदराजी दाऊ के नाम से जानथन।

मंदराजी दाऊ के जन्म 1 अप्रेल 1911 ई. म राजनांदगांव ले सात कि. मी. दुरिहा रवेली गांव के संपन्न मालगुजार परिवार म होय रिहिस। पिता जी के नांव श्री रामाधीन साव अउ माता जी के नांव श्रीमती रेवती बाई साव रिहिस हे। इंखर प्राथमिक शिक्षा कन्हारपुरी म होइस। बचपनेच् ले इंखर रूचि गाना-बजाना म रिहिस। कहावत हे, ’होनहार बिरवान के होत चीकने पात’; गांव म कुछ लोक-कलाकार रिहिन, इंखरे संगत म पड़ के बचपनेच् म ये मन तबला अउ चिकारा बजाय बर सीख गें। वो समय इहां हारमोनियम के नामोनिसान नइ रिहिस।

माता-पिता के इच्छा रिहिस कि बेटा ह पढ-़लिख के मालगुजारी ल संभालय, फेर बेटा के मन तो नाचा के सिवा अउ कुछू म रमेच् नहीं। बाप ल ये सब चिटको नइ सुहावय। बेटा ल हाथ से निकलत देख के वोला फिकर होय लगिस। बेटा ल बांध के रखे खातिर अब वोला एकेच् उपाय दिखिस। चैदह साल के बालपन म ही राम्हिन बाई नांव के सुंदर कन्या के संग दुलार सिंह के बिहाव कर दिन। फेर मंदराजी के मूड़ म तो नाचा के भूत सवार रहय, दुनियादारी म वो कहां बंधने वाला रिहिस?

दुनिया के कोनों माया-मोह ह मंदराजी दाऊ ल नाचा ले अलग नइ कर सकिन। एक समय वो ह नाचा बर नरियर झोंक डरे रहय। घर म बेटा ह बीमार पड़े रहय। भगवान ल परछो लेना रिहिस होही। विही दिन बीमार बेटा के सांस ह टूट गे। पुत्र-सोग ले बढ़के दुनिया म अउ कोनों दुख नइ होवय, फेर वो तो रिहिस ए युग के राजा जनक, वीतरागी। बेटा के लहस ल छोड़ के पहुंच गे नाचा के मंच म। रात भर नाचा होइस। देखइया मन रात भर मजा लूटिन, मंदराजी के मन के दुख ल कोई नइ जान सकिन, न देखइया मन, न संगवारी कलाकार मन। बिहिनिया नाचा खतम होइस, मंदराजी के दूनों आंखी ले तरतर-तरतर आंसू बोहय लगिस। संगवारी मन चकरित हो गें। अइसन रिहिस मंदराजी दाऊ ह।

दुलार सिंह ले मंदराजी बनें के घला बड़ रोचक किस्सा हे। बचपन म बड़े पेट वाला हट्टा-कट्टा दुलार सिंह ह अंगना म खेलत रहय। तुलसी-चंवरा म वइसने एक ठन पेटला मूर्ति ओधे रहय जउन ह मदरासी मन सरिख दिखय; नाना ह विही ल देख के बालक ल कहि दिस ’मदरासी’। काकी-भउजी मन ल घला इही नाम ह भा गे अउ दुलार सिंह ह बन गे मदरासी। इही मदरासी ह सुधरत-सुधरत हो गे मंदराजी अउ जहरित हो गे जग म।

नाचा अउ मंदराजी दाऊ अब एक-दूसर के पहिचान बन गें। समाज के कुरीति अउ अंगरेज के गुलामी वोकर मन ल निसदिन कचोटय। मंदराजी दाऊ ह इंखर से लड़े खातिर नाचा ल हथियार बना लिस। अब वो ह नाचा ल अपन मनमाफिक रूप देय बर भिड़ गे। 1927-28 ई. म वो ह नाचा के प्रसिद्ध कलाकार मन ल जोड़ के नाचा पार्टी बनाय के उदिम शुरू कर दिसं। खल्लारी के प्रसिद्ध परी नारद निर्मलकर,  प्रसिद्ध गम्मतिहा लोहरा( भर्रीटोला) के सुकालू ठाकुर अउ खेरथा (अछोली) के नोहर दास, कन्हारपुरी (राजनांदगांव) के तबलची राम लाल निर्मलकर अउ चिकरहा के रूप म खुद, पांचों झन मिल के रवेली नाचा पार्टी के गठन करिन। इही ह पहिली संगठति नाचा पार्टी बनिस।

मंदराजी दाऊ के नांव अब छत्तीसगढ़ म जहरित हो गे। 1930 ई. म संगवारी मन संग कलकत्ता जा के हारमोनियम लाइस। नाचा म अब पहिली बार हारमोनियम बजे लगिस। नाचा के रंग-ढंग ल दाऊ जी ह अब चुकता बदले म भिड़ गें। नाचा के मंच म अब चंदेवा लगे के शुरू हो गे। बजनिहा मन बर बाजवट माढ़े लगिस। मशाल के जघा गियास बत्ती (पेट्रोमेक्स) जले लगिस। खड़िया अउ हरताल के जघा स्नो-पावडर आ गे। ब्रह्मानंद अउ कबीर के निरगुनिया भजन के जघा ’भाई रे तंय छुआ ल काबर डरे’ अउ ’तोला जोगी जानेव रे भाई’ जइसे गीत बजे लगिस (आगू चल के फिल्मी गीत घला आ गें।) गम्मत होय लगिस अउ इही गम्मत मन म समाज के ढोंग ल उजागर करे के उदिम अउ देश के आजादी के बात होय लगिस। नाचा अब रात के दस बजे ले बिहिनिया के होवत ले होय लगिस।

जनता नाचा के दिवानी हो गे। दिन डुबतहच जघा पोगराय बर बोरा-दरी जठे के शुरू हो जाय। दुरिहा-दुरिहा के आदमी गाड़ी-खांसर म जोरा-जोरा के आय। नाचा के लोकप्रियता के हिसाब रायपुर म सन् 50-51 म एकर प्रदर्शन से लगाय जा सकथे। डेढ़ महीना तक रोज नाचा होइस। नाचा के समय जम्मों टाकीज मन बंद हो जावंय। टाकीज वाले मन थर खा गें।

मंदराजी ह नाचा अउ नाचा कलाकार मन बर अपन सब कुछ ल होम कर दिस। अंत म सौ एकड़ के मालिक ये दधीचि के पास हारमोनियम के सिवा अउ कुछू नइ बचिस। दाऊ जी ह एक बात हरदम कहंय, -’’ दुनिया म धन कमाना सरल हे, नाम कमाना कठिन हे।’’ दुनिया म सबो खाली हाथ आथें अउ खालिच् हाथ जाथें, फेर महापुरूष मन अपन नांव ल दुनिया म छोड़ जाथें। उंखर कर्म के महक ह सदा-सदा के लिये समाज म बस जाथे।
24 सितंबर 1984 ई. म दाऊ जी ह ये दुनिया ले बिदा हो गें।
वोकर जन्म स्थान रवेली म वोला भक्ति-भाव अर्पित करे बर हर साल 1 अप्रेल के दिन लोक कलाकार मन के मेला लगथे। राज्य सरकार ह वोकर सम्मान म लोक कलाकार मन बर दो लाख रूपिया के मंदराजी सम्मान देथे।
                             
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11 - लोकसाहित्य में लोक जीवन की अभिव्यक्ति

आदरणीय विद्व्तजन एवं मित्रों,

एक बहु प्रचलित बोध कथा है -
एक प्रकाण्ड पण्डित था। शास्त्रार्थ में वह कभी किसी से पराजित नहीं होता था। अपनी पंडिताई पर उसे बड़ा अभिमान था। यात्रा के दौरान वह सदैव अपनी किताबों और पोथियों को साथ लेकर चलता था। एक बार वह नाव से नदी पार कर रहा था। उसने नाविक से पूछा - ’’क्या तुम वेद-शास्त्रों के बारे में जानते हो?’’ नाविक ने कहा कि नाव और नदिया के अलावा वह और कुछ नहीं जानता। पंडित ने उस नाविक को लंबा-चैड़ा उपदेश दिया और कहा कि तुम्हारा आधा जीवन तो व्यर्थ चला गया।

तभी मौसम ने अचानक अपना मिजाज बदला। आसमान पर काले-काले बादल घिर आए। बड़ी तेज आँधियाँ चलने लगी। नाव का संतुलन बिगड़ने से वह बुरी तरह डगमगा रही थी और वह किसी भी झण डूब सकती थी। नाव को डूबते देख नाविक ने पंडित जी से पूछा - ’’महात्मन्! क्या आप तैरना जानते हैं, नाव डूब रही है।’’ पंडित जी मृत्यु भय से कांप रहा था, बोल भी नहीं निकल रहे थे। मुश्किल से उसने कहा ’’नहीं।’’
नाविक ने कहा - ’’महात्मन! तब तो आपकी पूरी जिंदगी बेकार चली गई।’’

मित्रों! इस छोटी सी बोधकथा में प्रकृति और प्राणियों के बीच के अंतर्संबंधों का रहस्य उद्घाटित होता है। प्रकृति अपनी असीम शक्तियों के द्वारा प्राणियों को जन्म देती है, पालन करती है और अंत में उसका संहार भी करती है। जो प्राणी स्वयं को प्रकृति की विभिन्न शक्तियों के अनुकूल समर्थ बना पाता है, वही अपने अस्तित्व की रक्षा करने में सक्षम हो पाता है। डार्विन ने इसे समर्थ का जीवत्व कहा है।

एक और लोककथा है जो सरगुजा अंचल में कही-सुनी जाती है। वह इस प्रकार है -
वृक्ष के कोटर में पक्षी ने एक अंडा दिया। समय आने पर उसमें से चूजा निकला। मां दाना चुगने गई थी तभी उस चूजे पर एक भयंकर सांप की नजर पड़ गई। वह चूजे को खाने के लिये लपका। चूजे ने कहा - ’’हे नागराज! अभी तो मैं बहुत छोटा हूँ। मुझे खाकर आपको तृप्ति नहीं मिलेगी। कुछ दिनों बाद जब मैं बड़ा हो जाऊँगा, तब आप मुझे खा लेना।’’ सांप को चूजे की बात जंच गई।

सांप रोज आता और उस चूजे को खाने के लिये लपकता। चूजा रोज इसी तरह अपनी जान बचाता। एक दिन सांप ने फिर कहा - ’’अब तुम बड़े हो चुके हो। आज तो मैं तुम्हें खाकर ही रहूँगा।’’ चूजे ने कहा - ’’तो खा लो न, मैं कहाँ मना कर रहा हूँ।’’ इतना कहते ही वह फुर्र से उड़ गया। सांप हाथ मलते रह गया।

मित्रों, यह लोककथा कोई मामूली कथा नहीं है। जिस किसी भी लोक ने इसे सृजित किया होगा, उसे जीवन और जगत् के बीच के अंतर्संबंधों का सहज-अनुभवजन्य परंतु विशद् ज्ञान रहा होगा।

मित्रों! जिन दो कहानियों का उल्लेख मैंने आभी किया है, उनके अभिप्रायों पर गौर कीजिये। ये दोनों कहानियाँ कहीं न कहीं प्रकृति और प्राणियों के बीच चलने वाले जीवन संघर्षाें को, कार्यव्यवहारों को रेखांकित करती हैं। जीवन संघर्ष में जीत सदैव सबल व समर्थ की होती है। प्रकृति और प्राणियों के बीच का संघर्ष शास्वत है। सृष्टि के विकास की यह एक अनिवार्य तात्विक व रचनात्मक प्रक्रिया है। इसी से सृष्टि विकसित होती है, सुंदर और समरस बनती है। इसी संघर्ष में विश्व की विषमता की पीड़ाओं से मुक्ति का रहस्य भी छिपा है। छायावाद के महाकवि जयशंकर प्रसाद ने इसी ओर इशारा करते हुए कहा है -

विषमता की  पीड़ा  से व्यस्त  हो  रहा स्पंदित विश्व महान।
यही दुःख-सुख, विकास का सत्य यही, भूमा का मधुमय दान।
 (श्रद्धा सर्ग)
स्पर्धा  में जो उत्तम  ठहरे, वे रह जावें।
संसृति का कल्याण करें, शुभ मार्ग बतावें।
(संघर्ष सर्ग)
समरस थे, जड़ या चेतन, सुंदर साकार बना था।
चेतनता एक विलसती,  आनंद अखंड घना था।।
   (आनंद सर्ग )
संघर्ष का सीधा संबंध शक्ति से है। प्रथम प्रस्तुत बोधकथा के अभिप्राय पर जरा गौर करें। यहाँ पर प्रकृति के साथ संघर्षों के लिये तीन बातें जरूरी बताई गई हैं -
1. प्रकृति के कार्यव्यवहारों का ज्ञान,
2. जीवन का व्यवहारिक ज्ञान, और
3. शारीरिक रूप से शक्तिशाली होना।
दूसरी लोककथा के अभिप्रायों पर गौर करें तो निम्न तथ्य सामने आते हैं -
1. मुसीबत से डरकर नहीं, निर्भयता से उसका सामना करने पर ही उससे छुटकारा मिल सकती है।
2. अपने से सबल के साथ शरीर बल से नहीं बल्कि बुद्धिबल से लड़ना चाहिये।
3 परिस्थितियाँ अनुकूल होने की प्रतीक्षा करें।
4 जहाँ शारीरिक बल काम न आये वहाँ चतुराई बरतना अति आवश्यक है।
शास्त्रों में अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष, ये चार प्रकार के पुरुषार्थों का वर्णन है। अर्थ, धर्म और काम से गुजरे बिना क्या मोक्ष संभव है? यह शास्त्रों की स्थापनाएँ हैं, इस पर शास्त्रार्थ होते रहे हैं, आगे भी होते रहेंगे। लोक की भी अपनी स्थापनाएँ हैं। उपर्युक्त कथाओं में इन स्थापनाओं को देखा जा सकता है। जीवन संघर्ष के लिये तीन तरह की शक्तियों की आवश्यकता होती है - तन की शक्ति, मन की शक्ति, और बुद्धिबल (मानसिक शक्ति)।
इन कथाओं के आलोक में हम समस्त छत्तीसगढ़िया अपनी क्षमताओं पर गौर करें, आंकलन करें। फिर अपनी स्थितियों का आंकलन करें कि वर्तमान में हमारी स्थिति क्या है, और यदि ऐसा ही रहा तो भविष्य में हमारी क्या स्थिति होने वाली है?
हमारे छत्तीसगढ़ को प्रकृति ने विपुल प्राकृतिक संसाधनों से नवाजा है, फिर भी संपूर्ण हिन्दुस्तान में हमसे ज्यादा गरीब और कोई नहीं है। हम अमीर धरती के गरीब लोग कहे जाते हैं। हमारी संसाधनों का दोहन हम नहीं करते, उस पर हमारा अधिकार नहीं हैं। परंतु दिगर जगह से आकर यहाँ बसने वाला पाँच साल में ही कार और बंगलों का मालिक बन जाता है।
राजनीति में हमारे बीच के लोगों की हमेशा उपेक्षा की गई है।

राज्य सेवाओं की, शासकीय नौकरियों की, प्रतिस्पर्धा में हमारे बच्चे टिक नहीं पाते हैं क्योंकि उच्चशिक्षा प्रदान करने वाले शिक्षाकेन्द्रों से अब तक हमें वंचित रखा गया है। हमारे बच्चों में भी डाॅक्टर, कलेक्टर, एस.पी. और मजिस्ट्रेट बनने की योग्यता है, पर वे नहीं बन पाते।

हम अपने बच्चों के लिये क्या कर रहे हैं? रामचरितमानस की प्रतियोगिताओं में उन्हें पेन और कापी पकड़ा कर, और इन मंचों के लिये बच्चों की मंडलियाँ बनाकर हम उनमें कौन सी सेस्कार विकसित कर रहे है? क्या इससे वे कलेक्टर और डाॅक्टर बनेंगे?
हमें, हमारी संस्कृति और हमारी भाषा को इस हद तक हेय समझा गया है कि हमारे अंदर आज केवल हीन भावनाएँ ही भरी हुई है, और स्वयं को छत्तीसगढ़िया कहलाने में अथवा छत्तीसगढ़ी बोलने में हम हीनता का अनुभव करते हैं।

मुझे स्वामी विवेकानंद के उपदेश याद आते है। एक अंग्रेज सज्जन गीता के उपदेशों और गूढ़ रहस्यों को समझने के लिये काफी दिनों से उसके पीछे पड़ा हुआ था। एक दिन स्वामी जी ने कहा कि वे आज फुटबाॅल के मैदान पर मिलें, वही पर चर्चा होगी। अंग्रेज सज्जन जब नियत समय पर फुटबाॅल के मैदान पर पहुँचा तो स्वामी जी पूरे मनोयोग से फुटबाॅल खेलने में व्यस्त थे। अंग्रेज सज्जन ने कहा, ये क्या कर रहे हैं आप? स्वामी जी ने कहा - गीता के रहस्यों को समझ रहा हूँ। आओ आप भी समझो।

मित्रों, ध्यान रहे, सफलता का कोई विकल्प नहीं होता। जीत जीत है, और हार हार है। दुनिया उगते हुए सूरज को प्रणाम करती है। धर्म आचरण का विषय है, शास्त्रों का नहीं। निर्णय हमें करना है कि हम अपनी ऊर्जा को अपने राजनीतिक हकों को प्राप्त करनें में लगायें, हमारे प्रदेश में ही हमारे बच्चों के लिये आई. आई. टी और आई. आई. एम. जैसी उच्चशिक्षा के संस्थान खुलवाने में लगायें, उसमें अपने बच्चों को दाखिले के योग्य बनने में लगायें या पूरे साल रामायण प्रतियोगिताएँ और इसी तरह की प्रतियोगिताओं को संपन्न करने में लगायंे।
धन्यवाद।

12  -  लोक-साहित्य में मिथक

 ’’लोक साहित्य में मिथक’’। इस वर्ष की स्मारिका भी इसी विषय पर केन्द्रित है। यहाँ पर तीन शब्द हंै - लोक, साहित्य और मिथक, जिनके बारे में उपस्थित विद्वान विस्तार से हमें बताएँगे। वैसे भी, सुरगी वालों के लिए ये शब्द अपरिचित नहीं हैं। मिथक से तो सुरगी का सदियों पुराना रिस्ता है। नौ लाख ओड़िया और नौ लाख ओड़निनों के द्वारा एक ही रात में, इस गाँव में छः आगर छः कोरी तालाब खोदे जाने की कहानी यहाँ भला कौन नहीं जानता? विषय से संबंधित कुछ बातें, जैसा मैं सोचता हूँ, संक्षेप में आपके समक्ष रखना चाहूँगा।

लोक का क्या अर्थ है?
यदि समष्टि में हम अपने समाज को देखें तो लगभग दो तिहाई लोग गाँवों में बसते हंै, केवल एक तिहाई आबादी शहरों और कस्बों में निवास करती है। गाँवों में निवास करने वाले, और कुछ अंशों में शहरों में भी निवास करने वाले वे लोग जो अपढ़ या निक्षर होते हैं, परंपरागत व्यवसाय करने वाले मेहनतकश होते हैं और आधुनिक सभ्यता तथा आधुनिक सभ्यताजन्य मनोविकारों से अछूते होते हैं, लोक कहे जाते हैं। इसके विपरीत शहरों में निवास करने वाले पढ़े-लिखे, बुद्धिजीवी लोग जो आधुनिक सभ्यता के संपर्क में जीते हैं, शिष्ट वर्ग कहे जाते है।

यहाँ पर मैं स्पष्ट कर देना चाहूँगा कि यद्यपि लोक पढ़ा-लिखा नहीं होता है, पर वह अज्ञानी या मूर्ख कदापि नहीं होता। लोक और शिष्ट का अपना-अपना ज्ञान-क्षेत्र होता है। लोक का ज्ञान उसके अनुभवों और परंपराओं से आता है जबकि शिष्ट का ज्ञान किताबी ज्ञान ही अधिक होता है। एक महापंडित और नाविक की कहानी आप सभी जानते है। नदी पार करते समय अचानक तूफान और फिर मूसलाधार बारिश होने से नाव पलट जाती है। नाविक तैर कर अपनी जान बचा लेता है, परन्तु महापंडित बाढ में बहकर मर जाता है क्योंकि उसे तैरना नहीं आता था। वह उस नाविक का अनुभवजन्य ज्ञान ही था जिसने उसकी जान बचाई।

एक दूसरी कहानी है - एक किसान गाँव के पुरोहित को नदी में नहाते वक्त गले तक पानी में खड़े होकर ध्यान लगाते रोज देखा करता था। उत्सुकतावश एक दिन वह पुरोहित से पूछ बैठा कि ऐसा करने से क्या होता है? पुरोहित ने बड़े ही उपेक्षापूर्वक ढंग कहा कि इससे भगवान मिलता है।

उस किसान के मन में भी भगवान को पाने की इच्छा हुई। दूसरे दिन वह भी नदी के बीच धार में ध्यान लगाकर खड़ा हो गया। तभी अचानक बरसात शुरू हो गई। बाढ़ आ जाती है। बाढ़ का पानी उस किसान के सिर के ऊपर से बहने की स्थिति में पहुँच जाता है, पर उसका ध्यान नहीं टूटता क्योंकि अभी तक भगवान का आगमन जो नहीं हुआ था। भगवान ने सोचा, मेरी वजह से बेचारा किसान अकाल मारा जायेगा, दर्शन तो देना ही पड़ेगा। भगवान प्रगट हुए। पुरोहित ने भगवान से पूछा कि भगवन! मैं तो रोज ही आपका ध्यान लगाता हूँ मुझे तो आपने कभी दर्शन नहीं दिया, और इस गँवार किसान के सामने प्रगट हो गये? भगवान ने कहा - पंडित जी! यह किसान गाँवार है, अपढ़ है, वेद-शास्त्र को नहीं जानता; पर इसके मन में किसी प्रकार का अहंकार, किसी प्रकार के विकार और किसी प्रकार के विचार भी नहीं हैं, इसका मन और इसका हृदय दोनों ही निर्मल है। आप में और इसमें यही अंतर है।

ज्ञानी और भक्तों, दोनों का ही अंतिम लक्ष्य होता है - निःअहंकार होना, निर्विकार होना और निर्विचार होना; लोक में यह विशेषता देखी जा सकती है।
साहित्य क्या है?

बहुत सरल शब्दों में कहें तो, गीत, कविता, नाटक, कहानी, उपन्यास - यही तो साहित्य हैं। वे गीत और वे कहानियाँ जो लोक की वाचिक परंपरा में होते हैं लोक-साहित्य कहलाते हैं। विचार करें तो हमारे वेद, जिन्हें हम ’श्रुति’ कहते हैं, आरंभ में वाचिक परंपरा के ही साहित्य रहे हैं। लिखा हुआ साहित्य शिष्ट साहित्य है। हर समाज का, हर देश का और हर बोली और भाषा का अपना-अपना लोक-साहित्य होता है।

मिथक क्या हैं?
किसी गाँव में रात में एक हाथी आया और गलियों से होता हुआ आगे जंगल की ओर चला गया। धूल में उसके पैरों के निशान पड़ गए। उस गाँव के किसी भी व्यक्ति ने अपने जीवन में कभी हाथी नहीं देखा था। सुबह हाथी के पैरों के निशान देख कर सबकी मति चकरा गई कि आखिर रात में यहाँ कौन सा जीव आया होगा। सबने खूब सोचा पर किसी को कुछ न सूझा। सबने कहा - लाल बुझक्कड़ को बुलाओ, हमारे गाँव में एक वही बुद्धिमान आदमी है। वही इस पहेली को सुलझा सकता है। लाल बुझक्कड़ को बुलाया गया। उसने खूब सोचा। उसे अपनी इज्जत जाती दिखी। इज्जत तो बचाना ही था, अंत में उसने कहा -
’’लाल बुझक्कड़ बूझ के, और न बूझो कोय।
पैर में चक्की बांध के, हिरना कूदो होय।’’

शुरू मे मैंने सवा लाख, कहीं-कहीं कुछ लोगों के अनुसार नौ लाख ओड़िया और नौ लाख ओड़निनों द्वारा सुरगी में एक ही रात में छः आगर छः कोरी तालाब निर्माण की कहानी की ओर इशारा किया था। बचपन में बुजुर्गों से हम सुनते आए हैं कि चन्द्रमा में दिखने वाला दाग मूसल से धान कूटती एक बुढ़िया का है या वह खरागोश का है। चन्द्र-ग्रहण और सूर्य ग्रहण धड़-हीन राहु-केतु द्वारा उन्हें निगल लिए लाने की वजह से होते हैं। पृथ्वी शेषनाग के सिर पर रखी हुई है, आदि-आदि ....। छत्तीसगढ़ी में एक लोक-कथा है - महादेव के भाई सहादेव। आप सभी जानते हैं। इसमें यह बताया गया है कि रात में सियार हुँआते क्यों हैं? एक चतुर सियार ने महादेव को खूब छकाया। अंत में पकड़ा गया। उसे सजा मिली। सजा से छुटकारा पाने के लिए उसने महादेव से वादा किया था कि रात में वह पहरा दिया करेगा। रात में चार बार हुआँ कर वह लोगों को सचेत किया करेगा। उस सियार के बाद भी उसके वंशज  आज तक अपना वही वचन निभा रहे हैं।

झारखण्ड के आदिवासियों में भी इसी तरह की एक रोचक कथा प्रचलित है। 
सृष्टि के आरंभ में आसमान में सात सूरज हुआ करते थे। ये कभी अस्त न होते थे और खूब तपते थे। सारे जीव बहुत परेशान रहते थे। उसी समय जंगल में, किसी गाँव में सात आदिवासी भाई भी रहते थे। ये सातों बड़े तीरंदाज, बलिष्ठ और बड़े लडाके थे। इन लोगों ने सातों सूरज को मजा चखाने की ठानी। सातों ने अपनी-अपनी कमान पर तीर चढ़या। हरेक ने एक-एक सूरज पर निशाना साधा और एक साथ छोड़ दिये तीर। कुछ ही देर बाद पृथ्वी पर घुप अंधेरा छा गया। दूसरा दिन हुआ नहीं; एक भी सूरज नही निकला। सूरज का निकलना बंद हो गया। अब तो अंधेरे की वजह से लोगों पर आफत के पहाड़ टूटने लगे। मनुष्य सहित जंगल के सारे जीव-जंतुओं ने इस पर विचार किया कि अब क्या किया जाय? किसी ने कहा - सात सूरज में से केवल छः ही मरे हैं, मैंने देखा है कि एक भाई का निशाना चूक गया था और एक सूरज जिंदा बच गया था। लेकिन वह डरा हुआ है और पहाड़ के पीछे छिपा बैठा है। बुलाने पर वह आ सकता है। पर बुलाये कौन? मनुष्य से तो वह डरा हुआ था। राक्षसों और निशाचरों की तो बन आई थी। चिड़ियों ने कोशिश किया, खूब चहचहाये, पर वह सूरज नहीं निकला। तितलियों ने, भौरों ने, कौओं ने और अन्य प्राणियों ने भी कोशिश किया। छः दिनों तक लगातार कोशिशें जारी रही। सातवें दिन सब ने मुर्गे से कहा कि तुमने अब तक कोशिश नहींे किया है। तुम भी कोशिश करके देखो, शायद तुम्हारे बुलाने से सूरज निकल आए। मुर्गे ने कहा - कुकड़ू कूँ। और पूरब की ओर थोड़ा सा उजाला छा गया। सब के सब खुशी से झूम उठे। सब ने मुर्गे से फिर कहा - फिर से बुलाओ, वह आ रहा है। मुर्गे ने फिर कहा - कुकड़ू कूँ। सूरज ने पहाड़ के पीछे से सिर उठा कर झांका और उसकी किरणे धरती पर बिखरने लगी। सब ने मुर्गे से फिर कहा, देखो-देखो! पहाड़ के पीछे से वह लाल सूरज झांक रहा है, एक बार फिर बुलाओ। मुर्गे ने फिर कहा - कुकड़ू कूँ। तब तो छिपा हुआ वह सूरज पूरी तरह से निकल आया और आसमान में चढ़ने लगा। एक ही सूरज की तपन बड़ी प्यारी लग रही थी। लोग खुशी से झूम उठे। तभी से चलन हो गया है; मुर्गे की बांगने से ही सूरज निकलता है।

हमारे यहाँ कई गाँवों में, भांठा में एक साथ, एक ही जगह पत्थर की ढेर सारी मूर्तियाँ पई जाती है। इनमें बहुत सारी मूर्तियाँ सैनिकों के होते हैं, कुछ घुड़सवार तो कुछ पैदल। कुछ तलवार लिए तो कुछ तीर-कमान लिए। लोग कहते हैं - एक राजा था। उसकी रानी बहुत सुंदर थी। उसी राज्य में एक जादूगर भी रहता था जो अपनी जादुई ताकत से कुछ भी कर सकता था। वह भी रानी की सुंदरता पर मुग्ध था। उसने एक दिन रानी का अपहरण कर लिया। गुप्तचरों से पता चलने पर राजा ने जादूगर से लड़ने की ठानी। उसने आक्रमण किया।  जादूगर ने अपनी जादू से पूरी फौज को पत्थर का बना दिया।
ये ही मिथक हैं।

मिथकों की स्वीकार्यता।
मिथकों का निर्माण कैसे हुआ होगा? जाहिर है, ऊपर के उदाहरणों में जैसा कि हमने देखा, मिथकों का निर्माण समाज के बौद्धिक वर्ग ने ही किया होगा। परंतु बौद्धिक वर्ग द्वारा रची गई कोई भी कहानी लोक-स्वीकार्यता और लोक-मान्यता प्राप्त करने के पश्चात् ही मिथक बन पाया होगा। हर समाज, हर भाषा, हर जाति, हर देश का अपना-अपना मिथक होता है। मिथकों की रचना समाज की मान्यताओं और परिस्थितियों के अनुसार ही हुआ होगा।

एक ही विषय से संबंधित भिन्न-भिन्न मिथक हो सकते है। हिन्दुस्तान में धरती शेष नाग के सिर पर रखी हुई है। शेष नाग साल में एक बार फन (गंड़री) बदलता है। भूकंप इसी का नतीजा है। युरोप में यही धरती हरक्यूलिस नामक एक शक्तिशाली देवता के कंधे पर रखी हुई है, हरक्यूलिस कभी भी कंधा नहीं बदलता। दुनिया नष्ट हो जाएगी।

लोक-साहित्य के मिथक और शिष्ट साहित्य के मिथक में क्या अंतर होता है?
ऊपर लोक-साहित्य और शिष्ट साहित्य के बहुत सारे मिथकों की हमने चर्चा की है। सूर्य और चन्द्र ग्रहण की कथा हो, शेषनाग की कथा हो या हरक्यूलिस की कथा, ये शिष्ट साहित्य के मिथक हैं और सभी धार्मिक आस्था से जुड़े हुए हैं। हमारे सारे अवतार प्रगट होते हैं, माँ की कोख से जन्म नहीं लेते। हमारे सभी धर्मग्रन्थ भी ईश्वरीय होते हैं और ये भी प्रगट होते हैं, साहित्यकार द्वारा लिखे नहीं होते। इस संबंध में कुछ भी बोलना फतवे को आमंत्रित करना ही होगा। चुप रहने में ही बुद्धिमानी है। इसके विपरीत लोक के मिथक बड़े लचीले होते हैं। अलग-अलग अंचल में नये-नये रूपों में प्रगट होते हैं, क्योंकि ये लोक की संपत्ति होते हैं, धर्म की नहीं। लोक के मिथक या तो विशुद्ध मनोरंजन करते हुए प्रतीत होते हैं अथवा लोक-शिक्षण करते हुए। ये प्रकृति के रहस्यों की लोक-व्याख्या के रूप में भी प्रगट होते हैं। इस पर कोई भी फतवा जारी नहीं कर सकता।
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13  - विचार वीथी (जून-अगस्त 2013)संपादकीय


छत्तपसगढ़ राज्य बनने के बाद ऐसा प्रतीत होने लगा था कि वर्षों से दबी-कुचली छत्तपसगढ़ की प्रतिभाएँ मुखरित होंगी और मान-सम्मान पाने में उनके लिए कहीं कोई रूकाव्ट पैदा नहीं होंगी। मैं छत्तपसगढ़ी लोकसंस्कृति, कला और साहित्य के छेत्र में निष्काम और निःस्वार्थ भाव से सृजनरत विभूतियों की ओर छत्तीसगढ़ शासन का ध्यान आकृष्ट करना चाहूँगा। इन क्षेत्रों में छत्तीसगढ़ की प्रतिभाएँ पहले भी मुखरित होती रही हैं और पृथक राज्य बनने के बाद तो इन्होंने अपनी प्रमिभा का पुनः पूरे दमखम के साथ लोहा मनवाया है। छत्तीसगढ़ में ऐसी-ऐसी प्रतिभाएँ हैं जिन्होंने छत्तीसगढ़ राज्य बनने के पूर्व से ही छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति, कला और साहित्य के उत्थान मेें कोई कोरकसर नहीं छोड़ी हैं। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद भी लोकसंस्कृति, कला और साहित्य के इन प्रतिभाओं का सम्मान न हो पाना हमारा दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है? विद्वानों ने कहा है, जो राज्य अपनी प्रतिभाओं का सम्मान करना नहीं जानती, उसका पतन अवश्यंभावी है।

विचार वीथी के पिछले कई अंकों में मैंने इस मसले को उठाया है, पर चाटुकारों से घिरी सरकार के कानों में जूँ तक नहीं रेंगी। इस विषय पर पुनः कलम चलाने के पीछे मेरा उद्देश्य सही प्रतिभाओं को सामने लाने का है ताकि स्मृतिहीनता तथा दृष्टिहीनता की शिकार शासन का ध्यान इन प्रतिभाओं की ओर जा सके।

छत्तीसगढ़ का ऐसा कौन व्यक्ति होगा जो छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति, लोकसाहित्य तथा इनसे जुड़ी प्रतिभाओं को भव्य मंच प्रदान कर इसे राज्य ही नहीं देश के कोने-कोने में बगराने वाली संस्था ’चंदैनी गोंदा’ के बारे में न जानता हो? छत्तीसगढ़ का बच्चा-बच्चा इसके बारे में जानता है, नहीं जनती है तो केवल यहाँ की सरकार, और सरकार चलाने वाले लोग। इस संस्था के अमर शिल्पी दाऊ रामचंद्र देशमुख को शासन की ओर से क्या वह सम्मान मिल पाया जिसका कि वे हकदार हैं।छत्तीसगढ़ी नाचा के मदन निषाद, फिदाबाई जैसे अनेक अमर कलाकार जिनकी प्रतिभाओं के आगे बाॅलीवुड के भी बड़े-बड़े अभिनेता और निर्देशक नतमस्तक हाते थे, क्या उन्हें अब तक वह सम्मान मिल पाया है जिनका कि वे हकदार हैं? नाचा में जब खड़े साज का युग था तब से कमर में हारमोनियम बांधकर छत्तीसगढ़ी लोकगीतों को मधुर स्वर देने वाले खुमान साव को आज कौन नहीं जानता। अब तक छत्तीसगढ़ शासन उन्हें सम्मानित क्यों नहीं कर सकी है? पच्यासी वर्ष की अवस्था में भी संगीत-साधना में रत तथा दाऊ रामचंद्र देशमुख की अमर कृति ’चंदैनी गोदा’ को जीवित रखने वाला संगीत का यह महान साधक अपने आत्मस्वाभिमान को ताक में रख कर शासन से सम्मान की याचना करे, छत्तपसगढ़ शासन क्या यही चाहती है? छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति, कला और साहित्य को शिखर तक पहुँचने वाले खुमानलाल साव की प्रतिभा आखिर और कब तिरस्कृत, उपेक्षित और अनादरित होती रहेगी?

छत्तीसगढ़ में तिरस्कृत, उपेक्षित और अनादरित होने वाली प्रतिभाओं में छत्तीसगढ़ी भाषा के साहित्यकार भी शामिल हैं। जब पृथक छत्तीसगढ़ राज्य का मानचित्र भी परिकल्पना में नहीं आया था, जब यहाँ के तथाकथित शिष्ट लोग छत्तीसगढ़ी को भाषा तो क्या बोली मानने और बोलने में भी अपमानित महसूस करते थे, उस समय छत्तीसगढ़ी संस्कृति और सभ्यता को छत्तीसगढ़ी  भाषा में ही सहेज कर रखने के प्रयास में और छत्तीसगढ़ी भाषा की अस्मिता के लिये संधर्ष के आह्वान में, छत्तीसगढ़ी भाषा में ’गरीबा’ महाकाव्य की रचना करने वाले राजनांदगाँव जिला के ग्राम भंडारपुर करेला के निवासी पं. नूतन प्रसाद शर्मा आज भी साहित्य साधना में रत हैं, पर ऐसी प्रतिभा को पूछने वाला आज यहाँ कौन है?

टेलिविजन आज सामाजिक जीवन का आवश्यक और अभिन्न अंग बन चुका है। भारत के हर क्षेत्रीय भाषा का अपना कम से कम एक चैनल तो अवश्य है, परंतु बड़े खेद का विषय है कि छत्तीसगढ़ी भाषा का अपना कोई भी चैनल टेलिविजन पर मौजूद नहीं है। ऐसे में छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य के वैश्विक प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित इंटरनेट की पत्रिका ’गुरतुरगोठ’ के संपादक संजीव तिवारी का हमें आभारी होना चहिये। विगत पाँच वर्षों से वे अपने अभियान में समर्पित भाव से जुटे हुए हैं। इस कार्य हेतु 9 सितंबर 2013 को वे नेपाल की राजधानी काठमांडु में वहाँ के प्रधानमंत्री द्वारा सम्मानित होने जा रहे हैं, हमें संजीव तिवारी पर गर्व है, उन्हें कोटिशः बधाइयाँ। हमें उस दिन और अधिक गर्व महसूस होगा जिस दिन छत्तीसगढ़ी की सरकार की सरकार उन्हें सम्मानित करेगी। पता नहीं हमारी प्रतिभाओं के लिए ऐसा दिन कब आयेगा। राज्योत्सव के अवसर पर बालीवुड के सितारों को चंद घंटे की प्रस्तुतिकरण के लिए राजकोष से करोड़ों रूपये बाँटने वाली छत्तीसगढ़ की सरकार पता नहीं कब अपनी प्रतिभाओं को पहचान पायेगी, सम्मानित कर पायेगी।
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14 - न्याय के उच्च मापदण्ड

न्याय के उच्च मापदण्डों की जब भी चर्चा होगी राजा शिवि और मुगल बादशाह जहांगीर का उल्लेख अवश्य किया जायेगा। राजा शिवि ने शरणागत कबूतर को बाज से बचाने के लिए अपना अंग काट-काटकर न्याय के तराजू के दूसरे पलड़े पर रखता गया ताकि बाज को कबूतर के वजन के बराबर मांस दिया जा सके। और जब तराजू सम पर नहीं आया तो उन्होंने अपना पूरा शरीर ही पलड़े पर डाल दिया। यह राजा शिवि के धर्म और न्याय की इन्द्र और अग्नि द्वारा लिया गया परीक्षा था।

मुगल बादशाह जहांगीर भी न्याय की सर्वोपरिता पर विश्वास करते थे। उनके लिए न्याय की दष्टि में सभी बराबर थे। उन्होंने फरियादियों के लिए महल के बाहर एक घंटा लगा रखा था जिसे नीचे लटकती हुई रस्सी को खींचकर बजाया जा सकता था। एक बार एक बूढ़े बैल को घंटा बजाते हुए पाया गया। दरबारियों ने इसे एक संयोग समझा। परंतु बादशाह ने बैल की फरियाद को समझ लिया। बूढ़ा होने के कारण बैल से कोई काम नहीं लिया जा सकता था। इसीलिए उसके मालिक ने उसे घर से बाहर निकाल दिया था। बादशाह ने उस बैल के मालिक को बुलाकर दंड दिया और बैल की सुरक्षा सुनिश्चित की। बादशाह जहांगीर के न्याय की एक और कहानी प्रसिद्ध है। वे अपनी बेगम नूरजहां से बेइंतिहा मोहब्बत करते थे। एक बार तीर लगने से एक घोबन के निर्दोष पति की मृत्यु हो गयी। घोबन ने बादशाह से न्याय की फरियाद की। तहकीकात में पाया गया कि हत्या शाही तीर से हुई है और तीर चलानेवाली हैं - बेगम नूरजहाँ। नियम था - जान के बदले जान। दरबार में सन्नाटा पसर गया। क्या बेगम नूरजहाँ को फांसी पर लटकाया जायेगा? बादशाह ने न्याय की राह नहीं छोड़ी। उन्होंने फैसला सुनाया - ’धोबन को हक है कि जिस औरत ने उसका सुहाग छीना है वह भी उस औरत का सुहाग छीन ले।’ और स्वयं को धोबन के सामने पेश कर दिया। धोबन ने बेगम नूरजहां की गुनाह को माफ कर दिया। परिस्थिति और प्रकष्ति द्वारा ली गयी यह भी एक परीक्षा ही थी।हमारे पुराणों और इतिहासों में न्याय के ऐसे उच्च मापदण्ड के दष्ष्टांत दुर्लभ हैं।  वर्तमान समय में तो इसकी कल्पना करना ही बेमानी है।
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15  - समकालीन स्त्री-विमर्श को  डाॅ. विनय कुमार पाठक का प्रदेय

इस शोध प्रबंध की समीक्षा, समालोचना अथवा आलोचना में कुछ लिखने अथवा कहने से पहले हमें ध्यान देना होगा कि इस ग्रंथ की चैदह पृष्ठों की विस्तृत और विद्वतापूर्ण भूमिका के अलावा दोनों फ्लैफ में भी, दो अलग-अलग विद्वानों की अमृत वाणियाँ (मीठे वचन को संत कवियों ने अमृत के समान ही माना है।) दी गई हैं। इस तरह की सामग्रियाँ वस्तुतः प्रस्तुत कृति की समीक्षाएँ ही होती है। फिर भी मान्य समीक्षकों की समीक्षाएँ अलग महत्व रखती हैं और अधिक मूल्यवान होती हैं, अतः समीक्षाओं और आलोचनाओं की और भी निर्झरणियाँ विभिन्न स्रोतों से निकलनी चाहिए, निकलकर बहनी भी चाहिए, यह हमारी साहित्यिक परंपरा के अनुकूल भी है और आवश्यकता भी।
कहा गया है -
’’सूर, सूर, तुलसी शशि, उड़ुगण केशवदास।
बांकी सब खद्योत सम, जँह-तँह करत प्रकाश।’’

सूर्य, चन्द्रमा और तारों की रोशनी के बाद कुछ अहमियत जुगनुओं की भी होती है, पर हमारे अर्थात् मेरे समान प्रकाशहीन और हैसियतहीन व्यक्ति की तो कुछ औकात ही नहीं बनती कि इस पर कुछ कह सकूँ। जो कुछ भी कहने का प्रयास मैंने किया है वह एक दृष्टिविपन्न पाठक की त्त्वरित और अनर्गल, पाठकीय प्रतिक्रिया के अलावा और कुछ भी नहीं है। दृष्टि में ही दोष हो तो ताजमहल में भी हजारों दोष दिख जायेंगे, परन्तु इससे न तो ताज की सुंदरता कम होती है और न ही उसकी अहमियत। इस ग्रंथ में मुझे यदि कोई दोष दिख भी जाये तो उसका संदर्भ इस स्वयं सिद्ध उक्ति से अधिक और कुछ भी नहीं होगा।

इस ग्रथ के कव्हर फ्लैफ के प्रथम पृष्ठ के (प्रथम फ्लैफ के) लेखक डाॅ. चंपा सिंह के अनुसार - ’’डाॅ. दादू लाल जोशी ने इनके (डाॅ. विनय कुमार पाठक के) स्त्री विमर्श के समग्र कार्यों की परिक्रमा करके विशेषतः ’स्त्री-विमर्श: पुरूष रचनाधर्मिता के संदर्भ में’ ग्रंथ की पड़ताल करके डाॅ. विनय कुमार पाठक के प्रदेय को शोध का विषय ही नहीं बनाया, स्त्री-विमर्श की समझ विकसित करके हिन्दी साहित्य को नई दृष्टि देने का उपक्रम भी निवेदित किया है।’’ अर्थात:-

(अ) इस शोध प्रबंध में शोधार्थी (डाॅ. दादू लाल जोशी) ने डाॅ. पाठक के समग्र कार्यों का अध्ययन तो किया है परन्तु मुख्य पड़ताल ’स्त्री-विमर्श: पुरूष रचनाधर्मिता के संदर्भ में’ ग्रंथ की हुई है।
(जिस आत्म विश्वास के साथ उपरोक्त बातें कही गई है, जाहिर है, फ्लैफ लेखक ने स्वयं डाॅ. पाठक के समग्र कार्यों का अध्ययन किया होगा।)
(ब) इस शोध प्रबंध ने दो (महान्) लक्ष्य हासिल किया है -

1. इस शोध प्रबंध ने स्त्री-विमर्श की समझ विकसित किया है। हिन्दी साहित्य जगत में स्त्री-विमर्श से संबंधित सामग्रियों की बेहद कमी है, ऐसा कहना शायद उचित नहीं होगा; इसके बावजूद वर्तमान समाज में स्त्रियाँ चैतरफा प्रताड़ित और अपमानित हो रही हैं। जाहिर है, और सत्य है कि समाज में स्त्रियों के प्रति समझ का अभाव है। डाॅ. जोशी के इस शोध प्रबंध को पढ़कर यदि स्त्री-विमर्श के प्रति मूढ़मति समाज की समझ विकसित हो सके तो इसके लिए समाज डाॅ. जोशी का ऋणी होगा। परन्तु किताब की कीमत (छः सौ रूपये) और हिन्दी पाठकों की वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह कैसे होगा और किस सीमा तक हो सकेगा, कहना बेहद मुश्किल है। बेहतर होगा, इस ग्रंथ को लोगों तक पहुँचाने में सरकार भी अपनी सहभागिता निभाये।

2. इस शोध प्रबंध ने हिन्दी साहित्य को नई दृष्टि देने का उपक्रम निवेदित किया है। समय के अनुसार दृष्टियाँ बदलनी ही चाहिए, इस लिहाज से यह कार्य अत्यन्त महत्वपूर्ण है। दृष्टियाँ बदलने से ही परिदृश्य बदलती है, समाज बदलता है। सदियों से अंधदृष्टि भारतीय समाज की दृष्टि बदले चाहे न बदले, इस कृति को पढ़कर खुल ही जाये, तब भी यह डाॅ. जोशी द्वारा किया गया एक महान् कार्य ही माना जायेगा।

दूसरे फ्लैफ के लेखक डाॅ. जितेन्द्र कुमार सिंह ने कहा है, ’’इनके (डाॅ. विनय कुमार पाठक के) ’स्त्री-विमर्श’ पर केन्द्रित कार्यों को शोध और समीक्षा का अधार बनाकर डाॅ. दादू लाल जोशी ने प्रस्तुत ग्रंथ के द्वारा नई स्थापना दी है, जिसका स्वागत न सिर्फ हिन्दी वरन् भारतीय भाषाओं में भी होगा, इसमें दो मत नहीं।’’ अर्थात:-
(अ) डाॅ. जोशी का यह ग्रंथ केवल शोध ग्रंथ ही नहीं है अपितु एक समीक्षा ग्रंथ भी है।
(ब) डाॅ. दादू लाल जोशी ने प्रस्तुत ग्रंथ के द्वारा एक नई स्थापना दी है।

उपर्युक्त दोनों कथनों की जांच तो आप तभी कर पायेंगे जब आप इस ग्रंथ के पन्नों को एक-एक कर पलटते और परखते जायेंगे। और अंत में फ्लैफ लेखक ने आशा व्यक्त किया है कि इसका स्वागत हिन्दी सहित भारतीय भाषाओं में होगा। लेखक की तरह मैं भी ऐसा ही सोचता हूँ और इसी तरह की कामना भी करता हूँ। संभव हो तो इसी तरह की कामना आप सबको भी करना चाहिए।

इस ग्रंथ की विस्तृत भूमिका डाॅ. सभापति मिश्र जी ने लिखा है। स्त्री-विमर्श को परिभाषित करते हुए वे लिखते हैं - ’’स्त्री विमर्श एक नारीवादी सिद्धांत है, जिसमें स्त्री-केन्द्रित ज्ञान की चर्चा-परिचर्चा होती है।’’;(p-vii)  और स्त्री-विमर्श अस्तित्व में कैसे आया, इसका करण स्पष्ट करते हुए वे लिखते हैं कि - ’’समकालीन सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्र में व्याप्त विसंगतियाँ साहित्य की सभी विधाओं में दृष्टिगोचर होती हैं। स्त्री-विमर्श उन्हीं विसंगतियों की देन है।’’(p-vii)

यदि व्याप्त विसंगतियों के समस्त आयामोें को टटोला जाय तो आगे भी लगभग सभी विद्वानों ने इसे ही स्त्री-विमर्श के अस्त्वि में आने का प्रमुख कारण माना है। भूमिका में इसके आगे जितनी बातें कही गई हैं लगभग सभी इसी ग्रन्थ से संदर्भित हैं, न सिर्फ संदर्भित हैं बल्कि उद्धृत हैं।

दो सौ अड़तालीस पृष्ठों की इस शोध ग्रन्थ को डाॅ. जोशी जी ने छः अध्यायों में समेकित किया है। प्रारंभ में उन्होंने प्रस्तावना तथा छठे अध्यााय के अंत में डाॅ. विनय कुमार पाठक के नारी-विषयक विचार विस्तार में तथा अन्य विद्वानों के विचार संक्षिप्त में दिया है। छठा अध्याय समाकलन (उपसंहार) का है। यहाँ डाॅ. जोशी जी लिखते हैं - ’’फिर भी 1975 के पहले तक ऐसे कोई विचार या सिद्धांत सजग, सचेत विमर्श की तरह लगभग न विकसित हुए, न लिखे गये जिसे स्त्री नितांत अपना विमर्श मान सके और और नेतृत्व में भागीदारी कर सके।’’;(p- 229)

भारत में स्त्री-विमर्श की स्थिति, अवधारण, स्थापना और परंपरा पर अपनी स्थापना देते हुए डाॅ. जोशी जी आगे लिखते हैं कि - ’’सन् 1975 में संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ भारत सरकार के अनुबंध के कारण सरकारी पहल पर एक ’सोशल इंजीनियरिंग’ का दौर शुरू हुआ। उसमें भी वैचारिक, सैद्धांतिक संदर्भ के लिए पश्चिमी विमर्श को ज्यों का त्यों अपना लिया गया। स्पष्ट है, अंग्रेजी में स्त्रीवादी आंदोलन और स्त्री-विमर्श को एक-दूसरे से  अलग करके देखें तो दरअसल स्त्री-विमर्श का अगर सारा का सारा नहीं तो लगभग सारा कार्यकलाप अंग्रेजी में ही चलता है। जाहिर भी है कि वह अंग्रेजी पृष्ठभूमि वाले भारतीय स्त्री समाज के भी एक सीमित अंश के सिवाय भारतीय स्त्री के लिए जैसे का तैसा अपना विमर्श न हो सकता है, न है।

मुझे पूरा विश्वास है कि भारत व्याकुलता, अंध परंपरावाद, प्रतिक्रियावाद, बौद्धिक साम्प्रदायिकतावाद, संकुचित दृष्टकोण, संकीर्ण मानसिकता और शुद्ध ब्राह्मणी भाषा से ऊपर उठकर स्त्री-विमर्श पर विचार करेगा। डाॅ. विनय कुमार पाठक भारतीय परंपरा के विद्वान हैं इसलिए उनके लेखन व चिंतन में स्त्री-विमर्श, स्त्री के भरोसे भारतीय (जो भी उसका अर्थ हो) को बचाये रखने में भारतीयता के नाम पर स्त्री की स्वतंत्रता, समानता, भगिनीभाव, न्याय, धर्मनिरपेक्षता और आत्मनिर्णय के अधिकार के लिए किया गया सार्थक प्रयास है।’’;(p- 229-230)   

स्पष्ट है कि डाॅ. विनय कुमार पाठक ही भारतीय परंपरा में समकालीन स्त्री-विमर्श के संस्थापक या जनक हैं। समकालीन स्त्री-विमर्श को यही डाॅ. विनय कुमार पाठक का सबसे बड़ा प्रदेय है। डाॅ. जोशी जी लिखते हैं - ’’डाॅ. विनय कुमार पाठक हिन्दी में पहले समीक्षक हैं, जिन्होंने स्त्री-विमर्श के मानदण्ड का निर्धारण किया है और समीक्षा को भी रचनात्मकता प्रदान की है।’’;(p-xxiv)

(’’सन् 1975 में संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ भारत सरकार के अनुबंध’’ की बात पर मुझे The UN Convention on the Rights of the Child, 1989 (UN - CRC) का स्मरण हो आता है जिस पर भारत सरकार ने 11 दिसंबर 1992 को हस्ताक्षर किया था और जिसकी वजह से भारत में बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए *THE JUVENILE JUSTICE (CARE AND PROTECTION OF CHILDREN) ACT, 2000 संक्षेप में (JJ ACT, 2000)  तथा बालकों के ऊपर होने वाले अत्याचारों और आपराधिक कृत्यों के प्रभावी रोकथाम के लिए*THE PROTECTION OF CHILDREN FROM SEXUAL OFFENCES ACT, 2012* la{ksi esa (POCSO ACT 2012) बनाये गए तथा ’बाल अधिकार संरक्षण आयोग’ की स्थापनाएँ की गई।

भारत में, हिन्दी साहित्य में बाल-साहित्य की न्यूनता जग जाहिर है। भारतीय फिल्म उद्योग की भी यही स्थिति है। इसी के मद्देनजर मैं कहना चाहूँगा कि अब समय आ चुका है कि भारत में ’’बाल-विमर्श’’ की परंपरा की भी स्थापना किया जाय, जिससे कि बाल मनोविज्ञान तथा बाल-समस्याओं पर आधारित साहित्य की कमी को पूरा किया जा सके और इस विकट और बेहद महत्वपूर्ण समस्या की ओर समाज का ध्यान आकृष्ट किया जा सके।)

डाॅ. दादू लाल जोशी ने अपनी उपर्युक्त स्थापनाओं में लगभग शब्द पर विशेष जोर दिया है। (’’अगर सारा का सारा नहीं तो लगभग सारा कार्यकलाप अंग्रेजी में ही चलता है।’’ तथा ’’लगभग न विकसित हुए, न लिखे गये।’’) इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि डाॅ. विनयकुमार पाठक द्वारा समकालीन स्त्री-विमर्श की परंपरा स्थापित करने के पूर्व और 1975 के पूर्व भी स्त्री विषयक विमर्श होते रहे हैं, चाहे वह ’संकीर्ण मानसिकता और शुद्ध ब्राह्मणी भाषा’ में ही क्यों न होती रही हो। स्त्री-विमर्श के संदर्भ में डाॅ. दादू लाल जोशी जी का यह कथन कि - ’वह अंग्रेजी पृष्ठभूमि वाले भारतीय स्त्री समाज’ तक ही सीमित होकर रह गई थी, भी उपरोक्त लगभग के दायरे में आकर अपर्याप्त लगता है।

प्रथम अध्याय में डाॅ. जोशी जी ने लिखा है - ’’समकालीन स्त्री-विमर्श पूर्ववर्ती स्त्री-विमर्श से अलग अपनी पहचान के बिन्दु रखता हैं। समकालीन स्त्री-विमर्श अपने पूर्ववर्ती स्त्री-विमर्श से जिस आधार पर अलग हुआ उसकी चर्चा विभिन्न विद्वानों द्वारा बड़े-बड़े दावों के साथ की गयी है, लेकिन इससे वस्तुस्थिति को समझने में विशेष सहायता नहीं मिली।’’(p-35)

डाॅ. दादू लाल जोशी अपनी प्रस्तावना में लिखते हैं - ’’स्त्री-जीवन की समस्याओं को केन्द्र में रखकर कुछ शोध-प्रबंध लिखे गये हैं, लेकिन स्त्री-विमर्श के मानदण्ड व इतिहास पर प्रकाश नहीं डाला गया है।’’(p-xxiii)
 
स्पष्ट है कि हिन्दी साहित्य में स्त्री-विमर्श की परंपरा तो रही है, परंतु इसके मानदण्ड व इतिहास पर प्रकाश नहीं डाला गया है। डाॅ. दादू लाल जोशी जी लिखते हैं - ’’हिन्दी साहित्य में बदलाव की दिशा 1960 ई. के बाद ही दिखायी देने लगती है। 1965 ई. तक पहुँचते-पहुँचते स्त्री-विमर्श का यह बदला हुआ रूप पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है। समकालीन स्त्री-विमर्श के प्रारंभिक वर्षों (1960-65) के बीच हमारे देश में व्यक्ति की जीवन-स्थितियाँ बहुत तेजी से बदलीं।’’(p-36)

डाॅ. दादू लाल जोशी ने पूर्व में कहा है - ’1975 के पहले तक ऐसे कोई विचार या सिद्धांत सजग, सचेत विमर्श की तरह लगभग न विकसित हुए, न लिखे गये’ और अब वे कहते हैं - ’1965 ई. तक पहुँचते-पहुँचते स्त्री-विमर्श का यह बदला हुआ रूप पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है।’

तिथियों में इस तरह की हेराफेरी से मेरे जैसे मूढ़मति पाठक की बुद्धि चकराने लगती है।प्रथम अध्याय में ’समकालीन बोध’ को समझाने का प्रयास किया गया है। बहुत सारे विद्वानों के अभिमत दिये गये हैं। डाॅ. दादू लाल जोशी ने समकाीन बोध पर अपना मंतव्य तो पहले ही दे दिया है। डाॅ. दादू लाल जोशी के अनुसार - ’’जब हम समकालीन या समकालीनता की बात करते हैं, तो उसमें हम युग विशेष की प्रत्येक प्रकार की स्थितियों अर्थात् - समूचे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक जीवन का समावेश कर लेते हैं। इसी को ’युग-परिवेश’, ’युग-परिदृश्य’ या ’युग-परिप्रेक्ष्य’ भी कहते हैं।’’ इसी पृष्ठ पर वे आगे लिखते  हैं - ’’यह मान्य है कि अपने समय की प्रवृत्तियों को पहचानने, व्यक्ति और समाज की विषम स्थितियों को समझने और गहरी संवेदनशीलता के साथ युग-चेतना से संपृक्त होने का पर्याय समकालीनता है।’’(p-xix)
समकालीन बोध पर प्रथम अध्याय में विभिन्न विद्वानों की कई तरह की और भी परिभाषाएँ दी गई हैं। किसी विषय पर अलग-अलग  विद्वानों की अलग-अलग परिभाषाएँ स्वाभाविक हो सकती हैं परन्तु एक ही विषय को एक ही विद्वान के द्वारा अलग-अलग ढंग से परिभाषित करना, जैसा कि ऊपर उद्धृत किया गया है, क्या है, क्यों है, मुझे समझ में नहीं आया। डाॅ. दादू लाल जोशी करे भी तो क्या, साहित्य सहित राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र और भी शास्त्रों की परंपरा ही यही है। किसी विषय पर हर व्यक्ति की समझ, सोच उनके विचार और दृष्टिकोण अलग-अलग हों तो या तो यह विषय की व्यापकता के कारण होता होगा या उस विषय में उलझाव, अस्पष्टता आदि कारणो से अथवा विद्वानों की अतिबौद्धिकता ज्ञापित करने की लालसा की वजह से। समकालीन बोध और समकालीनता पर इतनी सारी परिभाषाएँ पढ़कर भी मैं यह समझ नहीं पाया कि एक ही कवि की कुछ कविताएँ छायावादी और कुछ कविताएँ समकालीन कैसे हो जाती हैं और पिछले युग की एक ही समय के कवियों में किसी कवि की रचनाओं में समकालीन प्रवृत्तियाँ कहाँ से आ जाती हैं। यह भी समझ में नहीं आती कि समकालीन प्रवृत्तियाँ वर्तमान की सीमाओं का अतिक्रमण करके बाल्मीकि तक कैसे पहुँच जाती हैं।    

फैराडे ने डायनमो का सिद्धांत दिया - ’जब कोई कुण्डली और चुम्बक एक दूसरे के सापेक्ष गति करते हैं तो कुण्डली में विद्युत धारा प्रवाहित होने लगती है।’ फैराडे के बाद अनेक वैज्ञानिक आते रहे हैं, परन्तु डायनमो के सिद्धांत की इससे भिन्न और कोई परिभाषा नहीं बन पाई।

डाॅ. दादू लाल जोशी ने स्त्री-विमर्श को परिभाषित करते हुए लिखा है - ’’समकालीन स्त्री-विमर्श अपने समय की जीवन्त समस्याओं की समझ और सक्रिय हिस्सेदारी का जागरूक विमर्श है, जो सामाजिक संरचना, धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक व्यवस्था के उस सांचे को तोड़ने का सार्थक प्रयत्न करता है, जिसमें जनतंत्र की दुहाई तो खूब दी जाती है, लेकिन सारी सुविधाएँ पुरूष वर्गोन्मुखी होती हैं। हम कह सकते हैं कि  समकालीन स्त्री-विमर्श, यथास्थिति का विरोध करता हुआ असंगतियो के स्पष्ट उद्घाटन द्वारा, अपने रचनात्मक हस्तक्षेप की जनतांत्रिक पद्धति को सही मायने में उभारने और सँवारने वाला विमर्श है। यह यथास्थिति का केवल भाण्डाफोड़ ही नहीं करता बल्कि उसे बदलने में सक्रिय साझेदारी भी निभाता है। जनमानस को बुनियादी हक की प्राप्ति के लिए प्रबुद्ध करता है और अपने तार्किक, ठोस विश्लेषणों द्वारा हमें झकझोरता है, ताकि हम सब वैषम्यमूलक, पुरूषवादी सभ्यता की शोषक व्यवस्था से जूझ सकें। इसे ही समीक्षकों ने समकालीन स्त्री-विमर्श की चेतना स्वीकार किया है।’’(p-xx)

डाॅ. दादू लाल जोशी की स्त्री-विमर्श पर दूसरी परिभाषा इस प्रकार है - ’’एक छोर पर अमूर्तन की तरह एक व्यापक अस्तित्व रखने के बावजूद अपने ठोस और वास्तविक अवतार में भारतीयता भी कोई एक भारतीयता नहीं है। इसी तरह अनेक पितृसत्ताएँ भी हैं और अनेक स्त्री-विमर्श भी। अन्य सभी विमर्शों की तरह स्त्री-विमर्श भी इसी अर्थ में एक सिरे पर भिन्नताओं का समारोह है।’’(p-230)

प्रथम और तृतीय अध्याय में स्त्री-विमर्श की, अलग-अलग विद्वानों की और भी परिभाषाएँ दी गई हैं। इतनी सारी परिभाषाओं को पढ़कर मुझे तो कई बार बेहोशी आने लगी थी।प्रथम अध्याय में ही पृष्ठ 36 से लेकर पृष्ठ 47 तक स्त्री-विमर्श के मानदण्ड को भलीभांति और विस्तार से समझाया गया है। अध्याय 3, स्त्री-विमर्श: परिभाषा और परिव्याप्ति में स्त्री-विमर्श की और भी परिभाषाएँ दी गई हैं। इसी अध्याय के पृष्ठ 101 से 103 तक स्त्री-विमर्श की अठारह मूल प्रवृत्तियों का उल्लेख भी है। परंतु स्त्री-विमर्श के इतिहास को न तो स्पष्टता पूर्वक समझाया गया है और न ही इसका काल विभाजन किया गया है। इन्हीं पृष्ठों में (पृ. 45-46 में) शापेनहावर के स्त्री विषयक विचार अंग्रेजी में दिया गया है। अंग्रेजी भाषा में उद्धृत इस विचार का हिन्दी अनुवाद भी फुट नोट के रूप में दिया जाना आवश्यक था, क्योंकि शायद परंपरा इसी प्रकार की हैं।

डाॅ. जोशी के मतानुसार 1965 ई. अथवा 1975 ई. के बाद समकालीन स्त्री-विमर्श की परंपरा निर्मित होती है। परन्तु इसके पूर्व भी हिन्दी साहित्य में पौराणिक स्त्री पात्रों - यशोधरा, उर्मिला, ऊर्वशी पर काव्य लिखे गये; श्रद्धा और इड़ा; महाभारत में कुंती और द्रौपदी को लेकर स्त्रियों की समस्याओं पर चर्चा की गई हैं। रामायण में सीता हैं। रीतिकाल में तो स्त्रियाँ साहित्य के केन्द्र में ही रही हैं। वैदिक साहित्य में भी कहीं न कहीं स्त्रियाँ होगी ही। नाच्यौ बहुत गोपाल भी है। इन कालखण्डों और इन विमर्शों को परिभाषित करना क्या आवश्यक नहीं था। डाॅ. दादू लाल जोशी ने अपने इस शोध ग्रन्थ में इनमें से कुछ को, अध्याय 3, स्त्री-विमर्श: परिभाषा और परिव्याप्ति के प्रारंभिक पृष्ठों में स्पर्ष जरूर किया है, परन्तु स्त्री-विमर्श का इतिहास बताने का कोई स्पष्ट प्रयास नहीं किया है। 1965 ई. अथवा 1975 ई. के पहले यदि किसी प्रकार का स्त्री-विमर्श नहीं था तो इसकी स्पष्ट घोषण होनी चाहिए और यदि था तो उसका विधिवत उल्लेख और नामकरण।

इस शोध प्रबंध में दो बेहद मूल्यवान सामग्रियाँ हैं। इनमें पहला है - अध्याय दो में डाॅ. विनय कुमार पाठक का जीवन परिचय और रचनाधर्मिता। डाॅ. विनय कुमार पाठक मेरे आदर्श ही नहीं, प्रेरक, मार्गदर्शक और आशीर्वादक भी हैं; और हर व्यक्ति अपने आदर्श के विषय में जानना चाहता है। मेरे जैसे और भी होंगे जिन्हें यह अध्याय उपयोगी लगेगा। यहाँ पर डाॅ. दादू लाल जोशी ने बेहद पुण्य का काम किया है। उन्हें साधुवाद।

इस शोध प्रबंध में दूसरी बेहद मूल्यवान सामग्री हैं इस ग्रन्थ के विभिन्न पृष्ठों में बिखरी हुई विभिन्न कवियों की स्त्री विषयक कविताएँ। लेकिन खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि इन कविताओं के संदर्भों-भावार्थों को न तो उसके पूर्ववर्ती पँक्तियों के साथ जोड़ा गया है और न ही पश्चातवर्ती पँक्तियों के साथ। मेरा मानना है कि केवल इन्हीं कविताओं को लेकर समकालीन स्त्री-विमर्श की बेहद उपयोगी और सर्वथा मौलिक सामग्री दी जा सकती है। इस ग्रन्थ के विभिन्न पृष्ठों में बिखरी हुई विभिन्न कवयित्रियोें-कवियों की स्त्री विषयक ये कविताएँ निहायत ही संग्रहणीय हैं।

इस ग्रंथ के चैथे अध्याय: स्त्री-विमर्श और परिवेश, में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक परिवेश की चर्चा की गई है। इस अध्याय में समकालीन स्त्री-विमर्श और डाॅ. विनय कुमार पाठक के प्रदेय, की न्यून उपस्थिति से यह अध्याय मुझे बेहद बोझिल लगा। यह अध्याय इन विषयों के विद्यार्थियों के लिए जरूर उपयोगी साबित हो सकता है।

ग्रंथ के पाँचवे अध्याय, ’समकालीन स्त्री-विमर्श: डाॅ. विनय कुमार पाठक का प्रदेय’, में आदरणीय डाॅ. पाठक के अवदानों को क्रमवार और तार्किक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इस अध्याय से हमें डाॅ. पाठक के जीवन-उद्देश्यों और उनके व्यक्तित्व को और भी अधिक सूक्ष्मता से समझने का अवसर मिलता है। यह अध्याय इस ग्रंथ की आत्मा की तरह है।

मुझे शोध और शोधकार्य की प्रक्रियाओं के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं है। शोध ग्रंथ भी नहीं पढ़ा हूँ। बहुत पहले मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय के किसी प्राध्यापक का मुक्तिबोध पर आधारित शोध ग्रंथ पढ़ा था। प्रो. (डाॅ.) जगदीश चन्द्र झा की ’आधुनिक यूरोप’ भी पढ़ा हूँ। अभी-अभी डाॅ. यशेश्वरी ध्रुव की ’छत्तीसगढ़ी कहानियों में सांस्कृतिक चेतना’ पढ़ा है और अब डाॅ. जोशी जी की यह कृति। अंतिम दो कृतियों में समाहित सामग्रियों में मैंने संदर्शित ग्रंथों से उद्धृत वाक्यों को गिनने का प्रयास किया जो मात्रा में 60 प्रतिशत से भी अधिक लगीं। इस विषय पर मैंने कुछ विद्वानों से चर्चा किया। पता चला कि शोध कार्य की यही मान्य प्रक्रिया है, ऐसा नहीं करने से शोध ग्रंथ मान्य नहीं होते हैं।

डाॅ. जोशी जी के इस ग्रंथ के कुछ ही पृष्ठों में प्रूफ की गलतियाँ रह गई हैं जो नगण्य हैं। फिलहाल व्याकरण और भाषा के निकशों को ध्यान में रखते हुए इन वाक्यों पर गौर किया जा सकता है -

’’जब हम समकालीन या समकालीनता की बात करते हैं, तो उसमें हम युग विशेष की प्रत्येक प्रकार की स्थितियों अर्थात् - समूचे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक जीवन का समावेश कर लेते हैं। इसी को ’युग-परिवेश’, ’युग-परिदृश्य’ या ’युग-परिप्रेक्ष्य’ भी कहते हैं।’’(p- xix)  तथा - ’’....युग विशेष की प्रत्येक प्रकार की स्थितियों अर्थात् - सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक के समावेश की बात कही गयी है।’’(p- xxv)  
धन्यवाद।
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16 - कबीरपंथी होने की सार्थकता मनुष्य होने में है 

(2 जून 2015 को कबीर प्राकट्य दिवस के अवसर पर शंकरपुर, राजनांदगाँव में निवेदित विचार)

आदरणीय संतों एवं मित्रों, कबीर साहब ने कहा है -
’सब कहते कागद की लेखी,
मैं कहता आँखन की देखी।’

कागद की लेखी आप सभी जानते हैं, और मुझसे बेहतर जानते हैं। उन बातों को दुहराने से कोई लाभ होगा, इसे मेरा मन स्वीकार नहीं करता; अतः मैं अपसे वही बातें कहूँगा जो मेरी अपनी आँखन देखी है। सद्गुरू कबीर प्राकट्य दिवस पर इस चर्चा की सार्थकता भी इसी में है। मैं अपने कुछ अनुभव आपके साथ साझा करना चाहूँगा।

दो साल पहले की बात है, भिलाई में एक मित्र के घर चाय का दौर चल रहा था। मित्र महोदय ने अचानक एक अनापेक्षित प्रश्न उछाल दिया - ’मृत्यु के बारे में आप क्या जानते हैं?’

प्रश्न सुनकर मैं अवाक रह गया क्योंकि इसके लिए मैं तैयार नहीं था। कुछ झण पश्चात् मैंने कहा - ’मित्र! मृत्यु के बारे में तो मैं कुछ भी नहीं जानता क्योंकि आज तक मैं कभी मरा ही नहीं हूँ। इसीलिए मुझे इसका कोई अनुभव नहीं है।’

चौकने की बारी अब मित्र की थी। उनसे कुछ कहते नहीं बना। कुछ समय तक खामोशी छायी रही।

इस तरह के दार्शनिक प्रश्न के द्वारा हम सामनेवाले की योग्यता को माप भी सकते हैं और अपनी योग्यता का लोहा भी मनवा सकते हैं। हमारी सोच और हमारे पूर्वाग्रह सामान्यतः ऐसी ही होती होंगी। मित्र महोदय की योजना क्या थी, वे ही बेतर जानते होंगे। खामोशी को तोड़ते हुए मैंने कहा - ’मित्र! इस विषय पर आप भी घंटे-दो घंटे का बढ़िया प्रवचन कर सकते हैं और मैं भी, परन्तु उस प्रवचन में न तो आपका अनुभव होगा और न ही मेरा। वही सब कुछ होगा जिसे या तो हमने कहीं से पढ़ा है या सुना है या फिर वे काल्पनिक बातें होंगी, जो हमारे विचारों में और कल्पनाओं में सामान्यतः आते होंगे। जाहिर है, ये सब बातें सत्यता से परे होंगी। सदियों से लोग ऐसा करते आ रहे हैं परन्तु क्या मृत्यु को कोई जान पाया है? मृत्यु को तो मरनेवाला ही जान पाता होगा। और यह सच है कि मरने के बाद आपना अनुभव बताने के लिए लौटकर कोई आता नहीं है। मेरा मानना है कि जिस बात का हमें कोई अनुभव न हो उस पर कोई सार्थक चर्चा नहीं हो सकती। ऐसी चर्चाओं से से कोई लाभ नहीं हो सकता। मृत्यु पर चर्चा करके न तो मृत्यु को जाना जा सकता है और न ही जीवन को। और न ही इन्हें सुंदर बनाया जा सकता है। कुछ करने और कुछ बनाने के लिए कर्म की आवश्यकता होती है। मृत्यु में कोई कर्म संभव नहीं है। कर्म जीवन में संभव है। जीवन का हमें अनुभव है। जीवन की चर्चा करके हम अपने जीवन और मृत्यु दोनों को ही सुंदर बना सकते हैं। परन्तु हमने आज तक कभी जीवन की बातें की ही नहीं, अनुभव की बातें की ही नहीं।

तथागत ने ऐसे प्रश्नों को अव्याकृत कहा था और अव्याकृत विषयों पर वे चर्चा नहीं करते थे।

आदरणीय संतों एवं मित्रों, कबीर साहब ने भी जीवन भर जीवन की बातें कही है, की है। जीवन को सुंदर और मृत्यु को आनंददायी बनाने की बातें की है। उन्होंने जो कुछ कहा है, अपने अनुभव की बातें कहा है। उन्होंने जो कुछ कहा है, उसे अपने जीवन में उतारा भी है। इस प्रकार उन्होंने अपने जीवन को सुंदर और मृत्यु को आनंददायी बनाकर दिखाया भी है। रोते हुए तो हम आते ही हैं, इस पर हमारा कोई बस नहीं है, परन्तु जाते वक्त हम हँसते हुए जा सकें, यह हमारे ही बस में है। ’कुछ ऐसी करनी कर चलो, आप हँसें जग रोये।’ इसका जतन हमें करना चाहिए, कबीर को मानने की सार्थकता इसी में है। उनका एक पद है -
’राम नाम रस भीनी चदरिया
दास कबीरा ने ओढ़ी चदरिया,
ज्यों की त्यों धर दीन्हीं चदरिया।’
’ईश्वर ने हम सबको शरीर रूपी यह चादर दिया हुआ है। कबीर साहब ने इसे राम नाम के रस से (प्रेम-रस से) सिक्त किया, सुवासित किया। धर्म, संप्रदाय, जाति, छुआछूत, ऊँच-नीच, पाखण्ड, आडंबर, आदि के दागों से बचाकर रखा और इसीलिए वे इस चादर को ज्यों की त्यों लौटा सके।’
क्या हम भी ऐसा नहीं कर सकते?

आदरणीय संतों एवं मित्रों, आँखन देखी एक बात और। पिताजी के निधन पर  चौंका हुआ। चैंका स्थल पर मैंने पिताजी का फ्रेम किया हुआ फोटो रखना चाहा। महंत साहब ने इसकी अनुमति नहीं दिया। चौंका के बाद मैंने महंत साहब से इसका कारण जानना चाहा। महंत साहब ने कहा - कबीरपंथ में निर्गुण ईश्वर की उपासना होती है। मैंने कहा - साहेब! हम सब कबीरपंथियों के घरों में कबीर साहब की, धर्मदास साहब और उनके वंशजों की बडीे-बड़ी तस्वीरें दीवारों में टंगे होते हैं। रोज उसकी पूजा-आरती होती है। इन फोटों को हम दामाखेड़ा से ही खरीदकर लाते हैं। इसका विरोध तो आपने कभी नहीं किया। कबीर साहब निर्गुणी और ज्ञानमार्गी संत थे, पूरी दुनिया में यही मान्यता है। यह सच है। परंतु हमने तो कबीर साहब को ही ईश्वर का अवतार मान लिया है। कबीर की पूजा हम इसी रूप में करते हैं। इस तरह हम तो सगुण भक्तिधारा के कबीरमार्गी शाखा के अनुयायी हो गये। कबीर साहब निर्गुणी और ज्ञानमार्गी और हम उनके अनुयायी सगुण उपासक और भक्तिमार्गी। यह एक विडंबना नहीं है?

महंत साहब ने मेरे इस शंका का निवारण करने के लिए लगभग घंटे भर का प्रवचन-उपदेश दिया। परंतु मुझ जैसे मूढ़ के खाली खोपड़ी में उनकी कुछ भी बातें समा न सकीं।

उस दिन मैंने महंत साहब से एक और प्रश्न पूछा। ’एकमात्र बीजक ही कबीर साहेब का प्रमाणिक ग्रंथ माना जाता है। इसमें  चौंका-आरती का कहीं कोई विधान नहीं है। कान फूॅँकने और कंठीमाला पहनाने की विधि का भी कोई उल्लेख नहीं है। यह सब कहाँ से आया?’ महंत साहब ने कहा - यह सब धनी धर्मदास साहब का बनाया हुआ है।

मैंने कहा - तब तो हम धर्मदास पंथी हुए, कबीर पंथी नहीं। सुनकर महंत साहब बहुत विचलित हुए। प्रगट में क्रोधित नहीं हुए पर उनका क्रोध उनके व्यवहार से प्रगट हो रहा था। उसने कहा - लगता है, आप भटके हुए हैं। आपके खानपान और विचार शुद्ध नहीं लगते। आप कंठी माला नहीं पहने हो, चंदन का टीका भी नहीं लगाते हो, गुरू बनाये हो कि नहीं? कैसे कबीर पंथी हो?
कबीर साहब ने कहा है -
बैस्नो भया तो कया भया, बूझा नहीं विवेक।
छाप-तिलक बनाईकर, दग्ध्या लोक अनेक।।

हम भी पाहन पूजते होते, हिन्दू बनके रोज।
सद्गुरू की कृपा भयी, डारया सिर के बोझ।।

टोपी पहिरे, माला पहिरे, छाप-तिलक अनुमाना।
साखी शब्दे गावत भूले, आतम खबर न आना।।
कबीर साहब के इन पदों का उल्लेख करते हुए मैंने कहा - ’साहेब, जिस प्रकार आज मैंने अपने तीन साल के बेटे को आपका शिष्य बनाया है, ठीक वैसा ही, कभी मेरे माता-पिता ने भी मेरे साथ किया होगा। रही कंठीमाला की बात, वह तो मैं तो पहनता ही था, घर के दीवरों, दरवाजों, खिड़कियों, बर्तन-भांड़ों, सूपा-बाहरी को भी  पहनाता था। चंदन का टीका भी लगाता था। परन्तु न जाने कब और कैसे सद्गुरू की कृपा हुई और सिर के ये सारे बोझ जो सबसे बड़े बंधन भी थे, आप ही आप छूट गये।

आप पूछते हैं - ’गुरू बनाया कि नहीं?’ साहेब! मैं तो रोज ही कोई न कोई गुरू बनाता हूँ। ये पेड़-पौधे, नदी-पहाड़, खेत-खार, कीट-पतंग, गुनगुनाता हुआ यह हवा, मस्ती में नाचती -फुदकती हुई ये पक्षियाँ, रोज ही इनमें से कोई न कोई, सिर का बोझ कम करनेवाला एक संदेश मुझे दे जाता है और इन्हें मैं गुरू बना लेता हूँ। ये ऐसे गुरू हैं जिन्हें कभी गुरूदक्षिणा भी नहीं देना पड़ता।

साहेब! यदि मस्जिद की मीनार पर चढ़कर मुल्ला का जोर-जोर से अजान पढ़ना व्यर्थ है तो  चौंका आरती में झांझ-मजीरे का यह कानफोड़ू आवाज सार्थक कैसे है? पत्थर पूजने से ईश्वर नहीं मिलता तो आटे का इतना बड़ा दीपक बनाकर पूजने से ईश्वर कैसे मिल सकता है। ज्ञान या जीवात्मा का प्रतीक चाहिए तो मिट्टी का छोटा सा दीया ही काफी है।

मेरी बातें सुनकर महंत साहब काफी नाराज भी हुए और कई तरह से स्पष्टीकरण देते रहे।
आदरणीय संतों और मित्रों! कबीर साहब की मुक्ति, आसक्तियों से मुक्ति में निहित है। आसक्तियाँ हमारे बंधन हैं। सद्गुरू हमें इन बंधनों से मुक्त होने में हमारी सहायता करते हैं। बांधनेवाला व्यक्ति कभी भी सद्गुरू नहीं हो सकता।

आदरणीय संतों और मित्रों! आशकरण अटल की एक बड़ी प्यारी कविता है - ’क्या हमारे पूर्वज बंदर थे?’
एक मित्र हैं। वे खेती नहीं करते, व्यापर करने वाले संप्रदाय से संबंधित हैं। किसी चर्चा के दौरान एक दिन उन्होंने कहा - खेती में बड़ी हिंसा होती है, इसलिए हम लोग खेती नहीं करते हैं। मैंने कहा - बंदर जिस दिन खेती करना सीख लेंगे, उस दिन उनके पास भी लिपि होगी, भाषा होगी, धर्मग्रंथ होंगे, धर्म, दर्शन, साहित्य और सभी प्रकार की कलाएँ होंगी और उनका अपना ईश्वर भी होगा। उनका ईश्वर हमारे ईश्वर के समान नहीं होगा। उनका ईश्वर उनके समान ही होगा। हमारे ही ईश्वर एक जैसे कहाँ होते हैं?

मित्र ने कहा - क्या मतलब? ऐसा कैसे कह सकते हो?
मैंने कहा - ऐसा इसलिए कह सकता हूँ कि मनुष्य जब खेती करना नहीं जानता था, वह भी बंदरों के समान ही था। मनुष्य ने खेती करना सीखा। उसके पास आज धर्म, दर्शन, सभ्यता, संस्कृति, और ज्ञान-विज्ञान, सब कुछ है। बाकी पशु खेती करना नहीं सीख पाये, उनके पास ये नहीं हैं। धर्म, दर्शन, सभ्यता, संस्कृति, और ज्ञान-विज्ञान, के मामले में हम आज जहाँ हैं वह सब खेती की बदौलत है। भूख कभी भी हमें पशु के स्तर से ऊपर उठने नहीं देती है। पेट अनाज से भरता है और अनाज खेती से आता है। खेती के लिए ज्ञान की आवश्यकता पड़ती है, कौशल और तकनीक की आवश्यकता पड़ती है। यह ज्ञान केवल किसानों के पास होता है। किसानों के इसी ज्ञान की नींव पर आज के हमारे धर्म, दर्शन, सभ्यता, संस्कृति, और ज्ञान-विज्ञान टिके हुए हैं। यह ज्ञान सभी ज्ञानों से श्रेष्ठ है। किसानों के लिए उनके खेत, उनके कृषि के उपकरण, उनके हल-बैल, आदि सब ईश्वर तुल्य है। उनके लिए अनाज अन्नपूर्णा की साक्षात मूर्ति है। किसान लाभ-हानि का अर्थशास्त्र नहीं जानता। उनके लिए कृषि एक पवित्र कार्य है। इसमें हिंसा देखना मूर्खता के सिवा और कुछ भी नहीं है। कृषि और कृषकों की महानता को हमारे नेताओं ने पहचान लिया, मान लिया, लेकिन हमारे धर्माचार्यों की आँखों में अभी भी अपने थोथे ज्ञान के अहंकार की पट्टी बंधी हुई है।

आदरणीय संतों और मित्रों! कबीर साहब ने सदा इसी व्यावहारिक ज्ञान की प्रतिष्ठा की है। उन्होंने सदा हमें पोथी आधारित ज्ञान की व्यर्थता से अवगत कराया है।

’क्या हमारे पूर्वज बंदर थे’ एक हास्य प्रधान परन्तु बड़ी सुंदर और मार्मिक कविता है। डार्विन का सिद्धांत है - मनुष्य के पूर्वज बंदर थे। बच्चे ने स्कूल में यह सिद्धांत पढ़ा। घर आकर विभिन्न लोगों से पूछा - क्या हमारे पूर्वज बंदर थे? सबसे अलग-अलग और विचारोत्तेजक जवाब मिले। अंत में उसने ओशो से पूछा - कया हमारे पूर्वज बंदर थे? ओशो ने कहा -
’प्रश्न सामयिक है, मजेदार है
लेकिन एक बार बंदर से भी पूछकर देख लो
कि क्या उसे आज के मनुष्य का
पूर्वज बनना स्वीकार है?

वह इन्कार कर देगा, शर्म के मारे डूब मरेगा
या कोई आदमी जैसा चालाक बंदर रहा
तो अदालत में मानहानि का दावा कर देगा
कि हुजूर!
हम बंदरों की प्रतिष्ठा को मिट्टी में मिलाया जा रहा है
इस भ्रष्ट और हिंसक मनुष्य को
हमारा वंशज बताया जा रहा है।

मनुष्य होना एक दुर्लभ घटना है
मनुष्य अभी मनुष्य नहीं बना है।’

अंत में कवि कहते हैं -
’हरएक की बात ने मन को छुआ
उत्तर तो नहीं मिला, पर एक और प्रश्न उठ खड़ा हुआ
अब मैं यह नहीं पूछता कि क्या आदमी पहले बंदर था?
वह प्रश्न खड़ा है वहीं का वहीं
अब मैं पूछता हूँ - आदमी आदमी भी है कि नहीं?’

आदरणीय संतों और मित्रों! आप भी इस प्रश्न का उत्तर सोचें। अपने आप से पूछें - क्या हम आदमी बन पाये हैं। कबीर साबह आजीवन आदमी को आदमी बनाने का प्रयास करते रहे। यदि कुछ अंशों में ही सही, यदि हम आदमी बन सके तो ही हमारा कबीरपंथी होना सार्थक हो सकता है।
सकल संत को साहेब बंदगी साहेब।
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17 - कबीर जयंती 


20 जून 2016 
समस्त आचार्यजन, आत्मीयजन
हम कबीर पंथियों में कबीर साहब की यह आरती प्रचलित है

आरती हो साहेब आरती हो।
आरती ग़रीबनिवाज, साहेब आरती हो।
आरती दीनदयाल साहेब आरती हो।
ज्ञान आधार विवेक की बाती, सुरति जोत जहँ जाय।
आरती करूँ सतगुरू साहेब की, जहाँ सब संत समाज।
दरस-परस गुरू चरण-शरण भयो, टूटि गयो जम के जाल।
साहेब कबीर संतन की कृपा से,
भयो है परम परकाश।

इसका शाब्दिक अर्थ इस प्रकार हो सकता है:-
’’आरती करता हूँ, हे ईश्वर! तुम्हारी आरती करता हूँ।
गरीबों पर दया करने वाले, हे ईश्वर! तुम्हारी आरती करता हूँ।
उस दीपक से (शरीर रूपी दीये से) आरती करता हूँ जिसमें ज्ञान का तेल है, विवेक की बाती है और जिससे सुरति की ज्योति निकल रही है।

ईश्वर स्वरूप हे सद्गुरू! संत-समाज के बीच तुम्हारी आरती करता हूँ।
हे सद्गुरू! तुम्हारे दर्शन हुए, तुम्हारा स्पर्श हुआ, और तुम्हारेे चरणों में शरण मिलने से, जम के फाँस टूट गये।
हे ईश्वर! हे कबीर! संतों की कृपा से परम प्रकाश प्राप्त हुआ है।
गरीबों पर दया करने वाले, हे ईश्वर! तुम्हारी आरती करता हूँ।
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इस आरती में कुछ अनमोल शब्द हैं, जिधर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहूँगा -
पहला शब्द है -

ज्ञान-आधार अर्थात ज्ञान रूपी तेल।
ज्ञान का अर्थ क्या है? .......... जिसे हमने किताबों में पढ़कर रट लिया? .......... जिसे हमने किसी से सुऩकर रट लिया? ........ किताबों में लिखी हुई जन्म-मृत्यु, आत्मा-परमात्मा, धर्म-दर्शन, हिंसा-अहिंसा और स्वर्ग-नर्क संबंधी विषयों की कपोलकल्पित जानकारियों को रट लेना और इन विषयों पर शब्दों की जुगाली करना; क्या यही ज्ञान है? .......... क्या विज्ञान और कलाओं, जैसे - गणित, भौतिकी, रसायन, जीवविज्ञान, अंतरिक्ष विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान, अभियांत्रिकी, अर्थशास्त्र, मानवशास्त्र जैसे विषयों का अध्ययन और जानकारी को ज्ञान में शामिल नहीं किया जा सकता है? .........  प्रकृति और उसके रहस्यों के बारे में, जिसके बारे में कहा जाता है कि यदि प्रकृति के रहस्यों की तुलना समुद्र से की जाय तो उसके संबंध में अब तक मनुष्य का अर्जित ज्ञान केवल एक बूंद के बराबर है, क्या इस एक बूँद को ही जानना ज्ञान है?

वैज्ञानिक कहते हैं - संपूर्ण ब्रह्माण्ड में स्पेस (अंतरिक्ष) की तुलना में द्रव्य बहुत कम है। ब्रह्माण्ड में अपने विभिन्न रूपों में सबसे अधिक मात्रा ऊर्जा की है जो स्पेस (अंतरिक्ष) में भी है और द्रव्य में भी। यह सबमें व्याप्त है। संपूर्ण ब्रह्माण्ड ऊर्जा से भरा हुआ है। अंतऱिक्ष, और काल अर्थात् (स्पेस एण्ड टाईम) के बारे में हमारी जानकारी लगभग शून्य है। और दूसरी ओर हमें अपने इस किताबी - सीमित, अप्रमाणित, कपोलकल्पित अनुपयोगी, बातों के रूप में अर्जित ज्ञान पर बड़ा गर्व है। उस सीमित ज्ञान पर जिससे न तो अन्न का एक दाना पैदा किया जा सकता है, न कोई निर्माण कार्य किया जा सकता है, और न हीं जीवन को सुखमय और सुंदर बनाया जा सकता है।

ज्ञान क्या इतना सीमित और इतना अनुपयोगी हो सकता है? तथाकथित आभिजात्य, श्रमचोरी करने वाले मुफ्तखोरों की कपोलकल्पित बातों को ज्ञान मानकर मानव समाज का कौन सा भला हो सका है? समाज के उत्पादक वर्ग के विभिन्न समूहों के यथा - कृषकों, दस्तकारों, कारीगीरों, वनवासियों - के द्वारा अर्जित ज्ञान को, जो जीवन के लिए अविकल्पनीय अन्न का उत्पादन करता है, जो प्रकृति के रहस्यों पर से परदा उठाता है; को हम आज तक ज्ञान मानने से इन्कार करते क्यों आ रहे हैं। इतने विस्तृत ज्ञान की उपेक्षा करके क्या हमने अपने ज्ञान को सीमित नहीं कर लिया है?

समाज के बहुसंख्यक लोगों द्वारा अर्जित ज्ञान के इन भंडारों को आज तक मान्यता और विस्तार क्यों नहीं मिला? ......... अपने ज्ञान के क्षेत्र का विस्तार हम यहाँ तक क्यों नहीं कर सके? .......... क्योंकि इसके सारे अनुसंधाता और सर्जक; समाज के वे लोग हैं, जिन्हें शूद्र कहकर तिरस्कृत और अपमानित किया गया है। क्योंकि इनके द्वारा अर्जित ज्ञान को ज्ञान स्वीकार कर लेने का मतलब यह होता कि समाज में इनका स्थान सर्वोच्च हो जाता। क्योंकि तब श्रम की चोरी करनेवाला तथाकथित आभिजात्य वर्ग श्रम, और श्रम की चोरी के आरोपों से बच नहीं पाता। क्योंकि तब श्रम और श्रमवीरों का शोषण करनेवालों को न तो शोषण के उपकरण मिल पाते और न ही ये अपने शोषण के दुष्कृत्यों को औचित्यपूर्ण ही सिद्ध कर पाते।

वनों और पहाड़ों में निवास करनेवाले लोगों के पास क्या ज्ञान नहीं होता है? ......... कृषकों के पास क्या ज्ञान नहीं होता है?

भारत के अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह की जनजातियों को अण्डमान और निकोबार की जनजातियाँ कहते हैं। इनमें छः प्रमुख जनजातियाँ हैं। डॉक्टर राव का कहना है कि ’इन जनजातियों को प्राकृतिक आपदा का अनुमान पहले से हो जाता है क्योंकि वे जीव-जंतुओं और प्रकृति के संकेतों को समझते हैं। यही वजह है कि इन जनजातियों में किसी को कोई क्षति नहीं पहुँची है।’ वे कहते हैं कि ’जनजातियों के इस दुर्लभ ज्ञान को दस्तावेज के रूप में एकत्र किया जाना चाहिए जिसके आधार पर तटीय इलाकों में सुरक्षा और चेतावनी के इंतजाम किए जा सकते हैं।’ ......... कवि लीलाधर मंडलोई ने अपनी किताब ’काला पानी’ में जारवा समुदाय पर विस्तार से लिखा है। मंडलोई के अनुसार अंडमान द्वीप समूह में नीग्रो मूल की चार दुर्लभ जनजातियाँ हैं, जारवा इनमें से एक है. ’इनकी जीवन शैली पाषाण युग के मनुष्य की तरह है।’ परन्तु इनकी अपनी विलक्षण भाषा, संस्कृति, सभ्यता और ज्ञान है, जिन्हें संरक्षित किया जाना चाहिए।

भरतीय ज्ञानपीठ से सम्मानित मराठी साहित्यकार भालचंद्र नेमाड़े ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ’हिन्दू: जीने का समृद्ध कबाड़’ में इन आदिवासियों के इस ज्ञान को समझने-जानने और इसका दस्तावेजीकरण करने का प्रयास करनेवाली एक अंग्रेज महिला, मंडी के प्रयासों का उल्लेख करते हुए लिखा है -

’’अश्मयुग में ही सारे विश्व के मानवीय समुदायों से अलग हुए ग्रेट निकोबारी द्वीप पर डाॅ. मंडी आदिवासियों के बीच रहकर आई हैं। इन लोगों के साथ हिन्दमहासागर में, दो ही इन्सान बैठ पाएँ ऐसी छोटी-सी डोंगी में मछली के शिकार पर वे जाती थी। इतनी-सी डोंगी में लंबी लाठी में लगी बरछी से मछलियाँ मारने की कला सीखी - असल में यह कला ही है, क्योंकि इसमें कला के सारे लक्षण मिलते हैं: ........... एक बार एक बड़ी मछली बरछी की पहुँच में थी फिर भी वह निकोबारी लड़का बरछी नहीं मार रहा था और मंडी जी उस ओर उँगली दिखाकर लगातार चिल्ला रही थी - वो देखो, वो देखो। आखिरकार वह लड़का परेशान होकर बोला, चुप बैठिए, समझ में नहीं आता कि वो पेट से है?

............ इन लोगों को कैसे मालूम हुआ कि वह मछली गर्भवती है - यह सवाल अलग है। असल सवाल है - गर्भवती को न मारना। और हम जैसे सुसंस्कृत कहलानेवालों को शर्मिंदा करनेवाली एक और बात यानी, उस दिन की जितनी जरूरत होगी उतनी ही मछलियाँ मारना। ....... दो बड़ी और एक छोटी चाहिए होगी, तो दो बड़ी पकड़ने के बाद तीसरी बड़ी सामने आए, तो भी उसे छोड़ देना और छोटी मिलने तक ...... समुद्र में भटकते रहना। पर्यावरण का सर्वनाश करनेवाले मनुष्य के उन्नत समुदायों के अब इतने पीछे जाने में समझदारी होगी। 
........ प्यार, ममता, सहजीवन ये मूल्य इस कठोर आधुनिक विचार-शक्ति को तुच्छ लगते हैं। इसी कारण ढाई-तीन हजार सालों में गौतम बुद्ध जैसा मनुष्य दुबारा जन्म नहीं ले पाता है। यह उत्क्रांति की विफलता है।
वे आगे लिखते हैं -

’एक द्वीप पर एक छोटा-सा बच्चा एक जवान आदमी से हमेशा चिपका रहता था। मैंने उन्हें उन्हीं की भाषा में पूछा, यह कौन है? निकोबारी बोला, मेरी बीवी का लड़का। .... मतलब? तेरा नहीं? ...... नहीं, मेरी बीवी का। ...... ऐसा कैसे? इस पर वह झल्लाकर बोला, तुम औरतों की समझ में आना चाहिए। मेरी बीवी को मेरे अलावा क्या किसी दूसरे से बच्चा नहीं हो सकता? .... आश्चर्य। अरे! इंगलैण्ड में कोई पति ऐसा सोच भी नहीं सकेगा।
यह नैतिकता भारतीयों की दृष्टि से केन्द्र में आनी चाहिए। यहाँ जरा-से संदेह के कारण बीवी को जिंदा जलानेवाली हमारी हिन्दू संस्कृति है - हम सुसंस्कृत कहलानेवाले समाज, कितने क्षुद्र?’
(पृ. 497-498)

(’हिन्दू: जीने का समृद्ध कबाड़’ भालचंद नेमाड़े की प्रसिद्ध औपन्यासिक कृति है जिस पर उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया है। इसका हिन्दी अनुवाद डाॅ. गोरख थोरात ने किया है। पुरातत्व पर शोध कर रही तीस वर्षीय अंग्रेज महिला मंडी इस उपन्यास की सहनायिका हैं। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की प्राचीन जनजाति ’ओंग’ के बारे में अनके शोध का उल्लेख करते हुए श्री भालचंद्र नेमाड़े ने अपनी इस किताब में उपरोक्त बातों का उल्लेख किया है।)

हिन्दुस्तान के आधे से अधिक क्षेत्रफल में वन हैं। इन वनों में निवास करनेवाली जनजातियों के पास जंगलों, पहाड़ों, वन्यपशु-पक्षियों, वनस्पत्तियों, पेड़-पौधों, वनौषधियों, प्रकृति के रहस्यों से संबंधित ज्ञान का विशाल भंडार है, परंतु आभिजात्य समाज ने इसे न तो महत्व दिया और न ही मान्यता। तब, इसके संरक्षण और दस्तावेजीकरण करने की बात करना ही व्यर्थ है।

पिछले साल एक महिला रिश्तेदार गंभीर रूप से बीमार हो गई। छत्तीसगढ़ के दो सुप्रसिद्ध अस्पतालों में वे बारी-बारी से लगभग महीनेभर भर्ती रहीं। अंत में डाॅक्टरों ने जवाब दे दिया और लाखों रूपये का बिल थमाते हुए डिस्चार्ज कर दिया। पीड़ित परिवार को किसी गाँव में रहनेवाले एक वैद्य का पता चला जो जड़ी-बूटी से इलाज करते हैं। बहुत काम खर्च में आज वह महिला पूर्णतः स्वस्थ और सामान्य जीवन जी रही हैं। यह कौन सा ज्ञान है जो 21वीं सदी की अतिआधुनिक चिकित्सा पद्धति पर भारी है? क्या यह सहेजने योग्य नहीं है?

क्या खेतों में काम करनेवाले कृषकों-मजदूरों के पास ज्ञान नहीं होता? यदि नहीं होता तो खेती संभव होता? परन्तु इस कार्य को हेय समझा गया है और इसे करनेवालों को शूद्रों की श्रेणी में डालकर सदियों से उन्हें अपमानित किया जाता रहा है। क्या खेती कार्य में हिंसा होती है?

पिछली बरसात की बात है। इसी विषय पर अहिंसावदी धार्मिक वृत्तिवाले एक व्यवसायी से मेरा एक वाद-विवाद हुआ।  उस सज्जन ने कहा - ’’हम लोग खेती इसलिए नहीं करते क्योंकि इसमें बड़ी हिंसा होती है।’’ मैंने अपने उत्तर में कहा - ’’जिस दिन बंदर भी खेती करना सीख जायेंगे, उस दिन उनका भी अपना धर्म होगा, सभ्यता होगी, संस्कार होगे, साहित्य और विभिन्न प्रकार की कलाएँ होगी। तब हिंसा और अहिंसा के संबंध में उनकी भी अपनी व्याख्याएँ होगी और जो हमारी व्याख्याओं, स्थापनाओंँ और मान्यताओं से भिन्न होंगी। हो सकता है उनकी स्थापनाएँ और मान्यताएँ हमारी स्थापनाओं और मान्यताओं से अधिक तर्कसंगत और नीतिसंगत हों।’’

सज्जन ने कहा - ’’कैसी बातें करते हो?’’

मैंने कहा - ’’जब मनुष्य को खेती करना नहीं आता था तब वह भी बंदरों और अन्य हिंसक पशुओं की तरह ही जीता और जंगलों में रहता था। खेती का ज्ञान ही है जिसने उसे सभ्य और सुसंस्कृत बनाया। दुनिया के सारे धर्मों और सारी कलाओं के विकास के मूल में खेती का यही ज्ञान है। खेती करते हुए किसान के मन में न तो कभी हिंसा के भाव होते हैं और न ही लाभ-हानि (फल) के। उनके लिए उनके खेत, कृषि के सारे उपकरण, फसलें और अनाज; सभी पवित्र और देवतुल्य होते हैं। कसानों के लिए कृषि पूजा और धर्म होता है। और धर्म में हिंसा कैसी?’’ किसानों ने गीता कभी नहीं पढ़ होगा। किसी कृष्ण ने उन्हें उपदेश भी नहीं होगा परन्तु उनका यह कर्म गीता के - ’’कर्मण्येवाधिकारस्ते .......’’ से श्रेष्ठ है।

लोक समाज में इस तरह के ज्ञान का भंडार पड़ा हुआ है परन्तु न तो इसे कभी महत्व दिया जायेगा और न ही मान्यता। यह न सिर्फ हमारा दुर्भाग्य है अपितु मानवता के प्रति अपराध भी है।

तथाकथित आभिजात्य समाज की, अधर्म को पराजित कर धर्म की स्थापना करनेवाले उद्धोषों और गर्वोक्तियों पर प्रहार करनेवाले कबीर पहले महामानव हैं, जिन्होंने लोक द्वारा अर्जित ज्ञान की इन परंपराओं को महत्व दिया। उन्होंने अक्षरों और शब्दों की जुगाली करनेवाली परंपराओं की व्यर्थता को सिद्ध करते हुए कहा -
’’पाँच तत्व का पूतरा, युक्ति रची मैं कीव।
मैं तोहि पूछौं पंडिता, शब्द बड़ा कि जीव।’’

’’हे ज्ञानियों! हम सबका शरीर पाँच तत्वों से ही बना है। फिर कोई उच्चवर्ण का और कोई नीचवर्ण का कैसे हो गया। यह तो शब्दों की मायाजाल है। मैं पूछता हूँ - शब्द (शब्द मनुष्य की रचना है। शब्दों से भाषा बनती है। भाषा से समस्त धर्मग्रंर्थों और किताबों की रचना होती है।) बड़ा होता है कि (ईश्वर की रचना) जीव?’’
अर्थात् जीव-आत्मा को शब्दों के माध्यम से जानना संभव नहीं है। कबीर कहते हैं -

’’शब्द-शब्द सब ही कहे, वो तो शब्द विदेह।
जिभ्या पर आवे नहीं, निरखि-निरखि कर लेह।।’’
(संसार ईश्वर को शब्दों के माध्यम से जानने का प्रयास करता है। ईश्वर तो शब्दों के सामथ्र्य से बाहर है। उसे शब्दों से कैसे जानोगे?)
इसीलिए कबीर साहेब कहते हैं -

’’पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंडित होय।।’’
(पोथी पढ़-पढ़कर अर्थात शब्दों का मायाजाल रचकर कोई ज्ञानी नहीं बन सकता। इससे न तो आत्मा को जाना जा सकता है और न ही परमात्मा को। आत्मा और परमात्मा को जनने के लिए, ज्ञानी होने के लिए, प्रेम को पढ़ना होगा। हजारों शब्दों के योग से बने ग्रंथों को पढ़ना और रट लेना जितना आसान हो सकता है, प्रेम के ढ़ाई अक्षर को पढ़ना उतना ही कठिन।)

ज्ञान का संबंध ज्ञात करने अर्थात् जानने से है। जो नहीं जाना गया है उसे जानना और जो नहीं खोजा गया है उसे खोजना ही ज्ञान है। ज्ञान का शब्दों से कोई संबंध नहीं है।

विवेक की बाती:- 
अच्छे-बुरे, नीति-अनति, शुभ-अशुभ जैसी अवधारणओं को पहचानना और किसी संगत और उचित निष्कर्ष तक पहुँचना विवेक है। इसका संबंध बुद्धि से है। मुझे बचपन में पढ़ी, चार भाइयों की कथा याद आती है जिसमें तीन भाई पढ़े-लिखे और समस्त विद्याओं के ज्ञाता थे परन्तु छोटा भाई विद्याहीन और अनपढ़ था। जंगल से गुजरते समय उन्हें शेर की अस्थियाँ मिलीं। पढ़े-लिखे भाइयों को अपने-अपने विद्या की जाँच करने की सूझीं। उन्होंने शेर को जीवित करने की सोची। छोटे भाई ने कहा कि ऐसा करना उचित नहीं होगा क्योंकि जीवित होते ही वह हमें खा जायेगा। बड़े भाइयों ने छोटे का उपहास किया। वे शेर को जीवित करने में लग गये। इस बीच छोटा भाई किसी ऊँचे पेड़ पर चढ़ गया। शेर जैसे ही जिवित हुआ, तीनों बड़े भाइयों को खा गया।
बड़े भाइयों के पास ज्ञान था और विद्या भी थी परन्तु विवेक नहीं था।

भारतीय परंपरा में कभी विश्वास का वास्ता देकर तो कभी पाप-पुण्य और स्वर्ग-नर्क का भय दिखाकर विवेक की हमेशा हत्या की जाती रही है। या तो हम तर्क-वितर्क करना भूल गये हैं या फिर अपने रूढ़िगत परंपराओं और विश्वासों के पक्ष में ही तर्क करते हैं। सुप्रसिद्ध दार्शनिक जे. कृष्णमूर्ति के अनुसार कहें तो हम सब ’कंडीशन्ड’ हो चुके हैं। हम सब न सिर्फ कंडीशन्ड लोग हैं बल्कि सम्मोहित मानसिकतावाले लोग भी हैं। इसी की परिणति है कि ईश्वर की श्रेष्ठतम कृति - मनुष्य, यहाँ गौण है और तथाकथित आभिजात्यों की रचना विभिन्न धर्मशास्त्र सर्वोच्च हैं। कबीर साहेब इस स्थिति को तोड़ना चाहते थे और इसीलिए वे बार-बार तथाकथित आभिजात्यों से पूछते थे कि - ’’शब्द बड़ा कि जीव?’’

सुरति-जोत:-
सुरति, चेतना के जागरण की अवस्था है। इस संबंध में ओशो साहित्य में बड़ी प्यारी कथा मिलती है। एक गुरू थे। शिक्षा देने की उनकी विधि बड़ी लिक्षण थी। उनके पास एक लाठी हुआ करती थी। शिक्षा के नाम पर वे शिष्यों पर केवल लाठियाँ बरसाते थे। शुरू-शुरू में वे केवल दिन में, जब शिष्य जग रहे होते, ऐसा करते थे। प्रारंभ में असावधानी की वजह से शिष्य खूब मार खाते थे। समय बीतने के साथ धीरे-धीरे शिष्य इतने सजग और सावधान की स्थिति सीख लेते थे कि तब फिर गुरू उन्हें नहीं मार पाते थे। तब शिक्षा का दूसरा अध्याय शुरू होता था। अब रात में भी, जब शिष्य निद्रावस्था में होते, गुरू की लाठी बरस जाती। शिष्य फिर मार खाने लगते। समय के साथ धीरे-धीरे शिष्य निद्रावस्था में भी सजग और सावधान रहना सीख लेते थे। उनका शरीर तो सो रहा होता परन्तु चेतना उनकी जग रही होती। लाठी के प्रति धीरे-धीरे उनकी चेतना इतनी जागृत हो जाती कि गुरू के मन में जैसे ही किसी शिष्य को मारने का विचार आता, उसे सुनाई पड़ जाती - गुरूजी! मैं सावधान हूँ, अब आप मुझे नहीं मार पायेंगे। ...... यह सुरति की अवस्था है।

चेतना के जागरण की इस प्रगाढ़ स्थिति में निकलने वाली सूक्ष्म तरंगे इतनी सक्षम होती हैं कि किसी के विचारों से उत्पन्न सूक्ष्म तरंगों को ये पकड़ सकती हैं। चेतना के जागरण की ऐसी अवस्था ही सुरति की अवस्था है और इस अवस्था में निकलनेवाली सूक्ष्म तरंगें ही सुरति की जोत है। इस अवस्था में ही हमारी चेतना ईश्वरीय सत्ता की सूक्ष्म तरंगों का अनुभव कर सकती है।
सुरति का अर्थ प्रेम और स्मृति भी है। चेतना के जागरण की यही प्रगाढ़ अवस्था प्रेम और स्मृति की अवस्था है। इसे शब्दों और पोथियों के द्वारा हासिल नहीं किया जा सकता, इसे साधना से ही प्राप्त किया जा सकता है। इसीलिए शब्दों और पोथियों को नकारते हुए कबीर साहब कहते हैं -

’’पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंडित होय।।’’
सुरति की अवस्था प्रेम की अवस्था है, स्मृति की अवस्था है, चेतना के जागरण की अवस्था है। ईश्वर की प्रतीति इसी अवस्था में हो सकती है। ईश्वर को इसी चेतना के द्वारा अनुभव किया जा सकता है, शब्दों के द्वारा नहीं।

’’शब्द-शब्द सब ही कहे, वो तो शब्द विदेह।
जिभ्या पर आवे नहीं, निरखि-निरखि कर लेह।।’’
त्रिपुर अर्थात् स्वर्ग का दृश्य प्रस्तुत करते हुए महाकवि प्रसाद कामायनी के अंत में लिखते हैं -

’’समरस थे, जड़ या चेतन, सुदर साकार बना था।
चेतनता एक विलसती, आनंद अखण्ड घना था।’’
’’जहाँ जड़ और चेतन में समरसता हो; जहाँ सुंदरता हो; जहाँ चेतना का विलास (नृत्य, उत्सव) हो; जहाँ अखण्ड आनंद की सघनता हो; वहीं स्वर्ग है।’’

स्वर्ग की यह कल्पना इसी लोक में साकार हो सकती है। कबीर साहेब इसी प्रयास में लगे रहे। वे बार-बार कहते रहे कि शब्दों की मायाजाल से इसे साकार नहीं किया जा सकता। इसके लिए  हमें अपने ज्ञान की अवधारणा को विकसित और विस्तारित करना होगा, विवेक और चेतना को जागृत करना होगा। शब्दों और पोथियों के सम्मोहन को तोड़ना होगा, प्रेम का पाठ पढ़ना होगा।
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18 - जब हिंदू ही नहीं रहेंगे तो हिंदुत्व कैसे बच पायेगा

दो दिन पहले की बात है। पान खाने के लिए मैं पान ठेले के सामने खड़ा था। इसी उद्देश्य से एक सज्जन और आ गये। तभी जोरों की बारिश होने लगी और आधे घंटे तक होती रही।

सज्जन पान ठेलेवाले से बतिया रहा था। (बाद में पता चला कि वह किसी हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी का सक्रिय और प्रशिक्षित कार्यकर्ता था।) बातचीत का विषय उनकी पार्टी से ही संबंधित था। एक अच्छे समीक्षक की तरह उनकी बातें तार्किक और सधी हुई थी।

उनकी कुछ बातें मुझे बड़ी प्यारी लगी। वह बता रहा था कि उसके एक साथी का, कभी पार्टी के द्वारा ही आयोजित किसी धरना-प्रदर्शन जैसी क्रियाकलाप से संबंधित, कोई आपराधिक प्रकरण न्यायालय में विचाराधीन है। साथी लगातार पेशियों से तंगहाल और परेशान हो चुका है। पार्टी की ओर से उसे सहानुभूति के अलावा और कोई सहायता नहीं मिलती। उन्होंने कहा, देश के कानून के अनुसार - ’’सजा यदि हुई तो साथी को होगी, पार्टी को नहीं।’’

सही है, पार्टी के किसी भी क्रियाकलाप की सफलता उसके कार्यकताओं की सफलता होती है। इसका लाभ पार्टी को मिलता है। तो पार्टी द्वारा आयोजित कार्यक्रमों के दौरान दर्ज आपराधिक प्रकरणों में सजा भी पार्टी को ही मिलनी चाहिए।

पार्टी के उद्देश्यों की समीक्षा करते हुए उन्होंने कहा कि कभी-कभी लगता है कि - ’’पार्टी का उद्देश्य एकमात्र हिंदुत्व को बचाना है, हिंदुओं को बचाना नहीं। समझ में नहीं आता, जब हिंदू ही नहीं रहेंगे तो हिंदुत्व कैसे बचा रह पायेगा?’’

आगे उन्होंने स्वमी विवेकानंद के ऐतिहासिक शिकागो धर्म सभा और अमेरिका प्रवास से संबंधित बातों की चर्चा करते हुए कहा कि स्वामीजी द्वारा दिये गये व्याख्यानों के जरिये हिंदू धर्म, अध्यात्म और संस्कृति संबंधी अद्भुत ज्ञान के बारे में जानकर अमेरिकी तथा अन्य विद्वान और धर्म गुरू अचंभित थे। परंतु इससे भी अधिक अचंभित वे इस बात से थे कि ज्ञान का इतना विपुल और अद्भुत भंडार होने के बाद भी भारत गुलाम है। स्वामीजी से उन विद्वानों ने इसका कारण पूछा था - ’’आपके पास ज्ञान का इतना विपुल और अद्भुत भंडार है, फिर भी आपका भारत गुलाम क्यों है?’’

स्वामी विवेकानंद ने उन विद्वानों को इस प्रश्न का क्या और किस प्रकार जवाब दिया था, इसे भी उस सज्जन ने बताया। इस पर प्रकाश डालते हुए उसने पता नहीं, स्वामीजी के ही शब्दों को उद्धृत किया या उसे अपने शब्दों में प्रस्तुत किया, पर उसके इस स्पष्टीकरण को समझना मेरे लिए कठिन था। उसने जो भी कहा वह मुझे काल्पनिक, अविश्वसनीय, अतार्किक और अधूरा लगा। (हो सकता है कि ऐसा मुझे अपनी अज्ञानता के कारण लगा हो। वेदों और शास्त्रों में संचित ज्ञान के बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है।)

मैं सोचता हूँ, विदेशी विद्वानों द्वारा स्वामी विवेकानंद से पूछा गया सवाल कि आपके पास ज्ञान का इतना विपुल और अद्भुत भंडार है फिर भी आपका भारत गुलाम क्यों है (अब गुलाम था। या अब भी है?), हर भारतीय से पूछा गया सवाल माना जाना चाहिए। इस सवाल का जवाब हम प्रत्येक भारतीय को ढूँढना चाहिए।

इस सवाल का जवाब ढूँढते समय मैं ’ज्ञान’ और ’ज्ञानी’ शब्द पर उलझ-अटक जाता हूँ। भारत न केवल ज्ञान से अपितु ज्ञानियों से भी भरा पड़ा है। भारत का ज्ञान मुझे अचंभित नहीं करता। भारत में, वेद, पुराण, उपनिषद्, शास्त्र, साहित्य आदि में धर्म, दर्शन, अध्यात्म, योग, आदि से संबंधित संचित विपुल ज्ञान भी मुझे अचंभित नहीं करते। इस पर एक भारतीय को जितना गर्व होना चाहिए, उतना मुझे भी होता है। मैं अचंभित होता हूँ इस बात पर कि प्रयत्न करके ढूँढने पर भी इस देश में कोई अज्ञानी नहीं मिलता, मिलते हैं तो केवल ज्ञानी ही। यहाँ सुननेवाला मुझे कोई नहीं मिलता, मिलते हैं तो केवल सुनानेवाले ही। यहाँ सुनाने के लिए सभी उतावले दिखते हैं; सुनने का धैर्य किसी में नहीं दिखता। अपवाद स्वरूप सुनने में यदि कोई तल्लीन दिख भी जाये तो इस अकाट्य सत्य पर संदेह मत करना। ध्यानस्थ और समाधिस्थ दिखना बगुले की चालाकी के सिवाय और कुछ नहीं होता। कभी-कभी मैं भी सुनने में तल्लीन दिख जाता होऊँगा। पर यह मेरी ’काग चेष्टा, बकुल ध्यानम’ वृत्ति के अलावा कुछ नहीं होती। मैं भी किसी की, कुछ भी सुनना नहीं चाहता, केवल सुनाना चाहता हूँ। एक दिन मेरी अंतरात्मा ने कहा - ’कुछ देर के लिए ही सही, खुद को अज्ञानी मान लेने में हर्ज ही क्या है। कभी-कभार किसी की सुन लेने में हर्ज ही क्या है? ज्ञानी के रूप में तो कभी अपनी पहचान बना नहीं पाये, अज्ञानी के रूप में ही अपनी पहचान बना ले। इस देश में कभी अज्ञानियों का सर्वेक्षण हुआ और सूची बनी तो एकमात्र और सबसें ऊपर अपना ही नाम होगा।’ पर मेरे मन ने तत्क्षण लताड़ते हुए मुझे चेताया - खबरदार! भूल से भी यह भूल मत करना।

भारत ज्ञानियों का देश है, यह देश ज्ञानियों से अटा पड़ा है और अज्ञानी नामक कोई भी जीव या कोई भी पदार्थ इस देश में कहीं नहीं पाया जाता, इस बात की जानकारी स्वामी विवेकानंद को भी थी। शायद इसीलिए उन्होंने शिक्षा का प्रचार-प्रसार करने में लगे अपने सन्यासियों से कहा था - इस देश को ज्ञान की नहीं, शिक्षा की जरूरत है। स्वतंत्रता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा इस देश की अशिक्षा है। इस देश की सभी समस्याओं का मूल अशि़क्षा ही है। लोगों के बीच जाकर आप उनके अंदर  शिक्षा की प्यास जगाओ। आप शिक्षा के प्यासों के पास जाओं। कहावत है, कुआँ कभी प्यासे के पास नहीं आता, प्यासे को ही कुएँ के पास जाना पड़ता है। परंतु हमें इस कहावत को बदलना पड़ेगा। आप कुआँ हो, पर आपको प्यासों के पास जाना होगा। ये प्यासे आपको खेतों और खानों में काम करते हुए मिलेंगे। गाँवों में और सघन वनों में मिलेंगे। क्योंकि पेट की आग इन्हें आपके पास आने नहीं देगा। पेट की आग से मुक्त लोगों को उनके ज्ञान का अहम आपके पास आने नहीं देगा।

पाश्चात्य विद्वानों द्वारा स्वामी विवेकानंद से किया गया यह सवाल आज तक एक सवाल ही बना हुआ है। हम स्वतंत्र हो चुके है। यह स्वतंत्रता हमें हमारे ज्ञान ने नहीं दिलाया है। तब इस देश में कुछ शिक्षित और स्वतंत्र लोगों का आविर्भाव हुआ था। यह स्वतंत्रता उन्हीं की कोशिशों का सुपरिणाम है। उन दिव्यों की दिव्यता को मैं प्रणाम करता हूँ।

स्वतंत्रता की अनुभूति की जकड़ आज हमारी सबसे बड़ी परतंत्रता बन चुकी है। स्वतंत्रता शिक्षा की भूमि में पैदा होती और उसी में विकसित होती है। अशिक्षितों के लिए यह पशुवृत्ति का मार्ग प्रशस्त करती है। प्रेम, अहिंसा और नैतिकता का संदेश देनेवाले इस देश में घृणा, हिंसा और अनैतिकता का ग्राफ दिनोंदिन बढ़ रहा है।

ओशो कहते हैं कि पढ़कर, सुनकर, देखकर, गंध और स्वर्श से हम बहुत कुछ सीखते हैं। इस तरह सीखी हुई और बाह्य माध्यमों से अर्जित सूचनाओं को ही ज्ञान मानकर हम बैठे हुए हैं। बाहर से अर्जित ये सूचनाएँ कूड़ा-कर्कट के अलावा और कुछ नहीं हैं। यह छद्म ज्ञान घृणा और अहंकार पैदा करता है। इस घृणा और अहंकार ने हमें जकड़ा हुआ है। ध्यान रखें, ज्ञान कोई बाह्य वस्तु नहीं है। ज्ञान आंतरिक अनुभूति है। इसका स्रोत हमारे अंदर होता है। इसका प्रवाह अंदर से बाहर की ओर होता है। इससे अहंकार नहीं, विनम्रता का जन्म होता है; घृणा नहीं, प्रेम का जन्म होता है।

प्रकाश को ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। सूर्य अपने प्रकाश को बाहर से अर्जित नहीं करता। प्रकाश का उद्गम सूर्य के अंदर स्थित है। इसका फैलाव बाहर की ओर होता है जिससे सारा जग आलोकित होता है। सूर्य के समान दिव्य - महावीर, बुद्ध, कबीर और नानक के प्रकाश रूपी ज्ञान का स्रोत उनके अंदर से फूटा था और इस भूमि को अपनी करुणा और प्रेम से सींचा था।
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19 - ज्ञान का अर्थ है - बाजार की जानकारी होना

’’ज्ञान ही शक्ति है।’’ बाजार में यह सूक्तिवाक्य आजकल खूब उछल रहा है, पर सवाल है - कब नहीं था? मनु के ज्ञान की शक्ति की जकड़ आज तक कायम है इसे कौन नहीं जानता। मेकाले के ज्ञान की शक्ति के फंदे में फँसा देश अब तक फड़फड़ा रहा है, इसे कौन नकार सकता है। बाजार ने इस नारे के द्वारा जो नयी जकड़न तैयार किया है, जो नयी जाल बुनी है, उसका प्रभाव विश्वव्यापी है, और इसकी गिरफ्त में पूरी दुनिया है। बाजार अपने द्वारा प्रयोगित हर शब्द को एक नया अर्थ देता है। इस नारे में ’ज्ञान’ शब्द के निहितार्थ इस प्रकार हैं -

1. ज्ञान का अर्थ है - विकास। ज्ञान से ही आप विकास कर सकते हैं और विकास का अर्थ है केवल औद्योगिक विकास। जल, जंगल, जमीन और जन की चिंता न करो। ये सब दोहन करने के लिए ही बने हुए हैं।

2. ज्ञान का अर्थ है - आप में इतनी क्षमता है कि अपने स्वार्थ और अपने लाभ के लिए आप दुनिया की हर स्थूल और सूक्ष्म चीज को खरीद सकते है, बेच सकते हैं। आप सरकारों को भी खरीद और बेच सकते हैं।

3. ज्ञान का अर्थ है - सफलता। ज्ञान से ही आप सफलता प्राप्त कर सकते है और सफलता का एकमात्र अर्थ है, पैसा कमाना। पैसा कमाने के लिए कोई भी रास्ता, कोई भी साधन अपनाया जा सकता है। रास्ता अनैतिक भी हुआ तो चिंता न करो। पैसों के द्वारा नैतिकता और अनैतिकता को पुनरपरिभाषित किया जा सकता है। पैसा स्वयं पवि़त्र और नैतिक होता है, इसके स्पर्श से हर चीज नैतिक और पवित्र हो जाती है।

4. ज्ञान का अर्थ है - पैसा कमाना। अपनी क्रयशक्ति बढ़ाना। जो व्यक्ति बाजार द्वारा उत्पादित वस्तुओं से जितना अधिक स्वयं को और आपने घर को सजाता और अलंकृत करता है। वह उतना ही अधिक सफल माना जाता है।

5. ज्ञान का अर्थ है - बाजार की जानकारी होना। बया, अप्रेल-जून, 2017, पृ. 14 के अनुसार - वर्ष 2000 में ’शिक्षा सुधार हेतु नीतिगत प्रारूप’ (अ पाॅलिसी फ्रेमवर्क फाॅर रिफार्म इन एजुकेशन) पर शिक्षा आयोग का गठन किया गया था। शिक्षाविदों के स्थान पर देश के दो सबसे सफल उद्यमियों मुकेश अंबानी और बिरला कुमारमंगलम को इसमें बतौर प्रतिनिधि शामिल किया गया। प्रधानमंत्री कार्यालय के आग्रह पर इन्हें आयोग का प्रतिवेदन तैयार करने के लिए कहा गया। इस आयोग के दस्तावेज का अर्टिकल 1, 6 कहता है - ’’..... शिक्षा के बारे में हमें अपनी मानसिकता बदलनी होगी। सामाजिक विकास के घटक के रूप में नहीं बल्कि शिक्षा को मुनाफा कमाने के साधन के रूप में देखना होेगा ....।’’ आगे कहा गया है - ’’... दुनिया अब तेजी से बाजारोन्मुख अर्थव्यवस्था को अपना चुकी है और उसके बारे में जो जानकारी होगी वह शिक्षा के बराबर होगी। उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन ही उसके (शिक्षा के) आर्थिक मूल्य का निर्धारक घटक होगा।’’

6. आज ज्ञान का अर्थ है - संतुलित रूप से विकसित इन्सान की जगह प्रशिक्षित कुत्ते तैयार करना। हमारे शिक्षण संस्थान क्या ऐसा ही नहीं कर रहे हैं?
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20 - ’टेपचू’ सर्वव्यपी है

(टेपचू - उदय प्रकाश की चर्चित कहानी)
एक कहानी में टेपचू कहानी की पाठ योजना बनाते समय प्राध्यापक महोदय बड़ी उलझन में पड़ गये। बदमाश और उद्दंड विद्याथियों को कहानी के इस अंश को आखिर कैसे पढ़ाया जाय? कहानी का वह अंश यह है -

मुझे देख कर वह मुस्कराया, ’सलाम काका, लाल सलाम।’ फिर अपने कत्थे-चूने से रँगे मैले दाँत निकाल कर हँस पड़ा, ’मनेजमेंट की गाँड़ में हमने मोटा डंडा घुसेड़ रखा है। साले बिलबिला रहे हैं, लेकिन निकाले निकलता नहीं काका, दस हजार मजदूरों को भुक्खड़ बना कर ढोरों की माफिक हाँक देना कोई हँसी-ठट्ठा नहीं है। छँटनी ऊपर की तरफ से होनी चाहिए। जो पचास मजदूरों के बराबर पगार लेता हो, निकालो सबसे पहले उसे, छाँटो अजमानी साहब को पहले।’

प्राध्यापक महोदय ने कक्षा में विद्यार्थियों से कहा - ’’बच्चों! इस कहानी में अमुक पेज पर एक गंदा शब्द लिखा हुआ है। इस शब्द को मिटाकर उसकी जगह ’गुदा मार्ग’ लिख लो।’’
बच्चों ने वह शब्द तलाशना शुरू किया। एक बच्चे ने चिल्लाकर कहा - ’’मिल गया सर। गांड शब्द को मिटाकर गुदा मार्ग लिखना है न?’’

प्राध्यापक ने झेपते हुए कहा - ’’बदमाश! चिल्लाओं मत। चुपचाप लिखो।’’
कहानी में विद्यार्थियों को बड़ा रस आ रहा था। सब बदमाशी पर उतर आये थे। तभी एक अन्य विद्यार्थी की नजर कहानी के इस अंश पर पड़ी - ’दरोगा करीम बख्श ने तूफानी सिंह से कहा कि टेपचू को नंगा किया जाए और गाँड़ में एक लकड़ी ठोंक दी जाए।’ एक और विद्याार्थी ने चिल्लाकर कहा - सर! यहाँ भी गांड लिखा हुआ है। इसे भी मिटाकर गुदा मार्ग कर लें क्या?’
अध्यापक महोदय झेपकर कक्षा से बाहर चले गये।
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परंतु इस कहानी का मूल तत्व यह नहीं है। मूल तत्व है - कहानी के नायक टेपचू की विपरीत से भी विपरीत परिस्थितियों में जीने की उत्कट शक्ति। कहानी का मूल उद्देश्य है - भारतीय सामाजिक व्यवस्था की सदियों से चली आ रही नग्न संच्चाइयों की ओर ध्यान खींचना। कहानी इस प्रकार शुरू होती है -

यहाँ जो कुछ लिखा हुआ है, वह कहानी नहीं है। कभी-कभी सच्चाई कहानी से भी ज्यादा हैरतअंगेज होती है। टेपचू के बारे में सब कुछ जान लेने के बाद आपको भी ऐसा ही लगेगा।

टेपचू अभावग्रस्त, गरीब, जवान-विधवा माँ की इकलौती संतान और एकमात्र सहारा है। टेपचू के लिए उसकी माँ असमय ही बूढ़ी हो जाती है। एक दिन असहनीय भूख को शांत करने के लिए किशोर टेपचू कमलगट्टे की लालच में तालाब के गहरे पानी में उतर जाता है और डूब जाता है। टेपचू पानी के भीतर तड़पने लगता है। तभी वहाँ परमेसुरा नाम का एक व्यक्ति आता है। टेपचू जहाँ डूबा था वहाँ पानी की हलचल देखकर उसे वहाँ किसी बड़ी मछली के होने का भ्रम होता है। कहानी में लिखा है -

जहाँ पर मछली तड़प रही थी वहाँ उसने गोता लगा कर मछली के गलफड़ों को अपने पंजों में दबोच लेना चाहा तो उसके हाथ में टेपचू की गर्दन आई। वह पहले तो डरा, फिर उसे खींच कर बाहर निकाल लाया। टेपचू अब मरा हुआ-सा पड़ा था। पेट गुब्बारे की तरह फूल गया था और नाक-कान से पानी की धार लगी हुई थी। टेपचू नंगा था और उसका पेशाब निकल रहा था। परमेसुरा ने उसकी टाँगें पकड़ कर उसे लटका कर पेट में ठेहुना मारा तो ’भल-भल’ करके पानी मुँह से निकला।

एक बाल्टी पानी की उल्टी करने के बाद टेपचू मुस्कराया। उठा और बोला ’’काका, थोड़े-से कमलगट्टे तालाब से खींच दोगे क्या? मैंने इत्ता सारा तोड़ा था, साला सब छूट गया। बड़ी भूख लगी है।’’
परमेसुरा ने भैंस हाँकनेवाले डंडे से टेपचू के चूतड़ में चार-पाँच डंडे जमाए और गालियाँ देता हुआ लौट गया।

टेपचू के जीवनीयशक्ति को उद्घाटित करनेवाली यह पहली प्रमुख घटना है। कहानी में आगे वह ताड़ी की लालच में एक ताड़ वृक्ष पर चढ़ जाता है। ताड़ी के मटके में हाथ डालने पर टेपचू के हाथ को वहाँ पहले से मौजूद एक जहरीला सांप जकड़ लेता है। फिर यह होता है -

जमीन पर टेपचू गिरा तो धप्प की आवाज के साथ एक मरते हुए आदमी की अंतिम कराह भी उसमें शामिल थी। इसके बाद मटका गिरा और उसके हिज्जे-हिज्जे बिखर गए। काला साँप एक ओर पड़ा हुआ ऐंठ रहा था। उसकी रीढ़ की हड्घ्डियाँ टूट गई थीं।

यहाँ भी टेपचू सकुशल बच जाता है। कहानीकार कहता है - गाँववालों को उसी दिन विश्वास हो गया कि हो न हो टेपचू साला जिन्न है, वह कभी मर नहीं सकता।

टेपचू की हरकतें उसकी माँ को आवारागर्दी लगती है। उसने उसे गाँव के भगवानदीन पंडित के यहाँ चरवाही पर लगा देती है, जहाँ टेपचू के साथ इस प्रकार का बर्ताव होता है -

उनको चरवाहे की जरूरत थी इसलिए पंद्रह रुपए महीने और खाना खुराक पर टेपचू रख लिया गया। भगवानदीन असल काइयाँ थे। खाने के नाम पर रात का बचा-खुचा खाना या मक्के की जली-भुनी रोटियाँ टेपचू को मिलतीं। करार तो यह था कि सिर्फ भैंसों की देखभाल टेपचू को करनी पड़ेगी, लेकिन वास्तव में भैंसों के अलावा टेपचू को पंडित के घर से ले कर खेत-खलिहान तक का सारा काम करना पड़ता था। सुबह चार बजे उसे जगा दिया जाता और रात में सोते-सोते बारह बज जाते। एक महीने में ही टेपचू की हालत देख कर फिरोजा पिघल गई।

इस प्रकार परिस्थितियों से लड़ता हुआ  - एक दिन टेपचू एक भरपूर आदमी बन गया। जवान। पसीने, मेहनत, भूख, अपमान, दुर्घटनाओं और मुसीबतों की विकट धार को चीर कर वह निकल आया था। कभी उसके चेहरे पर पस्त होने, टूटने या हार जाने का गम नहीं उभरा।

और फिर बैलाडीला लौह खदान में आकर वह नौकरी कर लेता है। वहाँ वह मजदूरारों का नेता बन जाता है और मजदूरों के शोषण के विरोध में आवाज उठाता है। हड़तालें होती हैं। पुलिस का दमन चक्र चलता है। पुलिसवाले उसे जीप के पीछे बांधकर जंगली रस्ते में घसीटते हुए ले जाते है। कहानीकार लिखता है -

जीप कस्बे के पार आखिरी चुंगी नाके पर रुकी। पुलिस पलटन का चेहरा खूँखार जानवरों की तरह दहक रहा था। चुंगी नाके पर एक ढाबा था। पुलिसवाले वहीं चाय पीने लगे।

टेपचू को भी चाय पीने की तलब महसूस हुई, ’’एक चा इधर मारना छोकड़े, कड़क।’’ वह चीखा। पुलिसवाले एक-दूसरे की ओर कनखियों से देखकर मुस्कराए। टेपचू को चाय पिलाई गई। उसकी कनपटी पर गूमड़ उठ आया था और पूरा शरीर लोथ हो रहा था। जगह-जगह से लहू चुहचुहा रहा था।

और जंगल में टेपचू को गोलियों से छलनी करके झाड़ पर लटका दिया जाता है। बाद में पोस्टमार्टम के लिए उसका शव टेबल पर रखा गया। वहाँ बड़ी हैरतअंगेज घटना घटती है। क्या होता है? कहानीकार ने लिखा है -

सुबह टेपचू की लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेजा गया। डॉ. एडविन वर्गिस ऑपरेटर थिएटर में थे। वे बड़े धार्मिक किस्म के ईसाई थे। ट्राली-स्ट्रेचर में टेपचू की लाश अंदर लाई गई। डॉ. वर्गिस ने लाश की हालत देखी। जगह-जगह थ्री-नॉट-थ्री की गोलियाँ धँसी हुई थीं। पूरी लाश में एक सूत जगह नहीं थी, जहाँ चोट न हो।

उन्होंने अपना मास्क ठीक किया, फिर उस्तरा उठाया। झुके और तभी टेपचू ने अपनी आँखें खोलीं। धीरे से कराहा और बोला, ’’डॉक्टर साहब, ये सारी गोलियाँ निकाल दो। मुझे बचा लो। मुझे इन्हीं कुत्तों ने मारने की कोशिश की है।’’

डॉक्टर वर्गिस के हाथ से उस्तरा छूट कर गिर गया। एक घिघियाई हुई चीख उनके कंठ से निकली और वे ऑपरेशन रूम से बाहर की ओर भागे।

तो ऐसी है, टेपचू की जीवनीयशक्ति और हमारे समाज की नग्न सच्चाई। कहानी का अंत इस प्रकार होता है -

हमारे गाँव मड़र के अलावा जितने भी लोग टेपचू को जानते हैं वे यह मानते हैं कि टेपचू कभी मरेगा नहीं - साला जिन्न है। आपको अब भी विश्वास न होता हो तो जहाँ, जब, जिस वक्त आप चाहें, मैं आपको टेपचू से मिलवा सकता हूँ।

नहीं! मुझे टेपचू के अस्तित्व पर कोई अविश्वास नहीं होता। मुझे इस कहानी की सच्चाई पर कोई हैरत नहीं हेती। मुझे हैरत होेती है कि आजादी के सत्तर साल बाद भी टेपचू यहाँ हर गाँव, हर गली, हर जगह पर मौजूद हैं। टेपचू ईश्वर की कृति नहीं है, यह भारतीय समाज की रचना है और भारतीय समाज अपनी इस रचना को कभी मरने नहीं देगा।
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21 - कबीर के उलटबासी

काव्य में उलटबासी कहने की परंपरा वैदिककाल से चली आ रही है। सर्वप्राचीन ग्रंथ ऋगवेद में इस प्रकार कहा गया है -

इह ब्रवीतु य ईमड.्ग वेदास्य वामस्य निहितं पदं वेः।
शीष्र्ण क्षीरं दुहते गावो अस्य वब्रिं वसाना उदकं पदापु।।(1-164-7)
(उस सुंदर व गतिशील पक्षी के भीतर निहित रूप को जो जानता हो, बताए। उसकी इन्द्रियाँ अपने शिरो भाग द्वारा क्षीर प्रदान करती हैं और अपने चरणों से जल पीया करती हैं।) इसी प्रकार -
क इमं वो नृव्य माचिकेत, वात्सोमातृ जनयति सुधाभि।
(1-7-25, सूत्र 95)

(वन आदि में निहित अग्नि को कौन जानता है? पुत्र होकर भी अग्नि अपनी माताओं को हव्य द्वारा जन्म देते हैं।)

और यह परंपरा नाथ साहित्य में पुष्ट होकर पूर्व मध्यकाल (भक्तिकाल) तक पूर्ण वेग से चलती रही। कबीर साहब ने कहा है -
तलि कर साखा, उपरि कर मूल, बहुत भांति जड़ लागै फूल।
कहे कबीर यह पद को बूझै, ताकू तीन्यूँ त्रिभुवन सूझै।।

परंतु उत्तर मध्यकाल (रीतिकाल) में यह परंपरा थम-सी गई। ऐसे पद बहुत कम कहे गये। बिहारी ने कहा -
तन्त्री नाद, कवित्तरस, सरस राग रतिरंग।
अनबूड़े बूड़े, तिरे, जे बूड़े सब अंग।।263।।
नेह न नैनन को कछु, उपजी बड़ी बलाय।
नीर भरे नितप्रति रहै, तऊ न प्यास बुझाय।।373।।
या अनुरागी चित्त की, गति समझै नहीं कोय।
ज्यों-ज्यों बूड़ै स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्ज्वल होय।।550।।

यद्यपि ये उलटी कही गई बातें हैं, परंतु रीतिकाल के इस तरह के पदों को शायद ही कोई उलटबासी कहता होगा। ये पद काव्य में कलात्मकता लाने के लिए लिखे गये हैं। उलटबासी तो वे पद हैं जिनमें अध्यात्म की भावना निहित हों।

और अब आधुनिक काल में यह परंपरा पूरी तरह से लुप्त हो चुकी है। परंतु इस तरह के पदों को उलटबासी कहने की परंपरा या विमर्श को जरूर आधुनिककाल की देन कहा जा सकता है। उलटबासी शब्द की व्युत्पित्ति, वर्तनी और अर्थ के संबंध में विद्वानों में पर्याप्त मतांतर है। जैसे -
1. उलटबाँसी = उल्टा अंश या उल्टी बातें।
2. उलटबाँ-सी, उलटवाँ-सी या उलटवा-सी = उलटी हुई सी।
3. उलटवाची = उलटी वाणी। उलटी कही गई सी।
4. उलटवासी = उलटा निवास करनेवाला। अर्थात् लौकिक कथनों में अलौकिक भाव का वास।
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परंतु इन उलझनों में मैं नहीं पड़ना चाहूँगा। और आमतौर पर कबीर साहब के ’तलि कर साखा, उपरि कर मूल, बहुत भांति जड़ लागै फूल। कहे कबीर यह पद को बूझै, ताकू तीन्यूँ त्रिभुवन सूझै।।’ जैसे उन पदों में भी जिसे उलटबासी के रूप में जनसामान्य में मान्यता मिली हुई है। क्योंकि मेरा मानना है कि कबीर साहब तो सब प्रकार से उलटे ही हैं। उनका देखना भी उलटा और उलटबासी है और उनका कहना भी। एक प्रसिद्ध पद है -
’सब कहते कागद की लेखी।
मैं कहता आँखन की देखी।।

कबीर साहब पारंपरिक पोथियों के ज्ञाता नहीं थे, परंतु जीवन रूपी पोथी को उन्होंने जितना पढ़ा था, उतना कोई नहीं। दुनिया के पास केवल लौकिक आँखें होती हैं इसीलिए वह कागद की लेखी की बात करता है। कबीर साहब के पास दैहिक आँखों के अलावा ज्ञान की आँखें भी हैं इसीलिए वे कागद की लेखी की नहीं, आँखन देखी बातें, ज्ञान की बातें कहते हैं। और कबीर साहब जब ऐसी बातें कहते हैं तो उनकी बातें हमें उलटी लगती हैं। वे कहते हैं -
’’पाँच तत्व का पूतरा, युक्ति रची मैं कीव।
मैं तोहि पूछौं पंडिता, शब्द बड़ा कि जीव।’’

दुनिया की नजरों में शब्द बड़े हैं। पोथियाँ बड़ी  हैं। और पोथियों के आगे जीव का कोई मोल नहीं है। कबीर साहब के लिए सबसे बड़ा जीव है। कबीर साहब की यह दृष्टि हमें उल्टी लगती है। ध्यान दीजिए - कबीर साहब के लिए पंडित कोई वर्ण या जाति नहीं है। पोथियों पर विश्वास करनेवाला हर पोथीजीवी व्यक्ति पंडित है। पंडित शब्दों के जादूगर होते हैं। उनके शब्द बड़े सम्मोहक होते हैं। भााषा विज्ञानियों ने कहा है - शब्द परंपरा से मिलकर शोषण भी करती है। शब्द शोषण भी करता है और शासन भी करता है। एक कहावत प्रचलित है - मन हरे वो धन हरे। कोई ठग जब किसी को ठगता है तो पहले उसे अपने शब्दों के जाल में उलझाता है, अपने शब्दों से उसे बाँधता है, उसका मन पहले हरता है, उसे सम्मोहित करता है। आप जानते हैं कि सम्मोहित व्यक्ति वही करता है जैसा सम्मोहनकर्ता चाहता है। सदियों से हम सब पंडितों के शब्दों के सम्मोहन के प्रभाव में हैं। उनकी झूठी बातें हमें सच्ची लगती हैं। वे कहते हैं - पोथियों की रचना ईश्वर ने की है। उस पर ईश्वर के हस्ताक्षर हैं। कितना बड़ा झूठ है। भाइयों! अगर मैं यह कहूँ कि भाषा की रचना ईश्वर ने नहीं किया है, यह समाज की रचना है। पोथियों की रचना ईश्वर ने नहीं किया है, यह समाज के पंडितों की रचना है जिसे पण्डितों ने हमें ठगने के लिए बनाया है, तो आप मुझे पागल कहेंगे। मैं यदि किसी किसान और मजदूर से कहूँ कि पोथियों का ज्ञान थोथा है क्योंकि वह अनुत्पादक है। पोथियों का ज्ञान जीवन का आधार अन्न का एक दाना पैदा नहीं कर सकता। और जो ज्ञान किसी को जीवन नहीं दे सकता वह किसी को मोक्ष क्या देगा। आपका ज्ञान उत्पादक है, वह अन्न पैदा करता है, जीवन देता, इसलिए आपका ज्ञान मोक्ष देनेवाला है। आपका ज्ञान पोथियाँ के ज्ञान से श्रेष्ठ है, तो संभव है वे मुझे मार डालेंगे। कहेंगे - हमारे पोथियों की बुराई करता है, पापी है। इतिहास में बहुत लोग इसी तरह से मारे गये हैं। कबीर साहब यही कहते हैं। उन्होंने कहा है -
’’शब्द-शब्द सब ही कहे, वो तो शब्द विदेह।
जिभ्या पर आवे नहीं, निरखि-निरखि कर लेह।।’’

ईश्वर तो शब्दों से परे है। शब्दों से उसे कैसे पाओगे? ईश्वर अनुभव करने का विषय है। ईश्वर को ईश्वर की बनाई हुई भाषा और उसी के बनाये धर्म से पाया जा सकता है। ईश्वर की बनाई हुई भाषा प्रेम है। ईश्वर का बनाया हुआ धर्म करुणा है। ईश्वर को केवल इसी से पाया जा सकता है। कबीर साहब जब ऐसा कहते हैं तो वे हमें उल्टे लगते हैं। क्योंकि हम सब तो शब्दों को, पोथियों को और उसी की भाषा को, उसी में वर्णित शब्दजालों को धर्म मानकर बैठे हुए हैं। और ईश्वर को शब्दों के द्वारा, पोथियों के द्वारा पाना चाहते है। यह धोखा है। यह पंडितों के सम्मोहन का प्रभाव है।

कबीर साहब का रास्ता उलटा है। उलटे रास्ते पर चलनेवाले की चाल और दिशा भी उलटी ही होगी। इसीलिए कबीर साहब की हर बात हमें उलटी लगती है। उनके पद हमें उलटबासी लगते हैं। वे कहते हैं -
पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का पढ़ै सो पंडित होय।।

पोथी पढ़कर, शब्दों को रटकर, कोई पंडित नहीं हो सकता। जब ईश्वर को पाने के लिए मात्र ढाई आखर ही पर्याप्त हैं, तो फिर पोथी को सिर पर लादने से क्या फायदा? पोथी की क्या जरूरत है। कबीर के लिए केवल ढाई आखर ही महत्व पूर्ण हैं, बाकी सब बेकार हैं। परंतु इस अनमोल ढाई आखरों का हमारे लिए कोई मोल नहीं है। हमारे लिए दुनिया में जो सर्वाधिक अनमोल चीज है वह है, पोथी। कबीर साहब पोथियों को नकारते हैं तो वे हमें उलटे लगते हैं।

हमारी प्रवृत्ति है - कठिन चीजें, जटिल चीजें, सजावटी चीजें, चमकीली चीजें, रोमांच पैदा करनेवाली थ्रिलर चीजें, हमें लुभाती हैं। सीधी, सरल, सुगम और सादी चीजें हमें पसंद नहीं आती। कबीर साहब को सीधी, सरल, सुगम और सादी चीजें पसंद थी। वे हमें उलटे लगते हैं। कबीर के अनुसार पत्थर (मूर्तियाँ अथवा आकृतियाँ) और उनकी पूजा तथा सारे धर्म बोझ हैं। वे उसे त्यागते हैं और हमें भी त्यागने के लिए कहते हैं तो हमें उनकी बातें उलटी लगती हैं। और यही चीजें हम जीवनभर सिर पर लादकर चलते हैं। वे कहते हैं -
हम भी पाहन पूजते होते, हिन्दू बनके रोज।
सद्गुरू की कृपा भयी, डारया सिर के बोझ।।

हम लोग अपनी सुख-सुविधा के लिए घर बनाते हैं। कबीर साहब बने-बनाये घर को जलाने की बात करते हैं। क्योंकि वे हमें जहाँ ले जाना चाहते हैं, वहाँ ऐसे घरों को साथ लेकर नहीं जाया जा सकता। वहाँ किसी भी प्रकार का बोझ लेकर नहीं जाया जा सकता। कबीर साहब जब ऐसे सभी बोझौं को त्यगने के लिए कहते हैं तो उनकी बातें हमें उल्टी लगती हैं।
कबिरा खड़ा बाजार में लिए लुकाठी हाथ।
जो घर जारै अपना, चलै हमारे साथ।।

लोग मोक्ष की चाह में काशी जाते है पर कबीर साहब काशी छोड़कर मगहर जाते हैं। उनका रास्ता भी उलटा है और उनकी चाल भी उलटी है। लोग पोथियों में लिखी बातें कहते हैं, पर कबीर साहब आँखों देखी बातें कहते हैं। उनका देखना भी उलटा और कहना भी उलटा। लोग अपने आराम के लिए घर बनाते हैं, कबीर अपना बना-बनाया घर जला़ने के लिए कहते हैं। उनकी दृष्टि भी उलटी और उनके विचार भी उल्टे। हमें कबीर साहब की हर चीज उल्टी लगती है। और इसीलिए उनकी कही हर बात को हम उलटबासी कहते हैं।

मनुष्य की पकृति उलटी होती है। जिन चीजों को त्यागने के लिए कहा जाता है उन्हीं चीजों को हम और अधिक मजबूती से पकड़कर बैठ जाते हैं। छाप-तिलक, जप-माला, कर्मकाण्ड, पूजा पद्धति सबको कबीर साहब त्यागने की बातें करते हैं। इन्हें हम और मजबूती से पकड़कर बैठ जाते हैं। इसीलिए दुनिया के सारे पण्डित हमें ठगे जा रहे हैं।

कबीर साहब की वाणियों को, उनके पदों को जिस किसी ने भी पहली बार उलटबासी कहा होगा, मुझे नहीं लगता कि वह ज्ञानी रहा होगा। मुझे नहीं लगता कि ऐसा उसने विचार और विवेकपूर्वक कहा होगा। परंतु अज्ञान में ही सही, अविवेक में ही सही, मैं सोचता हूँ, कबीर साहब के बारे में उस च्यक्ति ने परम सत्य को कह दिया है। लोग कहते हैं कि कबीर साहब को आज तक सही-सही कोई समझ नहीं पाया है। कबीर साहब का सही मूल्यांकन आज तक किसी ने नहीं किया है। मैं उल्टी बातें कहता हू, भारत के इतिहास में आज तक अगर किसी का सही मूल्यांकन हुआ है, तो केवल कबीर साहब का हुआ, है। किसी और का नहीं। जिस किसी ने भी कबीर साहब की वाणियों को उलटबासी कहा है उसने कबीर साहब के बारे में एकदम सही बात कहा दी है, सटीक और पूरी तरह संतुलित, न रत्तीभर कम और न रत्तीभर ज्यादा। इतनी सही बात, सटीक बात और पूरी संतुलित बात केवल अज्ञानी व्यक्ति ही कह सकता है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि कबीर साहब की वाणियों को, उनके पदों को जिस किसी ने भी उलटबासी कहा वह अज्ञानी ही रहा होगा। ज्ञानियों ने तो कबीर को नकार दिया है। ज्ञानी व्यक्ति ऐसा कह ही नही सकता। कैसे?

समझने की बातें हैं। ’उलटबासी’ कहनेवाला व्यक्ति दुनिया में आज तक केवल एक ही हुआ है - कबीर। परंतु ’बासी’ कहनेवाले पता नहीं कितने लोग हो गये होंगे। कबीर साहब उलटबासी थे और हम लोग हैं केवल ’बासी’। ’बासी’ का अर्थ आप सब जानते हैं। थोड़ा दिमाग पर जोर दीजिए तो ’उलटबासी’ का भी अर्थ समझ में आ जायेगा। उलटबासी का अर्थ क्या होता है? उलटबासी का अर्थ समझना हो तो पहले बासी शब्द को समझ लेना चाहिए। क्या अर्थ होता है बासी का? बासी वह है जो ताजा न हो। जो उपयोग करने लयक न हो और धोखा से भी यदि उसका उपयोग हो जाये तो उपयोग करनेवाला बीमार हो जाये। वह बासी है। समझ गये न? बासी मतलब मृत। उलटबासी का अर्थ अब आपको बताने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। उलटबासी का मतलब हुआ बासी का उलट, ताजा, उपयोगी, स्वस्थ्यवर्धक। बासी मतलब हुआ अमृत। इस तरह हम सब मृत और बासी। अमृत और ताजा केवल एक - कबीर साहब। दुनिया में केवल एक ही व्यक्ति हुआ है जिसे अमृत कहा जा सकता है, कयोंकि वे सीधे थे। हर स्थिति में सीधे थे। हम सब मृत हैं, क्योंकि हम लोग हर स्थिति में केवल उल्टे लोग हैं। ध्यान दीजिए, मृत शब्द का विरुद्धार्थी शब्द जीवित होता है। परंतु कबीर साहब के लिए मृत शब्द के विरुद्धार्थी शब्द के रूप में मैंने अमृत शब्द का प्रयोग किया है, जीवित का नहीं। क्यों? क्योंकि जिसने जन्म ही नहीं लिया हो वह मरेगा कैसे? जहाँ जन्म ही नहीं हो, वहाँ मृत्यु कैसे? जन्म-मरण से जो परे हो उसे आप और क्या कह सकते हैं। अमृत के अलावा कोई दूसरा शब्द है आपके पास है उसके लिए। इसीलिए मैंने कबीर साहब को अमृत कहा है। मृत का उलटा अमृत। बासी याने मृत और उसका उलटा उलटबसी याने अमृत। उलटबासी का एक और अर्थ हो सकता है - उलटे लोक का बासी। हम लोग धरती के बासी हैं। धरती का उलटा स्वर्ग। कबीर साहब उलटे लोक के बासी थे, स्वर्ग के बासी थे।

कबीर साहब का एक और अमृत पद है। अंत में इस दोहे को भी समझ लेते हैं। कबीर साहब कहते हैं -
कबिरा आप ठगाइए और न ठगिए कोय।
आप ठगे सुख होत हैं, और ठगे दुख होय।।
आप भले ही ठगाते रहो परंतु किसी को ठगो मत। ठगे जाने पर सुख मिलता है, ठगने से दुख। बड़ी उल्टी बातें लगती है। ठगा हुआ आदमी सदा सुखी रहेगा है। ठगनेवाला सदा दुखी रहेगा।

एक निरक्षर व्यक्ति ने इसका भेद बताया - जो पाप करेगा, वह तो भुगतेगा ही। जैसी बरनी, वैसी भरनी। हमें क्या। किसी के ठगने से कोई गरीब तो नहीं हो जाता।

एक पढ़े-लिखे यक्ति ने कहा - ठग कब तक बचा रहेगा। कभी न कभी कानून की पकड़ में तो आयेगा ही। फिर तो जेल में उसे चक्की ही पिसना पड़ेगा।

एक समझदार व्यक्ति ने कहा - कबीर साहब तो फक्कड़ आदमी ठहरे। उसके पास तो संपत्ति के नाम पर केवल एक ही चीज थी - ज्ञान। वह तो चाहता ही था कि कोई आकर उसके ज्ञान को ठग ले। ज्ञान तो बाँटने से ही बढ़ता है। परंतु कोई ठग ज्ञान नहीं चाहता, वह तो धन चाहता है।

ओशो जैसे एक आदमी ने कहा - कबीर के लिए तो पूरी दुनिया ईश्वरमय थी। उसे तो हर प्राणी में ईश्वर के ही दर्शन होते थे। वे तो बाजार में चदरिया बेचने का काम करते थे। ग्राहक उसे ईश्वर ही दिखते थे। और ठगनेवाला जब ईश्वर हो तो ठगानेवाला खुश क्यों नहीं होगा।

मगर मुझे बात इतनी आसान नहीं लगती। कबीर साहब दुनिया के छाप-तिलक और शब्दों के बंधन में जकड़े साधु वेषधारी महाठगों को देखते होंगे, जो पोथियों के शब्दों के बल पर, स्वर्ग-नर्क का डर दिखाकर, लोंगों को ठगते हैं। तब उन्होंने कहा होगा, भाई! हम तो ऐसा हरगिज नहीं करेंगे, इससे तो हमें दुख ही होगा।
कोई भी विवेकवान और विचारवान व्यक्ति दूसरों को ठगकर कभी सुखी नहीं हो सकता -
कबिरा आप ठगाइए और न ठगिए कोय।
आप ठगे सुख होत हैं, और ठगे दुख होय।।
धन्यवाद।
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22 - विकल्पहीन और असहाय भारतीय नारियों की स्वैछिक स्वीकारोक्ति

भारतीय नारियों की शुचिता पर बातचीत के दौरान एक महिला ने कहा - साहूजी! हम भारतीय नारियाँ हैं और भारतीय नारियाँ जीवन में अपने शरीर का सौदा केवल एक बार करती हैं, बार-बार नहीं। भारतीय नारियाँ अपने शरीर को केवल एक बार बेचती हैं, बार-बार नहीं।

मैंने उस पवित्र महिला को मन ही मन प्रणाम किया। अब वह इस दुनिया में नहीं है। परंतु उसके प्रति आज भी मेरा सिर श्रद्धा से झुक जाता है।

यद्यपि आत्मा और शरीर की शुचिता और पवित्रता की यह भावना भारतीय स्त्रियों के शोषण का एक प्रमुख कारक भी है फिर भी इस देश की नारियों के हृदय में यह भावना आज भी दृढ़तापूर्वक रची-बसी है, चाहे वह किसी भी जाति और धर्म से संबंधित क्यों न हो। इस देश की स्त्रियों के मन में रची-बसी यह भावना किसी धर्म या संप्रदाय की बपौती नहीं है।

शुचिता और पवित्रता की यह भावना भारतीय स्त्रियों की सांस्कृतिक पहचान भी है। यही भावना भारतीय स्त्रियों की आत्मा है और यही उनका मूल धर्म भी। भारतीय नारियाँ एक बार किसी पुरुष को अपना तन-मन सौपने के बाद अपने इसी आदर्श-भावना की रक्षा के लिए कोई भी त्याग कर सकती हैं। हर प्रकार का त्याग करती हैं। वे अपना घर छोड़ देती हैं, अपना परिवार छोड़ देती हैं, अपने संबंधियों को छोड़ देती हैं, अपने खुशियों का बलिदान कर देती हैं, अपनी जाति और अपना धर्म छोड़ देती हैं और यदि कोई विकल्प न बचे तो अपना जीवन भी बलिदान कर देती हैं।

अपने इधर के गाँवों में अक्सर बुजुर्ग महिलाओं को यह कहते हुए मैंने सुना है - ’महिलाओं की न तो कोई जाति होती है, न कोई धर्म होता है और न ही कोई घर।’ संपत्ति की तो वे कल्पना ही नहीं कर सकतीं। परंतु सदियों बाद अब सरकार ने स्त्रियों के लिए घर और संपत्ति का कानून बनाकर कुछ अंशों में स्त्रियों के साथ न्याय किया है।

सधर्मीय और सजातीय पुरुष का दामन थामने पर स्त्रियाँ कम से कम आपनी जाति और अपना धर्म बदलने के संकट से बच जाती हैं। परंतु अंतरजातीय और अंतरधर्मीय पुरुष का दामन थाम लेने पर वे क्या करें? ऐसा करते ही वे माँ-बाप, नाते-रिश्तेदार, सगे संबंधियों और जाति-बिरादरीवालों से हमेशा-हमेशा के लिए अलग, अपरिचित हो जाती हैं। एक तो इस देश में ऐसी दशा प्राप्त स्त्रियों की जाति और धर्म का संरक्षण करनेवाला न तो कोई कानूनी प्रावधान है और नहीं सामाजिक व्यवस्था। दूसरी ओर परंपराओं और सामाजिक मर्यादाओं के दबाव के कारण बिना अपराध किये ही वे अपराधबोध से ग्रस्त हो जाती हैं। तब कानून-प्रदत्त पैत्रिक घर और संपत्ति के अधिकार की बात करने की उनमें साहस ही कहाँ बची रहती है? ऐसी स्थिति में अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए जिस अंतरजातीय और अंतरधर्मीय पुरुष का दामन उन्होंने थामा है, उसके धर्म और उसकी जाति को स्वीकार करने के अलावा उनके पास रास्ता ही क्या बचता है? विकल्पहीनता और असहायता की इस हालात में पहुँची हुई ऐसी किसी स्त्री द्वारा अपनी जाति और अपना धर्म त्यागकर उस पुरुष की जाति और उसके धर्म को स्वीकार करने की इच्छा व्यक्त करने को क्या उनकी स्वैच्छिक स्वीकारोक्ति माना जा सकता है?
 अंतरजातीय और अंतरधर्मीय पुरुष का दामन थामनेवाली स्त्रियों के लिए एक विकल्प तो होना ही चाहिए जिससे वे पुरुषों को भी अपनी जाति और अपना धर्म त्यागने के लिए कह सके। (हो सकता है, कुछ अल्पसंख्यक समाज में स्त्रियों को ऐसा विकल्प प्राप्त हो।) समाज ऐसा विकल्प देगा, ऐसा सोचना ही कल्पनातीत है, परंतु कानून से तो यह उम्मीद किया ही जा सकता है।
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23 - बंठू मेरा मानसिक नुकसान करता है        - ग. मा. मुक्तिबोध

(सुप्रसिद्ध छत्तीसगढ़ी लोककलामंच ’चंदैनी गोंदा’ के संचालक-संगीतकार-निर्देशक, छत्तीसगढ़ी लोकसंगीत के जीवित किंवदंती, संगीत एवं नाटक अकादमी सम्मान से सम्मानित, श्री खुमान साव जिन्हें लोग सम्मानपूर्वक खुमान सर के नाम से संबोधित करते हैं, ने 05 सितंबर 2017 को अपना 88 वाँ जन्मदिन मनाया। श्री खुमान साव ने गजानन माधव मुक्तिबोध से संबंधित यह संस्मरण मुझे इसी दिन सुनाया था। यह लेख उन्हें ही सादर समर्पित है।)

म्युनिसिपल स्कूल राजनांदगाँव में खुमान साव कक्षा सातवीं के क्लास टीचर हुआ करते थे और प्रथम कालखण्ड में वे अंग्रेजी पढ़ाया करते थे। स्कूल सुबह सात बजे लगता था। एक बच्चा अक्सर देर से आया करता था। एक तो खुमान साव अनुशासन के पक्के थे। दूसरे - देर से आने के कारण बच्चे की पढ़ाई का नुकसान होता था। बार-बार टोकने और समझाने के बाद भी बच्चे की आदत नहीं सुधरी। खुमान साव के लिए यह असहनीय था। एक दिन वह बच्चा फिर देर से आया। खुमान साव को उस बच्चे पर क्रोध आया। उसने कहा - ’’अपने पिताजी को बुलाकर लाओ, तब तुम्हें मैं कक्षा में आने की अनुमति दूँगा।’’

बच्चा अपने पिताजी को बुलाने चला गया।
कालखण्ड समाप्त होने पर खुमान साव स्टाफ रूम की ओर आ रहे थे। एक अन्य शिक्षक (अयोध्या प्रसाद शुक्ल, किशोरी लाल शुक्ल का भतीजा) कक्षा की ओर जा रहे थे। बरामदे में दानों आमने-सामने हुए। उस शिक्षक ने खुमान साव से कहा - ’’जानते हो, आज आपने किसे बुलवाया है?’’
’’नहीं तो। कौन हैं वे?’’
’’अरे, कैसे हैं आप? एक आप ही उन्हें नहीं जानते हैं। वरना राजनांदगाँव से दिल्ली तक, सारे लोग उसे जानते हैं। जाइए। स्टाफ रूम में आपकी प्रतीक्षा हो रही है।’’

असमंजस और उलझन के साथ खुमान साव ने जैसे ही स्टाफ रूम में कदम रखा, वह अभिभावक बहुत शालीनता और विनम्रता पूर्वक अभिवादन की मुद्रा में हाथ जोड़कर अपनी जगह पर खड़ा हो गया। अभिवादन के पश्चात् उन्होंने अपना परिचय देते हुए कहा - ’’मैं गजानन माधव मुक्तिबोध हूँ और आपके इस अपराधी शिष्य, दिवाकर मुक्तिबोध का पिता हूँ। बच्चे के अपराध में मैं भी बराबर का सहभागी हूँ। इस अपराध के लिए मैं शर्मिंदा हूँ। आपके इस अनुशासन का मैं सम्मान करता हूँ और सराहना भी। बच्चे की ओर से और अपनी ओर से भी मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ। और वचन देता हूँ कि आज के बाद यह गलती फिर नहीं होगी।’’

इस महान कवि की सरलता और शालीनता के आगे खुमान साव निरुत्तर हो गये। दोनों विभूतियों ने एक-दूसरे को परखा। कुछ देर चर्चा करने के बाद वे चले गये। जाते-जाते खुमान साव को अपने घर आने का आग्रह पूर्वक निमंत्रण देेना वे नहीं भूले।

इस तरह दोनों में परिचय हुआ। मेल-मुलाकात का सिलसिला शुरू हुआ।
एक दिन खुमान साव मुक्तिबोध से मिलने गये। उन्होंने मुक्तिबोध को काफी परेशान और विचलित पाया। इसका कारण पूछने पर मुक्तिबोध ने कहा - ’’मुझे नहीं पता था, राजनांदगाँव में ऐसे लोग भी मिलेंगे।’’

राजनांदगाँव को संस्कारधानी कहा जाता है। राजनांदगाँव की वजह से मुक्तिबोध का इस तरह दुखी होना राजनांदगाँव के संस्कारों पर एक आघात था। खुमान साव समझ नहीं पाये। उन्होंने पूछा - ’’क्या किसी ने आपका अपमान किया है? किसी ने आपको नुकसान पहुँचाया है?’’

मुक्तिबोध ने कहा - ’’हाँ! बंठू मुझे मानसिक नुकसान पहुँचाता है। बंठू को जानते हैं न आप?’’

फिर उसने अपार मानसिक दुख पहुँचानेवाली उस घटना के बारे में बताया। घटना यह थी -
उस समय दुर्गाचौक से दिग्विजय काॅलेज की ओर जानेवाली सड़क पर बंठू यादव की चाय-नाश्ते की एक गुमटी हुआ करती थी। मुक्तिबोध अपने साथी प्राध्यापकों के साथ चाय-नाश्ते के लिए अक्सर यहाँ आया करते थे। आर्थिक तंगी ने कभी मुक्तिबोध का साथ नहीं छोड़ा। चाय-नाश्ते के बिल की रकम अदा करने लायक उनके पास अक्सर पैसे नहीं होते थे। परंतु इसका वे बराबर हिसाब रखते थे और वेतन मिलने पर एकमुश्त अदा कर दिया करते थे। उस दिन वेतन मिलने पर वे बंठू को ऐसा ही रकम अदा करके आये थे। मुक्तिबोध के हिसाब से उधार की रकम 20 रूपये की थी।

पैसा लेने के पहले बंठू ने कहा - ’’गुरूदेव! मैं भी अपनी डायरी चेक कर लेता हूँ।’’ कुछ देर डायरी के पन्ने पलटने के बाद बंठू ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा - ’’गुरूदेव! मात्र साढ़े सात रूपये।’’

और फिर बीस रूपये और साढ़े सात रूपये के मुद्दे पर दोनों में अच्छी-खासी बहस हो गई।

उस दिन इसी घटना ने मुक्तिबोध को अपार मानसिक क्षति पहुँचायी थी। वे सोचते होंगे - दुनिया में बेईमानों की कमी नहीं है। लोग अपने फायदे के लिए बेईमानी करते हैं। परंतु यह कैसा बेईमान है, जिसने अपने नुकसान के लिए बेईमानी किया है?

कुछ भी हो, एक चायवाले की डायरी ने ’एक साहित्यिक की डायरी’ को छोटा जरूर बना दिया था।
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24 -  छत्तीसगढ़ी पारंपरिक लोकगीतों का सामाजिक संदर्भ 

(लोकगीतों में लोक आकांक्षा और लोक-परंपरा की अभिव्यक्ति)



समग्र साहित्यिक परंपराओं पर निगाह डालें तोे वैदिक साहित्य भी श्रुति परंपरा का ही अंग रहा है। कालांतर में लिपि और लेखन सामग्रियों के आविष्कार के फलस्वरूप इसे लिपिबद्ध कर लिया गया क्योंकि यह शिष्ट समाज की भाषा में रचा गया था। श्रुति परंपरा के वे साहित्य, जो लोक-भाषा में रचे गये थे, लिपिबद्ध नहीं हो सके, परंतु लोक-स्वीकार्यता और अपनी सघन जीवन ऊर्जा के बलबूते यह आज भी वाचिक परंपरा के रूप में लोकमानस में गंगा की पवित्र धारा की तरह सतत प्रवाहित है। लोकमानस पर राज करनेवाले वाचिक परंपरा की इस साहित्य का अभिप्राय निश्चित ही, और अविवादित रूप से, लोक-साहित्य ही हो सकता है।

लोक क्या है?
लोक क्या है? इस संबंध में डाॅ हजारी प्रसाद द्विवेदी को उद्धृत करते हुए डाॅ. जीवन यदु कहते हैं - ’’लोक शब्द का अर्थ जनपद या ग्राम्य नहीं है, बल्कि नगरों और गाँवों में फैली हुई वह समूची जनता है, जिनके व्यावहारिक ज्ञान का अधार पोथियाँ नहीं हैं।’’1 यही लोक है।

लोक-जीवन में लोक-साहित्य की परंपरा केवल मन बहलाव, मनोरंजन अथवा समय बिताने का साधन मात्र नहीं है; इसमें लोक-जीवन के सुख-दुख, मया-पिरीत, रहन-सहन, संस्कष्ति, लोक-व्यवहार, तीज-त्यौहार, खेती-किसानी, आदि की मार्मिक और निःश्छल अभिव्यक्ति होती है। इसमें प्रकष्ति के रहस्यों के प्रति लोक की अवधारण और उस पर विजय प्राप्त करने के लिए उसके सहज संघर्षों का विवरण; नीति-अनीति का तथ्यपरक, अनुभवजन्य अन्वेषण और लोक-ज्ञान का अक्षय कोश निहित होता है। लोक-साहित्य में लोक-स्वप्न, लोक-इच्छा और लोक-आकांक्षा की स्पष्ट झलक होती है। नीति, शिक्षा और ज्ञान से संपष्क्त लोक-साहित्य लोक-शिक्षण की पाठशाला भी होती है। यह श्रमजीवी समाज के लिए शोषण और श्रम-जन्य पीड़ाओं के परिहार का साधन है। यह लिंग, वर्ग, वर्ण और जाति की पष्ष्ठभूमि पर अनीति पूर्वक रची गई सामाजिक संरचना की अमानुषिक परंपरा के दंश को अभिव्यक्त करने का, इस परंपरा के मूल में निहित अन्याय के प्रति विरोध जताने का शिष्ट और सामूहिक लोकविधि भी है।

जीवन यदि दुःख, पीड़ा और संघर्षों से भरा हुआ है तो लोक-साहित्य इन दुःखों, पीड़ाओं और संघर्षों के बीच सुख का, उल्लास का और खुशियों का क्षणिक संसार रचने का सामूहिक उपक्रम है। लोक-साहित्य सुकोमल मानवीय भावनाओं की अलिखित, मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति है, जिसमें कल्पना की ऊँची उड़ानें तो होती है, चमत्कष्त कर देने वाली फंतासी भी होती है। यही कारण है कि लोक साहित्य का नायक आवश्यक नहीं कि मानव ही हो; इसका नायक कोई मानवेत्तर प्राणी भी हो सकता है।

लोक-साहित्य मानव सभ्यता की सहचर है। इसकी उत्पत्ति कब और कैसे हुई होगी, यह अनुमान और अनुसंधान का विषय है, परंतु एक बात तय है कि इसकी उत्पत्ति और विकास उतना ही प्राकृतिक, सहज, और अनऔपचारिक है जितना कि मानवीय सभ्यता की उत्पत्ति और विकास। लोक-कथाएँ, लोक-गाथाएँ, लोक-गीत तथा लोकोक्तियाँ, लोक-साहित्य के विभिन्न रूप हैं। लोक-साहित्य में लोक द्वारा स्वीकार्य पौराणिक एवं ऐतिहासिक प्रसंगों का, पौराणिक पात्रों सहित ऐतिहासिक लोक-नायकों के अदम्य साहस, शौर्य और धीरोदात्त चरित्र का, अद्भुत लोकीकरण भी किया गया है। शिष्ट साहित्य का लोकसाहित्य में यह संक्रमण सहज और लोक इच्छा के अनुरूप ही होता है।

लोकगीत, लोककथा, लोकगाथा, कथाकंथली, हाना (मुहावरे और लोकोक्तियाँ), बुझउला, बिसकुट्टक आदि लोकसाहित्य की ही विधाएँ हैं। फुगड़ी, खुड़वा जैसे विभिन्न लोक खेलों में भी खेल के साथ गीत गाये जाते हैं। इन खेल गीतों को भी लोक साहित्य की भिन्न विधा के रूप में मान्य किया जाना चाहिए। रातभर नाचा देखकर लौटा हुआ लोक चैपाल में अपने साथियों के बीच बैठकर बड़े मानोयोग से उस नाचा दल की विभिन्न प्रस्तुतियों की समीक्षा करता है। लंबी यात्रा से लौटा हुआ लोक अपनी यात्रा, यात्रा के  अनुभवों और देखे गये स्थलों का सिलसिलेवार विवरण प्रस्तुत करता है। लोक की पुरानी पीढ़ी अपनी नयी पीढ़ी के समक्ष गाँव-समाज के किसी दिवंगत प्रभावशाली व्यक्ति, अपने पूर्वजों आदि के व्यक्तित्व और कष्तित्व के किस्से सुनाता है। क्या इसे आज की आधुनिक शिष्ट साहित्य की भाषा में आलोचना, संस्मरण, रेखाचित्र, यात्रावृत्तांत, जीवनी, आत्मकथा और व्यंग्य नहीं कहा जायेगा? जाहिर है, आधुनिक शिष्ट साहित्य की गद्य की इन समस्त विधाओं का स्रोत भी लोकसाहित्य ही है। हिंदी साहित्य में इन विधाओं का विकास आधुनिककाल में हुआ है परंतु लोक में यह आदिकाल से प्रचलित रही है, अब भी प्रचलित है, यद्यपि लोकसाहित्य के रूप में इन्हें अब तक पहचान नहीं मिल पाई है।

लोकगीत लोक-जीवन के सर्वाधिक निकट होते हैं। लोकगीतों की जड़े लोक-संस्कृति की उर्वर भूमि से पोषित होती हैं इसी उर्वर भूमि से ये लयात्मकता का सुंदर स्वरूप और रागात्मकता की प्राण ऊर्जा पाती हैं।

लोकगीत क्या है?
लोकगीत को परिभाषित करते हुए डाॅ. जीवन यदु कहते हैं - ’’लोकगीत लोक की आंतरिकता का लय और संगीतबद्ध रेखांकन हैं।’’2 यह ’’सामाजिक व्यवस्थाओं की देन है’’3 लोक का ज्ञान अनुभव आधारित और व्यावहारिक होता है। यह वर्तमान और आधुनिकता का तिरस्कार नहीं करता अपितु उसे स्वीकार करता है। लोकगीतों में वर्तमान और आधुनिकता का समावेश होने के कारण यह गतिमान होता है। लेकगीतों की उपर्युक्त विषेशताओं को समझने के लिए ददरिया के निम्न पदों को देखा जा सकता है -

बागे बगीचा दिखे ल हरियर
दुरूग वाला नई दिखे बदे हव नरियर
मोर झूल तरी
मोर झूल तरी गेंदा इंजन गाड़ी सेमर फूलगे
सेमर फूलगे अगास मन चिटको घड़ी नरवा मा
नरवा मा अगोर लेबे ना
नवा सड़किया रेंगे ल मैना
चार दिन के अवईया लगाये महीना
मोर झूल तरी

गाय चराये हियाव करिले
दोस्ती मा मजा नईये बिहाव करले
मोर झूल तरी
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हे बटकी में बासी, अउ चुटकी में नून
में गावाथंव ददरिया तें कान देके सुन वो चना के दार
हाय चना के दार, हाय चना के दार राजा, चना के दार रानी,
चना के दार गोंदली, तड़कत हे वो
टुरा हे परबुधिया, होटल में भजिया, झड़कत हे वो।

तरी फतोई, ऊपर कुरता, हाय ऊपर कुरता
रहि-रहि के सताथे, तोरेच सुरता।
होय चना के दार

कांदा रे कांदा, केंवट कांदा, हाय केंवट कांदा
हे ददरिया गवईया के, नाम दादा।
होय चना के दार

उद्धृत गीतों में - बाग बगीचा, सेमर का फूलना, गाय चराना, दोस्ती के प्रति अनास्था और विवाह में आस्था, बटकी में बासी अउ चुटकी में नून, तरी फतोई ऊपर कुरता, कांदा रे कांदा केंवट कांदा, में यहाँ के लोक स्ंस्कृति की अभिव्यक्ति हुई है परंतु इंजन गाड़ी, नवा सड़किया और होटल में भजिया, झड़कत हे, में लोक जीवन में आधुनिकता का समावेश और उसकी लोक स्वीकृति की अभिव्यक्ति हुई है।

बाग बगीचा दिखे ल हरियर
दुरूग वाला नई दिखे बदे हव नरियर
मोर झूल तरी
ददरिया छत्तीसगढ़ का श्रंृगार गीत है। उपरोक्त पंक्तियों का सौंदर्य देखिए। पति परदेश गये हैं। लौटने की तिथि बीत चुकी है। अब तो बाग-बगीचे भी हरे-भरे हो गये है। (सावन भी बीत रहा है।) विलंब होने के पीछे किसी अनिष्ट की आशंका है। इस कारण नायिका का धीरज टूट रहा है। अतः पति के सकुशल लौट आने की कामना करते हुए वह अपने ईष्ट से नारियल का बदना (मनौती) बदी हुई है। यहाँ लोक के निश्छल और सरल आस्था की अभिव्यक्ति का संुदर दृश्य अभिव्यंजित हो रहा है।

लोक गीत लोक की सांस्कृतिक यात्रा का साक्षी होता है
लोकसाहित्य ’’लोक की सांस्कृतिक यात्रा का साक्षी है।’’4 निम्न ददरिया का अवलोकन कीजिए। पति व्यापार करने परदेश गये है। घर में अकेली पत्नी सास, ननद और देवर द्वारा निरंतर प्रताड़ित हा रही है। पति अब अपने गाड़ी में चढ़कर (सवार होकर) सकुशल लौट आये हैं। आनंदित पत्नी थारी सजाकर उसका आरती उतार रही है।
सास गारी देवे, ननंद मुंह लेवे, देवर बाबू मोर।
संइया गारी देवे, परोसी गम लेवे, करार गोंदा फूल।
केरा बारी में डेरा देबो चले के बेरा हो।

आए बेपारी गाड़ी म चढिके।
तोर आरती उतारव थारी म धरिके हो।

लोकगीतों में आधुनिकता का समावेश
सामाजिक-राजनीतिक बदलावों के कारण उत्पन्न परिस्थियाँ लोक में सहज स्वीकार्य होकर लोक साहित्य में अभिव्यक्त होने लगती हैं।
टिकली रे पइसा ल बीनी लेइतेंव।
मोर सइकिल के चढ़इया ल चिन्ही लेइतेंव ग।
पहिरे ल पनही खाये ल बीरा पान।
मोर रइपुर के रहइया चल दिस पाकिस्तान ग।

नायिका का प्रेमी सायकिलवाला है। वह पनही पहनता है, पान खाता है। वह सायकिलवालों की भीड़ में उसे पहचानने की कोशिश करती है यह जानते हुए भी कि अब लौटने की कोई संभावना नहीं है क्योंकि देश का विभाजन हो गया है और अब वह पाकिस्तान चला गया है।

लोकदृष्टि लौकिक होती है  
लोकसाहित्य लोकसंस्कृति का अंग है। छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति कृषि आधारित है इसीलिए यहाँ के लोकसाहित्य में कष्षि संस्कष्ति रची-बसी है। पौराणिक पात्रों का भी आगमन लोक में कृषक के रूप में ही होता है। इसका कारण है -  ’’लोक साहित्य में मानवीय संबंधों का रूपांकन सरलतम विधि से होता है।’’5 परिणामस्वरूप लोकसाहित्य में पौराणिक पात्रों और अवतारी पुरुषों का भी सामान्यीकरण कर दिया जाता है। लोक साहित्य में अवतारी राम और सीता भी सामान्य मेहनतकश कृषक नर-नारी के रूप में आते हैं। जाहिर है, लोकदृष्टि लौकिक होती है -
’’राम गिस नांगर फांदे, सीता लेगिस बासी।
बिन बीजा के साग लाने, हमू खाबों बासी।।’’6
लोकसाहित्य में अलौकिक, अतीन्द्रिय, और चमत्कारपूर्ण कार्य सामान्य लौकिक पात्र भी कर सकता है।

लोकगीतों की आंतरिक बुनावट में असंगतता भी होती है 
’’लोकगीतों की आंतरिक बुनावट में विरोधाभास (असंगत कथन) को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता।’’7 इसका मूल कारण लोक की लौकिक दृष्टि हीहै। लोक बरछी धारण करनेवाला है अतः उसका धनुर्धारी राम भी बरछी ही धारण करेगा।
राम धरे बरछी लखन धरे बान।
सीता माई के खोजन बर निकलगे हनुमान ग।
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लोकगीतों में लोक प्रतिरोध के स्वर भी होते हैं -
मित्रों! कहना न होगा कि छत्तीसगढ़ राज्य लोकसाहित्य के मामले म अत्यंत समष्द्ध है। आप सब जानते ही है कि साहित्य अभिव्यक्ति का माध्यम होता है। हृदय का प्रेम-विशाद्, हर्श-उल्लास और सुख-दुख, की अभिव्यक्ति तो साहित्य के माध्यम से होता ही है, इनके अलावा मन की सहमति-असहमति, सामाजिक और धार्मिक शोषणों के प्रति विरोध-प्रतिरोध के स्वर और वे सभी बातें और कार्याभिव्यक्ति जिसे लोक अपनी सीमाओं और मर्यादाओं तथा सामाजिक तथा धार्मिक रूढ़ियों और दबावों के कारण क्रियात्मक रूप मे प्रत्यक्ष रूप से कह नहीं पाता है, वे सभी प्रतिरोधात्मक वष्त्तियाँ लोकसाहित्य के माध्यम से अभिव्यक्त होते हैं। इस तरह की अभिव्यक्ति के मामले में लोक और लोकसाहित्य की बराबरी शिष्ट साहित्य नहीं कर सकता। लोकसाहित्य के माध्यम से लोक अपनी असहमति और प्रतिरोध-विरोध को इतनी मारक, सुंदर और कलात्मक रूप में व्यक्त करता है कि उसके मन की भड़ास भी निकल जाती है और शोषकों और लक्षित लोगों को चुभती भी नहीं है। इन्हें भी सुननेवालों को भी केवल रसानुभूति ही होती है। कुछ उदाहरण देखिए -
 वैसे तो सुवा गीत के माध्यम से नारी-मन के हर्श-उल्लास, व्यथा और करुणा की अभिव्यक्ति होती है परंतु यह गीत प्रमुख रूप सेे पुरूश प्रधान समाज द्वारा नारी उत्पीड़न के विरोध में नारी-मन की सामूहिक अभिव्यक्ति का ही गीत है। एक पद देखिए -
’ठाकुर पारा जाइबे तंय घुम-फिर आइबे,
तंय घुम-फिर आइबे,
कि सेठ पारा झन जाइबे,
रे सुवा न, कि सेठ पारा झन जाइबे।
सेठ टुरा हे बदन इक मोहनी,
बदन इक मोहनी,
कि कपड़ा म लेथे मोहाय।
रे सुवा न, कि कपड़ा म लेथे मोहाय।’

विचार करें, सेठ वर्ग को षोशक वर्ग का पर्याय माना गया है। परंतु लोक के मन में इस वर्ग के प्रति कोई दुर्भावना नहीं है। सुआ गीत के इस पद में इस षोशक वर्ग के प्रति प्रतिरोध को जिस सौम्यता, शिष्टता और कलात्मक सौन्दर्य के साथ व्यक्त किया गया है वह कला और सौन्दर्य, दोनों की पराकाष्ठा ही तो है? हमारा लोकसाहित्य इसी प्रकार के प्रतिरोध के अनेक कलात्मक स्वरों से भरे पड़े हैं। एक हाना देखव - ’खेत बिगाड़े सोमना, गाँव बिगाड़े बाम्हना।’

ब्राह्मण वर्ग लोक में चाहे जितना पूज्य और मान्य हो, परंतु उसका शोषक रूप न तो लोकदृष्टि से बच सकता है और न ही उसके प्रतिरोध से। सोमना एक प्रकार का खरपतवार हैै जो देखते ही देखते खेतभर में फैल जाता है और फसल को बर्बाद कर देता है। इसी तरह जिस गाँव में ब्राह्मण परिवार होता है, वह गाँव बिगड़ जाता है। उस गाँव के लोग सदा शोषित होते रहते हैं, गाँव में कभी एकजुटता और समृद्धि नहीं आ पाती। ददरिया गीत का एक पद है -
’’करे बिहावे पठोये नेवता
नाता-गोता नइ चीन्हें बाम्हन देवता।’’
(हे सखि! इन ब्राह्मणों के आमंत्रण (बुलावे) पर कभी मत जाना। ये नाते-रिश्ते नहीं पहचानते। इनकी नजरों में नारी केवल भोग्या है।)
देवार जाति के लोग अपने लइकों-बच्चों का नाम रखते हैं - पुलिस, कप्तान, तहसीलदार, श्रीदेवी, आदि। सोचिए, यह क्या है? इसी प्रकार राऊत नाच में भी अनेक दोहे कहे जाते हैं। एक उदाहरण इस प्रकार है -

’कोलकी-कोलकी बइला रेंगे, बइला के सींग म माटी।
ठाकुर घर जोहारे ल गेंव, बुचुवा हँड़िया म बासी।।’

तथा
’कोलकी-कोलकी बइला रेंगे, बइला के सींग म माटी।
ठाकुर पहिरे सोना-चांदी, इकुरइन पहिरे घांटी।।’

ठाकुर अर्थात मालिक के घर में बासी को ’बुचुवा हँड़िया’ में रखा जाता है, और ठकुराइन गले में घंटी पहनती है, ऐसा कहना मालिक की इज्जत और रुतबे का मर्दन करना है। सामान्य स्थिति में यह मालिक का घोर और असहनीय अपमान है। इस प्रकार का अपमान करनेवाला दण्ड से बच नहीं सकता। परंतु यह विशेष लोकपर्व पर गाया जानेवाला लोक गीत है। मालिक जानता है कि इस दोहे में संदर्भित मालिक की कोई व्यक्तिगत पहचान नहीं है। यह एक सामान्यीकृत मालिक है। संसार का हर मालिक एक जैसा होता है। और मालिक इस अपमानजनक दोहे को सुनकर भी सम्मान का ही अनुभव करता है। यह एक प्रकार का लोक प्रतिकार है और यह लोकगीतो की अनन्य विशेषता भी है। लोकसाहित्य में निहित लोक प्रतिकार और लोकप्रतिरोध के स्वर को स्वयं शोषक भी नहीं समझ पाता है। समझकर भी वह इससे असंपृक्त बना रहता है। लोकसाहित्य में लोक प्रतिरोध की सबसे बड़ी विशेषता यही है।
प्रतिरोध के उपर्युक्त पदों में विचारणीय तथ्य यह है कि सेठ वर्ग तो शोषक के रूप में जगजाहिर है ही, ठाकुर वर्ग (मालिक) भी शोषक वर्ग ही है परंतु ठाकुर (मालिक) सुख-दुख का साथी भी है, इस नाते वह आपना ही हैं। इनका विश्वास किया जा सकता है। सेठ वर्ग श्रेष्ठ और शिष्ट वर्ग है। परदेशी है। इनका विश्वास कैसे किया जा सकता है? ये अपने और हम इनके अपने कैसे हो सकते हैं?
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लोकगीतों में लोक परंपराओं की अभिव्यक्ति होती है -
लोकगीतों में बिहाव गीत में लोक परंपराओं की अभिव्यक्ति सर्वाधिक मुखर रूप में होती है। बिहाव एक संस्कार है। अन्य लोक त्यौहारों और लोक परंपराओं की तरह अब बिहाव संस्कार के स्वरूप में परिवर्तन आ गये हैं। सप्ताहभर चलनेवाला बिहाव समारोह अब तीन दिनों में ही निपट जाता है। बिहाव के विभिन्न नेगों-संस्कारों के समय गाये जानेवाले गीत अब केवल कैसेट तक ही सीमित हो गये हैं। फिर भी, संक्षिप्त रूप में ही सही आज भी बिहाव के सारे नेग संपन्न कराये जाते हैं।
लोक परंपरा में वर को भगवान श्रीरामचंद्र और वधु को माता सीता का रूप माना जाता है। इसी तरह वर का गाँव अयोध्या में, वधु का गाँव जनकपुर में, वर का पिता राजा दशरथ तथा वधु का पिता राजा जनक के रूप में रुपांतरित हो जाते हैं। तब सुवासिनें वर से पूछती हैं - ’बाबू! तुम्हारे पिताजी चक्रवर्ती महाराजा है, फिर भी, अब तक तुम कुंवारे कैसे रहे?’ वर का जवाब तर्कसंगत और सामयिक है। वे कहते हैं - ’दीदी! हरदी के देश में हरदी मंहगा हो गया है। पर्रा के देश में पर्रा, कलसा के देश में कलसा और तेल के देश में तेल मंहगा हो गया है। ऐसे में शादी कैसे हो सकती थी।’ मंहगाई की समस्या आज की नहीं है, सनातन और पारंपरिक है।

तोरे ददा बाबू देसपति के राजा
अउ काहे गुन रहे गा कुंवारा
हरदी के देस दीदी
हरदी महंगा भइगे, अउ परी सुकाल भइगे
इही गुन रहेंव ओ कुंवारा
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रामे-वो-लखन के
रामे-वो-लखन के दाई तेल वो चढ़त हे
दाई तेल वो चढ़त हे
पेरि देबे तेलिया मोर राई सरसो के तेल
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लोक दृष्टि सदैव स्वप्नदृष्टा रही है। जिस वैभाव और आदर्श की प्राप्ति लोक के वास्तविक जीवन में संभव नहीं है उसके लिए न तो उसके मन में कोई पछतावा या मलिनता है अैर न ही उसे प्राप्त कने के लिए वह अव्यावहारिक या अनैतिक मार्ग अपनाता है। यह स्वप्न लोकगीतों में उभरकर सामने आती है और वह भी बड़े तार्किक ढंग से। राम और लखन का विवाह हो रहा है। राजा जनक के घर विवाह का मंडप सजा हुआ है तो जाहिर है आंगन की लिपाई साधारण गाय के गोबर से नहीं होगी, इसके लिए सुरभि गाय का ही गोबर मंगाया जायेगा। चैक मोतियों से पूरा जायेगा और सोने का कलश सजाया जायेगा।
सुरहिन गइया के गोबर मंगाले ओ
हाय, हाय मोर दाई खूंट धर अंगना लिपा ले ओ
खूंट धर अंगना लिपा ले ओ
हाय, हाय मोर दाई मोतियन चैंक पुरा ले ओ
मोतियन चैंक पुरा ले ओ
हाय, हाय मोर दाई सोने के कलसा मंढ़ाले ओ
सोने के कलसा मंढाले ओ
हाय, हाय मोर दाई सोने के बतिया लगा ले ओ
सोने के बतिया लगा ले ओ
हाय, हाय मोर दाई सुरहिन घीव जला ले ओ
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यहाँ की संस्कष्ति का आधार कृषि है और उत्पादन के साधनों में गाँव के मरार, कंडरा, बढ़ाई, राउत नाई आदि का महत्व लोकस्वीकृत है अतः सामाजिक जीवन, लोकोत्सव और मांगलिक कार्यों में इनकी सहभागिता अनिवार्य और महत्वपूर्ण होता है। इनकी सहभागिता यहाँ की लोकपरंपरा का अभिन्न अंग है। लोकोत्सवों और मांगलिक कार्यों के समय इनकी मान और प्रतिष्ठा को बराबर महत्व दिया जाता है। तेल चढ़ाने के समय गाये जानेवाले इस बिहाव गीत में इस परंपरा की अभिव्यक्ति इस प्रकार हुई है -
कहां रे हरदी, कहां रे हरदी
भई तोर जनामन, भई तोर जनामन
कहां रे लिए अवतार
मरार बारी, मरार बारी
दीदी मोर जनामन, दीदी मोर जनामन
बनिया दुकाने दीदी लिएंव अवतार
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इतिहास से पता चलता है कि स्वयंवर में कन्या द्वारा वरण न किये गये राजा महाराजा सदैव आक्रोशित हो जाया करते थे और चयनित वर को युद्ध की चुनौती का सामना करना पड़ता था। बिना युद्ध शादियाँ संपनन नहीं होती थी। आल्हाखण्ड में भी इस तरह के दृश्यों का वर्णन मिलता है। विवाह मंडप से कन्या को सुरक्षित व्याहकर लाने के लिए युद्ध जीतना जरूरी होता था। अतः माएँ दूल्हे को विजय का आशीर्वाद देती हुई उसका मंगल अभिषेक करती थी और उसे अपने दूध का वास्ता देती थी। यह परंपरा आज भी माँ द्वारा दूल्हे का मउंर सौपने के रूप में प्रचलित है।
पहिरव दाई्
पहिरव दाई हो सोन रंग कपड़ा
हो सोन रंग कपड़ा
सौंपव दाई मोर माथे के मउर्
मउर सोपत ले्
मउर सोपत ले दाई बंइहा झन डोलय
दाई बंइहा झन डोलय
डोलय दाई मोर माथे के मउर्
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यद्यपि दीपावली के समय सुरहोती की रात गौरा-गौरी की पूजा की परंपरा है, जो कि महादेव-पार्वती के विवाह का लोक रूप है, परंतु इस परंपरा के साथ गोंड़ आदिवासी समाज में विवाहित बेटियों के मान-सम्मान की परंपरा भी जुड़ी हुई है। इसी तरह भोजली पर्व भी बेटियों की मान-सम्मान का पर्व है।

लोकगीतों में लोक आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति
लोकगीतों में लोक आकांक्षाओं की भी अभिव्यक्ति होती है। भिलाई स्पात संयंत्र की स्थापना के समय सरकार ने यहाँ के लोगों को संपन्नता के खूब सब्जबाग दिखाये थे। इसी सपने को आधार बनाकर यहाँ के लोग अपनी उम्मीदों को अपनी लोककलाओं के विभिन्न माध्यमों के द्वारा व्यक्त करते रहे। परंतु जल्द ही उन्हें समझ आ गया कि वे छल लिये गये हैं। संयंत्र स्थापना हेतु जिन गाँवों को उजाड़ा गया, जिन किसानों की जमीनों, और खेतों को अधिग्रहित किया गयाय उनके लिए बड़े-बड़े वादे किये गये। पर वे अब कहाँ और किस हालत में हैं, कोई नहीं जानता। यहाँ की नदियों में बहनेवाले जल से यहाँ के खेतों की सिंचाई के लिए बारहों महीने पानी दिया जा सकता था। तब यहाँ के किसान और खेतिहर मजदूर पंजाब के किसानों की तरह समृद्ध और खुशहाल होते। परंतु स्पात संयंत्र बनने से यहाँ की नदियों का अधिकांश जल स्पात कारखाने में और स्पात नगरी के लोगों के टायलेटों में खप जाता है। छत्तीसगढ़ में केवल वर्शा आधारित खरीफ की खेती हो पाती है। प्रचुर जल संपदा के रहते छत्तीसगढ़ को हर साल सूखे की स्थिति का सामना करना पड़ता है। स्पात नगरी में अन्य प्रांत से आकर बसनेवाले लोगों ने यहाँ की समृद्ध लोक परंपराओं का, यहाँ की भाशा का मजाक उड़ाने में कोई कमी नहीं की। यहाँ के लौह अयस्क का दोहन करके जो स्पात बनाया जाता है वह छत्तीसगढ़ियों के लिए नहीं है। भिलाई स्पात संयंत्र छत्तीसढ़ और छत्तीसगढ़ियों के लिए अभिशाप के अलावा और कुछ भी साबित नहीं हुआ। इससे चाहे देष समृद्ध हुआ होगा, परंतु यहाँ के लोग केवल षोशत हुए हैं। संयत्र स्थापित होते समय छत्तीसगढ़ियों का दिखाये गए सपने की अभिव्यक्ति भी यहाँ के लोकगीतों में हुई है। ददरिया का यह पद देखिए -
’का साग रांधे टुरी लोहा के कड़ाही में।
तोर-मोर भेट होही दुरुग-भिलाई में।।’
(प्रेम करनेवाले नायक-नायिका की आर्थिक स्थिति असमान है। नायिका की रसोई में सब्जी लोहे की कड़ाही में बनती है। लोहे की कड़ाही  में सब्जी का बनना संपन्नता का प्रतीक है। नायक गरीब है। इसीलिए दोनों के मिलने की संभावना कम है। परंतु अब भिलाई में स्पात का कारखाना बन रहा है। सरकार ने कहा है कि यहाँ के सभी गरीबों को वह कारखाने में नौकरी देगी। नायक भी वहाँ नौकरी पायेगा। नौकरी पाकर खूब पैसा कमायेगा। उसके पास भी लोहे की कड़ाही होगी। तब नायिका से मिलन में कोई बाधा नहीं होगी। इसीलिए उन्होंने नायिका से वादा किया है कि अब उनकी अगली भेंट दुरुग-भिलाई में ही होगी।)

संदर्भ -
1. लोकस्वप्न में लिलिहंसा, डा.ॅ जीवन यदु, श्रीप्रकाशन दुर्ग, छ.ग., संस्करण 2007, पष्ष्ठ 7 ।
2. वही , पृष्ठ 37 ।
3. वही ,पृष्ठ 37 ।
4. वही , पृष्ठ 39 ।
5. वही , पृष्ठ 8 ।
6. वही ,पृष्ठ 9 ।
7. वही , पृष्ठ 42 ।
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25 - ’बुद्धिमान की मूर्खता’ से दो-चार होते हुए

’कार्यालय तेरी अकथ कहानी’ और ’स्वार्थ के वायरस’ के बाद ’बुद्धिमान की मूर्खता’, वीरेन्द्र सरल का तीसरा व्यंग्य संग्रह है। अमन प्रकाशन कानपुर द्वारा 2018 में प्रकाशित 128 पष्ष्ठ और 275 रूपय मूल्य के इस संग्रह में लेखक की अपनी बात के अलावा दो भूमिकाएँ और 23 व्यंग्य रचनाएँ संग्रहित हैं। संग्रह की भूमिकाएँ सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार, व्यंग्यालोचक व भाषाविद् डाॅ. सुरेशकांत और जानेमाने व्यंग्यकार डाॅ. हरीश नवल ने लिखी हैं।
संग्रह में व्यंग्यकार वीरेन्द्र सरल ने ’’गलाकाट प्रतिस्पर्धा के इस दौर में जिंदगी की रफ्तार’’ के कारण ’’पीछे छूटते जा रहे मानवीय मूल्यों कृकृ की पड़ताल करके मुखौटे के भीतर की सच्चाई को सामने’’ लाने का प्रयास किया है। उनका यह प्रयास ’कार्यालय तेरी अकथ कहानी’ और ’स्वार्थ के वायरस’ से सतत् जारी है जो कि स्तुत्य है। संग्रह पठनीय और संग्रहणीय है।
बिना ’कार’ के इस व्यंग्यकार के बारे में डाॅ. सुरेशकांत ने अपनी भूमिका में लिखा है कि जो ’’अच्छा लिख रहे हैं और सतत् अच्छा लिख पा रहे हैं’’, उन ’’मुट्ठीभर’’ नव व्यंग्यकारों में वीरेन्द्र सरल ’’आगे’’ हैं। वे आगे लिखते हैं - ’’उनके पास कथ्य का इतना भारी बल है कि शैली की सारी कमजोरियाँ ढक लेता है। कृकृ जब ये अपनी भाषा-शैली पर भी ध्यान देने लगेंगे तो कितने प्रभावशाली हो जायेंगे।’’
अर्थात् वीरेन्द्र सरल की भाषा और शैली में कुछ कमियाँ हैं।
अपनी भूमिका में डाॅ. हरीश नवल लिखते हैं - ’’वीरेन्द्र की भाषा व्यंग्यानुकूल मर्म को छूनेवाली समर्थ भाषा है।’’
वीरेन्द्र सरल की भाषा के बारे में दो दिग्गजों के इन परस्पर विरोधी कथनों में से यदि मजबूरीवश मुझे अपना पक्ष चुनना हो तो मैं डाॅ. सुरेशकांत के पक्ष में जाना चाहूँगा। संग्रह की सभी 23 रचनाएँ कथा तत्वों से भरपूर हैं। वीरेन्द्र सरल की निरीक्षण क्षमता व्यापक है इसीलिए प्रत्येक व्यंग्य के कथानक भिन्न-भिन्न हैं। अस्पतालों, सरकारी कार्यालयों, आदि में व्याप्त भ्रष्टाचार, बैंकों  के घोटाले, सरकारी योजनाओं की दुर्गति, सरकार की नीतियाँ, भूमाफियाओं की किसानों की जमीनों को हड़पने की कुटिल चालें, वर्तमान शिक्षा नीति से उपजी विडंबनाएँ, आधुनिक सायबर अपराध आदि कुछ भी वीरेन्द्र सरल की सजग नजरों से बच नहीं पाये हैं। ’स्मार्ट मरीज’ में अस्पतालों में डाॅक्टरों की संवेदनशून्यता और चिकित्सा जैसे पवि़त्र कर्म को व्यापार में बदलकर ’स्वास्थ्य बीमा योजना के अंतर्गत जारी स्मार्ट कार्ड के रूपयों को ल्ूटने की साजिश’ की कहानी है। छत्तीसगढ़ के सरकारी अस्पतालों में घटिया और नकली दवाइयों की खरीदी और पिछले दिनों महिला नसबंदी शिविर में नकली सिप्रोसिन के कारण नसबंदी करानेवाली दर्जनों महिलाओं की मष्त्यु की घटना को ’भवसागर तारण केन्द्र’ का विषय बनाया गया है। ’मष्त्यु प्रमाणपत्र’ में भी अस्पतालों और डाॅक्टरों पर व्यंग्य किया गया है। ’बाबूलाल का जीव’, ’देशभक्ति का बुखार’, ’सुखी राम जनसेवक’, ’विज्ञापनिस्तान की सैर’, ’हिरण्यकश्यप की आधुनिक कथा’, ’श्रद्धेय उल्लू जी’, ’मुफ्त तीर्थ यात्रा’, और ’आलोकतंत्र की कथा’ में नेताओं और अधिकारियों के दोहरे चरित्र, तथा सरकारी योजनाओं का अपात्र लोगों द्वारा लाभ लेने के लिए अपनानेवाले हथकंडों पर व्यंग्य किया गया है। ’ठगी का व्यापार’ में सायबर अपराधियों के द्वारा बैंक खाता धारकों से विभिन्न प्रकार के इनामों का लालच देकर ए. टी. एम. का नंबर और पासवर्ड पूछकर उनके खातों से रकम उड़ा लेने की कहानी है। ’अतिक्रमण अनीति’ में भूमाफियाओं के हथकंडों को उजागर किया गया है। धर्म के नाम पर आम लोगों के शोषण को ’ज्ञानीजी का ज्ञान’ तथा गणेशोत्सव के दौरान चैक-चैराहों पर लगनेवाले ट्रैफिक जाम और चंदा के धंधे को ’गणेशजी की चिंता’ में रेखांकित किया गया है। ’दर्दे द्रोणाचार्य’ और ’अजीब दास्तां है यह’ में वर्तमान शिक्षा व्यवस्था से उपजी विडंबनाओं को व्यंग्य का विषय बनाया गया है। साहित्य, लेखकों और संपादकों को ’बुद्धिमान की मूर्खता’, ’पुरस्कार प्रपंच’, तथा ’महान टाइप के लेखक’ में उचित स्थान दिया गया। ’पितष्पक्ष में एक पुण्यात्मा’ में साहित्य में लगभग उपेक्षित किसानों और गाँवों की दुर्दशा को तथा ’सेल्फी का भूत’ में स्मार्ट फोन जैसे नवीन तकनीक के दुरुपयोग से उत्पन्न खतरों को व्यंग्य का विषय बनाकर वीरेन्द्र सरल ने आपनी सजगता और व्यापक दष्ष्टि का परिचय दिया है।
’विज्ञापनिस्तान की सैर’ इस संग्रह की सर्वाधिक सशक्त व्यंग्य रचना है। बाजार की शक्तियों ने संसार को आज धनबल और बाहुबल द्वारा शासित निरंकुश साम्राज्य ’विज्ञापनिस्तान’ में रूपांतरित कर दिया है जहाँ हर आदमी विज्ञापनों के सम्मोहन से सम्मोहित है। व्यंग्य में विभिन्न उत्पादों की गुणवत्ता के बढ़ा-चढ़ाकर किये गये दावों, बाबाओं-तांत्रिकों द्वारा तंत्र-मंत्र और गंडे-ताबीजों के जरिये सभी बीमारियों के उपचार के दावों और देश के कर्णधारों द्वारा देश की सुरक्षा को ताक में रखकर दिये गये खोखले बयानों में साम्यता दिखाया गया है। इस रचना में व्यंग्य की धार को परखने के लिए यह उदाहरण देखिए  - ’’यह एक विशेष चालीसा रक्षा कवच है। इसके रहते हमें दुश्मनों की गोली तो क्या, गोला भी लग जाय तब भी हमारा कुछ नहीं बिगड़नेवाला है।’’
वीरेन्द्र सरल के इस तीसरे व्यंग्य संग्रह के संबंध में डाॅ. हरीश नवल लिखते हैं - ’’कार्यालय तेरी अकथ कहानी’ पढ़कर लगा जैसे किसी परिपक्व रचनाकार की कष्ति है कृकृ ’स्वार्थ के वायरस’ पढ़ा और लगा कि एक श्रेष्ठ व्यंग्यकार नई पीढ़ी को मिल गया है।’’ और इधर हमारे लंगोटिया आलोचक मित्र यशवंत जी का कहना है कि ’कार्यालय तेरी अकथ कहानी’ से ’स्वार्थ के वायरस’ की तुलना करें तो वीरेन्द्र की लेखनी में गुणवत्ता का ह्रास नजर आता है। मैं अपनी कहूँ तो मुझे तीनों संग्रह की गुणवत्ता में कोई विचलन नहीं दिखता।
किसी भी रचना को पढ़ते हुए मुक्तिबोध का सवाल - ’पार्टनर! तुम्हारी पालिटिक्स क्या है’, अक्सर मेरे मन में कौंधता रहता है। वीरेन्द्र सरल की रचनाओं से गुजरते हुए भी यह प्रश्न मुझे परेशान करता रहा। वीरेन्द्र सरल के संदर्भ में मेरी यह परेशानी बरकार है। पर यह तो स्वीकार करना ही पडेगा कि वीरेन्द्र सरल की रचनाएँ सोचने के लिए बाध्य करती हैं। कुछ स्थानों पर वीरेन्द्र सरल के अस्वाभाविक और विरोधाभासी कथन विचलित भी करते हैं। उदाहरणार्थ - हर आदमी अस्पताल और अदालतों से बचना चाहता है परंतु ’स्मार्ट मरीज’ का दादाजी चंदर सिंह अस्पताल की सैर करने के लिए मचलते हैं। वीरेन्द्र सरल सतत् रूप से अपने कथनों को विभिन्न उपमाओं के द्वारा सुंदर दिखाने और प्रभावशाली बनाने का प्रयास करते चलते हैं। उनकी कुछ उपमाओं में भी विरोधाभासी गुण नजर आते हैं। ’आलोकतंत्र की कथा’ से एक उदाहरण देखिए - ’’उनकी जुबान पर लोककथाएँ ऐसे हुआ करती थी जैसे पुलिस के जुबान पर गाली और नेताओं के जुबान पर आश्वासन।’’ इस उदाहरण में लोककथाएँ उपमेय और पुलिस की गाली तथा नेताओं के आश्वासन उपमान हैं। यहाँ लोककथा जैसी पवित्र चीज की तुलना पुलिस की गाली तथा नेताओं के आश्वासन से करना अजीब लगता है। इसी व्यंग्य में आगे एक स्थान पर कहा गया है - ’’उनकी स्मष्तियों में लोककथा वैसी ही सुरक्षित थी जैसे जमाखोरों के गोदामों में माल।’’ इस व्यंग्य पद में लोककथाकार की तुलना जमाखोर व्यापारी से तथा लोककथा की तुलना उसके गोदामों में जमा माल से की गई है। लोककथाकार को जमाखोर व्यापारी और लोककथा को कालाबाजारी का माल कहना अजीब लगता है। वीरेन्द्र सरल के व्यंग्यों में प्रयुक्त प्रतीकें, यथा - उल्लू, गधा, सियार, गिद्ध, गिरगिट आदि के निहितार्थ जल्द ही डिकोड हो जाते हैं। किसी व्यंग्य का अंत किस प्रकार होनेवाला है यह भी पाठक के लिए अधिक देर तक जिज्ञासा का विषय नहीं रह पाता। वीरेन्द्र सरल के व्यंग्यों की यह सहज संप्रेषणीयता पाठकों के लिए किसी भी प्रकार के स्पेस की संभावना को समाप्त कर देता है। परंतु वीरेन्द्र सरल के किसी भी व्यंग्य को पढ़ लेने के बाद पाठक के मस्तिष्क में गूंजनेवाला अनुनाद इस कमी को दूर कर देता है।
फिलहाल, वीरेन्द्र सरल के इस व्यंग्य संग्रह की प्रशंसा हो रही है और आशा है, आगे भी होती रहेगी।
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26 - विज्ञान के अंधेरे में अच्छी नींद आती है - केदारनाथ सिंह 

’विज्ञान के अंधेरे में अच्छी नींद आती है’, यह कथन, (मान्यता, निष्पत्ति अथवा निष्कर्ष - कौन सा शब्द सटीक बैठेगा, समझ नहीं पा रहा हूँ।) प्रख्यात कवि केदारनाथ सिंह का है, जो उनकी कविता - विज्ञान औद नींद’ से लिया गया है। पूरी कविता इस प्रकार है -
विज्ञान और नींद

जब ट्रेन पर चढ़ता हूँ
तो विज्ञान को धन्यवाद देता हूँ
वैज्ञानिक को भी

जब उतरता हूँ वायुयान से
तो ढेरों धन्यवाद देता हूँ विज्ञान को
और थोड़ा-सा ईश्वर को भी

पर जब बिस्तर पर जाता हूँ
और रोशनी में नहीं आती नींद
तो बत्ती बुझाता हूँ और सो जाता हूँ

विज्ञान के अंधेरे में अच्छी नींद आती है।
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कविता पढ़कर मन में कुछ सवाल तैर जाते हैं, मसलन -
जिस अंधेरे में अच्छी नींद आती है, वह अंधेरा क्या विज्ञान का अंधेरा है?
जिस उजाले में अच्छी नींद नहीं आती है, वह उजाला क्या विज्ञान का उजाला है?
विज्ञान का अंधेरा क्या है और विज्ञान का उजाला क्या?
अंधेरे और उजाले का संबंध क्या केवल विज्ञान से है?
अंधेरे और उजाले का संबंध क्या ज्ञान से भी नहीं है?
विज्ञान की तरक्की और वैज्ञानिक सोच विकसित होने से पहले अंधेरा था और अजाला भी। तब भी तो लोग बत्ती बुझाकर, अंधेरे में ही सोते रहे होंगे। नींद और अंधेरे का संबंध तो विज्ञान की तरक्की के पहले से है। ................. ?
बहुत दुविधा और भ्रम है। कृपा करके कोई तो समझाए।
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मेरे अनुसार -
केदारनाथ सिंह की इस कविता ’विज्ञान और नींद’ के प्रथम दो पदों का भावार्थ स्पष्ट है। तीसरे पद का भावार्थ इस प्रकार होना चाहिए -
समकालीन कविताओं में विचार सर्वोपरि होते हैं। समकालीन कविताएँ न सिर्फ व्यवस्था का पतिपक्षी होती हैं अपितु रूढ़ परंपराओं का अतिक्रमण भी करती हैं। कवि अपने विचारों को प्रतीकों और बिंबों के माध्यम से व्यक्त करता है। ये प्रतीक कभी बड़े स्पष्ट होते हैं तो कभी बेहद संश्लिष्ट। इस कविता में भी ’विज्ञान’, ’नींद’, ’अंधेरा’ और ’उजाला’ प्रतीकात्मक रूप में प्रयुक्त हुए हैं। यहाँ ’अंधेरे’ और ’उजाले’ शब्द के पारंपरिक प्रतीकात्मक अर्थ ’अज्ञान’ और ’ज्ञान’ का अतिक्रमण हुआ है और इनके भावार्थों का विस्तार हुआ है। (संपूर्ण ब्रह्माण्ड स्वयंभू है और अपनी व्यवस्थाओं के तहत अपने ही नियमों और सिद्धतों का पालन करते हुए अपने संरचनात्मक अस्तित्व में विद्यमान है। ब्रह्माण्ड की व्यवस्थाएँ उसके नियम और सिद्धांत ही विज्ञान है। विज्ञान कभी अनुपस्थित नहीं रहा अपितु मनुष्य को ही इसकी जानकारी नहीं थी। जानकारी के अभाव में मनुष्य के लिए यह रहस्य बना रहा। अब तक इस रहस्य के अंश मात्र को ही समझा जा सका है।) विज्ञान का ’प्रकाश’ अपने विस्तारित अर्थ में ब्रह्माण्ड के रहस्यों का उद्घाटन है। यह उद्घाटन सदैव ही मनुष्य की परंपरिक मान्यताओं और आस्थाओं पर प्रहार करता रहा है। मनुष्य अपनी पारंपरिक मान्यताओं और आस्थाओं को खण्डित होते देख तिलमिलाता है। इस प्रहार, और तिलमिलाहट से उसे नींद कैसे आयेगी? अच्छी नींद के लिए वह विज्ञान के द्वारा उद्घाटित रहस्यों की सच्चाई को नकारता है। नकारता भी है और जीभरकर उसे कोसता भी है। इस प्रकार विज्ञान को नकारना ही अपने विस्तारित अर्थ में विज्ञान का ’अंधेरा’ है जो सोने के लिए, अच्छी नींद के लिए जरूरी है। विज्ञान हमें जगाता है और हमारी पारंपरिक मान्यताएँ और आस्थाएँ हमें जागने से रोकती हैं, सुलाती हैं।
चर्चा जारी रहे।
कुबेर

27 - खुमान सर: जैसा मैंने पाया

जीवित किंवदंती -
किसी प्रतिभा संपन्न व्यक्ति के व्यक्तित्व और कृतित्व के संबंध में जनमानस में जब जिज्ञासा, श्रद्धा और प्रेम-पल्लवित, विभिन्न प्रकार की प्रमाणित-अप्रमाणित और कल्पित बातें प्रचलित हो जाती हैं तो उसे हम लिजेण्डरी परसन अर्थात् किंवदंती पुरुष, कहने लगते हैं। जिस विभूति का नागरिक अभिनंदन करने के लिए आज हम यहाँ उपस्थित हुए हैं, भारत शासन के ’संगीत एवं नाटक अकादमी’ सम्मान से विभूषित आदरणीय श्री खुमानलाल साव, जिन्हें छत्तीसगढ़ की कला जगत् अतीव श्रद्धा और सम्मान के साथ ’खुमान सर’ कहकर संबोधित करती है, आज जीवित किंवदंती बन चुके हैं। जिन्होंने ’मन डोले रे माघ फगुनवा’, ’मोर संग चलव जी’, ’धनी बिना जग लागे सुन्ना’, ’ओ गाड़ीवाला रे’ जैसे अनेक सुमधुर गीतों की रचना की, और जिन गीतों को सुनते-गुनगुनाते मेरा बचपन बीता, और आज भी ये गीत उसी तरह मेरे मन में रचे-बसे हैं, उनके प्रति श्रद्धा भाव जागृत होना और ऐसे श्रद्धेय का सान्निध्य प्राप्त करने की मेेरे मन में लालसा जागृत होना सहज मानवीय स्वभाव है।
कुछ वर्ष पहले मैं डाॅ. नरेश वर्मा के साथ संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन के द्वारा छत्तीसगढ़ी भाषा और संस्कृति विषय पर आयोजित राज्य स्तरीय एक कार्यशाला में शामिल होने के लिए रायपुर गया था। कार्यक्रम टाउन हाल में आयोजित था। वापसी में खुमान सर ने हमें अपने साथ ले लिया। और इस तरह अपने श्रद्धेय का सान्निध्य प्राप्त करने की मेरी वर्षों पुरानी लालसा पूरी हुई। उस दिन खुमान सर की रससिक्त बातों से समय के प्रवाह का पता भी नहीं चला और हम ठेकवा पहुँच गये।

कला व साहित्य को परखनेवाला राजशाही संस्कार -
साकेत साहित्य परिषद् का वार्षिक कार्यक्रम भवानी मंदिर प्रांगण, करेला में चल रहा था। अप्रेल का महीना था। सम्मेलन में पधारे समस्त साहित्यकारों को अचंभित करते हुए खुमान सर का अचानक आगमन हुआ। इतनी बड़ी विभूति को आमंत्रित न करने की अपनी चूक के कारण मुझे बड़ी आत्मग्लानि हुई। मंच पर आसीन होने के लिए मिन्नतें की गई पर यह कहते हुए कि ’’तुंहर कार्यक्रम के समाचार पेपर में पढ़ेन, देखे के मन लगिस त आ गेन’’, वे बड़े सहज भाव से दर्शक दीर्घा में बैठे रहे। शायद 2013 की बात है, हमारे आदरणीय प्राचार्य श्री मुकुल साव, जो खुमान सर के यशस्वी भतीजे हैं, ने स्कूल में मुझे वैवाहिक आमंत्रण पत्र देते हुए कहा कि - ’’ठेकवा में शादी है, चाचाजी ने व्यक्तिगत रूप से कहा है, आपको जरूर आना है।’’ अचंभित होने का यह मेरा दूसरा अवसर था। खुमान सर के परिवार का यह आमंत्रण पाकर उस समय मुझे जो खुशी और सम्मान का अनुभव हुआ उसे व्यक्त करने के लिए आज भी मेरे पास शब्द नहीं है। शादी समारोह में जाने पर मैंने देखा, सारा मंडप कलाकारों, साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों से भरा पड़ा है। मेरी आँखों में मध्ययुगीन भारतीय इतिहास के वे पन्ने एक-एककर रूपायित होनेे लगे, जिनमें बादशाहों, राजाओं-महाराजाओं के दरबार में नौरत्नों की ससम्मान उपस्थिति का उल्लेख मिलता है। विभिन्न कलाक्षेत्र के कलाकरों, साहित्यकारों, और विद्वानों के प्रति, उनसे जुड़ने और उन्हें जोड़ने का जो आदर्श मध्ययुग के बादशाहों, राजाओं और महाराजाओं ने स्थापित किया था, वह आदर्श और वह संस्कार कला के इस बादशाह, खुमान सर के व्यक्तित्व में भी देखा जा सकता है।

अतिशयोक्ति अलंकार के अप्रतिम प्रयोक्ता -
खुमान सर से मैं जब भी मिलकर आता हूँ , आदरणीय मिलिंद साव से इस मुलाकात और मुलाकात में हुई बातचीत की चर्चा जरूर करता हूँ। मिलिंद सर मेरे वरिष्ठ सहकर्मी हैं और संगीत और शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए वे अपरिचित नहीं हैं, अक्सर कहते हैं - ’’खुमान चाचा के पास अतिशयोक्ति कथन की कमी तो है नहीं, बस, आप जैसा श्रोता चाहिए।’’
अतिशयोक्तिपूर्ण कथन के लिए भी तो अतीव कल्पना शक्ति चाहिए। यह एक विरल प्रतिभा है। यह प्रतिभा कलासाधकों में ही संभव है। कला और कल्पना का अस्तित्व अभिन्न होता है। मूर्तिकला, चित्रकला, अभिनय कला, संगीत कला, काव्यकला अथवा कला का कोई भी क्षेत्र हो, कलाकार की  कल्पना की उड़ान जितनी ऊँची और महान् होगी उसकी कलाकृति भी उतनी ही उच्चकोटि की और महान् होगी। काव्य में जहाँ भी अतिशयोक्ति पूर्ण वर्णन होता है वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार माना जाता है। भारतीय साहित्य में कालिदास, जयदेव, तुलसीदास, जायसी, और सेनापति जैसे महान् कवियों की महानता में अतिशयोक्ति अलंकार का योगदान कम नहीं है। महान् कलाकृतियों के सृजन के मूल में महान् कल्पना तत्व ही होते हैं। खुमान सर की कालजयी सुमधुर संगीत रचनाओं के परिप्रेक्ष्य में कहें तो उनकी अतीव कल्पना प्रतिभा से प्रसूत उनकी अतिशयोक्तिपूर्ण कथन ही इनके मूल श्रोत हैं।

अनुशासन की कठोरता और हृदय की कोमलता
मदराजी महोत्सव के सिलसिले में हमें दुर्ग जाना था। प्रस्थान के लिए 2 बजे का समय नियत था। किसी अपरिहार्य कारणों से मुझे आधे घंटे का विलम्ब हो गया। खुमान सर निर्धारित समय पर तैयार होकर प्रतीक्षा कर रहे थे। पहुँचने पर उन्होंने कहा - ’’कुबेर अस का? बड़े आदमी मन ला देरी होइच जाथे।’’
प्रेम, अपनत्व और दण्डभाव से युक्त उनके इस उलाहने के प्रत्युत्तर में आत्मसमर्पण करने के अलावा मेरे पास और कोई दूसरा उपाय नहीं था। अनुशासन के मामले में बाहर से वे जितना कठोर दिखाई देते हैं, उनका हृदय उतना ही कोमल, मधुर और रागात्मकता से परिपूर्ण है। यही कोमलता, यही मधुरता और यही रागात्मक तत्व उनकी संगीत रचनाओं को मधुर, कोमल, रागात्मक और कालजयी बनाते हैं। उनका व्यक्तित्व श्रीफल की तरह है। बाहर से कठोर पर भीतर से मधुर, कोमल और स्वस्थ।

5 सितंबर का अद्भुत संयोग -
भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति तथा दूसरे राष्ट्रपति डाॅ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक शिक्षक और महान् दार्शनिक थे इसीलिए उनके जन्मदिन 5 सितंबर को सारा राष्ट्र शिक्षक दिवस के रूप में मनाता है। हमारे छत्तीसगढ़ राज्य के संदर्भ में यह सुखद संयोग है कि छत्तीसगढ़ी लोकसंगीत अैर लोककला के महान् विभूति खुमान सर भी मूलतः एक शिक्षक और एक गुरु ही हैं और उनका भी जन्मदिन 5 सितंबर ही है। मैं आशान्वित हूँ कि भविष्य में छत्तीसगढ़ राज्य में 5 सितंबर, शिक्षक दिवस को न केवल डाॅ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन से बल्कि खुमानलाल साव के जन्मदिन से भी संदर्भित किया जायेगा।
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28 - संस्कार ले उपजे कहानी : बनकैना

साहित्य अउ संस्कृति के तिमाही पत्रिका ‘‘विचार वीथी’’ के संपादक अउ साहित्यकार सुरेश सर्वेद के नाम ह न सिरिक्त पत्रकारिता ले जुडे बुद्धिजीवी मनबर भलुक साहित्य के जानकार विद्वान मनबर घला कोनों अनजाना नइ हे। न सिरिक्त छत्तीसग<, छत्तीसग< के बाहिर, देश भर म, समर्पित अउ जागरूक संपादक के रूप म अउ विशेष रूप म गद्य साहित्य के क्षेत्र कथाकार के रूप म, वोकर पहिचान बन गे हे। ‘‘विचार वीथी’’ के जरिया वो मन ह राष्टभाषा हिन्दी के संगेसंग छत्तीसगढी भाखा के सोर ल घला देष भर म बगरावत हें। येकर पहिली सुरेश सर्वेद के हिन्दी कहानी मन के दू ठन संग्रह छप चुके हे, ये दरी वो मन ह छत्तीसगढी साहित्य के भंडार म बढौतरी करे बर ये छत्तीसगढी के कहानी संग्रह ल आप मन के हाथ म संउपत हें। सूमुद्र ह घला बूँद-बूँद पानी के जुरियाय ले बने हे। ‘‘बनकैना’’ ह घला छत्तीसगढी साहित्य के समुद्र ल भरे खातिर एक ठन बुँद हरे। सुरेश सर्वेद ह साहित्य, पत्रकारिता अउ संपादन के क्षेत्र म हमर मयारूक छत्तीसगढ के गाँव के माटी ले निकल के आय हवंय, उंकर तन-मन अउ हिरदे म छत्तीसगढ के माटी के महक ह, इहां के संस्कार अउ संस्कृ ति ह रचे-बसे हे, इही पाय के ये कहानी संग्रह म रचाय जम्मो कहानी मन ल पढत खानी आप मन ल, अपने गाँव म, अपने गाँव के खेत-खार के मेड म, खेती-डोली के बीच म किंजरत हव तइसे लगही। ये संग्रह म कुल जमा नौ ठन कहानी मन ल जोरे गे हे। फुटहा छानी’, ‘मतलाहा पानी’, ‘नियाव के जीत’ अउ ‘मनहरण भइया’ ये चारों ठन कहानी मन म सरपंच के आगू-पीछू किंजरत गाँव के राजनीति, गाँव के खेत-खार अउ खेत-डोली मनबर सिंचाई-पानी के समस्या, परदेसिया मन हमरे गाँव म आ के हमी मन ल दबाय के कोशिश करथें तेकर समस्या ल बड सुघ्घर ढंग ले रखे गे हे। गाय-गरू, बइला-भंइसा मन ह हमर खेती-किसानी अउ जीता-जिनगी के अधार आवंय। इही पाय के गउ ल हम माता कहिके वोकर पूजा करथन। बइला के बिना हमर किसानी नइ हो सकय, ये ह किसान मन के संगी-संगवारी आवंय, भाई आवंय। इही पाय के हम बइला के घला पूजा करथन। हमर समाज म हमर गोधन के रक्षा करे खातिर जउन नियम बनाय गे हे वो ह हमर दूसर सामाजिक नियम मन ले बढ के होथे। गउ हत्या के पाप ल मनखे हत्या के पाप ले बडे पाप माने गे हे। अब गाँव-गाँव म टेक्टर आ गे हे, पशुधन बर हमर प्रेम ह कम होवत जावत हे, इही समस्या ल ‘छन्नू अउ मन्नू’, ‘बन कैना’ अउ ‘गउ प्रेम’ कहानी मन म उठाय गे हे। पढ के हमर चेथी के आँखी ह आगू डहर आ जाथे। जुग-जोडी के जीवन ह आपसी बिश्वास के ठीहा म टेके रहिथे, बिश्वास के धारन ह बड कमजोर होथे, थोरको धक्का परे म गिर जाथे। ‘बिही चानी’ म इही बात ल समझाय गे हे। छुआ-छूत, छोटे-बडे येकर अधार पइसा ह हरे। अपन सुविधा अउ फायदा बर हम येकर बर नियम बनाथन, इही बात ल ‘देखावा’ म बताय गे हे। हाना ह छत्तीसगढी भाषा के परान आवय। कथाकार ह अपन कहानी मन म येकर प्रयोग तो करे ह फेर छत्तीसगढी के हिसाब से जतका अउ जइसन होना चाही वइसन नइ हे। कथाकार के भाषा ह कोनो-कोनो जघा अखरथे घला। ००० 29 - संपादकीय अंतत: किसी कवि ने कहा है - ’छत्तीससगढ़ में सब कुछ है, पर एक कमी है स्वाभिमान की। मुझसे सही नहीं जाती है, ऐसी चुप्पी वर्तमान की।’ कविता की इन पक्तियों में कवि की एक ओर जहाँ छत्तीसगढ़ के प्रति अगाध प्रेम, समर्पण और अटूट आस्था अभिव्यक्त होती है वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढिय़ों के शोषण और अपमान के प्रति उनका क्षोभ भी दिखाई देता है। स्वाभिमान को तार-तार करने वाला, छत्तीसगढिय़ों का अनावश्यक व कायराना भोलापन और उनकी चुप्पी के प्रति आक्रोश के भाव की अभिव्यंजना भी होती है। पर इस तथ्य से इन्कार करना मूर्खता होगा कि अमीर धरती के गरीब छत्तीसगढिय़ों की इस दीन-हीन स्थिति के लिए कोई और कारक जिम्मेदार नहीं है बल्कि उनका यही अनावश्यक व कायराना भोलापन, उनकी अनावश्यक व कायराना चुप्पी ही उनकी इस स्थिति के लिए जिम्मेदार है। छत्तीसगढिय़ों के लिए कहा जाता है - ’पहिली जूता पाछू बात, तब आवै छत्तीसगढिया हाथ’। खेतों और खदानों में पुरूषों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर काम करने वाली यहाँ की श्रमशाील हमारी माताओं और बहनों को अपमानित करने के लिए कहा जाता है - ’छत्तीसगढ़ की औरतें छत्तीस-छत्तीस मर्द बनाती हैं’। शोषकों के इसी मानसिकता का परिणााम है कि ’अमटहा भाटा ल चुचर, बमलई म चढ़, इही ल कहिथे छत्तीसगढ़।’ जैसी कविताएँ कवि मंचों पर रस ले-लेकर कही और सुनी जाती हैं। छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढिय़ों के लिए जो परिभाषा इस पंक्ति में गढ़ी गई है, यहाँ की आराध्य देवी के लिय जो मुहावरा कहा गया है; छत्तीसगढ़ी भाईयों और यहाँ की माताओं-बहनों के लिए जो बातें पहले से ही कही जाती रही हैं, उसे सिर्फ और सिर्फ यही के लोग बेशर्मी के साथ सुन और सह सकते हैं; सुनकर भी मुर्दों के समान चुप्पी साधे रह सकते हैं। हमारा यही अनावश्यक व कायराना भोलापन, और अनावश्यक व कायराना चुप्पी हमारे नेतृत्व क्षमता पर भी दिखाई देती है। हमारा नेतृत्व यहाँ के बहुंख्यक समुदाय के हाथों में कभी नहीं रहा; आयाति नेतृत्व का अनुचर और अनुगामी की भूमिका ही हम हमेशा पसंद करते रहे हैं, इसी में संतुष्ट होते रहे हैं। ऐसा आखिर कब तक? यहाँ की इस स्थिति के लिए यहाँ की आम जनता से अधिक दोषी यहाँ के बुद्धिजीवी, कवि और साहित्यकार हैं। माना कि साहित्य से क्राँतियाँ नहीं होती, पर क्राँति का मशाल जलाने के लिए चिंगारी और क्राँतिकारियों के दिलों में आग, तो यहीं से पैदा होती है। छत्तीसगढ़ में कवियों और साहित्यकारों की कमी नहीं है, देश की आजादी की लड़ाई के समय से ही यहाँ साहित्यकारों की एक समृद्ध परंपरा रही है। इनके साहित्य में क्राँति का मशाल जलाने के लिए चिंगारी और क्राँतिकारियों के दिलों में आग भडक़ाने की अद्भुत क्षमता भी होती थी, पर कवि-साहित्यकारों की आज की पीढ़ी, अपनी इस समृद्ध साहित्यिक विरासत को संभालने, सहेजने और आगे बढ़ाने में विफल रही है। छत्तीसगढ राज्य बनने के बाद तो यहाँ कवियों की भीड़ दिखाई देने लगी है। विचार वीथी के हर अंक के लिए छत्तीसगढ़ के सहित्यकारों के द्वारा नियमित रूप से मुझे पर्याप्त मात्रा में नइ प्रकाशित पुस्तकें प्राप्त होती रहती हैं, परन्तु प्रारंभ में कविता की जिन पँक्तियों का मैंने उल्लेख किया है, उस तरह की कविता, उस तरह के कवि और क्राँति का मशाल जलाने के लिए जिस चिंगारी की आवश्यकता है, और क्राँति के लिए दिलों में आग पैदा करने के लिए साहित्य में जिस आग की जरूरत है, उसे पैदा करने वाला आज न तो कोई कवि ही दिखाई देता है और न ही वैसी पँक्तियाँ ही पढऩे को मिलती हैं। विचार वीथी के पहले के अंकों में भी मैंने यह मुद्दा उठाया था। अपने आदरणीय साहित्यकारों से मैं पुन: निवेदन करना चाहता हू कि वे अपने साहित्यिक उत्तरदायित्व को समझें। समकालीन साहित्य की अवधारण्ओं और प्रवृत्तियों को समझें। कोरी कल्पना का उड़ान भरना छोड़ें, यथार्थ की कड़वी और कठोर धरातल का दामन थामें, हमारी अनावश्यक व कायराना भोलापन, और अनावश्यक व कायराना चुप्पी पर प्रहार करने वाली, उसे तोडऩे वाली रचनाओं का सृजन करें। याद रखें, हमारा नेतृत्व करने के लिए नेताओं का आयत करने की जरूरत नहीं है, हमारे नहीं चाहने पर भी वे आयातित होते रहेंगे, हमें मिलते रहेंगे; परन्तु वे हमारी अनावश्यक व कायराना भोलापन, और अनावश्यक व कायराना चुप्पी को और अधिक स्थायी बनाने का प्रयास ही करेंगे, क्योंकि इसी में उनका हित सधता है। हमारी अनावश्यक व कायराना भोलापन, और अनावश्यक व कायराना चुप्पी को तोडऩे वाला तो हममें से ही कोई पैदा हो सकता है। चर्चा जारी रहेगा .........। संपादक 000
कुबेर

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