पहिली पठन
(महेन्द्र बघेल के व्यंग्य संग्रह ’झन्नाटा तुहर द्वार’ की भूमिका)
अंग्रेज लेखक एडवर्ड वेराल लुकास के ’द स्कूल फॉर सिंमपथी’ शीर्षक से एक ठन निबंधात्मक कहानी हे जेमा ’द स्कूल फॉर सिंमपथी’ नाम के एक अनोखा स्कूल के बारे म बताय गे हे। कहानी के मुख्य पात्र वोकर संस्थापिका मिस बीम हे। स्कूल के पाठयक्रम म आने-आने विषय के अलावा अंधत्व दिवस, मूक दिवस, बधिर दिवस, लंगड़ा दिवस अउ लुलवा दिवस घला शामिल हें। पाठयक्रम के मुताबिक उहाँ के विद्यार्थी मन ल एक दिन अंधा, एक दिन मुक्का, एक दिन बहरा, एक दिन लंगड़ा अउ एक दिन लुलवा बनना अनिवार्य हे। एकर उद्देश्य हे - ’विद्यार्थी मन म वास्तविक जीवन म अलग-अलग कठिनाई के सामना करइया मनखे मन के पहिचान करे के क्षमता के विकास करना, अउ उंकर मन म अइसन मनखे मन के प्रति सहानुभूति के भाव जागृत करना ताकि वो मन (विद्यार्थी मन) एक विचारशील, मददगार अउ नेक नागरिक बन सकंय।’
कहानी के लेखक ह एक दिन वो स्कूल के दौरा म गिस तब वोला उहाँ के विद्यार्थी मन बताइन कि उंकर बर ’अंधत्व दिवस’ ह सबले कठिन दिन बीतिस फेर ’मूक दिवस’ वाले दिन ह घला कम कठिनाई म नइ बीतिस। ’द स्कूल फॉर सिंमपथी’ कहानी ल हमर देश के स्कूल अउ कॉलेज के अलग-अलग कक्षा मन म अंग्रेजी विषय के पाठयक्रम म शामिल करे गे हे। फेर हमर देश म अइसन कोनो स्कूल-कॉलेज कहूँ नइ हे।
ये सब बात ल बताय के पीछू मोला ये कहना हे कि मनखे ह बिना बोले नइ रहि सकय अउ बोले खातिर बोली-भाषा के जरूरत पड़थे। नवजात बच्चा ह घला पैदा होवत सात रोय के शुरू कर देथे। रोना ह घला एक ठन भाषा हरे। इही पाय के मोर ये दृढ़ मान्यता हे कि आदि ले अब तक मानव समाज ह जतका महत्वपूर्ण आविष्कार करे हे ओमा सर्वप्रथम आविष्कार, सबले बड़का आविष्कार अउ सबले जादा विलक्षण आविष्कार भाषा हरे। भाषा बिना आदमी ह न सोच सके, न विचार सके अउ न बोल सके।
मनखे ह बिना बोले काबर नइ रहि सकय? काबर कि वोहर समाज के बीच म अपन आप ल अभिव्यक्त करना चाहथे। अब सवाल ये पैदा होथे कि मनखे के पास अइसन का हे जउन ल वोहर अभिव्यक्त करना चाहथे? येला समझे बर हमला मनुष्य अउ भाषा के बीच के अंतरसंबंध ल समझे बर पड़ही। मनुष्य हे त भाषा हे अउ भाषा हे तब मनुष्य हे। दूनो एक-दूसर के पूरक हरें। इही पाय के भारतीय दार्शनिक मन आत्मा, मस्तिष्क, हिरदे अउ कंठ ल आधार मान के भाषा के चार स्वरूप माने हें जउन अइसन हें :-
(1) ’परा’ - ’परा’ के संबंध आत्मा ले हे। येला आत्मा के भाषा या आत्मा के आवाज कहे गे हे। आत्मा ह ज्ञान, चिंतन अउ चेतना के केंद्र हरे।
(2) ’पश्यंती’ - ’पश्यंती’ के संबंध मस्तिष्क ले हे। मस्तिष्क ह बुद्धि, विचार अउ कल्पना के केंद्र हरे। मन के आवाज अउ मन के बात इही हरे।
(3) ’मध्यमा’ - ’मध्यमा’ ह हृदय के भाषा हरे। हृदय के भाषा ह भाव ले भरे होथे। अउ,
(4) ’वैखरी’ - येहर कंठ ले पैदा होथे। पैदा हो के ये ह जन-जन तक पहुँचथे। माने येकर फैलाव या बिखराव होथे इही पाय के ऐला ’वैखरी’ कहे गे हे। येला सुने अउ बोले जा सकथे। ’सुन के समझना अउ बोल के समझाना’ एकरे द्वारा संभव हो पाथे। भाषा विज्ञान म एकरे अध्ययन करे जाथे। आत्मा के आवाज होय कि मन के बात होय या कि हृदय के भाव; इंकर प्रगटीकरण ’वैखरी’ के बिना संभव नइ हे।
अब केहे के जरूरत नइ हे कि प्रकृति म जउन चीज ह पैदा होथे वोकर प्रगटीकरण होथेच होथे। माने ’अभिव्यक्ति’ ह एक प्राकृतिक, स्वाभाविक अउ अनिवार्य प्रक्रिया हरे।
व्यवहार म भाषा ह केवल ध्वनि, वर्ण, अक्षर, शब्द अउ वाक्य भर ले पूरा नइ होवय। आंगिक क्रिया जइसे आँखी के विकृति, हाथ के इशारा, मुड़ी के डोलाना, मुँह बनाना, नाक-भौं सिंकोड़ना अउ बोले के लहजा के घला प्रयोग होथे। ये सब ल भाषा के सहायक अंग माने गे हे। ये सब के योग ले भाषा ह कभू मीठ लगथे त कभू करू, कभू अमृत कस लगथे त कभू जहर कस, कभू हँसाथे त कभू रोवाथे, कभू सुख देथे त कभू दुख देथे, कभू सहलाथे त कभू ठठाथे, कभू जियाथे त कभू मारथे। फेर भाषा ह जब एके संघरा मीठ अउ करू लागथे, अमृत अउ जहर बन जाथे, हँसाथे घला अउ रोवाथे घला, सहलाथे घला अउ ठठाथे घला अउ जियाथे अउ मारथे घला तब अइसने भाषा ह ’व्यंग्य’ बन जाथे। अइसन भाषा के प्रयोग करने वाला ह व्यंग्यकार बन जाथे। अउ जउन साहित्य म अइसन भाषा के प्रयोग होथे वोहर व्यंग्य कहलाथे।
आंगिक क्रिया, जउन मन ल भाषा के सहायक अंग माने गे हे, के प्रयोग बोल-चाल म, श्रुति परंपरा के लोक साहित्य म, दृश्य काव्य माने नाटक उवा म तो संभव हे पन लिखित साहित्य म इंकर सहयोग लेना संभव नइ हे। तब एक व्यंग्यकार ह व्यंग्य लिखे बर भाषा के कोन से सहायक अंग के उपयोग करथे? जाहिर हे - वक्र कथन, व्यंजना अउ लक्षणा के मदद लेथे। एकर अलावा, जइसे बोले के लहजा होथे वइसने लिखे के घला लहजा होथे। इही ह लेखक के लिखे के शैली आय। वक्र कथन, व्यंजना अउ लक्षणा के अलाव लेखक ह व्यंग्य लेखन म अपन लिखे के विशिष्ट लहजा के याने विशिष्ट शैली के सबले जादा प्रयोग करथे। समाज अउ व्यक्ति के व्यवहार म व्याप्त विडंबना मन ऊपर व्यंग्य लेखक के सतत अउ सतर्क निगाह रखना अनिवार्य हे। विडंबना मन ल पहिचान के वोला बिना डरे अउ जोर लगा के लिखना जरूरी हे। विडंबना मन ल पहिचान के अउ देख के आँखीं मूंद के चुप रहि जाने वाला लेखक ह कभू व्यंग्य नइ लिख सकय। व्यंग्य के भाषा ल तुतारी कस होना चाही; कभू हुदरने वाला अउ कभू कोचकने वाला।
छत्तीसगढ़ी भाषा म इक्कीसवीं सदी के शुरुआतेच ले गद्य लेखन म घला गति साफ-साफ दिखाई देवत हे। अब कविता के बरोबर कहानी अउ उपन्यास के घला सृजन होय लगे हे तब व्यंग्य लेखन ह कइसे पीछू रहितिस। छत्तीसगढ़ी भाषा म व्यंग्यकार मन के एक नवा पीढ़ी ह जोर लगा के व्यंग्य लेखन म जुट चुके हें। इही नवा पीढ़ी के व्यंग्यकार मन म महेंद्र बघेल ह घला अपन व्यंग्य संग्रह ’झन्नाटा तुंहर द्वार’ ल लेके अपन झन्नाटादार उपस्थिति दर्ज करे हें। महेंद्र बघेल के व्यंग्य संग्रह ’झन्नाटा तुंहर द्वार’ म चौबीस ठन व्यंग्य रचना संकलित हें। संकलित सबो व्यंग्य मन गजब के झन्नाटादार हें अउ पाठक मन के मन-मस्तिष्क ल हुदरे-कोचके म न कोनो कमी करंय अउ न ककरो लिहाज करंय। अधिकतर व्यंग्य मन म गाँव के समस्या अउ वातावरण ल विषय बनाय गे हे। महेंद्र बघेल ह अपन व्यंग्य मन म गाँव-परिवार म आवत रहन-सहन अउ सामाजिक बदलाव के भीतर जाके वोकर रेशा-रेशा ल खोले के प्रयास करे हे। शीर्षक रचना ’झन्नाटा तुंहर द्वार’ अउ ’दिखावा के सामाजिक ज्ञान’ व्यंग्य मन म सरकार के आबकारी नीति अउ पारिवार के मांगलिक प्रसंग मन म दारू के बाढ़त हस्तक्षेप ल उजागर करे गे हे। लेखक ह दारू बर नवा नाम गढ़े हे ’झन्नाटा’। ये व्यंग्य मन म अपन शान-शौकत के देखावा करे बर किसान मन ह कइसे अपन पुरखौती खेत ल बेंच के कंगाल होवत जात हें एकरो हिसाब-किताब प्रस्तुत करे गे हे।
आज के जमाना ह मोबाइल अउ बाबा मन के हे तब ये विषय मन एक जिम्मेदार अउ सतत पारखी नजर वाले व्यंग्यकार के निगाह ले कइसे छूट सकत रिहिन हें। ’कतका करंव बखान’ अउ ’प्राशन-पाचन अउ पंचेड़ बूटी’ व्यंग्य मन मोबाइल अउ बाबा महिमा ले ओतप्रोत हें।
गाँव-गाँव म गुटखा-पाऊच के कब्जा होय या नाली निर्माण के बहाना ग्राम पंचायत म होवइया भ्रष्टाचार होय, कि पर्यावरण संरक्षण के नाम म वृक्षारोपण के आड़ म होवइया भ्रष्टाचार होय, महेंद्र बघेल ह सबके खबर लेय हे। ’तरिया के बेंदरा-बिनाश’ व्यंग्य म गाँव तरिया के उपेक्षा करे ले गाँव के संस्कृति अउ सामाजिकता ऊपर पड़त असर ल लेके व्यंग्य करे गे हे। गाँव-गोढ़ा ले निकलके बघेल ह राज्य अउ देश के राजनीति डहर घलाव अपन खोजी नजर घुमाय बर नइ भूले हे। अभी हाल-हाल म ’नीट’ परीक्षा म जउन नाटक खेले गे हे वोकर खबर ’परीक्षा म कोचिंग कोचिया के खब-डब’ व्यंग्य म लेय गे हे, तब सरकारी स्कूल के शिक्षा व्यवस्था के पोल ’बनौती बनादे’ व्यंग्य म खोले गे हे। भारतीय न्याय व्यवस्था ऊपर पइसावाले मन कतका जमगरहा भारी हें एकर पोल ’दुधपिया के मौजमस्ती अउ निबंध’ म खोले गे हे। ये घटना ह घला हाले हाल के हरे अउ आप भुलाय नइ होहू, दूधपिया माने नाबालिग, जउन ह दारू के नशा म बेसुध हो के कार चलावत एक्सीडेंट करके दू झन ल मार डारिस अउ वोला सजा मिलिस 300 पेज के निबंध लिखे के।
महेंद्र बघेल के व्यंग्य के भाषा ह बहुत सरल अउ सहज संप्रेषणीय हे। इंजेक्शन के समान पाठक के मन-मस्तिष्क ऊपर तुरंत असर करथे। व्यंग्य के भाषा, विषय, वातावरण सबो मन पाठक के अनुभव के दुनिया ले आथें इही पाय के पाठक ल व्यंग्य मन ल पढ़त समय अइसे महसूस नइ होवय कि वोहर अपन दुनिया ले दुरिहा गे हे। वोला अइसे महसूस होथे कि लेखक संग वोकर सालों-साल के मितानी हे या कि जान पहिचान हे अउ वोहर वोकर संग फुरसतहा म बड़ घरेलू माने अनौपचारिक गपशप या गोठ-बात करत हे। कहूँ कोनो बनावटीपन नहीं, प्रवचन या उपदेश नहीं। बस आँखों देखा हाल के बखान हे; अउ अइसन हाल के बखान हे जउन मन खुदे बेहाल हो चुके हे।
फेर जब-जब सरकार के बात आथे तब महेंद्र बघेल ह सरकार ल कुछ जरूरी सलाह अउ सुझाव देय ले खुद ल रोक नइ सके हे। उदाहरण बर ’ताते तात चहा के भौतिक सत्यापन’ व्यंग्य के येदे अंश ल देखव - ’’चाय बर मनखे मन के दीवानापन ल देखत देश भर म हस्ताक्षर अभियान घलव चलना चाही। जेकर ले नीति आयोग ह “नवा चहा नीति“ बनाके विदेशी निवेश पाय बर मजबूर हो जाय। हम तो यहू कहिथन कि सन् 2025 ल चहा बरस घोषित कर देना चाही। अउ एकाद झन चहेड़ी टाइप के नेता मन के जनमतिथि ल चहा दिवस के रुप म मान्यता देवावत एक दिन के सरकारी छुट्टी अउ गाँव-गाँव म चहा-तिहार मनाय के घोषणा हो जतीस ते हम धन्य घलव हो जतेन। .......... मनखे-मनखे के अंतस म चहा बर गजबेच मया ल देखत ग्राम पंचायत, तहसील अउ जिला स्तर म “चहा ओलंपिक“ प्रतियोगिता के आयोजन घलव होना चाही। जेमा पहिली अवइया ल “चहेड़ी नंबर वन“ अउ दूसरइया ल “परम चहावीर“ के सम्मान ले सम्मानित करे जाय। बाकी प्रतिभागी चहेड़ी मन ल एक कप चहा पीयाके धन्यवाद ले सम्मानित करत चहा-धरम निभाय के बूता करे जाय। चुनाव के हारे-हपटे विधायक प्रत्याशी होय चाहे मुँहफूलोय बड़े कद के कार्यकर्त्ता, एकाद झन ल ’चहा आयोग’ के अध्यक्ष बनाके लाल बत्ती ल बुगुर-बुगुर जलवाय के एक ठन बड़का काम घलव करवाय जा सकत हे।’’
महेंद्र बघेल ह मूल रूप म कवि हरे इही पाय के शुरू ले आखिरी तक वोकर भाषा म गजब के काव्यात्मकता देखे बर मिलथे। कोनो-कोनो जघा तो अइसे लगथे कि हम कोनो गद्य नइ भलुक व्यंग्य कविता पढ़त हन। अपन कथन के सरेखा म मंय ह एक दू उदाहरण पेश करत हंव -
- ’’अनुदानी महासपना देखे के साद म लइका मन नीट परीक्षा म निटोर दिन, धन-दोगानी ल कोचिंग म बोर दिन अउ दाई-ददा के सपना ल रट्ट ले टोर दिन।’’(सपना के पंचनामा)
- ’’फेर जनता के भाग म, न राग हे न फाग हे। जनता ल पाँच साल बर बुकिंग करइया विकास मंत्री के फोटू वाले पाकिट म चाऊर-दार अउ बरी साग हे। अहोभाग हे कि जनता बर मंत्री के अतना अनुराग हे।’’(अमृत चांटे के भरम) अउ
- ’’बीरबल के कुछ अलग इमेज हे, अपन ह सुधवा अउ भौजी ह तेज हे। वो अतिक सुधवा कि कई घाँव अपन सुध ल घलव भूला जथे। भौजी ह बजार ले जब मुनगा मँगाथे त ये मुरगा धर के आ जथे.., एक दिन कतरा (हलवा) पागे बर सूजी मॅंगाइस त वीरबल ह कपड़ा सीले के सूजी ल धरके आगे। आजकल गली-मुहल्ला, बजार-हाट अउ रद्दा-बाट म बारो-महिना मुरगा मिलना सहज हे फेर मुनगा ह नोहर होगे हे।’’ (छाँटत-छाँटत अटल कुंवारी)
- ’’सरकारी निकाय के हालत खस्ता हे, महंगाई म सिरिफ भाषण ह सस्ता हे, कालाधन वाले मन लाल होगें, मोर देश के कइसन हाल हो गे।’’ (नेता चरित बखान)
महेंद्र बघेल ह हिंदी म सोच के छत्तीसगढ़ी म लिखइया लेखक नोहे। वोहर छत्तीसगढ़ी म लिखथे तब छत्तीसगढ़ीच म सोचथे। इही पाय के वोकर लेखन म छत्तीसगढ़ी के कतरो अइसन शब्द अउ हाना भरे पड़े हें जउन मन या तो नंदा गे हें या फेर बोलचाल ले दुरिहा गे हें। महेंद्र बघेल ह अइसन जम्मों शब्द अउ हाना मन ल प्रचलन म ला के वोला जिंदा करे के कोशिश करे हे, जइसे कि - ’बरेंडी, रंगझाझर, गुलाझांझरी, मुनूबिलई, सुकुड़दुम, ताते-तात चहा, पीत मारना, बेमझउव्वल बूता, सुहाफी, नोखियाना, खात-खवई, छट्ठी-बरही, लघियांत, झिल्ली-सनपना, जी कव्वुआना, झारोझार, हाड़ा-गोड़ा, घोलंडइया मारना, निटोर देना, उबुक-चुबुक होना, सुनगुन-सुनगुन, रकम-रकम के, चुचरना, भदभिद-भदभिद भगई, पेल-ढकेल के, बारा हाल होना, अधियाय गोठ ल लमाना, हब-डब’ उवा उवा।
विहिंचे लेखक ल अंग्रेजी भाषा के शब्द मन ले घला कोनो परहेज नइ हे। येमा अइसन अंग्रेजी शब्द तो हाबेंच जउन मन छत्तीसगढ़ी जन मानस म मिसरी कस घुर के मिंझर गे हें, अइसनो शब्द मन हें जउन मन आज के नवा पीढ़ी के जुबान म रच-बस गे हें, जइसे - मीडिया, ब्रेकिंग न्यूज, आर्गनिक प्रॉडक्ट, कंपीटीशन, ऑनलइन, हाईटेक, बीजी, एक्सप्रेस, डिक्शनरी, स्मार्ट क्लास, फैशन, कोचिंग, सिंथेटिक दूध, स्वीप शाट, डुप्लीकेट, ओरिजनल, उवा उवा।
महेंद्र बघेल ह नवा-नवा शब्द अउ नवा-नवा मुहावरा बनाय म घला कोनो कंजूसी नइ करय, जइसे - झन्नाटा (दारू), सेटिंग-सहमति, बुधियार (बुद्धिमान) मौनासन, हुमेलासन, भड़कासन, दूधपिया (नाबालिग), बोलक्कड़, सुनक्कड़, ठगतुल्य चहा, हर-हर गंगा हर-हर पाई नहाखोर के बासी खाई, सपनाशास्त्र के महान सपनज्ञ, गूगल गली म किंदरत आज्ञाकारी शिष्य, मुनगा चुचरो प्रतियोगिता, उवा उवा।
महेंद्र बघेल ह नवा-नवा नारा अउ नवा-नवा सूक्ति वाक्य गढ़े म घला सिद्धहस्त हे, जइसे येदे नवा नारा मन ल देखव -
ऽ ’नाली ले थाली तक’,
ऽ ’न खाता न बही दबंग जे कही उही सही’
ऽ ’केसर मुक्त अउ केंसर युक्त गुटका’
महेंद्र बघेल के नवा-नवा सूक्ति वाक्य मन ल देख के व्यंग्य के पुरोधा परसाई के सुरता आ जाथे। उदाहरण बर येदे वाक्य मन ल देखव -
ऽ ’डबरा ल का कहिबे नरवा ह खुदे नाली के पानी म उबुक-चुबुक हे।’
ऽ ’अइसन मन के भाग म राजयोग ह उबुक-चुबुक होवत रहिथे।’
ऽ ’सरकार अउ खाद्य विभाग के बीच म कंपीटीशन चलत हे।’
ऽ ’सपना ह कतिक अपना हे येहा तो सपना के वेरायटी अउ क्वालिटी ऊपर डिपेंड करथे।’
ऽ ’हाईटेक जमाना म सबे लइका मन सरकारी समय सीमा के पहिली सज्ञान हो जाथे।’
ऽ ’छत्तीसगढ़िया मन मुनगा चुचरे म व्यस्त हें ओती ठढ़बुदिया मन छत्तीसगढ़ ल चुहके म व्यस्त हें।’
ऽ ’जब-जब पइसा बोलथे तब-तब ईमान डोलथे।’
ऽ ’चमक-दमक के आगू म सोच ह अतिक अंखरी हो गे हे कि सुवारथ के रद्दा म रेंगे बर एक गोड़ म खड़े हो जाथे।’
ऽ ’शपथ लेवई अउ पथ बदलई के खेल म हरियर धरती के सपना ह लतपथ हो जाथे।’
ऽ ’हर हाल म सभ्यता अउ धार्मिकता ल मुद्रा के कोलकी डहर ले होके गुजरनाच पड़थे।’
महेंद्र बघेल के व्यंग्य मन म बिंब अउ प्रतीक योजना के घला प्रयोग होय हे। ’कुटनी चाल’ म येला देखे जा सकत हे। पूरा संग्रह ह शब्द के बाजीगरी ले भरे हे। शब्द के अइसन बाजीगरी ह पाठक के मन-मस्तिष्क म मोहनी-थापनी डारे कस असर करथे। शब्द मन के बाजीगरी दिखाना महेंद्र बघेल बर बड़ सहज बात आय, जइसे कि -
’’येला हरियर मद कहव चाहे हरियर फंड येकर फंडा ल समझे बर थोकिन फंडामेंटल नियम-धियम ल जानना घलव जरूरी होथे।’’ (हरियर आदेश म गुलाझांझरी)
’’खवई अउ जियई के गोठ-बात के बारे म आप मन गुनत रहव। अब हम खवई अउ पचई डहर चलथन। येकर विषय म कहूँ ज्ञान मिल जाय ते हमर खवई धरम ह घलव धन्य हो जाय। निरवा खवई अउ खात-खवई के इतिहास ह कतका प्राचीन हे येला इतिहासकार मन जाने।’’(प्राशन-पाचन अउ पंचेड़ बूटी)
कुल मिलाके महेंद्र बघेल ह गजब के प्रतिभाशाली व्यंग्यकार हे। ये व्यंग्य संग्रह ल पढ़के पाठक मन अतका उम्मीद तो अवश्य करहीं कि इंकर कलम के सियाही ले छत्तीसगढ़ी साहित्य के भविष्य ह अउ पोठ होही। हमला भरोसा हे कि महेंद्र बघेल ह भविष्य म पाठक मन के ये भरोसा ल जरूर पूरा करहीं।
कुबेर
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