मंगलवार, 26 अगस्त 2014

छत्‍तीसगढ़ी कविता

सुनो जी मितान

सुनो! सुनो! जी मितान,
इहाँ के कमइया अउ किसान।
सुंदर-सुंदर जंगल अउ सुंदर हे पहाड़,
सुंदर-सुंदर नदिया अउ सुंदर हे खदान।
सुनो! सुनो! जी मितान ...........  ।
कोरे-गाँथे बेटी कस, हमर हे डोली धनहा,
बैरी मन के फुटत हे आँखी अउ दरकत हे मन हा।
लार चुहावत आवत हावंय परदेसिया बइमान।
सुनो! सुनो! जी मितान ...........  ।
लोटा धर के काली आइन, आज टेकाइन बंगला,
तुँहर इहाँ तो गड़े हे नेरवा, फेर तुम काबर कंगला?
(वाह! सोला आना बात कहेस, मितान! सोचे बर पड़ही।)
(कब सोचबे? परान छूट जाही तब?)
अभी-अभी तुम सोचव संगी, छूटत हे परान।
सुनो! सुनो! जी मितान ...........  ।
पुरखा मन के आगी ल छोड़ेस, अउ छोड़ेस पानी ला।
हाना छोड़ेस, बाना छोड़ेस, अउ छोड़ेस बानी ला।
गाँव ल छोड़ेस, ताव ल छोड़ेस, होगेस सोगसोगान।
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