सोमवार, 2 नवंबर 2026

स्वार्थी राक्षस

स्वार्थी राक्षस
(आस्कर वाइल्ड के कहानी द सेल्फिस जायंट के छत्तीसगढ़ी अनुवाद)


मंझनिया जब स्कूल के छुट्टी हो जावय तब घर लहुटत समय लइकामन वो राक्षस के बगीचा म जाके मनभर के खेलंय।

बगीचा हा बहुत बड़े अउ बहुत सुंदर रिहिस। हरियर अउ नरम घास वाले। घास के बीच-बीच म चंदैनी के समान सुंदर फूल फूले रहंय। उहाँ आड़ू के दर्जनभर पेंड़ रिहिन जउन म बसंत के मौसम म मोती के समान गुलाबी रंग के सुंदर फूल फूले अउ पतझड़ के मौसम म पेड़मन फल ले लहस जावंय। नाना प्रकार के चिरईमन वोकर खंदाली म बइठ के सुंदर अकन गीत गावंय। गीत ल सुनके लइकामन खेले बर भुला जावंय। लइकामन आपस म कहंय, ’’हमला इहाँ खेले म गजब मजा आथे न।’’ 
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एक दिन वो राक्षस हा लहुट के आ गिस। वोहर अपन संगवारी ’कार्निश ओगर’ नाम के राक्षस संग मिले बर गे रिहिस। सात साल वोहर वोकर संग रिहिस। सात साल म वोकर बात हा पूरिस काबर कि वोहर बहुत कम बोलय। बात पूरिस तब वोहर अपन महल लहुटिस। जब वोहर अपन महल पहुँचिस तब देखिस कि पारा भर के लइकामन वोकर बगीचा म खेलत रहंय।

’’तुमन इहाँ का करत हव?’’ वोहर गुर्रा के अउ गुस्सा होके चिल्लाके पूछिस। 
लइकामन वोला देख के उहाँ ले भाग गिन।
राक्षस हा किहिस, ’’येहर सिरिफ मोर बगीचा हरे। ये बात सबला समझ में आ जाना चाही। मोर अलावा इहाँ अउ कोनो ल खेले के इजाजत नइ हे।’’ 

वोहर बगीचा के चारों मुड़ा पक्का दीवार के परकोटा बना दिस अउ फाटक म तख्ती टांग दिस जेमा लिखाय रहय -
बिना पूछे 
अंदर आवइया ऊपर 
कानूनी कार्रवाही करे जाही।
वो राक्षस हा बड़ा मतलबी रिहिस।

लइकामन के खेले बर अउ कोनो दूसर मैदान नइ रिहिस। वोमन सड़क म खेले के कोशिश करिन फेर उहाँ बिकट धुर्रा अउ चटर्रा पथरा रहंय। विही पाय के वोमन ला उहाँ खेले म तकलीफ होवय।
छुट्टी होय के बाद जब वोमन घर लहुटतिन तब वोमन राक्षस के बगीचा के परकोटा के चक्कर लगातिन अउ वो सुंदर बगीचा के सुरता करके आपस म कहितिन, ’’इहाँ खेले म हमला कतिक मजा आवय?’’
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दूसर साल फेर बसंत के मौसम आ गिस। देश भर म सब डहर बाग बगीचा अउ रूखराईमन फूल ले लहस गिन। नाना प्रकार के चिरई चिरगुन चहके लगिन। फेर वो स्वार्थी राक्षस के बगीचा म अभी घला ठंड के मौसम हा बीते नइ रिहिस। काबर कि उहाँ अब लइकामन के आना बंद हो गे रिहिस। विही पाय के उहाँ अब न तो कोनो चिरई-चिरगुन आवय अउ न उहाँ के रूखराईमन म फूल फूले न फर फरे। 

एक घांव एक ठन सुंदर फूल हा घास ऊपर अपन मुड़ी उचका के देखे के कोशिश करिस तब वोला विही चेतावनी वाले तख्ती हा दिखिस। लइकामन के बारे म सोच के वोला बड़ा दुख होइस। वोहर डर के मारे धरती मा लुका गिस अउ सुत गिस। 

वो राक्षस ले बरफ अउ पाला ला छोड़के अउ कोनो हा खुश नइ रिहिस। बरफ अउ पाला मन किहिन, ’’बसंत के मौसम हा ये बगीचा म आयबर भुला गे हे। अब हमन इहाँ बेफिकर होके सालभर आराम से रहिबोन।’’ 
बरफ हा अपन मोटा सफेद चद्दर के परत बिछा के घांस ला ढांक लिस। 
पाला हा सबो रूखराईमन ऊपर चांदी जइसे परत चढ़ा दिस। 

तब वोमन उत्तर दिशा ले आवइया कनकन ले ठंडा हवा ल नेवता देके बला लिन। दंदोरत, झकोरत वहू हा आ गिस। वोहर ऊन के गरम कपड़ा म लपटाय रहय आ दिनभर बगीचा ल दंदोरत रहय। चिमनी मन ला टोरत-फोरत रहय। कहय, ’’वाह! कितना सुंदर जघा हे।’’ 

बरफ अउ पाला हा किहिस ’अब हमला करा मन ला घला इहाँ बुला लेना चाही।’ 
करा मन घला आ गिन। वोमन रोज तीन घंटा महल के छत म अतका जोर से गिरतिन कि छत के जम्मों परतमन उखड़ गिन। तब वोमन बगीचा म उधम मचातिन। वोमन भुरवा रंग के कपड़ा पहिने रहंय अउ उंकर सांस ह बरफ सही कनकन ले रहय।

स्वार्थी राक्षस हा अपन खिड़की डहर ले झांक के बगीचा के बरफ ला देखके किहिस, ’’मोला समझ नइ आवत हे कि बसंत ऋतु के आय म अतका देरी काबर होवत हे। उम्मीद हे कि मौसम हा जल्दी बदलही।’’

फेर उहाँ न तो बसंत ऋतु आइस अउ न गरमी के मौसम। पतझड़ के मौसम म दुनिया भर के बगीचामन के पेडमन फल ले लहस गिन फेर राक्षस के बगीचा म एको ठन फल नइ फरिस। 

पतझड़ हा किहिस, ’राक्षस हा बहुत मतलबी हे। उहाँ बारो महीना ठंड के मौसम बने रहन दे। उत्तरी हवा, बरफ, पाला अउ करा बरसन दे।’
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एक दिन जब बिहिनिया वोहर अपन पलंग म ढलंगे रिहिस, वोला बहुत प्यारा संगीत सुनाई दिस। वोहर खुश होके सोचे लगिस कि राजा के संगीतकार मन सड़क म गावत-बजावत जावत होहीं।
फेर सच बात ये रिहिस कि एक ठन नानुक चिरई हा वोकर खिड़की के बाहिर गावत रिहिस। बहुत दिन हो गे रिहिस, राक्षस हा कोनो चिरई ला अपन बगीचा म गावत नइ सुने रिहिस। इही पाय के वोला सुंदर संगीत के भोरहा होइस। 

तब वोकर छत ऊपर करा गिरना बंद हो गिस। उत्तरी कनकनउवा हवा के दंदोरना घला बंद हो गिस अउ खुल्ला खिड़की डहर ले बहुत मीठ खुशबू आइस। ’’मोला लगथे कि आखिरकार अब बसंत ऋतु हा आ गिस।’’ राक्षस ह मनेमन किहिस अउ पलंग ले कूद के उठिस अउ बाहिर कोती देखे लगिस।
वोहर का देखिस?

वोहर बहुतेच चकरित करने वाला नजारा देखिस। देखिस कि परकोटा म बनल एक ठन छोटकुन भुलका डहर ले लइकामन भीतर आ गे हें अउ पेड़ के डंगाली मन म बइठे हें। वोला जतका पेड़ दिखिस सबके डंगाली म एक-एक झन लइका बइठे रिहिन। बच्चामन ला पाके पेड़मन बिकट प्रसन्न हो गे रिहिन हें। पेड़मन ह फूल ले ढंका गे रिहिन अउ लइकामन के मुड़ी म अपन डंगालीमन ल डोलावत रिहिन। चिरई मन चींव-चींव करत येती ले वोती उड़ावत रिहिन अउ घास मन के बीच-बीच म फूलमन अपन मुड़ी उठा के मुसकावत रिहिन। 

वाह! कितना सुंदर नजारा रिहिस। बस, बगीचा के दूरिहा वाले कोंटा म अभी घला ठंड के मौसम हा बांचे रिहिस। उहाँ एक झन छोटकुन लइका खड़े रिहिस। वोहर अतका छोटे रिहिस कि पेड़ के डंगालीमन ल वोहर अमर नइ पावत रिहिस। अउ पेड़ के चारों कोती घूम-घूमके चिल्ला-चिल्लाके रोवत रिहिस। बिचारा पेड़ हा अभी घला बरफ अउ पाला ले ढंकाय रिहिस अउ उत्तर के ठंडी हवा हा अभी घला हल्ला करत वोकर ऊपर दंदोरत रिहिस। 

पेड़ हा किहिस, ’’छोटकू! ऊपर आ जा।’’ अउ वोहर अपन डंगालीमन ल जतका हो सके नवा दिस। फेर लइका हा अतका छोटे रिहिस कि वोहर डंगालीमन ल अमर नइ सकिस।

येला देख के राक्षस के हिरदे हा पसीज गिस। वोला दया आ गिस। ’’ओह! मंय हा कितना स्वार्थी हंव।’’ वोहर किहिस, ’’अब मोला समझ में आ गिस कि मोर बगीचा म बसंत हा काबर नइ आवत रिहिस। मंय वो छोटकू ल पेड़ के खंदाली म बिठा देथों। अउ बगीचा के परकोटा ला गिरा देहूँ ताकि ये बगीचा हा सदा-सदा बर लइकामन के खेले के मैदान बन जाय।’’ वोला अपन करे ऊपर पश्चाताप होय लगिस।

वोहर चुपचाप दरवाजा ला  खोलिस अउ निकल के बगीचा म आ गिस। फेर जब लइकामन वोला देखिन तब वोमन डर के मारे तुरते बगीचा ले भाग गिन। बगीचा म फेर ठंड के मौसम आ गिस अउ वोहर पहिली जइसे हो गिस। सिरिफ कोंटा वाले वो छुटकू बाबू हा नइ भाग पाइस काबर के वोहर रोवत रिहिस। वोला राक्षस के आय के गम नइ मिल पाइस। 

राक्षस हा चुपचाप वोकर पीछू गिस अउ अउ बहुत जोगासन अउ प्रेम से वोला अपन गोदी म उठा लिस। पेड़मन म तुरते फूल फूल गिस। चिरईमन आके चहके लगिन। वो छुटकू बाबू हा अपन दूनो बाजूमन ला राक्षस के गला म लपेट के वोकर छाती ले लिपट गिस अउ वोला चूमे लगिस। 
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येला बांकी लइकामन देखिन। वोमन सोचिन कि राक्षस हा अब अच्छा आदमी बन गे हे। वोमन दंउड़के वापिस आइन। लइकामन के आते सात बसंत के मौसम हा घला लहुट के आ गिस। राक्षस हा बड़ दुलार से लइकामन ला किहिस, ’’मोर छुटकू संगवारी हो, ये बगीचा हा अब सबर दिन बर तुंहर हरे।’’ 

तब फेर वोहर कुदारी धर के अइस अउ बगीचा के परकोटा ला टोर के गिरा दिस। मंझनिया बारा बजे लोगबाग बजार जावत रिहिन। वोमन देखिन कि राक्षस हा आज बहुत सुंदर बगीचा म लइकामन संग खेलत हे। अतका सुंदर बगीचा वोमन पहिली अउ नइ देखे रिहिन।

लइकामन दिनभर खेलिन अउ सांझ समय सब झन राक्षस ला बाय, बाय केहे बर आइन।
राक्षस हा पूछिस, ’’अरे! तुंहर वो सबले छुटकू बाबू हा कहाँ हे? अरे, विही छुटकू, जउन ला मंय हा अपन गोदी म उठा के पेड़ म चढ़ाय रेहेंव।’’ राक्षस ल वो छुटकू बर सबले जादा मया आवत रिहिस काबर कि वोहर वोला चूमे रिहिस। 

’’हमन तो वोला नइ जानन।’’ लइकामन किहिन, ’’वोहर भाग गिस होही।’’
राक्षस हा किहिस, ’’वोला सुरता करके कहना कि काली वोहर इहाँ खेले बर जरूर आही।’’ 
लइकामन किहिन कि वोकर बारे म तो हमन कोनो नइ जानन कि वोहर कहाँ रहिथे। वोला तो हमन पहिली कभू देखे नइ रेहेन। 

लइकामन के जवाब सुनके राक्षस हा उदास हो गिस।
अब रोज मंझनिया छुट्टी होय के बाद लइकामन उहाँ खेले बर आतिन। राक्षस संग सब झन मनभर के खेलतिन। फेर वो छुटकू बाबू हा, जउन ल राक्षस हा सबले जादा प्रेम करय, कभू नइ दिखिस। 

राक्षस हा अब सबो लइकामन संग बड़ मया-दुलार करय। फेर वोला पहिली वाले अपन छुटकू बाबू के अघात सुरता आवय। अउ रोज वोकर बारे म लइकामन ल पूछय। कहय, ’’हाय! मंय हा वोला एक घांव तो अउ देख लेतेंव।’’
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अइसने कतरो साल बीत गिस। राक्षस हा डोकरा अउ कमजोर हो गिस। अब वोहर लइकामन संग खेले-कूदे नइ सकय। विही पाय के वोहर अपन आराम कुर्सी म बइठ जातिस अउ लइकामन ला खेलत देखत रहितिस। अपन बगीचा के सुंदरता ल देखत रहितस अउ कहितिस, ’’मोर बगीचा म कतनो एक ले बढ़के एक फूल हे फेर ये लइकामन सरीख कोनो फूल हा सुंदर नइ हे।’’

ठंडकला के दिन रिहिस। एक दिन बिहिनिया बाहिर निकले बर जब वोहर कपड़ा पहिनत रिहिस तभे वोहर खिड़की के बाहिर देखिस। अब वोला ठंडकला ले कोनो घृणा नइ रिहिस। काबर के वोकर समझ के मुताबिक अभी बसंत ऋतु ह आराम से सुतत रहिथे अउ फूलमन हा आराम करत रहिथें।

अचानक वोला हैरानी होइस। वोला वोहर टक लगाके देखिस। सचमुच येहर बड़ा अचरित करने वाला नजारा रिहिस। बगीचा के दूर वाले कोंटा म एक ठन पेड़ रिहिस जउन म लदलद ले सुंदर सफेद फूल फूले रिहिस। वोकर खंदेलीमन सोन के रंग के रिहिन जउनमन म चांदी कस फल ओरमें रिहिन। विही पेड़ के खाल्हे वो छुटकू बाबू हा खड़े रिहिस जेकर ले वोहर अघात मया करे।

राक्षस हा मारे खुशी के बाहिर बगीचा कोती भागिस। बगीचा के घास ऊपर दंउड़त वोहर वो बच्चा के नजीक पहुँचिस। तब बच्चा के हालत ला देखके वोहर गुस्सा के मारे तमतमा गिस अउ किहिस, ’’तोला अइसन चोट पहुँचाय के काकर हिम्मत हो गिस मोर छुटकू बाबू।’’ काबर कि वो बच्चा के हथेलीमन म खीला के छेद के निशान रिहिस। वोकर नान्हें-नान्हें पंवरीमन म घला खीला ठोकाय के निशान रिहिस। राक्षस हा चिल्लाके किहिस, ’’तोला अइसन चोट पहुँचाय के हिम्मत कोन हा करिस, मोला बता। मंय हा अभी वोला जान से मार देहूँ।’’
बच्चा हा जवाब दिस, ’’नहीं, तंय गुस्सा झन कर, काबर कि येहा तो प्रेम के घाव हरे।’’

राक्षस हा पूछिस, ’’तंय हा कोन हरस?’’ वोकर मन ह अजीब शंसय ले भर गे रिहिस। वोहर अपन माड़ी के भार बच्चा के आगू बइठ गिस।

बच्चा हा हाँस के राक्षस ल किहिस, ’’तंय हा एक घांव मोला अपन बगीचा म खेलाय रेहेस। आज तंय हा मोर संग मोर बगीचा म चल। वोहर सरग म हे।’’

अउ जब मंझनिया स्कूल के लइकामन उहाँ खेले बर आइन तब देखिन कि राक्षस हा पेड़ खाल्हे मरे पड़े हे। वोकर शरीर ह सफेद फूलमन ले ढंकाय हे।
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