रविवार, 24 जुलाई 2016

आलेख

हंस, जुलाई 2016 में संपादक महोदय ने देशभक्त और राष्ट्रवादियों का तर्कसंगत अंतर प्रस्तुत किया है। संपादक महोदय ने सरकार के दोमुँहेपन को भी बेनकाब किया है। लिखा है - ’’2 जून, 2015 तक शिक्षामंत्री दावा करती रहीं कि भगवाकरण का अरोप मिथ्या है, किंतु अब वे सब बेशर्मी से बोल पड़े हैं कि भगवाकरण सिर्फ शिक्षा का ही नहीं बल्कि चैतरफा होगा क्योंकि यह ’राष्ट्रहित’ में हैं, ....’’।

इसी कड़ी में आदरणीय नामवर सिंह के ’नया ज्ञानोदय, जुलाई 2016’ में प्रकाशित लेख ’होगा कोई ऐसा भी कि भीषम को न जाने?’ का यह अंश भी महत्वपूर्ण है। वे लिखते हैं - ’’भीष्म भी इसी तरह शरशैय्या पर लेटे थे। युधष्ठिर पितामह के सामने अपनी जिज्ञासा रखते थे और वे धैर्य के साथ उनका समाधान कर रहे थे। इस क्रम में अनुशासनपर्व के अंतर्गत भीष्म के मुख से यह अद्भुत श्लोक निकला:

एक एव चरेद् धर्मं, न धर्मध्वजिको भवेत।
धर्मवाणिजका हेते ये धर्ममुपभुञ्ञते।।

अर्थात मनुष्य को चाहिए कि वह अकेला ही धर्म का आचरण करे। धर्म का दिखावा करनेवाला धर्मध्वजी न बने।     जो धर्म को जीविका का साधन मानते हैं, उसके नाम पर जीविका चलाते हैं, वे धर्म के व्यवसायी हैं।’’

धर्म का व्यवसाय करनेवाले लोगों से हो रहा नुकसान आज किसी से छिपा नहीं है।

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