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शुक्रवार, 2 अगस्त 2019
सोमवार, 19 जून 2017
उपन्यास के अंश
(अवइया छत्तीसगढ़ी उपन्यास के अंश)
ख्याति
डोकरी दाई के चूंदीमन ह अब फुड़हर के रूईंकस झक् पंडरी हो गे हे। कनिहा ह नव गे हे। सत्तर ले उप्पर के हो गे होही तभी ले न अक्कल ह खंगे हे न गत्तर ह। गोटानी धरके दिनभर एती ले ओती किंजरत रहिथे। तरिया ले नहा के आ जाथे। नहा के आतेसाठ बटकीभर बासी निकाल के बइठ जाथे। बासी खा के अरोसी-परोसीमन घर घूमफिर के आ जाथे। अभीच्-अभी वो ह नंदगहिन घर कोती ले घूम के आय हे। सुतहूँ कहिके अपन खोली म खुसरिस हे, फेर नींद आय तब न। नतनिन के आरो लिस, आरो नइ मिलिस। मुँह ल मुरकेट के मनेमन किहिस - आगी लगे आज के लोग-लइका मन के पढ़ई-लिखई ल। जब देखबे तब, किताबेच् म मुड़ी गड़ाय रहीं। का मिलथे ते? किताब ह छुटही तहाँ ले दिनभर मुबाइल ल कोचकत रहिहीं। कोजनी का भराय रहिथे मुबाइल म ते। थोरिक देर थिरा के नतनिन ल हुँत कराइस - ’’अइ, सुनथस बेटी। ए ... खियाती।’’
नतनिन के कोनों आरो नइ मिलिस। डोकरी ह घुसिया के फेर चिल्लाइस - ’’ए ... खियाती ... , कान म पोनी गोंज के कते करा खुसरे हस रे रोगही। तोर रोना पर जातिस ते। नरी पिरा गे।’’
नतनिन ह अपन खोली म पढ़त रहय। डोकरी दाई के चिल्लई म पढ़ई ले धियान ह उचट गे। घुसिया के उत्ता-धुर्रा निकलिस। चिल्ला के किहिस - ’’का हो गे डोकरी? काबर बाँय-बाँय करत हस? बता?’’
डोकरी दाई ह घला अगियाबेताल हो गे। किहिस - ’’अई, हमला का हो गे हे रे बेंदरी। डोकरी कहिथस। कते करा हम डोकरी हो गे हन। डोकरी पोंसे हस हमला। डोकरी तो तंय होवत हस। कोन जाने तोर बिहाव ल कब करहीं ते? सरी उम्मर ह पहावत हे। थोरको अक्कल नइ हे तोर दाई-ददा मन ल। कब टारबे मुँहू ल इहाँ ले तंय। बुढ़तकाल म कते डौका मिलही तोला ते?’’ कहत-कहत डोकरी के सुर ह मद्धिम होगे। किहिस - ’’तोर उम्मर म हम दू झन लइका के महतारी बन गे रेहेन। दुनो ल गँवा डरेंव बेटी।’’ कहत-कहत डोकरी दाई के आँसू बोहाय लगिस। अँचरा म आँसू ल पोंछ के कहिथे - ’’गोठियाय के मन करथे बेटी, तोर संग नइ गोठियाहूँ त अउ काकर संग गोठियाहूँ, खियाती।’’
’’देख, देख! फेर खियाती कहत हस। खियाती-खियाती झन कहेकर हमला। हमर वइसने नाम हे का? डोकरी कहीं के।’’
’’अई! अउ का नाव हे तोर या? तोर दाई-ददा मन जइसन तोर नाव धरे हे, तइसने हम कहत हन दाई। खियाती, कहिके।’’
’’खियाती नहीं डोकरी, ख्याति, ख्याति। ख्याति, नइ कहि सकस का?’’
’’खाती, खाती केहेस वो?’’
ख्याति ह माथा ठोकत कहिथे - ’’हे भगवान! मरत ले नइ सीख सकस तंय ह, ख्याति केहे बर।’’
’’वइसने तो कहत हंव रे, ललबेंदरी। बेझवाथस काबर। हम का करबोन। तोर नावे ह टेड़गा-पेचका हे तेला?’’
’’हाँ, मोर नाम ह टेड़गा-पेचका हे। अउ तोर नाम ह बने हे? सुकारो?’’
’’सुकरार के जनम धरे रेहेन, तउन पाय के हमर सुकारो नाव धरिन। तोरे जइसे। सनीचरहिन नइ ते।’’
’’का सनीचरहिन?’’
’’अइ! सनीच्चर के जनम धरे हस, तउने पाय के तो सनीचरहिन कस हो गे हस रे, तोला गाड़ंव ते।’’
’’बस, बस! रहन दे। गड़ियाय के लाइक तो तंय ह हो गे हस। काबर चिल्लात रेहेस, तेला बता।’’
’’अइ, का करत रेहेस या?’’
’’पढ़त रेहेन।’’
’’का पढ़थस या रात-दिन?’’
’’बायलाॅजी।’’
डोकरी दाई ला ठट्ठा सूझिस। किहिस - ’’अइ, बइला ल पढ़थस वो? गोल्लर ल कब पढ़बे रे?’’
’’देख, तोर खंगे मत रहय डोकरी। सोझ-सोझ, बने-बने गोठियाय कर।’’
’’अइ! काबर गुसियाथस या। का कहि डरेन तोला। पढ ़के मास्टरिन बनबे का .., कहिके पूछथंव बेटी।’’
’’मास्टरिन नइ बनन, डाॅक्टर बनबोन।’’
’’डागदर बनबे! नरस बाई कस या?’’
’’हे भगवान! काबर बलाय हस तउन ल बोल न। मोर पास टाइम नइ हे। नर्स ह नर्स होथे, डाॅक्टर हा डाॅक्टर। समझे?’’
’’अई! नइ समझबो रे। निच्चट अड़ही-भोकवी समझथस हमला। बड़े-बड़े हस्पताल मन म बड़े-बड़े बीमारी के इलाज करथें, चीराबोंगा़ करके अजार ल निकालथें, तउन ल डागदर कहिथे।’’
ख्याति ह हाँस के डोकरी दाई के अक्कल ल सराहिस। बिस्कुट ल लुका के धरे रहय तउन ल डोकरी दाई के हाथ म धरा के किहिस - ’’पास हो गेस डोकरी। ये ले तोर इनाम। खियाती, खियाती कहिके काबर चिल्लाथस तउन ल महूँ जानथंव। अब जावंव?’’
नतनिन के मया ल देख के डोकरी दाई के आँखी ह फेर छलक गे। नतनिन ल छाती म ओधा के गजब आसीस दिस। किहिस - ’’तंय ह चल देबे, तहाँ ले कोन ह मोर सोर करही बेटी। सोच के मनेमन रोथंव वो।’’
’’तंय फिकर झन कर दाई! तोर जाय के पहिली मंय ह कहूँ नइ जावंव।’’
’’तब तंय ह मोर मरना ल खोजथस वो। अइ, डागदर बन जाबे तब तंय ह मोला बचाबे नइ या? बने मन लगा के पढ़ अउ झप ले डागदर बन।’’ डोकरी दाई ह ख्याति के मुड़ी म हाथ ल मढ़ा के आसीस दिस।
डोकरी दाई के मया-दुलार पा के ख्याति गदगद् हो गे। डोकरी दााई के पाँव पर के किहिस - ’’अब जावंव।’’
’’ले जा अउ मन लगा के पढ़। अउ सुनथस या, आज का खजानी मंगाय हस, तोर पापा ल?ं’’
डोकरी दाई के लालच ल देख के ख्याति ह अपन माथा ल धरलिस। किहिस - ’’हे भगवान, खाई-खजानी छोड़ के तोला अउ कुछू नइ समझे का वो। जावत हंव। बाय, बाय।’’
डोकरी दाई ह किहिस - ’’टार रे गड़उनी, तोर आंय-बांय ल।’’
डोकरी दाई ल कुड़कत देख के ख्याति ल हाँसी आ गे अउ हाँसत-हाँसत वो ह अपन खोली कोती चल दिस।
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सोमवार, 6 अप्रैल 2015
नाचा गीत
सुनो! सुनो! जी मितान,
इहाँ के कमइया अउ किसान।
सुंदर-सुंदर जंगल अउ सुंदर हे पहाड़,
सुंदर-सुंदर नदिया अउ सुंदर हे खदान।
सुनो! सुनो! जी मितान ........... ।
कोरे-गाँथे बेटी कस, हमर हे डोली धनहा,
बैरी मन के फुटत हे आँखी अउ दरकत हे मन हा।
लार चुहावत आवत हावंय परदेसिया बइमान।
सुनो! सुनो! जी मितान ........... ।
लोटा धर के काली आइन, आज टेकाइन बंगला,
तुँहर इहाँ तो गड़े हे नेरवा, फेर तुम काबर कंगला?
(वाह! सोला आना बात कहेस, मितान! सोचे बर पड़ही।)
(कब सोचबे? परान छूट जाही तब?)
अभी-अभी तुम सोचव संगी, छूटत हे परान।
सुनो! सुनो! जी मितान ........... ।
पुरखा मन के आगी ल छोड़ेस, अउ छोड़ेस पानी ला।
हाना छोड़ेस, बाना छोड़ेस, अउ छोड़ेस बानी ला।
गाँव ल छोड़ेस, ताव ल छोड़ेस, होगेस सोगसोगान।
सुनो! सुनो! जी मितान,
इहाँ के कमइया अउ किसान।
सुंदर-सुंदर जंगल अउ सुंदर हे पहाड़,
सुंदर-सुंदर नदिया अउ सुंदर हे खदान।
सुनो! सुनो! जी मितान ........... ।
kuber
सुनो! सुनो! जी मितान,
इहाँ के कमइया अउ किसान।
सुंदर-सुंदर जंगल अउ सुंदर हे पहाड़,
सुंदर-सुंदर नदिया अउ सुंदर हे खदान।
सुनो! सुनो! जी मितान ........... ।
कोरे-गाँथे बेटी कस, हमर हे डोली धनहा,
बैरी मन के फुटत हे आँखी अउ दरकत हे मन हा।
लार चुहावत आवत हावंय परदेसिया बइमान।
सुनो! सुनो! जी मितान ........... ।
लोटा धर के काली आइन, आज टेकाइन बंगला,
तुँहर इहाँ तो गड़े हे नेरवा, फेर तुम काबर कंगला?
(वाह! सोला आना बात कहेस, मितान! सोचे बर पड़ही।)
(कब सोचबे? परान छूट जाही तब?)
अभी-अभी तुम सोचव संगी, छूटत हे परान।
सुनो! सुनो! जी मितान ........... ।
पुरखा मन के आगी ल छोड़ेस, अउ छोड़ेस पानी ला।
हाना छोड़ेस, बाना छोड़ेस, अउ छोड़ेस बानी ला।
गाँव ल छोड़ेस, ताव ल छोड़ेस, होगेस सोगसोगान।
सुनो! सुनो! जी मितान,
इहाँ के कमइया अउ किसान।
सुंदर-सुंदर जंगल अउ सुंदर हे पहाड़,
सुंदर-सुंदर नदिया अउ सुंदर हे खदान।
सुनो! सुनो! जी मितान ........... ।
kuber
बुधवार, 23 अप्रैल 2014
उपन्यास के अंश
मुरहा राम के नियाव
गरमी
के दिन रिहिस। संपत महराज के सारा ह सगा आय रिहिस। सगा टूरा ह कालेज म पडत
रिहिस। गर्मी-छुट्टी के मजा अउ जमीदारी दबदबा के सुवाद लेय बर आय रिहिस।
ननपन के आवत रिहिस। पंदरही हो गे रिहिस आय। गाँव के जम्मो झन संग जान-पहचान
हो गे रिहिस। संझउती के बेरा रिहिस। हवा खाय के नाव म गाँव के अड़हा जात के
टुरी मन ल लाइन मारे बर दुबे परिवार के दूसर उतलंगहा संगी जहुंरिया टुरा
मन संग गली कोती निकले रहय। फिल्मी गाना गावत अउ गब्बर सिंग के डैलाग बोलत
फकीर घर कोती ले जावत रहंय। फकीर के ददा लतखोर ह गाँव के चार-छै झन संगवारी
मन संग बंबूर के एक ठन गोला ल बैलागाड़ी म जोरत रहय। चिराय बर आरा मसीन
लेगना रहय। गोला ह काबा भर के अउ बने लंबा रहय। घंटा भर हो गे रहय, गाड़ी म
जोरातेच् नइ रहय। फकीर के बहिनी टुरी, जउन ह आठवीं कक्षा म पढ़ रिहिस,
जोरइया मन बर चहा-पानी धर के आय रहय। सोन म सुहागा; बाम्हन टुरा मन ह देख
के विही करा बिलम गें अउ बेलबेलाय लगिन।
एक झन ह कहिथे - ’’जोर लगा के ....।’’
बांकी मन कहिथे - ’’हइया ...।’’
सगा आय रहय तउन बाम्हन टुरा ह टूरी कोती निसाना लगा के कहिथे - ’’अबे! अब मिलिस रे पेसल चहा, सांय ले चढ़ही गोला ह।’’
फकीर के ददा ह सुन के अउ समझ के घला उे बात म धियान नइ दिस; कहिथे - ’’आव जी महराज हो! आपो मन चहा पी लव, आजकल चहा म तो कोनो ह छुवा नइ मानय।’’
सगच् टुरा ह फेर कहिथे - ’’जरूर, जरूर! अइसन पेसल चहा ल कोन छोड़हय।’’
बांकी बाम्हन टुरा मन ठठा के हँस दिन। टुरी बिचारी ह सरमा के घर भीतर खुसर गे। सबके मुँहू ह करूवा गे। सबर दिन के तो अइसन बात ल सुनत अउ सहत आवत हें, चुरमुरा के रहि गिन सब झन। फकीर ह घला विही करा रिहिस। सुन के वोकर तन-बदन म आगी लग गे।
चहा पी के थोरिक धक्की मारिन अउ फेर भिड़ गिन गोला म। काबर चढ़े गोला ह गाड़ी म। फकीर के ददा ह कहिथे - ’’लेव न जी महराज हो! आय हव ते एक-एक हाथ लगा देव।’’
अतका सुनना रिहिस कि अरे तरे हो गे महराज लइका मन - ’’अरे! जबान संभाल के बात कर। हमर घर म नौकरी करने वाला, हमला तियारथस तंय ह।’’
’’तियारंव नहीं जी, महराज हो। मदद करे बर कहत रेहेंव। गलती होइस होही ते क्षिमा करहू, भड़को झन।’’ लतखोर ह हाथ जोर के खड़ा हो गे।
बाम्हन टुरा मन ल तो रार मचाना रिहिस। दबे ल अउ दबाना, गिरे ल अउ गिराना, कोनो अड़हा-गरीब ल मरत देख के उछाह मनाना; इंकर नस म रचे बसे हे। का होइस कि उमर म छोटे रिहिन वो मन, जाति के तो बड़े रिहिन? अउ लतखोर ह उमर म बड़े रिहिस, सियान हो गे रिहिस ते का होइस, रिहिस ते अड़हा जाति के। लतखोर ह बात ल सकेले के कोशिश करे, वोमन ह लमाय के। बात ल बढ़ात गिन अउ आखिर म आदर-मादर म उतर गिन। लतखोर ह फकीर के सुभाव ल देख के मनेमन डर्रावत रहय कि कोनो अलहन झन हो जाय।
अउ विहिच् होइस। फकीर ह सबर दिन के हाँ के हूँ कहवइया लइका। उमर म उंकरे जोड़ के रिहिस। गाड़ी के एक ठन खुँटा ल उखानिस अउ उबा के दौड़िस उंकर मन डहर। किहिस - ’’खबरदार, मोर बाप ल अंट-संट गारी बकने वाले साले कमीना हो।’’
लतखोर ह निगरानी म रहय, तुरते जा के वोला पोटार लिस। एक-दू झन मन अउ दंउड़िन तब कहू ले दे के फकीर ह काबू म आइस।
बात ह तुरते गाँव भर म आगी बरोबर बगर गे। बाम्हन पारा वाले मन ह आगी हो गंे। पहिली अइसन होतिस तब तो गदर मात जातिस। बाम्हन मन के गुप्ती-तलवार निकल जातिस। फेर जमाना ह बदल गे हे। जमीदारी के वो दिन ह नंदा गे हे। अउ फेर, गाँव म नवजवान टुरा मन के नवयुवक मंडल जब ले बने हे, समय ह बदल गे हे। संपत महराज ह गजब सोच-बिचार करिस। फकीर के उदेली के ये ह पहिली घटना नो हे, पहिली घला कर चुके हे। वोकर खून म कतका गरमी भराय हे तउन ल अब तो देखेच बर पड़ही। घंटा भर ले सोच बिचार करिस संपत महराज ह। वोला खून-खराबा करना उचित नइ लगिस। शस्त्र बल के जघा शास्त्र बल जादा उचित दिखिस।
घंटा भर के पीछू बैसका सकला गे। कटकटंउवा जुरियाय हे छोटे-बड़े सब।
सरपंच कका ह बैसका म सकलाय मनखे मन कोती निशाना बांध के किहिस - ’’गाँव भर के सब सकला गिन होहीं ते बैसका शुरू करतेन भाई हो, जादा रात करे ले का मतलब?’’ सब झन के मन ल भांप लिस तब फेर कोतवाल डहर देख के किहिस - ’’कोतवाल! बता जी, काकर ऊपर का बिपत आ गे हे, कोन ह बैसका सकेले हे।’’
संपत महराज ह तो खार खाय बइठे रहय, मन ह तो कहत रहय कि दू-चार आदमी ल जपते जाय, फेर गुस्सा ल पी के कहिथे - ’’बीपत हमार ऊपर आय हे जी, हम सकेले हन बैठका ल।’’
’’का बीपत आय हे तउनो ल बता डर महराज।’’
’’आदमी ह आदमी के बीच म रहिथे। परिवार म, गाँव म, समाज म रहिथे। जंगल म कोनो नइ रह सकय। काबर? काबर कि दुख होय कि सुख, चार के बीच म बँटे के चीज होथे। जब कोनों ऊपर बीपत आथय तब चार झन मिल के वो बीपत ला बाँट लेथंय। दुखियारा के दुख ह हल्का हो जाथे। सुख ल बाँटे ले सुख ह बाढ़ जाथे, जिनगी के मजा ह बाढ़ जाथे। सब एक-दूसर के मुँहू ल देख के बस्ती म बसे हबन। एक के दुख ह सब के दुख आवय अउ एक सुख ह घला सब के सुख आवय। गाँव म कोनो एक के बहू-बेटी ह सब के बहू-बेटी होथे। सबके मान-सनमान अऊ ईज्जत करे बर पड़थे। चार के बीच म रहि के ईज्जत पाना हे त चार के ईज्जत घला करे बर लगथे। इही खातिर समाज म रिश्ता-नाता बनाय गे हे। छोटे ल छोटे जइसे दुलार मिलना चाही अउ बड़े ल बड़े जइसे सम्मान मिलना चाही।’’
संपत महराज के गंजहा पार्टी के पेटपोंसवा नानुक राम ह वोकर बाजूच् म बइठे रहय। गाँव वाले बेलबेलहा टुरा मन वोकर ’छप्पनभोग’ नाव धरे हवंय। ये गाँव म बिरले होहीं जेकर कोनों बढ़ावल नाव नइ होही, टूरी होय के टूरा होय, सबके कोनों न कोनों बढ़ावल नाव हे। नाव बाढ़े हे तब नाव बढ़ाय के कोनों न कोनों कहानी घला हे। छप्पनभोग नाव बढ़ाय के घला कहानी हे, फेर ये कहानी ह बताय के लाईक नइ हे, आप मन खुदे अनुमान लगा लेव।
नानुक राम ह बोले के शुरू करिस तहाँ ले बेलबेलहा दल वाले मन के बीच म खुसुर-फुसुर शुरू हो। नानुक ह अद्दर खेत म रेंगत गाड़ी के चक्का ले निकलत हदक-हिदिक आवाज कस आवाज म कहिथे - ’’आने कि मने कि, भइ मोर हिसाब म तो महराज ह कहत हे तउन ह सोला आना सच आवय; फेर, आने कि, कहे के तमलब ये हे कि, ..........
मरहा राम, तारन, रघ्धू, जगत, ओम प्रकाश, लखन अशोक गुरूजी, सब एके जगह फकीर के संग बइठे रहंय। नानुक के बात ल बीचेच म काँटत मरहा राम ह कहिथे - ’’तोर आने कि मने कि, हिसाब अउ मतलब ल तोर घर म छोड़ के आय कर जी नानुुक भइया, जऊन बात कहना हे बने सोझ-सोझ कह।’’
’’............ आने कि मने कि महराज के कहना बिलकुल वाजिब हे। आने कि केहे के मतलब, मने कि ये गाँव के आदमी मन सियान मन के कतका ईज्जत करथें, संउहत देख लेव। आने कि मने कि कोनो सियान ह, मतलब, कोनो बात कहत हे तउन ल, बीच म मतलब, कैंची म कांटे बरोबर चक ले नइ काँटना चाहिये।’’
सरपंच ह कहिथे - ’’नानुक के कहना ह बिलकुल सही हे जी। बात करे के सबके अपन-अपन तरीका होथे। कोनो ह आने कि मने कि कहिके अपन बात के शुरूआत करथे, कोनो ह बच्चा के खातिर कहिके, तब कोनो ह अउ कुछू कहिके। सार बात ल, पकड़े के बात ल पकड़े करो। बीच-बीच म टोका-टाकी झन करे करो। नानुक भइया, आगू बोल जी; का कहत रेहेस तउन ल पूरा कर।’’
’’आने कि मने कि अउ का कहना हे जी। मतलब, इही कहना हे, महराज देवता ह कि आने कि, काकर मान-सनमान के का बात हो गे? आने कि, काकर बहू-बेटी के ईज्जत के ऊपर कइसन आंच आ गे, तउन ल बने फोर के बताय।’’
संपत ह फेर शुरू करिस - ’’गाँव के सब किसान भाई मन संपत के पालागी करथव, संपत ह बाम्हन आय, खाली येकरे सेती नो हे, संपत ह घलो सबके सनमान करथे तेकर सेती आवय। बताय कोनों कि संपत ह ककरो ईज्जत के ऊपर दाग लगाय होही ते? बाम्हन जइसे उच्च कुल म जनम धरे के बावजूद वो ह अड़हा मन ल गाँव नत्ता म जइसन-जइसन मानना हे तइसन-तइसन; भाई ल भाई कहत हे, कका ल कका अउ बबा ल बबा कहत हे तेकर सेती आवय। ..... का नइ करे हे संपत महराज ह गाँव के भलाई खातिर? दू ठन कुआँ कोड़वाइस। भरे अकाल म जनता ल पाले खातिर तीन ठन तरिया कोड़वाइस। बाँध बनवाईस, स्कूल बनवाईस, सड़क बनवाईस, बिजली लगवाईस। संपत ह न कोनो पंच आय न सरपंच आय, तब ले सरकार ले लड़-लड़ के अतका काम करवाय हे। सबके हिसाब लगा के देख लव, करोड़ रूपया ले जादा के काम संपत ह ये गाँव म करवाय हे। का अपन ईज्जत बेचे बर? गाँव के दसों झन जवान मन ल सरकारी नौकरी म लगाइस हे। आज वो मन ह राज करत हें। अपन तनखा ल वो मन ह संपत ल लान के देथे का? भगवान के देवल संपत महराज कना सब कुछ हे। नेकी कर दरिया म डाल। अउ कुछू नइ होना वोला। मान-सनमान के घला लालच नइ हे, फेर नेकी के बदला बदी तो झन देवव। गाँव के विकास होय, गरीब के भलाई होय, हमर तो बस इही उद्देश्य हे; आगू घला अपन ले जइसन बनही, करत रहिबोन। अतका सब करे के बाद बतावव; अपन अपमान अउ बेईज्जती कराय बर हम इहाँ बसे हाबन का?’’
वोकरे कना मुसुवा ह घला कोरियाय कस बइठे रहय। मौका देख के कहिथे - ’’छोटे मुँहू अउ बड़े बात, गलती ल छिमा करहू। समझदार ल इशारा काफी। महराज ह अपन दुख ल बता तो डरिस। फेर अतका बिनती अउ हे महराज ले कि अपमान करइया के नाव ल टीप के बतावय। बच्चा के खातिर। आज ये गाँव म काकर कना अतका हिम्मत हो गे, कि बाम्हन-बैरागी के हिनमान करे, बच्चा के खातिर?’’
संपत ह रकमखा के कहिथे - ’’लतखोर अउ वोकर टूरा ल पूछव, मोर से का पूछथव।’’
सरपंच - ’’बने बने बताव जी, लतखोर अउ वोकर टूरा कहे ले काम नइ बनय, वोकर टूरा के के नाव धर के बताव। येमा दूनों झन के गलती हे कि कोनो एक के, येकरो फरियाव करके बताव। ककरो ऊपर दोष लगाना सरल हे, फेर वोकर फुराजमोगा करे बर गवाही के घला जरूरत पड़थे, गवाही मन के नाव ल बताव। घटना कइसे होइस तउन ल मुड़ी-पूछी फरिया-फरिया के बने बताव।’’
संपत - ’’हमर घर मेहमान आय हे, मोर साला ह। साल म दू घांव, तीन घांव आतेच् रहिथे। अब तो वो ह गाँवेच् के लइका जइसे हो गे हे। आज संझा कुन के बात आय। गरमी के दिन, सांझ कुन के हवा ह सुहाथे। चाय-पान बर वो ह अपन संगवारी मन संग पीपर चैंक कोती गे रिहिस। बीच म लतखोर के घर पड़थे। वोकरे मुहाटी म दस-पंद्रह आदमी सकलाय रिहिन। लतखोर के टुरा फकीर घला रिहिस। विही ह मोर साला ल गाड़ा के खुँटा ल निकाल के मारे बर दँड़ाय हे। गली-खोर म निकलना घला जुलुम हे का जी? आगू के बात ल विही मन ल पूछव। मोला जउन कहना रिहिस, कहि डरेंव।’’
सरपंच - ’’कोन ह जुलुम करिस अउ काकर ऊपर करिस, सब ल जांचे जाही अउ सब के सुने जाही। सगा बाबू ह कोन जघा बइठे हे। बता जी आप ल कोन ह का किहिस, कइसे होइस।’’
सगा ह बोले म पिछवा गे, वोकर लंगोटिया यार, नाता म संपत महराज के एक झन भतीजा विजय ह रोसिया के कहिथे - ’’ये संरपंच कौन होता है? वो पुलिस है कि जज है जो हमारा फैसला करेगा। इस गाँव म सदा से दुबे लोग फैसला करते आ रहे हैं। हमारा फैसला ये क्या करेगा जो इनके सामने हम हाथ फैलायेंगे?’’
सरपंच - ’’सरपंच ह न पुलिस हरे अउ न जज। सरपंच ह ककरो नियाव घला नइ करय। इहाँ सब के बात ल सुने जाही, पांच पंच वोकर ऊपर बिचार करहीं अउ बहुमत के आधार म फैसला सुनाय जाही। अउ बाबू! जब तंुहला पंचायत म नियाव नइ कराना रिहिस, तब ये बैठका ल सकेले काबर हव? ये गाँव म पहिली का होवत रिहिस, वो ह तइहा के बात हो गे। अब जउन होही, चार के झन के सुम्मत से होही।’’
मरहा राम ह संपत महराज के बात ल सुन के गुसियाय बइठे रहय, विजय महराज के बात ल सुन के वोकर पारा ह अउ गरम हो गे। सरपंच के बात ल बीच म काट के कहिथे - ’’गाँव वाले भाई हो! अभी हम महराज मन के बात ल सुनेन। बात ह छोटे नइ हे। पूछे गे हे कि सरपंच ह नियाव करने वाला कोन होथे। हम सब चुनाव म चुने हन तब ये आदमी ह सरपंच बने हे, जबरन के नइ बने हे। सरपंच के बारे म अइसन कहना तो सरपंच के सरासर अपमान हरे। भरे सभा म हमर चुने सरपंच के जउन ह अपमान कर सकथे वो ह बाहिर जा के ककरो घला अपमान कर सकथे। अब मंय ह संपत महराज के बात के जवाब पहिली देना चाहहूँ। आप सब जानथव, संपत महराज ह घला जानथे। मंय पूछथंव, का इहिच् गाँव म कुआँ, तरिया अउ सड़क बने हे, बिजली ह इहिच् गाँव लगे हे। विकास के ये जम्मों काम ह अतराब के सब गाँव मन म घला होय हे; सब ह वोकरेच् करावल होही का? अउ कहिथे कि गाँव के लइका मन के नौकरी लगवाय हंव। कतेकर नौकरी लगाय हे नाव धर के तो बताय जरा। अतका पहुँच वाले हे ये आदमी ह तब अपन बेटा के नौकरी ल काबर नइ लगवाय सकिस? लतखोर ल पूछ, फकीर के पढ़ाई ल छोड़वाय बर वोला का किहिस अउ के घांव ले किहिस। ’मेटरिक पास हो गे रे तोर टुरा ह अउ कतका पढ़ाबे? पढ़ा लिखा वोला साहब बनाना हे का? छोड़ा वोकर पढ़ाई ल अउ बनी-भूती करे बर भेज।’ ये बात ह सच आय कि झूठ लतखोर भइया ल पूछ सकत हव। इही बात अशोक गुरूजी के बाप ल घला कहय। वहू ह येकर बात म आ जातिस त अशोक ह गुरूजी बन पातिस क? डाकिया ह येला गाँव के प्रमुख आदमी समझ के कतरो झन लइका के नौकरी के परीक्षा अउ इंटरबू के कागज ल येकर हाथ म देय-देय हे। काकर कागज ल ये ह समय म देय हे?
मरहा राम के बात ल सुन के सब आदमी मन कहे लगिन - ’’सब्बास मरहा भइया, जउन बात ल हमन नइ कहि सकत रेहेन, वोला तंय आज कहि देस।’’
कलर-किलिर के बीच म मरहा राम ह आगू किहिस - ’’ओरियाय म रात पहा जाही, ये मन का बताहीं, फकीर! तंय बता जी आज तोर संग का होइस तउन ल।’’
बाम्हन पारा के टुरा मन अउ संपत के मंदहा-गंजहा पार्टी के वोकर पेटपोंसवा मन घला रोसिया गे। कोन ह काकर ल सुने? सरपंच के समझाइस ह घला बेकार हो गिस।
संपत महराज ह किहिस - ’’विजय ह बने केहे हे। सबरदिन के नियाव करइया दुबे परिवार के नियाव ल तुम का कर सकहू। हमला जउन कहना रिहिस, कहि देन, जउन बताना रिहिस हे बता देन। रहि गे फैसला के बात; जउन करना होही, दुबे मन अपन फैसला ल खुदे कर लिहीं।’’
फकीर ह बादर सही गरज के अउ छाती पीट के कहिथे - ’’अरे जा, जा! ये ह फकीर आय, मुरहा राम नो हे, जउन ह तोर धमकी ले डर्रा के गाँव छोड़ के चल दिस। तोर अइसन गीदड़भभकी ले डरने वाला नइ हे फकीर ह।’’
वो जमाना ह तइहा के बात हो गे हे जब दुबे परिवार के मुखियागिरी चलय अउ कोनो ल कइसनो घला फैसला सुना देवंय।
सब गाँव वाला मन ल एक तरफा होवत देख के दुबे मन के सक्कापंजा बंद हो गे। बिना कोनों फैसला के बैसका ह उसल गे।
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KUBER
Mo. 9407685557
गुरुवार, 13 मार्च 2014
उपन्यास के अंश
2- मुसुवा के केकरा चाला
संझउती समय बैसका के हांका पर गे।
सटका लउठी ल फटर-फटर बजावत अउ ठुठवा बिड़ी ल सिपचावत निकल गे मुसुवा राम ह अपन बिला ले। माड़ी के आवत ले धोती पहिरे हे, बदन म सलूखा हे अउ चैखाना वाले लाल रंग के जुन्नेटहा मुहा पटका ल पागा सरीख मुड़ म लपेटे हे। कान म जरहा बिड़ी खेंचाय हे। मुरहा राम के घर आगू पहुँच के वोकर सटका के बजई ह बंद होइस। बने असन खखार के नरी ल साफ करिस अउ हुंत कराइस - ’’सुत गेव का जी मुरहा राम।’’
गरमी के दिन। भीतर ह धमकी मारत रहय। मुरहा ह घर आगू खोर म खटिया जठा के बइठे रहय। बैसका के नाव सुन के वोकर मुँहू ह वइसने सुखा गे रहय, करेजा ह धकधक-धकधक करत रहय; मुसुवा के आरो पा के वोकर घिघ्घी बंधा गे। मनेमन किहिस - ’पहुँच गे माहिल ह। को जानी का चाल चले बर आय होही ते। हे भगवान, रक्षा करबे।’ जी ल कड़ा कर के कहिथे - ’’आ भइया बइठ। कते कोती ले आवत हस। चोंगी पी ले।’’ मुरहा ह छेना के आगी म बिड़ी सुपचा के वोकर कोती लमा दिस।
मुसुवा ह बीड़ी के बने दू-तीन कस खींच लिस अउ किहिस - ’’वाह! मजा आगे जी मुरहा, तोर बीड़ी म। हाथे के बनावल आवय तइसे लगथे।’’
’’मंहगाई के जमाना, गरीब के नून-मिरी बिसाय के ताकत नइ हे। बिड़ी-सिकरेट ल का बिसा सकबोन ददा। घरे म अलवा-जलवा अंइठ लेथन। अब तंय ह सुना रे भइ, कइसे आय हस।’’
’’हफ्ता लगे न पंदरही, फकत बैसका; फकत बैसका। मालिक मन के दबदबा, अउ धमकी-चमकी के देखे बैसका के नाव सुन के कंपकंपी धर लेथे भइया। जर धरे सही लागथे। कमजोर दिल के आदमी, का बतांव, छाती ह धकधिक-धकधिक करत हे। घर म मन ह उचाट लगिस ते खोर डहर निकले रेहेंव। तुंहर इहां काकी के गोठ के सुरता आ गे। आजे बिहिनिया केहे रिहिस - ’तंय तो जानतेच् हस नानचुक, कतका देखासुनी अउ तेलाबाती करे म भगवान ह बड़े बहू ल चीन्हे हे तउन ल। देय हस तइसे बने-बने निबटा घला देतेस भगवान, कहिके रात-दिन मनउती मनात रहिथव बाबू। दू-चार दिन हो गे हे, बहू के पांव ह फुलफुलहा-फुलफुलहा कस दिखत हे। आ के देख देतेस।’ विही बात के सुरता आ गे। तउने पाय के आय हंव भइया। बने-गिनहा के बात ल तुम जानो रे भइ। .... काकी के आरो नइ मिलत हे। सुत गे हे का?’’
’’दस-गियारा बजे बिना अतका गरमी म काकर नींद ह परही भइया। नंदगहिन काकी घर कोती बइठे-बुठाय बर गे होही। बड़की के गोड़ ह थोरिक उसवाय-उसवाय कस दिखथे, वोकरे बात ल बताय रिहिस होही।’’
’’आज के जमाना ह दवई-गोली के जमाना आय मुरहा। देसी जड़ी-बुटी के जमाना ह नंदा गे। का दवई बतांव तोला। केहे गे हे - धर-बांध के डउकी अउ तेला-बाती के लइका, नंदात-नंदात म नंदाथे। उलटा-पुलटा हो जाही ते बाय हो जाही रे भइ। सौ लगे के पचास, नांदगांव लेग अउ बने असन माईलोगन के डागदरिन ल देखा रे भाई, बच्चा के खातिर।’’
’’काला बतांव भइया, अंटी म फूटे कउड़ी नइ हे। सोचबे ते चेत ह बिचेत हो जाथे।’’
’’होयेच् के बात ए मुरहा। डागदर मन के फीस ह मार डरथे। दवा-बूटी के भाव झन पूछ, आगी लगे हे। एक तो कोनों आदमी ल गरीब घर जनम झन देय भगवान ह अउ देथे त बीमार झन करे। गरीब के बीमारी ल मौत के परवाना जान ले बाबू।’’ थोरके थिरा के फेर कहिथे मुसुवा ह - ’’आजकल के खवई-पियई, इलाज-पानी म लइका ह पेटे भीतर बने भोगा जाथे भइया। जचकी निभे म तकलीफ होथे, काबर के चैखट ह नान्हे परे धरथे। तहाँ ले सोज्झे आपरेसन म टेकाथें डागदर मन ह। दस-पंदरा हजार ह नइ बांचे। इही ल कहिथे - दुब्बर बर दू असाड़। बने जोरा करके राख बाबू, अउ भगवान ऊपर भरोसा राख। चिंता करे म काम नइ बनय। मुड़ी म आय हे काम ह, कइसनो करके निपटबे करही। ले बइठ, जेवन-पानी निपट, मंय ह जावत हंव, बच्चा के खातिर।’’
मुरहा ह मनेमन सोचथे, दुब्बर बर दू असाड़ कहत हे माहिल ह, बात म कोनो न कोनो रहस अवस होही। सार बात ल, जेकर नाव ले के ये ह आय हे वोला नइ खोलिस लागथे। चिरौरी करत किहिस - ’’बइठ न भइया, बइठ न। जाबेच् निही। दुब्बर बर दू असाड़ कहिथस, अउ कोनो बात हे तइसे लागथे। बने समझा के बता न भइया। अइसने बिसकुटक वाले बात ह हमर जइसे अड़हा मन के मुड़ी म नइ समाय।’’
रेंगे बर ठाड़ हो गे रहय मुसुवा ह, अतकच् ल तो खोजत रहय। दांव ह पड़ गे। धरालका फेर बइठ गे। फुसफुसाय कस कहिथे - ’’तब तंय ह सिरतोनेच् म नइ जानस जी, कुछु बात ल? गाँव म कइसन-कइसन गोठ होवत हे तोर बारे म तउन ल।’’
मुसुवा के बात ल सुन के मुरहा के सांस ह अटके कस हो गे। बड़ मुसकिल म मुँहू ह उलिस। कहिथे - ’’मोर बारे म? मंय तो कुछुच् नइ जानव भइया। का बात होवत हे, बने फोर के बता न।’’
मुसुवा ह कहिथे - ’’हत् बइहा! आरूग भकला हस जी। बने-बने म बहू बेटा वाले हो जाय रहितेस। लइका नइ हस। सुन, भइया, तोला अपन भाई जान के कहत हंव। गरीब के संगी गरीबेच् ह होथे, नइ ते हमला का करना रिहिस हे रे भइ।’’ थोरिक थिरा लिस तहाँ फेर कहिथे - ’’तुंहर जात वाले मन ह, पार वाले मन ह का कहत हे थोरकोच् नइ जानस न?’’
जात वाले अउ पार वाले के बात ल सुन के मुरहा ल रोवासी आ गे। हे भगवान! जात-बिरादरी वाले मन के कोन जानी का बिगाड़ कर परे हंव ते। कहिथे - ’’मंय तो कुछुच् बिगाड़ नइ करे हंव भइया जात-बिरादारी वाले मन के। का कहत हें? बता न।’’
’’सही गलत के बात ल तंय ह बताबे मुरहा, हमर तो सुनती बात ए रे भइ का सही, का गलत। परमान मांगबे ते कहाँ ले लाहूँ भला। भगवान ह लबारी मारे के पाप झन कराय। धरम-अधरम, पाप-पुन, सरग-नरक ह सबो बर होथे भइया, अधरम ले बच के रहना चाही। कोनो ह कहि दिस मुरहा! कि कंउवा ह कान ल ले गे, त पहिली कान ल टमड़ के देख लेना चाही। कंउवा के पीछू नइ भागना चाही। बच्चा खातिर। सुनत हस नहीं जी? तोर ले बगरी भात खाने वाले हे तोर पार वाले मन ह। भात नइ खवाबे ते जात बाहिर कर दिहीं। इही बात तो आय भाइया। अउ वोती लीम के डंगाली म करेला के नार ह चढ़ के इतरावत हे। जानेस न? वो बेड़जत्ता महराज; कहत रिहिस हे, ....’’
’’संपत महराज ह? का कहत रिहिस भइया।’’
’’कोन जानी वोकर का बिगाड़ कर परे हस ते, तिहीं ह जानबे रे भइ। जहू-तहू कहत फिरत हे। तोर बारे म कहत रिहिस कथे कि - ’कोनो घला ईज्जतदार आदमी ल बदनाम करत फिरत हे। वोला गाँव बाहिर करना हे। भतबहिरी करे बिना वोकर चेत ह नइ चढ़े।’ अब कारण का हे तउन ल तंय जान, का वोकर बेईज्जती करे हस ते। बड़े आदमी, कहत हे ते जरूर कर के बताही, तोला गाँव ले बहिर करवाइच् दिही। सोच ले, जात बाहिर हो के, गाँव बाहिर हो के आदमी ह के दिन ले अलग रहि सकथे जी। अउ आगू म तोर अतका बड़ काम खड़े हे, पहाड़ बराबर। विही पाय के आय हंव भइया, अपन जान के कि नइ जानत होही ते सावचेती कर देथों कहि के। बच्चा के खातिर।’’
सुन के मुरहा राम के चेत हरा गे। भाखा नइ निकलिस।
मुसुवाच् ह कहिथे - ’’अउ तुंहर पार वाले, जात-बिरादरी वाले मन ल उचकइया घला तो विहिच् हरे। जमगरहच् छांद-बांध डरे हे, बेड़जत्ता ह। अउ वोकरेच् तो चलती हे इहाँ। ये गाँव म विहिच होही, जइसन वो बेड़जत्ता ह कहि दिही। वोकर बात के उदेली करइया इहाँ कोन हे भइया।’’
मुरहा के आँखी आगू धुंधरा छा गे।
मुसुवच् ह कहिथे - ’’कोनो बातिक-बाता होय हे का जी तोर संग वोकर।’’
मुरहा ह रोनहू हो के कहिथे - ’’तंय तो जानतेच हस भइया। सरी गाँव ह जानथे; गाँव के कते बहू-बेटी ऊपर नान्हे नीयत नइ करत होही अँखफुट्टा ह। तोर छोटकी बहू ह वो दिन कहत रिहिस, - रद्दा लगे न बाट, जब देखबे तब, बेलबेलात रहिथे, हाथ बंहा ल तको धरे के उदिम करत रहिथे। अब तिही बता भइया, अइसन बात ल कोन ह सहही। मोला तो वोकर सूरत देखे के मन नइ होय, साले नीच के।’’
मुसवा ह आखिरी दांवा फेंकिस - ’’इहिच बात होही मुरहा। बात के बतंगड़ बने म कतका टेम लगथे। तोर जात-पार वाले मन इही पाय के उमिहांय होही। अब तंय जान भइया अउ तोर करम जाने। अपन बचाव बर तोर तीर कोनों अवाही-गवाही हे कि नइ हे तेला तंय जान। मोर धरम ल मंय निभा देंव। सावचेती करना रिहिस, कर देंव। ले बइठ, अब चलथों।’’
’’तंही ह कुछू रद्दा बता भइया। मोला तो चारों खूँट अँधियारेच् अँधियार दिखत हे। का करँव, का नइ करँव।’’ आखिर म हार खा के मुरहा ह कहिथे।
’’सियान मन ह कहिथें, मरे ले टरे बने। कुछू खुराजमोगी करे के कोसिस ह बेकार हे भइया। बंद मुट्ठी लाख के, खुले म खाक के। जबान खोले म अपने फजीहत हे। दुनिया के चलन हे, लोगन ह गिरे ल अउ गिराथें। समरथ आदमी ल कोनों दोस नइ देवंय। कहाँ ले साखी-गवाही लाबे। कोन ह तोर सुती खाही। वोकर ले माफी मांग लेबे, इही म भलाई दिखथे मोला।’’
’’जहर खा लेहूँ भइया, नइ ते कोनों डहर जा के फाँसी लगा लेहूँ; फेर वो नीच के पाँव नइ परंव।’’
मुरहा ह अपन फैसला सुना दिस।
मुसुवा ह थेरिक उपिक के कहिथे - ’’सियान मन कळिथें मुरहा! रीस खाय बुध ल, अउ बुध खाय परान ल।
नादान मत बन, भइया। मूरख मन सरीख मत गोठिया तंय ह। तोला फाँसी म झूल जा केहे बर आय हंव जी। मर जाहूँ कहिथस। तोर पीछू अतेक बड़ परिवार हे, चैंथा पन म दाई के का हाल होही? दू-दू झन आधासीसी बाई हे, काली-परोन दिन तोर अँगना म खेलइया तोर नान-नान लइका आ जाहीं। काकर भरोसा छोंड़ के मरबे ये मन ल? कुछू सोचे हस। अउ मरिच् जाबे ते काकर काला लेग जाबे? अरे! जीयत रहिबे ते एक न एक दिन तोरो बारी आही। सब दिन होहि न एक समाना, एक बरोबर नइ रहय भइया सबके दिन ह। भगवान ह सब ल अवसर देथे। मुसीबत के समय आदमी ल केछवा धरम अपनाना चाही। मुसीबत परे म केछवा ह कइसे खोल म अपन मुड़ी-कान ल तोप लेथे, नइ देखे हस? आगू तंय जान भइया। अब मंय ह जावत हंव। मोर बात ल बने असन बिचार करके देख लेबे। बेफिकर रह। ले बइठ, जेवन-पानी नइ होय होही ते खा-पी। जावत हंव।’’
अतका कहिके मुसुवा ह ठुठवा बिड़ी ल सुपचावत अउ अपन सटका लउठी ल फटकारत गली कोती रेंग दिस।
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कुबेर
शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013
उपन्यास के अंश
कुबेर के अवइया नवा उपन्यास ’’भोलापुर : तारन भैया के गाँव’’ के अंश
1- डंडापिचरंगा
तारन,
रघ्घू, लखन, फकीर, ये मन तो वीरेन्द्र महराज के ननपन के संगवारी आवंय, संग
म खेले-कूदे हें, खेत के लाख-लाखड़ी अउ चना ल संग म चोराय हें, होरा भूंज
के खय हें, संग म चड्डी पहिने बर सीखे हें। इंकर ननपन के एक ठन कहानी सुनव।
तारन, रघ्घू, लखन, फकीर अउ वीरेन्द्र गाँव के प्रायमरी स्कूल म एके कक्षा म पढत रहंय। परीक्षा हो गे रहय, पास-फेल सुनाय के बाचे रहय। बिहने स्कूल लगय। मस्ती के दिन आ गे रहय। स्कूल ले छूटतिन अउ सोज्झे राजा तरिया कोती पल्ला भागतिन। तरिया पार म आमा के पेड़ कहस कि अमली के पेड़, पांत धर के, पुरखा मन के लगाय आजो जस के तस हे। ये समय म आमा के पेड़ मन लटलिट ले फरे रहिथें, ककरो फर ह सिसाही बांटी कस त ककरो ह चुनाकड़ी बांटी कस हो जाय रहिथे। वो मन सबले पहिली लबडेना मार-मार के जिकी धरत आमा के फर मन ल गिरातिन, सोसन के पूरत ले खातिन, सोसन पूरतिस तहाँ ले टुरा घटौंधा म आ जातिन। घटौंधा म तरियापार म पीपर के बड़ जबर रूख हे। डारा मन ह आधा तरिया के जावत ले छिछले-छिछले हें। छँइहा म शंकर चँवरा हे जेमा भोला बाबा ह नंदी संग बिराजमान हे। पीपर के पेड़ौरा म बिराजमान हे बजरंग बली। टूरा मन ह पागी-पटका ल लकर-धकर तरिया पार म कुढ़ोतिन अउ नंगरा हो के आँखी के ललियात ले तंउरतिन, पानी भीतर नाना भाँति के खेल खेलतिन। डंडापिचरंगा तो रोजे खेलतिन। लड़रिया मन सरीख उत्ताधुर्रा पेड़ म चघतिन, डारा म फलंगतिन अउ उहाँ ले पानी म कूदतिन।
एक दिन के बात आवय। पेड़ म चढ़त खानी रघ्घू ह बजरंग बली ऊपर पांव रख परिस। वीरेन्द्र ह देखत रिहिस; चिल्ला के कहिथे - ’’वहा दे! वहा दे।’’
हुरहा वीरेन्द्र के वहा दे! वहा दे! ल सुन के बाकी टुरा मन सुटपुटा गें। फकीर ह कहिथे - ’’का हो गे बे महराज, काबर चिचियावत हस?’’
वीरेन्द्र - ’’रघ्घू ह बजरंगबली भगवान ल खूंद दिस।’’
फकीर - ’’तब का हो गे?’’
वीरेन्द्र - ’’बजरंगबली ह रिसा जाही, जम्मा गाँव भर म आगी लगा देही, रोग-राही बगर जाही, सब आदमी मरे लगहीं।’’
फकीर - ’’तंय तो रोजेच खूँद के चढ़थस, बजरंग बली ह एकोदिन तो नइ रिसाइस?’’
वीरेन्द्र - ’’हम तो महराज आवन, हमर ले नइ रिसाय।’’
फकीर - ’’अउ वो दिन पेड़ म चढ़ के शंकर भगवान ऊपर मूते रेहेस तब बे?’’
वीरेन्द्र - ’’वो ह तो पानी चढ़ायेच् के देवता हरे। अउ जान-सुन के थोरे मूते रेहेंव, अउ उतर के पांव पर के माफी मांगे रेहेंव कि नहीं? - ’हे भगवान हमन लइका के जात, धोखा होगे, गलती कर परेंव, क्षमा कर देबे’ कहिके। मांगे रेहेंव कि नहीं?’’
फकीर - ’’रघ्धू ह घला मांग लेही तब।’’ रघ्धू ल कहिथे - ’’चल बे रघ्धू, बजरंग बली ल खूंदे हस तेकर सेती वोकर पांव पड़ के माफी मांग।’’
वीरेन्द्र - ’’शंकर भगवान ह सिधवा देवता हरे। बजरंगबली ह घुसियाहा भगवान हरे। पांव परे म नइ बनय।’’
फकीर - ’’तब कइसन म बनही?’’
वीरेन्द्र - ’’उदबत्ती अउ नरिहर चघाय बर पड़ही। ’’
फकीर - ’’नइ चढ़ाही तब?’’
वीरेन्द्र - ’’तुम जानव। गांव म कुछू अलहन आही तेकर जिम्मेदार तुम रहिहव। हम तो ये पाप के भागी नइ बनन। जा के अभीच् बताहूँ कका ल। बैसका सकेल के विही ह येकर फैसला करही।’’
वीरेन्द्र महराज के कका, मतलब संपत महराज। कका ल बताय के नाव म रघ्धू ह कांपे लगिस। आजेच वो ह कलम लेय बर अपन दाई ल पांच पइसा मांगे रिहिस, लेय नइ रिहिस, पेंट के जेब म राखे रिहिस, वोकरे सुरता आ गे। किहिस - ’’मोर तिर नरिहर लेय के पुरती पइसा नइ हे, पांच पइसा धरे हंव।’’
वीरेन्द्र - ’’बन जाही, बजरंग बली म चढ़ा दे, पांव पर ले अउ कोनो बाम्हन ल दान कर दे।’’
फकीर ह रघ्धू ल कहिथे - ’’कुछू नइ होय यार। तंय डर्रा झन। ये ह तोला ठगत हे।’’
जनम के सिधवा रघ्धू, वो ह तो बैठका के नाव सुन के कांपत रहय। जेब म रखाय पांच पइसा ल तुरते निकालिस अउ बजरंग बली म चढ़ा दिस।
फकीर ह रघ्धू के घोंचूपन ल देख के गुसियाय रहय, बीरेन्द्र के चाल ल समझ गे रहय, वोकरे डहर अंगरी धर के कहिथे - ’’अब दान करे बर कहाँ बाम्हन खोजबे। खोजे बर जाबे त पोलपट्टी खुल जाही। येकर ले बड़े बाम्हन अउ कहाँ मिलही? चढ़ा दे येकरे मुड़ी म।’’
रघ्धू ह वइसनेच् करिस।
ये तो होइस ननपन के बात; अब तो सब जवान हो गे हें। अब, जब सब मितान सकलाथें तब अपन ननपन के अइसने कतरो घटना ल सुरता कर-करके जम्मों झन कठल-कठल के हाँसथें। कहिथें - ’’फकीर ह बने कहथे संगी हो, पसीना गारथन तब दू कंवरा अन्न ह मिलथे, दू पइसा के दरसन होथे, अपन कमाई के धन ल काबर कोनों ल सेतमेत म देबोन?’’
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