सोमवार, 4 मार्च 2019

कहानी

गौरैया

(यह कहानी मेरी छत्तीसगढ़ी कहानी ’बाम्हन चिरई’ का हिंदी अनुवाद है।)

छत्तीसगढ़ी में एक कहावत है - ’बिहाव ह कथे कर के देखा, घर ह कथे बना के देखा।’ अर्थात् शादी-विवाह करना और घर बनाना आसान काम नहीं होता, दोनों की अपनी चुनौतियाँ होती हैं। दोनों ही कहते हैं - करके बता तो जानूँ। ऊँट के लिए पहाड़ चढ़ना कभी भी आसान नहीं होता। घर बनाते-बनाते मेरी कमर टूट चुकी है। बड़ी मुश्किल से पुताई का काम हो पाया है। फ्लोरिंग, टाइल्स, खिड़की-दरवजे और रंग-रोगन के लिए हिम्मत ने जवाब दे दिया है। योजना थी कि छः-सात महीने में गृह प्रवेश हो जायेगा, परंतु गाड़ी अटक गई।

मुसीबत चाहे कैसी भी हो, महिलाएँ बचने का रास्ता ढूँढ ही लेती हैं। पत्नी ने कहा - ’’कर्जा कर-करके और कितना बोझ लादोगे। उतारना आखिर हमें ही है। रईसी दिखाने के लिए दूसरों का नकल करना बेकार है। फ्लोरिंग और टाइल्स, नहीं हो पायेगा तो फर्सी पत्थर से काम चला लेते हैं। खिड़की-दरवजों के लिए इमारती लकड़ियों की व्यवस्था नहीं हो पा रही है तो साधारण लकड़ी से काम चला लेते हैं। चूने से एक बार पुताई तो हो ही गई है, रंग-रोगन बाद में करवा लेंगे। हँसनेवालों का क्या है, करोंड़ों खर्च करने पर भी तो वे मीन-मेख निकाल ही लेंगे। बरसात लगनेवाली है, दूसरे के घर में आखिर कितने दिन रहेंगे।’’

मैंने वैसा ही किया। और बरसात लगने से पहले हम अपने नये घर में आ गये।

अपनी किताबों को मैंने बरामदे की दीवर में बने रैक के विभिन्न खानों में व्यवस्थित ढंग से सजा दिया। रैक में अभी कांच-खिड़कियाँ नहीं लग पायी हैं। ताला लगाने का सवाल ही पैदा नहीं होता। अर्थात् मेरा यह अनमोल खजाना हर किसी की पहुँच के दायरे में है। 

किताबों के रैक के पास ही दीवार में खूँटी के सहारे एक दर्पण लटका हुआ है जिसके आगे खड़े होकर मैं कंघी किया करता हूँ। एक दिन मैंने देखा, एक गौरैया इसी दर्पण के फ्रेम मेें बैठकर अपना प्रतिबिंब निहार रही है। कभी वह घूम-घूमकर अपना सिर दायाँ-बायाँ मटकाती तो कभी चीं-चीं करके वह अपना पूँछ नचाती। उसकी आँखों में गजब की चमक थी। चहकने की आवाज में किसी असाधारण संगीत की मधुरता थी और उसके रूप में मन को आह्लादित करनेवाला आकर्षण था। वह किसी मुग्धा नयिका से कम नहीं लग रही थी। मैंने कहा - वाह जी, तुमको भी सजने-सँवरने का नशा चढ़ा हुआ है। पर उसे मुझमें कोई रूचि नहीं थी, भला मेरी बात वह क्यों सुनती? अलबत्ता रह-रहकर वह अपने ही प्रतिबिंब को अपने ही चोंच से ठुनकने लगती। सोचती होगी - मेरे साम्राज्य में यह दूसरा कहाँ से आ गई है, मेरे हक पर डाका डालने के लिए?

तभी कहीं से एक अन्य गौरैया फुर्र से उड़कर आई और उसके बगल में बैठ गई। इसके सिर और डैनों पर कत्थई रंग की धारियाँ बनी हुई थी। प्रचलित विश्वास और परंपरा द्वारा अर्जित ज्ञान के आधार पर यह पहचानने में मुझे देर नहीं लगी कि यह नर गौरैया है और पहलीवाली मादा। पहिलीवाली गौरैया ने उसे कुछ नहीं किया। झण भर के लिए उसे ध्यान से देखा और उसके कुछ और समीप आकर बैठ गई। दोनों के बीच अपनी भाषा में कुछ देर वार्तालाप हुई। और चीं-चीं करती हुई दोनों एक साथ उड़ गई। उन दोनों ने शायद मित्रता गांठ ली हो। कुछ देर बाद वे दोनों चीं-चीं करती हुई आईं और दर्पण में फिर बैठ गईं। कुछ देर मस्ती करके फिर उड़ गई। 

उन दोनों का यह आना-जाना दिनभर लगा रहा। दोनों इसी तरह दिन भर मस्ती करती रहीं। उनके इस कलरव भरी मस्ती से मुझे आनंद भी आ रहा था और ईष्र्या भी हो रही थी। इस तरह की मस्ती हम लोग क्यों नहीं कर पाते?

दूसरे दिन सुबह मैंने देखा, किताबों वाली रैक के नीचे फर्स पर खूब सारे कचरे बिखरे पडे़ हैं। मुझे पत्नी पर गुस्सा आया। घर की साफ-सफाई भी ठीक से नहीं कर सकती? पत्नी का ध्यान मेरी ओर ही था। उसने मेरा मनोभाव ताड़ लिया। मेरे कुछ कहने से पहले ही उसने सफाई देते हुए कहा - ’’बुहारते-बुहारते मैं तो थक गई, इन बदमाश चिड़ियों से। पता नहीं कब आती हैं और कचरा डालकर चली जाती हैं।’’

मेरी बोलती बंद हो गई। किताबों की ओर देखा। किताब की पंक्तियों और रैक के छत के बीच कुछ बड़ी सेंध थी। उन लोगों ने यहीं सेध मारी की थी। सेंध सूखे तिनकों से भरा पड़ा था। मुझे क्रोध आया - इन हरामखोरों को घोसला बनाने के लिए मेरी किताबों के बीच ही जगह मिली? मेरी निगाह झरोखों की ओर चली गई। वहाँ दोनों चिड़िया पूँछ नचाती और सिर मटकाती, अपनी-अपनी चोंज में तिनके लिए बठी थीं। उनका ध्यान मेरी ओर ही था। वे कुछ सहमें-सहमें से लग रहे थे। उन्होंने शायद भांप लिया था कि मेरे मन में क्या है और मैं क्या करने जा रहा हूँ। मैंने अपनी विवशता के बारे में सोचा, झरोखों में यदि कांच लग गया होता तो ये दुष्ट पक्षियाँ ऐसा हरगिज नहीं कर पातीं। 

सूपा और बुहारी लेकर मैं उनके घोसले की सफाई करने के लिए उद्यत हुआ। इस बीच वे दूसरे तिनके की तलाश में बाहर चली गई थी। रास्ता साफ था। परंतु जैसे ही उनके घोसले की ओर मैंने बुहारी बढ़या, वे आ गईं। वे चीं-चीं करके मेरे सिर के चारों ओर मंडराने लगीं। वे मेरे इस कृत्य पर आक्रोशित थी और इस कृत्य का प्रतिरोध कर रही थीं। उनकी आक्रामकता देखकर मैं डर गया। मन ने कहा - चिड़ियों से डर गये? यह तो गजब हो गया। मुझे भी जिद्द हो गया।

चिड़ियों का विरोध और भी आक्रामक हो गया।

मन ही मन मैंने कहा - वाह री पक्षियों, धन्य हो। इतना विरोध तो आदमी भी नहीं कर पाते।

पत्नी देख रही थी, कहा - ’’अब रहने भी दीजिए। पखेरुओं का आशियाना उजाड़ने पर पाप लगता है। चोंच मार देगी तो और मुसीबत हो जायेगी।’’

अभी अपना कार्यक्रम रोक देने में ही मैंने अपनी भलाई समझा। सोचा, इनकी अनुपस्थिति में देखा जायेगा।
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उस दिन की घटनाएँ याद आने लगी जिस दिन इस घर का पुनर्निर्माण करने के लिए मुझे पुराने ढांचे को तोड़ना पड़ा था। पुराना घर कवेलूवाला था। कवेलू में घोसला बनाने में चिड़ियों को आसानी होती है। उस कवेलू के ओरछे में गौरैया के बहुत सारे घोसले थे। जैसे इस घर में इन चिड़ियों का भी बराबर का स्वामित्व हो। घोसले हमेशा बने रहते थे। ये कब अंडे देते, कब उन अंडंों को सेते और उनके चूजे कैसे बड़े होते, बड़े होकर कब उड़ जाते, इस ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं होती। अब नये घर में इन्हें भी तो अपना हक, अपना हिस्सा चाहिए न।

मकान तोड़ने की प्रक्रिया में पहले खपरैल उतारे गये। इन्हें कोई तकलीफ नहीं हुई। जब छाजन तोड़ने की बारी आई और इनके घोसले उजड़ने लगे तो इनका विरोध शुरू हो गया। ये हमलावर हो गये। इन्होंने चीं-चीं करके आसमान सर पर उठा लिया। मजदूरों के सिर के ऊपर मधुमक्खियों की तरह ये मंडराने लगे। इनके विरोध और आक्रामकता देखकर काम करनेवाली औरतें डर गयीं। कहने लगीं - ’’हमसे नहीं होगा। यदि चोंच मार देंगी तो मुसीबत हो जायेगी।’’ 

किसी ने कहा - ’’बेचारियों का घर उजाड़ने में लगे हो, ये भला चुप क्यों रहेंगी? कोई तुम्हारा घर तोड़े तो क्या तुम विरोध नहीं करोगी?’’

पत्नी ने कहा - ’’बहनों! अभी इनके प्रजनन का समय चल रहा है। इनके घोसलों को इधर-उधर मत फेंको। किसी सुरक्षित जगह में इन्हें व्यवस्थित कर दो। आदमी हो या पशु-पक्षी, माँ तो माँ होती है। परिवार और बच्चों की चिंता तो होती ही है। अपने जैसा ही इन्हें भी जानो।’’

पत्नी का सलाह काम आया। जिन घोसलों में अंडे थे उनका सुरक्षित जगहों पर पुनर्वास किया गया। ले-देकर काम बना।
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अब तो पक्का घर बन चुका है। अपना हक भला कोई कैसे छोड़ दे? अपना हक भला ये क्यों न जताए? जब मैंने अपना सूपा-बुहारी वहाँ से हटाया, और अपना सफाई अभियान स्थगित किया तब जाकर इनका विरोध समाप्त हुआ।

अगले दिन, कुछ दिनों के लिए मुझे बाहर जाना हुआ। जब मैं लौटकर आया, इन्होंने अपने स्वामित्व पर कब्जा कर लिया था। इनका भी गृह प्रवेश हो चुका था।

सुबह मैंने देखा, किताबों के रैक नीचे फर्स पर कागज के छोटे-छोटे कतरन बिखरे पड़े है। ये किताबों के पन्नों के कतरन थे। मुझे क्रोध आया। पता नहीं, मेरी किताबों का इन लोगों ने क्या हाल किया होगा। 

कुछ किताबों को दूर से ही ध्यान से देखा, उनके किनारे आरी के दातों की तरह हो चुके थे। मुझे अपने इस नुकसान पर बड़ा क्रोध आया। कहा - ’’ठहरो, हरामखोरों। अभी मजा चखाता हूँ। तुम लोगों ने मेरी किताबों का सत्यानाश किया है, अब मैं तुम लोगों का सत्यानाश करता हूँ।’’

मैंने निश्चय किया, आज इनका घोसला उजाड़कर ही दम लूँगा। जैसे ही मैंने घोसले की ओर हाथ बढ़ाया, चिड़ियों का चीं-चीं शुरू हो गया। मेरे हाथ बीच में ही रुक गये। न तो आज ये मेरे सिर के ऊपर मंडरा रही थीं और न ही इनके स्वर में पहले जैसी आक्रामकता ही थी। आवाज झरोखे की ओर से आ रही थी। मेरी निगाहें उधर ही उठ गई। चीं-चीं की आवाज के साथ ही वे फुदक-फुदककर अपनी विवशता दर्शा रही थीं। उनके स्वरों में पहले की सी तीव्रता और आक्रोश के भाव नहीं थे। मुझे लगा जैसे ये हाथ जोड़कर और आँचल फैलाकर अनुनय-विनय कर रही हों कि कृपया आप ऐसा मत कीजिए। मैं सोच में पड़ गया।

मातृत्व के साथ अनायास ममता और विनम्रता भी आ जाती है।

पत्नी रसोई से बाहर आ रही थी। उसने मुझे किताबों के रैक के पास सोचनीय मुद्रा में देखकर मेरा इरादा भांप लिया होगा, कहा - ’’क्या कर रहे हो? अंडे पड़ गये होंगे। रहने दीजिए।’’

’’मेरे पोथी-पुराणों (साहित्यिक किताबों और मेरे पढ़ने लिखने की अन्य सामग्रियों को मेरी पत्नी पोथी-पुराण ही कहा करती हैं।) का इन लोगों ने क्या हाल किया है, जानती हो? बड़ा आई इनका पक्ष लेनेवाली।’’

पत्नी ने मुझे डाटते हुए कहा - ’’किसी जीव से बढ़कर हो गये हैं क्या आपके ये पोथी-पुराण? आपके इन्हीं पोथी-पुराणों से दुनिया की रचना होती है?’’ आज उसे अपना ज्ञान बघारने का अवसर मिल गया था।

पल भर के लिए मैं भी सोच में पड़ गया। मुझे कबीर का वह दोहा याद आ गया जिसमें वे पूछते हैं कि ’ऐ पंडितों, बताओ, तुम्हारे शब्द बड़े हैं कि मेरी रचना, जीव?

’पाँच तत्व का पूतरा, युक्ति रची मैं कींव।
तो से पूछौं पाण्डिता, शब्द बड़ा कि जीव।’

पत्नी की बातों में ज्ञान बघारनेवाली जैसी कौन सी बात है? बात व्यावहारिकता की है। यथार्थ की बात है। ममता की बात है। प्रेम, करुणा और दया की बात है। सृजन और सृजनकर्ता के अनुभव की बात है। सृष्टि का सृजन तो नारियाँ ही करती हैं। सृजन और सृष्टि की बातें वे न जानेगी तो और कौन जानेगा, पुरुष? पुरुष के ज्ञान में अहम का रूखापन होता है, नारियों के ज्ञान में होती है - करुणा और कोमलता। पत्नी सच ही कहती है - जो सृजन न कर सके उसे संहार का अधिकार नहीं है। संहार करने का मेरा संकल्प और अहंकार पलभर में ठंडा पड़ गया।

मेरे इस हृदय परिवर्तन का चिड़ियों को जैसे जरा भी विश्वास नहीं हुआ। डरे-सहमें वे दिन भर मेरे आसपास ही मंडराती रहीं। मानो मेरा निगरानी कर रही हों। दूसरे दिन भी उन लोगों ने ऐसा ही किया। तीसरे दिन वे जरा खुलीं। झरोखे में बैठकर सिर मटका-मटकाकर और चीं-चीं करके वे मेरी ओर देखती, जैसे कह रही हों - धन्यवाद। इस कृपा के लिए हम आपके आभारी हैं। 

उनकी आँखों से झर रहे अबोधता और कृतज्ञता के झरने से मेरा रोम-रोम आर्द्र हो चुका था। अब तो इन चिड़ियों की धमाचैकड़ी से मुझे रस मिलने लगा था। इसी तरह कुछ दिन और बीते। एक दिन सुबह-सुबह मैंने धोसले के अंदर से आती हुई चीं-चीं की महीन आवाजें सुनी। सृष्टि की रचना पूरी हो चुकी थी। कब हुई, कैसे हुई, किसे पता? सृष्टि की रचना ऐसे ही होती है - धीरे-धीरे, चुपके-चुपके।

चूजों के चीं-चीं की महीन आवाजें मुझे बच्चों की किलकारियों की तरह लगती। यह कुदरत का अमूल्य उपहार था जिससे मेरे घर का कोना-कोना उपकृत हो रहा था। मेरी हृदतंतुएँं इन मधुर झंकारों से झंकृत हो रही थी।

देखते-देखते बच्चे बड़े हो गये। उनके डैनों में इतनी ताकत आ गईं कि वे स्वयं को हवा में साध सके, हवा का सीना चीरते हुए आसमान की बुलंदियों को छू सके।

अगली सुबह घोसला सूना हो चुका था। 

दो-तीन दिनों तक मैं उनके लौट आने की प्रतीक्षा करता रहा। पर गौरैया का यह परिवार लौटकर नहीं आया। मुझे पक्का विश्वास हो गया कि अब लौटकर वे नहीं आयेंगे। मैंने उस घोसले को सावधानी पूर्वक टटोलकर देखा। मन ने कहा - शायद लौट ही आएँ, विरोध करने के लिए ही सही। 

घोसला सूना हो चुका था। मेरा विरोध करनेवाला अब कोई नहीं था। अब अपने पोथी-पुराणों की साफ-सफाई मैं निर्भय होकर कर सकता था। सबसे ऊपरवाली किताब में कुछ गंदगियाँ पड़ी थी जो साफ करने पर कुछ दाग छोड़कर साफ हो गई। तीन-चार किताबों के किनारों को कुतरकर आरी की दांतों की तरह बना देने के अलावा उन चिड़ियों ने मेरा और कोई नुकसान नहीं किया था।

मेरी किताबें और और किताबों का रैक अब पूरी तरह साफ हो गई थी। लेकिन मेरा घर अब सूना हो चुका था।
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