रविवार, 30 अप्रैल 2017

व्यंग्य

महान तपस्वी - मत्सर कुमार


कहते हैं - इस देश में पहले कहीं कोई गंदगी नहीं होती थी। नहीं होती थी तो दिखती कैसे? न तो कहीं कूड़ों का ढेर, होता था, न कहीं बजबजाती हुई नालियाँ होती थीं और न ही कहीं गड़ढों में सड़ता हुआ पानी भरा होता था।

ऐसे में मच्छरों के लिए पैदा होने और जीने का संकट पैदा हो गया था। वंश विनाश का गंभीर खतरा उपस्थित हो गया था। उसी समय मच्छर वंश में एक महाप्रतापी, महान तपस्वी और दृढ़ निश्चयी बालक का जन्म हुआ।

मच्छर वंश के राजपुरोहित ने इस जातक की कुण्डली बनायी। जातक की कुण्डली देखकर राजपुरोहित सुखद आश्चर्य में डूबने-उतराने लगे। उन्होंने देख लिया कि इस जातक के प्रताप से मच्छर वंश का भविष्य अत्यंत उज्ज्वल और सुखमय होनेवाला है। उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से इस जातक के पूर्व जन्म के समस्त दृश्यों को भी देख लिया। गद्गद् होकर उन्होंने मच्छर वंश के समक्ष इस जातक के पूर्व जन्म के रहस्य को उद्घाटित करते हुए कहा कि - ’हे भक्तों! पूर्व जन्म में यह जातक इस देश का महान राजनेता था। अत्यंत प्रतापी मानव कुल में इसका जन्म हुआ था। परिवार के सभी सदस्य या तो अधिकारी थे या व्यापारी। बचपन से ही इनके अंदर खून चूसने की इच्छा उबल-उबल पड़ती थी। इन्हें नेतागिरी के क्षेत्र में खून चूसने की अपार संभावनाएँ दिखी। फलतः यह राजनेता बन गया। राजनेता रहते हुए इन्होंने अपने परिवार के साथ मिलकर देश का खूब खून चूसा। खून चूस-चूसकर इसने देश को रक्तहीन और निश्तेज कर दिया; फिर भी इसकी खूनलिप्सा संतुष्ट नहीं हुई।

एक दिन इसने कुछ अधिक ही खूनपान कर लिया और अपच की बीमारी का शिकार हो गया। न तो आधुनिकतम चिकित्सा पद्धति काम आई और न ही देश के नामी चिकित्सकों की कोई चिकित्सा ही। उनकी खूनचूसी नजरें काफी तेज थी। अस्पताल में रहते हुए उन्होंने देखा कि यह तो खून चूसने का बड़ा निरापद स्थल है। यहाँ सेवा के नाम पर सारे लोग इस काम में पूर्ण मनोयोग से लगे हुए हैं।

बीमार अवस्था में वह महीने भर तक आई. सी. यू. में भर्ती रहा। वहाँ उसे खून चूसने का कोई अवसर नहीं मिलता था। एक तरफ तो उसे खून चूसने का कोई अवसर नहीं मिलता था और दूसरी तरफ वह यहाँ की खूनचुसाई का धंधा देखता रहता था। देख-देखकर उसका मन ईर्ष्या की आग से जल उठता था। और इस तरह उसकी बीमारी और बढ़ती जाती थी। ईर्ष्या की आग से जल-जलकर अंत में यह अकाल ही मृत्युकारित हो गया।

इस तरह इनकी प्रबल खूनलिप्सा अंत तक संतुष्ट नहीं हो सकी। इसी कारण इस जन्म में इसे मच्छर योनी प्राप्त हुई है। परंतु, हे भक्तों! इनकी यही खूनलिप्सा हमारे मच्छर वंश के लिए वरदान साबित होगी।’

आगे राजपुरोहित ने भविष्यवाणी किया कि - ’अपनी इसी खूनलिप्सा के कारण यह जातक महाप्रतापी, महातपस्वी और दृढ़ निश्चयी महान मच्छर के रूप में प्रसिद्ध होगा। बड़ा होकर यह अपने तपोबल के द्वारा मच्छर वंश का उद्धार करेगा। इतिहास में यह जातक महान मत्सर कुमार के नाम से जाना जायेगा।’

कुछ ही दिनों में राजपुरोहत की भविष्यवाणियाँ फलित होने लगी। गंदगी और गंदे स्थानों का अभाव होने के कारण मच्छर वंश का तेजी के साथ विनाश हो रहा था। अपने वंश की विनाशदशा को देखकर मत्सर कुमार को नींद नहीं आती थी। बहुत दिनों तक वह चिंतन-मनन करता रहा। अंत में उसे एक ही उपाय दिखा - तपस्या। तपस्या करने के लिए वह घोर जंगलों में चला गया। वहाँ वह शास्त्रों में वर्णित विधानों के अनुसार घोर तप करने लगा।

भगवान समदर्शी हैं, भक्तवत्सल हैं। वे जल्द ही प्रसन्न हो गये। प्रगट होकर उन्होंने मत्सर कुमार को वरदान दिया कि - ’हे भक्त! मत्सर कुमार, तुम्हारे मन की बात मैं जानता हूँ। मैं तुम्हें वरदान देता हूँ कि मनुष्य के दिमाग के कोने में अब तक सुसुप्तावस्था में पड़ी, गंदगी का उत्सकेन्द्र अब जागृत और सक्रिय हो जायेगी। इससे मनुष्य के मन में गंदगी के प्रति एक प्रबल चाह पैदा होगी। उसका मन और आचरण, दोनों ही गंदगी से भर जायेगा। गंदगी से तृप्त मन से यही गंदगी छलक-छलककर गली-मुहल्लों में फैलती जायेगी और तुम्हारे लिए स्वर्ग का निर्माण करेगी। यही गंदगी तुम्हारे अकाल कालकवलित पूर्वजों का उद्धार करेगी।’

भगवान का यह वरदान मच्छर वंश के लिए बड़ा फलदायी साबित हुआ। आज हर गली और हर मुहल्ला गंदगी से भर हुआ है।
यहाँ की सार्वत्रिक गंदगी के लिए यहाँ के नागरिकों को कदापि दोष नहीं दिया जाना चाहिए। यह तो मत्सर कुमार को दिये गये भगवान के वरदान के कारण होती है। मनुष्य के वश में आखिर है ही क्या? यहाँ सबकुछ ऊपरवाले की इच्छा से होता है।
000 kuber

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