शुक्रवार, 2 जून 2017

व्यंग्य

जाको राखे साईंयाँ


चोचं जी भगवान के बड़े भक्त हैं।  धर्म संबंधी बातों, यथा - आत्मा-परमात्मा, स्वर्ग-नर्क, जीवन-मृत्यु जैसे विषयों के लिए उनके पास बहुत समय होता है। इस तरह की चर्चाओं में वे अक्सर कक्षाओं का बहिष्कार भी करते रहते हैं। ’जाको राखे साईंयाँ मार सके न कोय’ की उक्ति बात-बात में दोहराते रहते हैं।

उस दिन लंच का समय था और वे ईश्वर के संबंध में दिव्य बातें बता रहे थे। ईश्वर के स्वरूप और स्वर्ग के बारे में मेरे मन में बहुत दिनों से एक उलझन थी। चोचं जी जैसा दिव्य व्यक्ति ही इसको सुलझा सकते थे। मैंने कहा - ’’स्वर्ग नामक जिस लोक में ईश्वर निवास करते हैं वहाँ ईश्वर, लक्ष्मी और शेषनाग के अलावा और कोई निवास नहीं करता। शेषनाग तो ठहरे नंग-धड़ंग। परंतु ईश्वर और लक्ष्मी के सारे वस्त्र, और सारे आभूषण, और सारे आयुध पृथ्वीवाले ही प्रतीत होते हैं। वहाँ इन चीजों का उत्पादन नहीं होता क्या? मुझे तो ऐसे स्वर्ग की कोई आकांक्षा नहीं होती, जहाँ कोई काम-घाम नहीं होता।’’ 

चोचं जी विचलित हो गये। कहा - ’’पाप-पुण्य से कुछ डरा करो यार। ईश्वर के बारे में बेसिर-पैर की बातें करते हो।’’

’’डरता हूँ भाई! बहुत डरता हूँ। न मैं ईश्वर की जाति-बिरादरीवाला हूँ और न ही वे मेरे मित्र-संबंधी हैं। आपकी तरह अपनी हैसियत कहाँ?’’   
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