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गुरुवार, 19 अक्टूबर 2017
आलेख - भाषा एवं व्याकरण
हिंदी भाषा में एक बहुप्रयोगित शब्द है - ’कर’। यह एक अनोखा शब्द है, भाषा में यह छः प्रकार से प्रयुक्त होता है; अर्थात् इसके छः अर्थ होते हैं। किसी अन्य भाषा में ऐसा शब्द है या नहीं मुझे ज्ञात नहीं। ’कर’ शब्द के छः अर्थ इस प्रकार हैं -
मंगलवार, 20 जून 2017
आलेख - भाषा एवं व्याकरण
’अनेक’ और ’अनेकों’ तथा ’मैं’ और ’हम’
अनेक विद्वान ’अनेकों शब्द के प्रयोग को गलत मानते हैं। तर्क यह है कि ’अनेक’ शब्द स्वयं बहुवचन शब्द है। बहुवचन का पुनः बहुवचन ’अनेकों कैसे हो सकता है।
’कई’ और ’बहुत’ भी ऐसे ही शब्द हैं। ये भी बहुवचन शब्द हैं। पर कई बार ’कई’ के बदले ’कइयों’ और ’बहुत’ के बदले ’बहुतों’ का प्रयोग किया जाता है। कइयों और बहुतों के प्रयोग को कोई गलत नहीं मानता। क्यों?
जैसे -
1. कई लोग झूठ बोलते हैं।
2. बहुत लोग झूठ बोलते हैं।
3. मैंने कई लोगों को झूठ बोलते देखा है।
4. मैंने बहुत लोगों को झूठ बोलते देखा है।
5. मैंने कईयों को झूठ बोलते देखा है।
6. मैंने बहुतों को झूठ बोलते देखा है।
आम तौर पर वाक्य क्रमांक 5 और 6 का प्रयोग हम करते हैं और इसमें हमें कोई गलती नजर नहीं आती।
क्या यहाँ पर ’कइयों’ और ’बहुतों’ का प्रयोग गलत है?
’सब’ और ’लोग’ शब्द भी बहुवचन शब्द हैं। और ’सबों’ तथा लोगों शब्द का भी प्रयोग प्रचलित है। इन शब्दों पर भी किसी को कोई आपत्ति नहीं है। तब अनेकों शब्द पर आपत्ति क्यों?
निम्न वाक्यों पर विचार कीजिए -
1. मैंने अनेक लोगों को झूठ बोलते देखा है।
2. मैंने अनेकों को झूठ बोलते देखा है।
क्या यहाँ वाक्य क्र. 2 में ’अनेकों’ शब्द का प्रयोग गलत है?
’मैं’ और ’हम’
अब ’मैं’ और ’हम’ सर्वनाम (सर्व अर्थात सब नामों के बदले प्रयुक्त शब्द सर्वनाम कहलाता है।) पर विचार करें। ’हम’ बहुवचन है ’मैं’ का। क्या ऐसा मानना सही है? दुनिया में हर व्यक्ति अपने नाम के बदले (अर्थात स्वयं के लिए) ’मैं’ का प्रयोग करता है। दुनिया में हर व्यक्ति अकेला है। दुनिया में किसी के समान और कोई दूसरा नहीं होता। तब ’मैं’ का बहुवचन कैसे संभव है? वास्तव में ’हम’ बहुत सारे ’मैंओं’ का समुच्चय है।तब क्या बहुत सारे ’अनेक’ का समुच्चय ’अनेकों’ नहीं हो सकता?
000कुबेर000
गुरुवार, 11 मई 2017
आलेख - भाषा एवं व्याकरण
अनुस्वार ( ं ) तथा अनुनासिक ( ँ )
हिंदी में अनुस्वार ( ं ) तथा अनुनासिक ( ँ ) दोनों अलग-अलग ध्वनियाँ हैं। परंतु अनुनासिक ( ँ ) अखबारों से गायब हो चुका है। अखबारों की हिंदी को आदर्श माननेवालों की वर्तनी से भी यह गायब हो चुका है। इन ध्वनियों में निम्न अंतर है -1. अनुस्वार
1. अनुस्वार की ध्वनि को प्रगट करने के लिए वर्ण के ऊपर बिंदु लगाया जाता है जैसा कि इस कोष्टक ( ं ) में दिखाया गया है।2. व्यंजन ध्वनियाँ स्वर के पहले आती है। अनुस्वार स्वर के बाद आनेवाली ध्वनि है अतः इसे व्यंजन ध्वनि नहीं कहा जाना चाहिए। परंतु इसका उच्चारण व्यंजन ध्वनियों की तरह होता है। यह पूर्णतः अनुनासिक ध्वनि है। अतः यह एक व्यंजन ध्वनि है। हिंदी में स्वर रहित पंचमाक्षरों अर्थात अनुनासिक ध्वनियों के लिए अनुस्वार का प्रयोग होता है।
जैसे - च् + अ + ञ् + च् + अ + ल् + अ = चञ्चल या चंचल
परंतु जब कोई पंचमाक्षर किसी पंचमाक्षर से ही संयुक्त हो रहा हो तो अनुस्वार का प्रयोग नहीं होता।
3. अनुस्वार के उच्चारण में जीभ वायु को मुखगुहा में बाधित करती है और मुँह बंद रहता है। अधिकांश वायु नाक से निकलती है।
4. अनुस्वार स्वर ध्वनि के बाद आनेवाली ध्वनि है; अर्थात यह स्वर का अनुसरण करता है इसलिए अनुस्वार कहलाता है।
5. यह दीर्ध स्वर है और छंदों में इसकी मात्रा 2 मानी गयी है।
2. अनुनासिक ( ँ )
1 अनुनासिक की ध्वनि को प्रगट करने के लिए वर्ण के ऊपर चंद्रबिंदु लगाया जाता है जैसा कि इस कोष्टक ( ँ ) में दिखाया गया है। परंतु ए, ऐ, ओ, औ, इ तथा ई की मात्राओं के साथ आने पर इसे बिना चंद्र के लिखा जाता है। जैसे - हैँ को हैं लिखा जाता है।2 अनुनासिक एक स्वर ध्वनि है।
3 अनुनासिक के उच्चारण में मुँह खुला रहता है और अधिकांश वायु मुँह से निकलती है। नाक से बहुत कम वायु निकलती है।
4 यह ह्रस्व स्वर है और छंदों में इसकी मात्रा 1 मानी गई है।
000kuber000
बुधवार, 10 मई 2017
आलेख - भाषा एवं व्याकरण
हिन्दी के वर्ण
1. स्वर वर्ण
स्वर (घोष)
कुल - 11 ह्रस्व स्वर अ, इ, उ, ऋ
दीर्घस्वर आ, ई, ऊ
संयुक्त स्वर (दीर्घ) ए, ऐ, ओ, औ
2. व्यंजन
प्रकार अघोष (श्वास का उपयोग) घोष (स्वर तंत्रियाँ झंकृत होती हैं)
नाद का उपयोग
अल्पप्राण महाप्राण अल्पप्राण महाप्राण अल्पप्राणव्यंजन
(33) क वर्ग स्पर्श कण्ठ से क ख ग घ ड.
च वर्ग तालु से च छ ज झ ञ
ट वर्ग मूर्धा से ट ठ ड ढ ण
त वर्ग दन्त से त थ द ध न
प वर्ग ओष्ठ से प फ ब भ म
अंतःस्थ (अल्पप्राण - घोष) य र ल व
ऊष्म (महाप्राण) श ष स ह
(4) संयुक्त व्यंजन क्ष त्र ज्ञ श्र
(2) द्विगुण व्यंजन (संयुक्त) ड़ ढ़
(2) अनुस्वार एवं विसर्ग ( ं ) (: )
वर्णों का उच्चारण
कंठस्थ अ आ क ख ग घ ड. (: ) हतालव्य इ ई च छ ज झ ञ य ष
मूर्द्धन्य ऋ ट ठ ड ढ ण र श
दन्त्य त थ द ध न ल स
ओष्ठ्य उ ऊ प फ ब भ म
कण्ठतालव्य ए एै
कंठोष्ठ्य ओ औ
दन्तोष्ठ्य व
शुक्रवार, 5 मई 2017
आलेख - भाषा एवं व्याकरण
(2) ’र’ की समस्या - लेखन में र की समस्या वस्तुतः इसे अन्य वर्णों के साथ संयुक्त करने की अथवा र के साथ अन्य वर्णों के संयुक्त होने की समस्या है। ऐसा करते समय इसके रूपों में पर्याप्त भिन्नता पाई जाती है। भाषा विज्ञानियों के अनुसार र के दो रूप हैं -
(1). र, तथा (2) < (कोणवत् रूप)
दूसरा, कोणवत् रूप प्राचीन लिपियों में मिलता है, वर्तमान वर्णमाला में यह विद्यमान नहीं है, परन्तु संयुक्त रूप में यही कोणवत् रूप निम्नलिखित रूपों में आज भी विद्यमान हैं -
1. रेफ के रूप में - उच्चारण क्रम में र के बाद व्यंजन ध्वनि आने पर (अर्थात र जब बिना स्वर ध्वनि के उच्चरित होता है) वह बाद में आनेवाले वर्ण के साथ संयुक्त हो जाता है (तात्पर्य - जब र अन्य वर्ण के साथ संयुक्त होता है।) तब इसे रेफ के रूप में शिरो रेखा के ऊपर लिखा जाता है।
जैसे - क् + अ + र् + म् + अ = कर्म
ध् + अ + र् + म् + अ = धर्म, आदि में।
2. उच्चारण क्रम में र के बाद स्वर ध्वनि आने पर अर्थात र के पूर्व का व्यंजन जब स्वर ध्वनि के बिना उच्चरित होता है और वह र के साथ संयुक्त होता है (तात्पर्य - जब अन्य वर्ण र के साथ संयुक्त होता है।) तब र के कोणवत् रूप का प्रयोग किया जाता है। यह दो प्रकार से होता है -
(अ) खड़ी पाईवाला व्यंजन जब र के साथ संयुक्त होता है तब तब र के कोणवत् रूप < की एक भुजा व्यंजन की खड़ी पाई में समायोजित हो जाता है और निम्न रूप बनता है। जैसे - क् + < = क्र, (जैसे - क्रम में)
क् + र् + अ + म् + अ = क्रम
व्रण घ्राण, प्राण आदि भी इसी के उदाहरण हैं।
(ब) बिना खड़ी पाईवाला व्यंजन जब र के साथ संयुक्त होता हैं तब र का कोणवत् रूप व्यंजन के नीचें संयुक्त होकर निम्न रूप बनाता है। जैसे - ट् + < = ट्र (जैसे राष्ट्र में)
र् + अ + ष् + ट् + र् + अ = राष्ट्र
उसी प्रकार - ड् + < = ड्र (जैसे - ड्रम)
3. कभी-कभी यह ृ रूप धारण कर कृ, घृ, दृ, मृ आदि रूपों में प्रगट होता है। अनेक विद्वान इसे (अर्थात ृ को) ऋ की मात्रा मानते हैं।
(1). र, तथा (2) < (कोणवत् रूप)
दूसरा, कोणवत् रूप प्राचीन लिपियों में मिलता है, वर्तमान वर्णमाला में यह विद्यमान नहीं है, परन्तु संयुक्त रूप में यही कोणवत् रूप निम्नलिखित रूपों में आज भी विद्यमान हैं -
1. रेफ के रूप में - उच्चारण क्रम में र के बाद व्यंजन ध्वनि आने पर (अर्थात र जब बिना स्वर ध्वनि के उच्चरित होता है) वह बाद में आनेवाले वर्ण के साथ संयुक्त हो जाता है (तात्पर्य - जब र अन्य वर्ण के साथ संयुक्त होता है।) तब इसे रेफ के रूप में शिरो रेखा के ऊपर लिखा जाता है।
जैसे - क् + अ + र् + म् + अ = कर्म
ध् + अ + र् + म् + अ = धर्म, आदि में।
2. उच्चारण क्रम में र के बाद स्वर ध्वनि आने पर अर्थात र के पूर्व का व्यंजन जब स्वर ध्वनि के बिना उच्चरित होता है और वह र के साथ संयुक्त होता है (तात्पर्य - जब अन्य वर्ण र के साथ संयुक्त होता है।) तब र के कोणवत् रूप का प्रयोग किया जाता है। यह दो प्रकार से होता है -
(अ) खड़ी पाईवाला व्यंजन जब र के साथ संयुक्त होता है तब तब र के कोणवत् रूप < की एक भुजा व्यंजन की खड़ी पाई में समायोजित हो जाता है और निम्न रूप बनता है। जैसे - क् + < = क्र, (जैसे - क्रम में)
क् + र् + अ + म् + अ = क्रम
व्रण घ्राण, प्राण आदि भी इसी के उदाहरण हैं।
(ब) बिना खड़ी पाईवाला व्यंजन जब र के साथ संयुक्त होता हैं तब र का कोणवत् रूप व्यंजन के नीचें संयुक्त होकर निम्न रूप बनाता है। जैसे - ट् + < = ट्र (जैसे राष्ट्र में)
र् + अ + ष् + ट् + र् + अ = राष्ट्र
उसी प्रकार - ड् + < = ड्र (जैसे - ड्रम)
3. कभी-कभी यह ृ रूप धारण कर कृ, घृ, दृ, मृ आदि रूपों में प्रगट होता है। अनेक विद्वान इसे (अर्थात ृ को) ऋ की मात्रा मानते हैं।
गुरुवार, 4 मई 2017
आलेख - भाषा एवं व्याकरण
कर्ताकारक की विभक्ति - ’ने’ के संदर्भ में -
'ने' विभक्ति अन्य विभक्तियों से विशिष्ट है। वाक्य में क्रिया के लिंग और वचन को यह प्रभावित करता है।
1. सामान्यतः क्रिया के लिंग और वचन का निर्धारण कर्ता के लिंग और वचन के आधार पर होता है। जैसे -
अ. राम रोटी खाता है।
ब. सीता रोटी खाती है।
2. परंतु कर्ता में यदि ’ने’ विभक्ति लगा हो तो क्रिया के लिंग और वचन का निर्धारण कर्म के लिंग और वचन के आधार पर होता है। जैसे -
अ. राम ने रोटी खाई।
ब. सीता ने रोटी खाई।
द. राम ने आम खाया।
इ. सीता ने आम खाया।
3. कर्ता में यदि ’ने’ विभक्ति लगा हो और वाक्य में कर्म न हो तो क्रिया सदैव पुल्लिंग में होता है। जैसे -
राम ने खाया।
सीता ने खाया।
मैंने खाया।
मैंने पढ़ा।
4. यदि कर्ता और कर्म, दोनों में विभक्ति लगा हो तो कर्ता सदैव पुल्लिंग में होता है। जैसे -
राम ने रोटी को खाया।
5. स्वतंत्र रूप में क्रिया पुल्लिंग होता है।
000kuber0001. सामान्यतः क्रिया के लिंग और वचन का निर्धारण कर्ता के लिंग और वचन के आधार पर होता है। जैसे -
अ. राम रोटी खाता है।
ब. सीता रोटी खाती है।
2. परंतु कर्ता में यदि ’ने’ विभक्ति लगा हो तो क्रिया के लिंग और वचन का निर्धारण कर्म के लिंग और वचन के आधार पर होता है। जैसे -
अ. राम ने रोटी खाई।
ब. सीता ने रोटी खाई।
द. राम ने आम खाया।
इ. सीता ने आम खाया।
3. कर्ता में यदि ’ने’ विभक्ति लगा हो और वाक्य में कर्म न हो तो क्रिया सदैव पुल्लिंग में होता है। जैसे -
राम ने खाया।
सीता ने खाया।
मैंने खाया।
मैंने पढ़ा।
4. यदि कर्ता और कर्म, दोनों में विभक्ति लगा हो तो कर्ता सदैव पुल्लिंग में होता है। जैसे -
राम ने रोटी को खाया।
5. स्वतंत्र रूप में क्रिया पुल्लिंग होता है।
बुधवार, 3 मई 2017
आलेख - भाषा एवं व्याकरण
भाषा विचार
भाषविज्ञानियों ने अपने-अपने तरीकों से भाषा को परिभाषित करने का प्रयास किया है। परंतु भाषा की अवधारणा को मानव और उसके स्वरयंत्र द्वारा उच्चरित ध्वनियों तक सीमित करने के बाद भी इसकी सर्वमान्य और पूर्ण परिभाषा अब तक नहीं आई है। इसका कारण भाषा की विलक्षणता है। ध्वनि, शब्द, वाक्य, पदबंध, अनुच्छेद और पाठ, भाषिक संरचना के पदक्रम हैं। भाषा का संबंध हमारे ज्ञान तंत्र से है। भाषा की उपयोगिता के बारे में सोचें तो लिखित व मौखिक अभिव्यक्ति के अलावा चिंतन, विचार, तर्क, कल्पना, विश्लेषण, निष्कर्ष और निर्णय लेने में भी भाषा का प्रयोग होता है। आधुनिक भाषाविज्ञानियों ने भाषा की निम्नलिखित चार प्रमुख विशेषताओं को रेखांकित किया है -
1. DISPLACEMANT (व्यापकता - देशकाल की सीमा से परे होना):-
भाषा मूर्त-अमूर्त, वर्तमान, भूत और भविष्य सबमें व्याप्त है।
2. ARBITERINESS (यादृच्छिकता):-
भाषा के परंपरागत शब्दों की तार्किक व्याख्या संभव नहीं है। (आविष्कार और तकनीकी आवश्यकता के अनुरूप गढ़े गये तकनीकी शब्दावलियों को छोड़कर)
3. DUALITY / MULTIPLICITY (रचनात्मकता):-
भाषा में संदर्भ के अनुसार अर्थ व्यक्त करने की अद्भुत क्षमता होती है।
4. PRODUCTIVITY (उत्पादकता ):-
सीमित ध्वनियों में असीमित अभिव्यक्तियाँ। संसार की समस्त मानव-भाषाओं में 20 से कम और 70 से अधिक ध्वनियाँ नहीं पाई जाती। भारतीय भाषाओं में 50 से 65 तक ध्वनियाँ पाई जाती हैं। उदाहरण स्वरूप अंग्रेजी में ध्वनि संकेत 26 होते हैं और ध्वनियाँ 44 होती हैं। इसके बावजूद भाषा की अभिव्यक्ति क्षमता असीमित होती है।
इसके अलावा संसार की सभी भाषाओं में निम्न विशषताएँ भी पाई जाती हैं:-
1. सी.वी.सी.वी. पैटर्न (CVCV Pattern)
अ. संसार की सभी भाषाओं में ’व्यंजन-स्वर-व्यंजन-स्वर’ एकान्तर क्रम में आते हैं। इसे (CVCV) पैटर्न कहा जाता है। बोलते समय व्यंजन ध्वनि के उच्चारण के लिए जीभ को एक स्थान से दूसरे स्थान के लिए गोता लगाना पड़ता है। इस अवधि में वायु बिना व्यवधान के बाहर आती है और दो व्यंजन ध्वनियों के मध्य स्वर ध्वनि पैदा होती है।
ब. शुरुआत में लगातार दो व्यंजन ध्वनि (cc) वाले शब्द कम पाये जात हैं। जैसे - क्रम (क् र् अ म)
स. शुरुआत में लगातार तीन व्यंजन ध्वनि (ccc) वाले शब्द गिनती के हैं। जैसे - स्प्राइट, (स् प् र् अ इ ट अ)
इसी तरह - स्प्रिट, स्क्वाश ।
द. शुरुआत में लगातार चार व्यंजन ध्वनि (cccc) लगातार आने वाले शब्द नहीं पाये जाते।
2. सभी भाषाओं में कर्ता, क्रिया और कर्म पाये जाते हैं। इनके क्रम अलग हो सकते हैं।
3. कारक - कर्ता और कर्म (संज्ञा अथवा सर्वनाम) का क्रिया के साथ संबंध बताने के लिए विभक्तियों का प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार बने पद को कारक पद कहते हैं। सभी विभक्तियाँ अव्यय होती हैं। जैसे:- राम ने रोटी को खाया।
(यहाँ ’ने’ तथा ’को’ विभक्ति हैं। तथा ’राम ने’ और ’रोटी को’ कारक पद हैं।)
सोमवार, 1 मई 2017
आलेख - भाषा एवं व्याकरण
अव्यय एवं विभक्तियाँ
अव्यय:-
अव्यय ऐसे शब्द को कहते हैं, जिसके रूप में लिंग, वचन, पुरुष, कारक इत्यादि के कारण कोई विकार उत्पन्न नहीं होता। इनका व्यय नहीं होता इसलिए ये अव्यय तथा इनमें विकार उत्पन्न नहीं होते इसलिए ये अविकारी शब्द हैं। जैसे - और, इसलिए, किन्तु, परन्तु, बल्कि, अर्थात्, क्यों, कब, आदि।
कारक:-
संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से वाक्य के अन्य शब्दों के साथ उनका संबंध सूचित हो, उसे कारक कहते हैं।
अथवा
संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से उनका क्रिया से संबंध सूचित हो, उसे कारक कहते हैं।
जैसे - रामचन्द्रजी ने समुद्र पर पुल बंधवाया।
रामचन्द्रजी ने, समुद्र पर तथा पुल कारक पद हैं इनका संबंध बंधवाया क्रिया के साथ सूचित होता है।
विभक्ति:-
कारकपद या क्रियापद बने बिना कोई शब्द वाक्य में बैठने योग्य नहीं होता। कारक पद बनाने के लिये ’ने, पर’ आदि अव्ययों का प्रयोग किया जाता है। इन्हें ही विभक्ति कहा जाता है।
हिन्दी कारकों की विभक्तियों के चिह्न -
कारक विभक्तियाँ
कर्ता 0, ने
कर्म 0, को
करण से
सम्प्रदान को, के, लिए
अपादान से
सम्बन्ध का, के, की, रा, रे, री
अधिकरण में, पर
सम्बोधन 0, हे, अजी, अहो, अरे
विभक्तियों की प्रायोगिक विशेषताएँ :-
1. विभक्तियाँ प्रायः संज्ञा या सर्वनामों के साथ आते हैं।
2. ये अव्यय होते हैं।
3. ये स्वतंत्र होते हैं।
4. इनके अर्थ नहीं होते।
हिन्दी की विभक्तियाँ सर्वनामों के साथ प्रयुक्त होने पर प्रायः उनमें विकार उत्पन्न कर उनसे संयुक्त हो जाते हैं। जैसे - मैंने, मेरा, हमारा आदि।
000KUBER000
बुधवार, 26 अप्रैल 2017
आलेख - भाषा एवं व्याकरण
भाषा एवं व्याकरण : हिंदी के प्रत्यय ’’वाला’’ एवं (पूर्वकालिक प्रत्यय) ’’कर’’ के प्रयोग में अशुद्धियाँ
उपसर्ग:- उपसर्ग उस शब्द या शब्दांश को कहते हैं, जो किसी शब्द के पहले आकर उसका विशेष अर्थ प्रकट करता है। उपसर्ग के प्रयोग से शब्दों की तीन स्थितियाँ होती हैं -
अ. नया शब्द बनता है। जैसे - प्र + हार = प्रहार
ब. मूल अर्थ में परिवर्तन नहीं होता परंतु अर्थ में तेजी आती है। जैसे - परि + भ्रमण = परिभ्रमण
स. विलोम शब्द बनना। जैसे - (1) अ + सत्य = असत्य, (2) परा + जय = पराजय
उपसर्ग की विशेषताएँ:-
(1) ये शब्दांश होते हैं।
(2) ये अव्यय(अविकारी)होते हैं।
(3) वाक्य में ये स्वतंत्र रूप में प्रयुक्त नहीं होते।
(4) इनके अर्थ नहीं होते। किसी शब्द के साथ संगति बैठने पर ही ये अर्थवान बनते हैं।
प्रत्यय:- शब्दों के बाद जो अक्षर या अक्षर समूह लगाया जाता है, उसे ’प्रत्यय’ कहते हैं।
जैसे - भला़ + आई = भलाई
(प्रत्यय की भी वही विशेषताएँ होती हैं जो उपसर्ग की होती हैं।)
प्रत्यय दो प्रकार के होते हैं - 1. कृत्, तथा 2. तद्धित
1. कृदन्त - क्रिया या धातु के अन्त में प्रयुक्त होनेवाले प्रत्ययों को कृत् प्रत्यय कहते हैं और उनके मेल से बने शब्द को कृदन्त। जैसे - गाना(क्रिया)+ वाला = गानेवाला
2. तद्धित - संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण के अन्त में लगनेवाले प्रत्यय को तद्धित कहा जाता है और उनके मेल से बने शब्द तद्धितान्त।
जैसे - मानव + ता = मानवता
अ. नया शब्द बनता है। जैसे - प्र + हार = प्रहार
ब. मूल अर्थ में परिवर्तन नहीं होता परंतु अर्थ में तेजी आती है। जैसे - परि + भ्रमण = परिभ्रमण
स. विलोम शब्द बनना। जैसे - (1) अ + सत्य = असत्य, (2) परा + जय = पराजय
उपसर्ग की विशेषताएँ:-
(1) ये शब्दांश होते हैं।
(2) ये अव्यय(अविकारी)होते हैं।
(3) वाक्य में ये स्वतंत्र रूप में प्रयुक्त नहीं होते।
(4) इनके अर्थ नहीं होते। किसी शब्द के साथ संगति बैठने पर ही ये अर्थवान बनते हैं।
प्रत्यय:- शब्दों के बाद जो अक्षर या अक्षर समूह लगाया जाता है, उसे ’प्रत्यय’ कहते हैं।
जैसे - भला़ + आई = भलाई
(प्रत्यय की भी वही विशेषताएँ होती हैं जो उपसर्ग की होती हैं।)
प्रत्यय दो प्रकार के होते हैं - 1. कृत्, तथा 2. तद्धित
1. कृदन्त - क्रिया या धातु के अन्त में प्रयुक्त होनेवाले प्रत्ययों को कृत् प्रत्यय कहते हैं और उनके मेल से बने शब्द को कृदन्त। जैसे - गाना(क्रिया)+ वाला = गानेवाला
2. तद्धित - संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण के अन्त में लगनेवाले प्रत्यय को तद्धित कहा जाता है और उनके मेल से बने शब्द तद्धितान्त।
जैसे - मानव + ता = मानवता
हिंदी में "वाला’’ प्रत्यय
हिंदी में ’’वाला’’ प्रत्यय के प्रयोग में मनमानी बरती जाती है अर्थात इसे मूल शब्द से अलग लिखने का चलन बढ़ रहा है। जैसे - होने वाला, करने वाला, आने वाला, जाने वाला आदि।
यहाँ पर ’’वाला’’ कोई स्वतंत्र शब्द न होकर एक प्रत्यय है अतः इसे मूल शब्द के साथ मिलाकर लिखा जाना चाहिए। जैसे - होनेवाला, करनेवाला, आनेवाला, जानेवाला आदि।
यहाँ पर ’’वाला’’ कोई स्वतंत्र शब्द न होकर एक प्रत्यय है अतः इसे मूल शब्द के साथ मिलाकर लिखा जाना चाहिए। जैसे - होनेवाला, करनेवाला, आनेवाला, जानेवाला आदि।
हिंदी में पूर्वकालिक प्रत्यय ’’कर’’
पूर्वकालिक क्रिया:- जब कर्ता एक क्रिया समाप्त कर उसी क्षण दूसरी क्रिया में प्रवृत्त होता है तब पहली क्रिया (या अंतिम क्रया के पहले संपन्न होनेवाली सभी क्रियाएँ) पूर्वकालिक क्रिया कहलाती है। जैसे - उसने नहाकर भोजन किया। इसमें नहाना पूर्वकालिक क्रिया है। इसके साथ प्रयुक्त प्रत्यय ’’कर’’ पूर्वकालिक प्रत्यय कहलाता है। यहाँ ’’कर’’ एक प्रत्यय के रूप में प्रयुक्त हो रहा है अतः इसे मूल शब्द से मिलाकर लिखा जाना चाहिए।
हिंदी में पूर्वकालिक प्रत्यय ’’कर’’ के प्रयोग में मनमानी बरती जाती है अर्थात इसे कई बार पूर्वकालिक क्रिया (मूल शब्द) से अलग लिखने का चलन बढ़ रहा है। उदाहरण के रूप में देश के एक सर्वाधिक प्रसिद्ध पत्रिका में कुछ सम्मानित कवियों की काव्य पंक्तियाँ देखिए -
1. हमारे समय के आतताई उन्हें दूसरी तरफ हाँक कर ले गए। (हाँककर)
2. और उनकी पीठ पर बैठी देवी फिसल कर गिर गई है गर्त में। (फिसलकर)
3. कि मुँह खोल कर अँधेरे को कोई अँधेरा न कह सके। (खोलकर)
हिंदी में पूर्वकालिक प्रत्यय ’’कर’’ के प्रयोग में मनमानी बरती जाती है अर्थात इसे कई बार पूर्वकालिक क्रिया (मूल शब्द) से अलग लिखने का चलन बढ़ रहा है। उदाहरण के रूप में देश के एक सर्वाधिक प्रसिद्ध पत्रिका में कुछ सम्मानित कवियों की काव्य पंक्तियाँ देखिए -
1. हमारे समय के आतताई उन्हें दूसरी तरफ हाँक कर ले गए। (हाँककर)
2. और उनकी पीठ पर बैठी देवी फिसल कर गिर गई है गर्त में। (फिसलकर)
3. कि मुँह खोल कर अँधेरे को कोई अँधेरा न कह सके। (खोलकर)
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