गुरुवार, 18 मई 2017

कविता


मेरे गाँव में

महेन्द्र बघेल ’मधु’

1
ये भी कोई तर्क है?
आम और खास में फर्क है।
आजाद हैं आप
पर ’तुम’ गुलाम है
सुबह की तलाश में
शाम ही शाम है।

संघर्ष से थका नहीं,
थमा नहीं
जो कहता है, बखूबी करता है
बेबाकी से, जोश से, खरोश से
कागज से, कलम से।

पर गजब नाकेबंदी है
कारपोरेट घरानों की,
मीडिया दुकानों की
चालबाजों ने
पढ़े, फाड़े
रद्दी टोकरी में गाड़े।

आजादी का बेहिसाब दंभ है,
हाँ! साहब,
व्यवस्था का
वह चैथा स्तंभ है
छपने नहीं देते
संघर्ष को।

मैं की, तुम की
पर कोशिशें जारी है
कोहरा हटाने की
स्वाभिमान जगाने
मेरे गाँव में।
 ऽऽऽ
2
शोर है, शोर है, शोर है,
ट्रकों का, डंपरों का
घुटकुरी में बंपरों का
बेधड़क आना और जाना
यही विकास का तराना।

सोणा है, सोणा है
गाँव में खेत में, नदी में
सोणा है।

देखो! वाहनों से
सड़क अटा है
रेत चूसने जे. सी. बी. डटा है।

चूस लो, चूस लो, दबंगों चूस लो
परसू, परनिया का तो
धूल-धुएँ से यारी है
पूरे गाँव में दमा की बीमारी है।

हक मांगने दम फूल जाता है
मैं, तुम या पड़ोसी
कौन है जो अड़ेगा
दबंगों से लड़ेगा?

तलाश है, तलाश है
घना कोहरा हटाने
तलाश है
मेरे गाँव में।
 ऽऽऽ
3
खार में खेत, नदी में रेत
सुने हैं, होता है
पास में नदी, लोग प्यासे हैं
वाटर बनाने
लायसेंसी तलाशे हैं।

मेरे खेत में विकास आया
एक्सप्रेस वे का
कल-कारखानों का
दबंगों का, मुस्टंडों का
पहलवानों का,
चमचमाती कारों में विद्वानों का
काले चश्मों से झांकते
गाँव की औकात मापते।

चिमनी के धुएँ की छाँव में
कारखाना है मेरे गाँव में
काले, गाढ़े धुएँ में
राख है, धूल है
ताजा गुलाब-गोंदा भी
बासी फूल है।

नाली जाम है छानी का
रंग धूसर है पानी का
श्वास  में गुंगवा
और गले से
इसी गरल को पीते हैं
प्रकृति की गोद में
हम ऐसे ही जीते हैं
मेरे गाँव में।
 ऽऽऽ

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